श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-05 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-पञ्चमोऽध्यायः पाँचवाँ अध्याय भूमण्डल पर स्थित विभिन्न द्वीपों और वर्षों का संक्षिप्त परिचय भुवनलोकवर्णने द्वीपवर्षविभेदवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे देवर्षे ! अब आप द्वीप तथा वर्ष के भेद से देवताओं के द्वारा किये गये सम्पूर्ण भूमण्डल विस्तार के विषय में… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-04 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-चतुऽर्थोऽध्यायः चौथा अध्याय महाराज प्रियव्रत का आख्यान तथा समुद्र और द्वीपों की उत्पत्ति का प्रसंग भुवनकोशविषये प्रियव्रतवंशवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत थे, वे नित्य पिता की सेवामें संलग्न रहते थे तथा सत्य… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-03 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-तृतीयोऽध्यायः तीसरा अध्याय महाराज मनु की वंश-परम्परा का वर्णन भुवनकोशविस्तारे स्वायम्भुवमनुवंशकीर्तनम् श्रीनारायण बोले — हे नारद! इस प्रकार पृथ्वी को यथास्थान प्रतिष्ठित करके भगवान् जब वैकुण्ठ चले गये तब ब्रह्माजी ने अपने पुत्र से कहा — ॥ १ ॥ तेजस्वियों… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-02 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-द्वितीयोऽध्यायः दूसरा अध्याय ब्रह्माजी की नासिका से वराह के रूप में भगवान् श्रीहरि का प्रकट होना और पृथ्वी का उद्धार करना, ब्रह्माजी का उनकी स्तुति करना धरण्युद्धारवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे परन्तप ! मनु एवं मरीचि आदि श्रेष्ठ मुनियों के… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-01 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-प्रथमोऽध्यायः पहला अध्याय प्रजा की सृष्टि के लिये ब्रह्माजी की प्रेरणा से मनु का देवी की आराधना करना तथा देवी का उन्हें वरदान देना भुवनकोशप्रसङ्गे देव्या मनवे वरदानवर्णनम् जनमेजय बोले — [ हे मुने!] आपने सूर्यवंश तथा चन्द्रवंश में उत्पन्न… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-40 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-चत्वारिंशोऽध्यायः चालीसवाँ अध्याय देवी की पूजा-विधि तथा फलश्रुति देवीगीतायां बाह्यपूजाविधिवर्णनम् देवी बोलीं — प्रातः काल उठकर सिर में प्रतिष्ठित ब्रह्मरन्ध्र (सहस्रार-चक्र) – में कर्पूर के समान आभा वाले उज्ज्वल कमल का ध्यान करना चाहिये । उस पर अत्यन्त प्रसन्न, वस्त्र-… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-39 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः उनतालीसवाँ अध्याय देवी-पूजन के विविध प्रकारों का वर्णन देवीगीतायां श्रीदेव्याः पूजाविधिवर्णनम् हिमालय बोले — हे देवेश्वरि ! हे महेश्वरि ! हे करुणासागरे ! हे अम्बिके ! अब आप यथार्थरूप से अपने पूजन की विधि को भलीभाँति बतलाइये ॥ १… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-38 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-अष्टत्रिंशोऽध्यायः अड़तीसवाँ अध्याय भगवती के द्वारा देवीतीर्थों, व्रतों तथा उत्सवों का वर्णन देवीगीतायां महोत्सवव्रतस्थानवर्णनम् हिमालय बोले — हे देवेश्वरि ! इस पृथ्वीतल पर कौन-कौनसे पवित्र, मुख्य, दर्शनीय तथा आप भगवती के लिये अत्यन्त प्रिय स्थान हैं ? हे माता! आपको… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-37 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-सप्तत्रिंशोऽध्यायः सैंत्तीसवाँ अध्याय भगवती द्वारा अपनी श्रेष्ठ भक्ति का वर्णन देवीगीतायां भक्तिमहिमावर्णनम् हिमालय बोले — हे अम्ब! आप मुझे अपनी वह भक्ति बताने की कृपा कीजिये, जिस भक्ति के द्वारा अपरिपक्व वैराग्यवाले मध्यम अधिकारी को भी सुगमतापूर्वक ज्ञान हो जाय… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-36 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-षट्‌त्रिंशोऽध्यायः छत्तीसवाँ अध्याय भगवती के द्वारा हिमालय को ज्ञानोपदेश – ब्रह्मस्वरूप का वर्णन देवीगीतायां ब्रह्मविद्योपदेशवर्णनम् देवी बोलीं — हे राजन् ! इस प्रकार आसन पर सम्यक् विराजमान होकर योग से युक्त चित्तवाले साधक को निष्कपट भक्ति के साथ मुझ ब्रह्मस्वरूपिणी… Read More