श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-01 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-प्रथमोऽध्यायः पहला अध्याय प्रकृतितत्त्वविमर्श: प्रकृति के अंश, कला एवं कलांश से उत्पन्न देवियों का वर्णन प्रकृतिचरित्रवर्णनम् श्रीनारायण बोले — सृष्टिविधान में मूलप्रकृति पाँच प्रकार की कही गयी है — गणेशजननी दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री ॥ १ ॥ नारदजी… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-24 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-चतुर्विंशोऽध्यायः चौबीसवाँ अध्याय देवी की उपासना के विविध प्रसंगों का वर्णन देवीपूजनविधिनिरूपणम् नारदजी बोले — हे तात! देवी के आराधनरूपी धर्म का स्वरूप क्या है ? किस प्रकार से उपासना करने पर वे देवी परम पद प्रदान करती हैं ?… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-23 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-त्रयोविंशोऽध्यायः तेईसवाँ अध्याय नरक प्रदान करने वाले विभिन्न पापों का वर्णन अवशिष्टनरकवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे देवर्षे ! जो दान और धन के आदान-प्रदान में साक्षी बनकर सदा झूठ बोलते हैं, वे पापबुद्धि मनुष्य मरने पर सौ योजन ऊँचे पर्वत-शिखर… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-22 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-द्वाविंशोऽध्यायः बाईसवाँ अध्याय विभिन्न नरकों का वर्णन नरकप्रदपातकवर्णनम् नारदजी बोले — हे सनातन मुने! विविध प्रकार की यातनाओं की प्राप्ति कराने वाले कर्मों के भेद कितने प्रकार के होते हैं; मैं इनके विषय में भलीभाँति सुनना चाहता हूँ ॥ १… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-21 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-एकविंशोऽध्यायः इक्कीसवाँ अध्याय देवर्षि नारद द्वारा भगवान् अनन्त की महिमा का गान तथा नरकों की नामावली नरकस्वरूपवर्णनम् श्रीनारायण बोले — ब्रह्मा के पुत्र महाभाग नारद ब्रह्मदेव की सभा में उन भगवान् शेष की महिमा का गान करते हुए उनकी उपासना… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-20 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-विंशोऽध्यायः बीसवाँ अध्याय तलातल, महातल, रसातल और पाताल तथा भगवान् अनन्त का वर्णन तलातलादिलोकवर्णनेऽनन्तवर्णनम् श्रीनारायण बोले — उस सुतल के नीचे के विवर को ‘तलातल’ कहा गया है । वहाँ त्रिपुराधिपति मय नामक महान् दानव रहता है ॥ १ ॥… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-19 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-एकोनविंशोऽध्यायः उनीसवाँ अध्याय अतल, वितल तथा सुतललोक का वर्णन अतलवितलसुतललोकवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे विप्र ! अतल नाम से विख्यात पहले परम सुन्दर विवर में मय दानव का पुत्र ‘बल’ नामक अति अभिमानी दैत्य रहता है ॥ १ ॥ जिसने… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-18 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-अष्टादशोऽध्यायः अठारहवाँ अध्याय राहुमण्डल का वर्णन राहुमण्डलाद्यवस्थानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] सूर्य से दस हजार योजन नीचे राहुमण्डल कहा गया है। यह सिंहिकापुत्र राहु योग्य न होने पर भी नक्षत्र की भाँति विचरण करता रहता है । चन्द्रमा… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-17 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-सप्तदशोऽध्यायः सत्रहवाँ अध्याय शिशुमारचक्र तथा ध्रुवमण्डल का वर्णन ध्रुवमण्डलसंस्थानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — इस सप्तर्षिमण्डलसे तेरह लाख योजन दूरीपर वह परम वैष्णवपद स्थित है ॥ १ ॥ परम भागवत तथा लोकपूजित उत्तानपादपुत्र श्रीमान् ध्रुव यहींपर विराजमान हैं । इन्द्र, अग्नि, कश्यप,… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-16 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-षोडशोऽध्यायः सोलहवाँ अध्याय चन्द्रमा तथा ग्रहों की गति का वर्णन सोमादिगतिवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] अब आप चन्द्रमा आदि की अद्भुत गति का वर्णन सुनिये। उसकी गति के द्वारा ही मनुष्यों को शुभ तथा अशुभ का परिज्ञान होता… Read More