May 20, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-23 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-त्रयोविंशोऽध्यायः तेईसवाँ अध्याय नरक प्रदान करने वाले विभिन्न पापों का वर्णन अवशिष्टनरकवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे देवर्षे ! जो दान और धन के आदान-प्रदान में साक्षी बनकर सदा झूठ बोलते हैं, वे पापबुद्धि मनुष्य मरने पर सौ योजन ऊँचे पर्वत-शिखर से अवीचि नामक परम भयंकर नरक में गिरते हैं ॥ १-२ ॥ इस अवीचि नामक आधारशून्य नरक में प्राणियों को नीचा सिर किये हुए गिरना पड़ता है, जहाँ स्थलभाग लहरयुक्त जल की भाँति दिखायी पड़ता है । इसीलिये इसे अवीचि कहते हैं । हे देवर्षे ! वहाँ पत्थर-ही-पत्थर बिछे रहते हैं । उनपर गिरने से प्राणियों का शरीर तिल-तिल करके कट जाता है । वे मरते भी नहीं और उसी में उन्हें बार- बार गिराया जाता है ॥ ३-४ ॥ हे ब्रह्मपुत्र ! जो ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणी अथवा व्रत में स्थित अन्य कोई भी प्रमादवश मद्यपान करता है तथा जो क्षत्रिय या वैश्य सोमपान 1 करता है, उसका अयः पान नामक नरक में पतन होता है । मुने! हे ब्रह्मापुत्र ! यमराज के दूत वहाँ पर उन्हें आग से अत्यन्त सन्तप्त तथा पिघला हुआ लोहा पिलाते हैं ॥ ५-६१/२ ॥ हे मुने! जो नराधम स्वयं निम्न श्रेणी में उत्पन्न हुआ है, किंतु अभिमानवश विद्या, जन्म, तप, वर्ण या आश्रम में अपने से श्रेष्ठ पुरुषों का सम्मान नहीं करता; वह महान् अधम मनुष्य आचार, यथोचित यमदूतों के द्वारा क्षारकर्दम नामक नरक में सिर नीचा किये हुए ले जाया जाता है; वहाँ पर वह घोर कष्टप्रद यातनाएँ भोगता है ॥ ७–९ ॥ हे महामुने ! जो मनुष्य मोहग्रस्त होकर नरमेध के द्वारा अन्य [यक्ष, राक्षस आदि ] – का पूजन करते हैं अथवा जो स्त्रियाँ भी नरपशु का मांस खाती हैं; वे रक्षोगणसम्भोज नामक नरक में गिरते हैं। उनके द्वारा इस लोक में मारे गये वे पशु यमपुरी में पहले से ही कसाई के रूप में विद्यमान रहते हैं । हे मुने! जिस प्रकार इस लोक में पशुओं का मांस खाने वाले पुरुष आनन्दित होते हैं, उसी प्रकार वे पशु भी निर्मम कसाई का रूप धारणकर तेज धारवाले अस्त्र से उनके शरीर को काटकर उससे निकले रक्त को पीते हैं और अनेक प्रकार से नाचते तथा गाते हैं ॥ १०–१२ ॥ हे ब्रह्मपुत्र ! जो लोग ग्राम में अथवा जंगल में रहने वाले निरपराध प्राणियों को जो जीने की इच्छा रखते हैं — उन्हें विविध उपायों से विश्वास में लेकर तथा फुसलाकर अपने पास बुला लेते हैं और अपने मनोरंजन के लिये उनके शरीर में काँटे चुभाकर अथवा रस्सी आदि में बाँधकर पीड़ा पहुँचाते हैं, वे मरने पर शूलपात (शूलप्रोत ) नामक नरक में गिरते हैं। उनके शरीर में शूल आदि चुभाये जाते हैं, वे भूख तथा प्यास से अत्यन्त पीड़ित होते हैं और तीखी चोंचवाले कंक, बक आदि पक्षी उन्हें जहाँ-तहाँ नोचते हैं । उस समय कष्ट भोग रहे वे प्राणी अपने पूर्वकृत पापों का बार-बार स्मरण करते हैं ॥ १३-१५१/२ ॥ हे विप्र ! उग्र स्वभाव वाले जो मनुष्य सर्पों की भाँति प्राणियों को उद्विग्न करते हैं, वे मरणोपरान्त दन्दशूक नामक नरक में पड़ते हैं, जहाँ पर पाँच तथा सात मुखों वाले क्रूरस्वभाव सर्प मरने के बाद इस नरक में पहुँचे हुए प्राणियों को चूहे की भाँति निगल जाते हैं ॥ १६-१८ ॥ जो अन्धकूपों में, प्रकाश रहित घर आदि में अथवा अन्धकारयुक्त गुफाओं में प्राणियों को बन्द कर देते हैं, उन पापकर्म परायण लोगों को यमराज के दूत मरने के उपरान्त [अवटारोध नामक नरक में गिराते हैं और ] उनका हाथ पकड़कर विषैली अग्नि के धुएँ से भरे हुए उसी प्रकार के अँधेरे स्थानों में प्रवेश कराकर उन्हें बन्द कर देते हैं ॥ १९-२० ॥ जो द्विज स्वयं गृह का स्वामी होकर अपने यहाँ समय पर आये हुए अतिथियों को पापपूर्ण नेत्र से इस प्रकार देखता है, मानो उसे भस्म ही कर डालेगा, मरने पर उस पापदृष्टि वाले पुरुष को यमराज के सेवक पर्यावर्तन नामक नरक में गिराते हैं । वहाँ पर वज्रतुल्य चोंचों वाले कंक, काक, वट, गीध आदि महान् क्रूर पक्षी बलपूर्वक उसकी आँखें निकाल लेते हैं ॥ २१-२२१/२ ॥ जो अधम मनुष्य अपने को वैभवसम्पन्न मानकर अभिमान से अत्यन्त गर्वित होकर दूसरों को वक्रदृष्टि से देखता है, जो सबके प्रति शंकाभाव रखता है, जो अपने चित्त में सदा धन कमाने किंतु व्यय न करने की ही भावना रखता है तथा ग्रह की भाँति सदा धन की रक्षा करता है, वह सूखते हुए हृदय तथा मुखवाला प्राणी कभी शान्ति को प्राप्त नहीं होता है। मरने पर यमराज के सेवकों द्वारा वह अपने पापकर्म के कारण सूचीमुख नामक नरक में गिराया जाता है । यमराज के दूत उस अर्थपिशाच के सम्पूर्ण अंगों को उसी प्रकार सिल देते हैं, जैसे दर्जी सूई-धागे से वस्त्र सिलते हैं ॥ २३–२६१/२ ॥ हे विप्र ! पापकर्म करने वाले मनुष्यों को यातना देने के लिये ये अनेक प्रकार के नरक हैं । इसी तरह और भी सैकड़ों तथा हजारों नरक हैं । हे देवर्षे ! उनमें से कुछ ही बताये गये हैं, मैंने बहुत-से नरकों का वर्णन ही नहीं किया। हे मुने! पापी मनुष्य अनेक यातनाओं से भरे इन नरकों में जाते हैं और धर्मपरायण लोग सुखप्रद लोकों में जाते हैं ॥ २७–२९ ॥ हे महामुने ! मैंने जिस प्रकार आपसे भगवती के पूजनके स्वरूप और देवी की आराधना के लक्षणों का वर्णन विस्तार से किया है, वही अपना धर्म है; जिसके अनुष्ठानमात्र से मनुष्य नरक में नहीं जाता । सम्यक् प्रकार से पूजित होने पर वे भगवती संसाररूपी समुद्र से प्राणियों का उद्धार कर देती हैं ॥ ३०-३१ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘अवशिष्टनरकवर्णन’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥ 1. क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिये शास्त्र में सोमपान का निषेध है । Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe