शंकराचार्य परम्परा अध्यात्म परम्परा १ ॐ गुरु जी प्रथमे उत्पत्ति आद्य शून्य, २ आद्य शून्य से अनादि शून्य, ३ अनादि शून्य से योगाशून्य, ४ योगाशून्य से महा-शून्य, ५ महा-शून्य से निरा शून्य, ६ निरा शून्य से आत्म-शून्य, ७ आत्म-शून्य से प्रमाल-शून्य, ८ प्रमाल-शून्य से चेतन-शून्य, ९ चेतन-शून्य से अजोड़ी शून्य, १० अजोड़ी शून्य से ओङ्कार, ११ ओङ्कार… Read More
नारायण हृदयम् ।। नारायण हृदयम् ।। भगवान् लक्ष्मी-नारायण की प्रसन्नता के लिए “लक्ष्मी-हृदय” के साथ इसका पाठ करने से धन-धान्य व ऐश्वर्य की वृद्धि होती है । आचम्य प्राणानायम्य देशकालौ स्मृत्वा। अस्मद्गुर्वन्तर्गत – श्रीभारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत – श्रीलक्ष्मीनारायणप्रेरणया श्रीलक्ष्मीनारायणप्रीत्यर्थं ममाभीष्टसिद्ध्यर्थं सङ्कलीकरणरीत्या सम्पुटीकरणरीत्या वा नारायणहृदयस्य सकृदावर्तनं करिष्ये ।… Read More
अग्नियों द्वारा उपदेश अग्नियों द्वारा उपदेश कमल का पुत्र उपकोसल सत्यकाम जाबाल के यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके अध्ययन करता था । बारह वर्षों तक उसने आचार्य एवं अग्नियों की उपासना की । आचार्य ने अन्य सभी ब्रह्मचारियों का समावर्तन-संस्कार कर दिया और उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी । केवल उपकोसल को ऐसा नहीं किया । उपकोसल… Read More
मूसलकिसलयम् मूसलकिसलयम् तेरहवीं शताब्दी में तमिलनाडु में नम्मालवार नाम के तमिल और संस्कृत के एक महान् साहित्यकार हो चुके हैं । वे बचपन में अनपढ़ रसोइया थे । वे आचार्य और उनके छात्रों के लिये भोजन बनाने का कार्य करते थे । आचार्य थे – पेरिया अचन पिल्लई । एक रोज आचार्य ने उस रसोइये से… Read More
पश्चात्ताप का परिणाम पश्चात्ताप का परिणाम इक्ष्वाकु-वंश के महीप त्रिवृष्ण के पुत्र त्र्यरुण की अपने पुरोहित के पुत्र वृशजान से बहुत पटती थी । दोनों एक-दूसरे के बिना नही रह सकते थे । महाराज त्र्यरुण की वीरता और वृशजान के पाण्डित्य से राजकीय समृद्धि नित्य बढ़ रही थी । महाराज ने दिग्विजय-यात्रा की; उन्होंने वृशजान से सारथि-पद स्वीकार… Read More
पूजा में आरती का महत्त्व पूजा में आरती का महत्त्व ‘आरती’ पूजन के अन्त में देवता की प्रसन्नता के हेतु की जाती है । ‘स्कन्द-पुराण’ में लिखा है – “मन्त्र-हीनं क्रिया-हीनं, यत्-कृतं पूजनं हरेः । सर्व सम्पूर्णतामेति, कृते नीराजने शिवे ।।” अर्थात् मन्त्र-हीन और क्रिया-हीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमें सम्पूर्ण पूर्णता आ जाती है ।… Read More
अद्भुत व चमत्कारी गोमती चक्र अद्भुत व चमत्कारी गोमती चक्र होली पर अथवा ग्रहण काल में साधक को चाहिए कि गोमती चक्र अपने सामने रखे लें और उस पर निम्न मन्त्र की 11 माला फेरें :- मन्त्रः- “ॐ वं आरोग्यानिकरी रोगानशेषा नमः” इस प्रकार जब 11 मालाएँ सम्पन्न हो जायें तब साधक को वह गोमती चक्र सावधानी-पूर्वक अपने पास रखना… Read More
भगवान् श्री राम की दिन-चर्या भगवान् श्री राम की दिन-चर्या “आनन्द-रामायण” के राज्य-काण्ड के १९ वेँ सर्ग में ‘भगवान् श्रीराम’ की दिन-चर्या का वर्णन है । इस वर्णन से सदाचारों का महत्त्व भली-भाँति स्पष्ट होता है । महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्यों को बताते हैं – “भगवान् श्रीराम नित्य प्रातः-काल चार घड़ी रात्रि शेष रहते मङ्गल-गीत आदि को श्रवण कर जागते… Read More
कामना अनुसार देवता उपासना कामना अनुसार देवता उपासना श्रीमद्-भागवत (२/३/२-१०) में विभिन्न कामनाओं के उद्देश्य से विभिन्न देवताओं की उपासना का उल्लेख मिलता है – ब्रह्मवर्चसकामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् । इन्द्रमिन्द्रियकामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् ।। देवीं मायां तु श्रीकामस्तेजस्कामो विणावसुम् । वसुकामो वसून् रुद्रान् वीर्यकामोऽथ वीर्यवान् ।। अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान् । विश्वान् देवान राज्यकामः साध्यान् संसाधको विशाम् ।। आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम… Read More
कीड़े से महर्षि मैत्रेय कीड़े से महर्षि मैत्रेय भगवान् व्यास सभी जीवों की गति तथा भाषा को समझते थे । एक बार जब वे कहीं जा रहे थे, तब रास्ते में उन्होंने एक कीड़े को बड़े वेग से भागते हुए देखा । उन्होंने कृपा करके कीड़े की बोली में ही उससे इस प्रकार भागने का कारण पूछा । कीड़े… Read More