श्री पीताम्बरा आरती पीताम्बरि रवि कोटि, ज्योति परा-माया, माँ ज्योति परा माया । बक-मुख ज्योति महा-मुख, बहु कर पर छाया ।। वर कर अष्टादश भुज, शत भुज शत काया । माँ शत भुज शत काया । द्वि-भुज चतुर्भुज बहु-भुज, भुज-मय जग माया ।। जय देवि, जय देवि ! मणि-मण्डप वेदी, माँ, मणिपुर मणि-वेदी ।… Read More


भगवती स्वाहा (स्वाहा देवी) का उपाख्यान श्रीब्रह्मवैवर्त्त-पुराण के प्रकृति-खण्ड के 40 वें अध्याय में भगवती ‘स्वाहा’ का सुन्दर उपाख्यान वर्णित है । नारदजी के पुछे जाने पर भगवान् नारायण कहते है – मुने ! सृष्टि के प्रारम्भिक समय की बात है – देवता भोजन की व्यवस्था के लिये ब्रह्मलोक की मनोहारिणी सभा में गये ।… Read More


पाताली हनुमान् उत्तरप्रदेश के हमीरपुर का “पाताली-हनुमान्” मन्दिर । यह अत्यन्त पवित्र स्थान माना जाता है, मान्यता है कि यहाँ हनुमान् जी स्वयं प्रकट हुए थे, वे सभी भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं । श्रद्धालुओं की रक्षा, साधकों के शत्रुओं का शमन करते हैं, विवाह में आ रही बाधाएँ दूर करते है इत्यादि मान्यताओं… Read More


श्री तारा वन्दना ॐ श्री तारायै नमः जटा पिंगला बद्ध-नागाधिराजा, प्रभा स्वर्ण-बालार्क-बाला हिरण्या । प्रतीची दिशा मेरु-रा तरण्या ।। नदी चोलना पावना कल्पना में, कली प्रस्फुटी पद्म वादी नदी में, जगी प्रात-काले प्रभा सूर्य-कन्या ।। दया-सागरा उग्र-ताश्वेता सु-रम्या । विराजें उसी पुष्प पे उग्र-तारा, करे कर्त्तरी खड्ग वामे सु-धन्या ।। दया-सागरा उग्र-तारा तरण्या ।।… Read More


उपासना का फल महर्षि अत्रि का आश्रम उनकी तपस्या का पवित्र प्रतीक थी । चारों ओर अनुपम शान्ति और दिव्य आनन्द की वृष्टि निरन्तर होती रहती थी । यज्ञ की धूम-शिखाओं और वेद-मन्त्रों के उच्चारण से आश्रम के कण-कण में रमणीयता का निवास था । महर्षि आनन्द-मग्न रहकर भी सदा उदास दीख पड़ते थे ।… Read More


त्यागी कौन ? बहुत बड़े धनी और विद्वान् जमींदार की एक बार किसी महात्मा से भेंट हो गयी । महात्मा बड़े त्यागी थे । जमींदार ने उन्हें एक लँगोटी का कपड़ा देना चाहा, परन्तु महात्मा आवश्यकता न होने से स्वीकार नहीं किया । कुछ समय तक साधु-संग करने पर जमींदार के मन में भी वैराग्य… Read More


षोडशी षोडशी माहेश्वरी शक्ति की सबसे मनोहर श्रीविग्रह वाली सिद्ध देवी है । महाविद्याओं में इनका तीसरा स्थान है । सोलह अक्षरों के मन्त्र वाली इन देवी की अंग-कान्ति उदीयमान सूर्य-मण्डल की आभा की भाँति है । इनकी चार भुजाएँ एवं तीन नेत्र हैं । ये शान्त मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल… Read More


वैदिक गणेश स्तवन गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ।। (शु॰यजु॰ २३।१९) हे परमदेव गणेशजी ! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों प्राणियों के पालक और समस्त सुखनिधियों के निधिपति ! आपका हम आवाहन करते हैं । आप सृष्टि को उत्पन्न… Read More


सीता, राम ही की थाती है बोले वशिष्ठ, सुनिये मान्यवर विदेहराज, याचक प्रतीक्षा करैं, कहाँ मेरे दानी हैं । सुतन समेत ठाढ़े द्वारे दशरथ आज, कैसे विलम्ब होत, अँखियाँ टकटकानी हैं ।।… Read More


स्वरशास्त्रानुसार निवास स्थान का चयन स्वरशास्त्रानुसार किसी व्यक्ति के निवास के लिये उपयुक्त नगर और उसकी दिशा का चयन करते हैं। सबसे पहले हम निवास के लिये उपयुक्त नगर के चयन को लेते हैं। नगर का चयन दो प्रकार से किया जाता है। १॰ नगर और व्यक्ति की नामराशियों से। २॰ नगर और व्यक्ति की… Read More