भगवती ( शताक्षी) शाकम्भरी भगवती ( शताक्षी) शाकम्भरी प्राचीन समय की बात है । दुर्गम नाम का एक महान् दैत्य था । उसका जन्म हिरण्याक्ष के कुलमें हुआ था तथा उसके पिताका नाम रुरु था । ‘देवताओं का बल वेद है । वेदके लुप्त हो जाने पर देवता भी नहीं रहेंगे’ – ऐसा सोचकर दुर्गम ने ब्रह्माजी से वर… Read More
परमभागवत परीक्षित् परमभागवत परीक्षित् जिस समय पाण्डव लोग सभी सुकृत कर्मों का अनुष्ठान करके आत्मा के आत्यन्तिक स्वरूप को जानकर, अपने मन को भगवान् के चरणाम्बुज में लगाकर एकान्त गति को प्राप्त हो गये, उस समय ब्राह्मणों की शिक्षासे महाभागवत राजा परीक्षित् पृथिवीका शासन करने लगे । राजा परीक्षित् ने जब सुना कि ‘कलिकाल के प्रभावसे प्राणियोंके… Read More
श्री सनकादि श्री सनकादि सृष्टि के प्रारम्भ में लोकपितामह ब्रह्मा ने विविध लोकों को रचने की इच्छा से तपस्या की । स्रष्टा के उस अखण्ड तप से प्रसन्न होकर विश्वाधार प्रभु ने ‘तप’ अर्थवाले ‘सन’ नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार-इन चार निवृत्ति-परायण ऊर्ध्वरेता मुनियों के रूपमें अवतार ग्रहण किया । ये प्रकट-काल से… Read More
जय जगदम्बिके ! जय जगदम्बिके ! हो रही सुशोभित लिए खड्ग-गदा-चक्र-चाप, परिधान शूल भुशुण्डि और शंख भी सुघोष हैं । नील घनश्याम रंग नेत्र हैं विशाल तीन, अंग-अंग साज रहे छवि के सु-कोष हैं ।। भक्त-जन ध्यावें जिनके कोमल चरण दस, पावें सुत बित ज्ञान मोक्ष सौं सु-पोष हैं । ऐसी महा-काली गल मुण्ड-माल धारि, करें रक्षा हमारी… Read More
हरि भजन बिना सुख नाहीं रे हरि भजन बिना सुख नाहीं रे हरि भजन बिना सुख नाहीं रे । नर क्यों बिरथा भटकाई रे ।। काशी गया द्वारका जावे, चार धाम तीरथ फिर आवे, मन की मैल न जाई रे । हरि भजन बिना सुख नाहीं रे । छाप तिलक बहु भाँत लगाए, सिर पर जटा विभूत रमाए, हिरदे शांति न… Read More
भक्त श्रीसीहाजी राठौड् भक्त श्रीसीहाजी राठौड् हथूंडी / पाली, मारवाड तेरहवीं शताब्दी का समय था । भारत के क्षितिजि पर संकट के बादल मंडरा रहे थे । मुसलमानों कं आतंक से देशवासी पीड़ित थे । भारत छोटे-छोटे हिन्दू राज्यों में बटा हुआ था, जो मुसलमान आक्रमणकारियों का सामना करने में असमर्थ थे । राजस्थान की दशा विशेष रूप… Read More
धनत्रयोदशी पर यमदीपदान धनत्रयोदशी पर यमदीपदान धनत्रयोदशी पर करणीय कृत्यों में से एक महत्त्वपूर्ण कृत्य है, यम के निमित्त दीपदान । निर्णयसिन्धु में निर्णयामृत और स्कन्द-पुराण के कथन से कहा गया है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को घर से बाहर प्रदोष के समय यम के निमित्त दीपदान करने से अकालमृत्यु का भय दूर होता है ।… Read More
श्री धन्वन्तरि व्रत-कथा श्री गरुड़-पुराणोक्त रोग-नाशिनी श्री धन्वन्तरि व्रत-कथा प्रथम अध्याय सनकादिक मुनियों ने सूत जी से कहा – हे सूत महा-मुने ! आपने भगवान् धन्वन्तरि की पूजा-विधि का विस्तार-पूर्वक वर्णन किया, किन्तु इसे सुनने पर भी हमें तृप्ति नहीं हुई । अतः श्री धन्वन्तरि का माहात्म्य अधिक विस्तार से बताइए । मुनि-श्रेष्ठ सुत जी ने कहा –… Read More
शरत्-पूर्णिमाः ‘लक्ष्मी-इन्द्र-कुबेर-पूजन’ शरत्-पूर्णिमाः ‘लक्ष्मी-इन्द्र-कुबेर-पूजन’ ‘आश्विन पूर्णिमा’ में “प्रदोष-लक्ष्मी-पूजन’ 1. सायं-काल यथा-शक्ति पूजा-सामग्री को एकत्र कर पवित्र आसन पर बैठे। आचमन कर दाएँ हाथ में जल-अक्षत-पुष्प लेकर ‘संकल्प’ करे। यथा- ॐ अस्य रात्रौ आश्विन-मासे-शुक्ल-पक्षे पूर्णिमायां तिथौ अमुक-गोत्रस्य अमुक-शर्मा (वर्मा या दासः) मम सकल-दुःख-दारिद्र्य-निरास-पूर्वक लक्ष्मी-इन्द्र-कुबेर-पूजनं अहं करिष्यामि (करिष्ये)।… Read More
दीन-दयालु दिवाकर देवा दीन-दयालु दिवाकर देवा दीन-दयालु दिवाकर देवा । कर मुनि, मनुज, सुरासुर सेवा ।। हिम-तम-करि-केहरि करमाली । दहन दोष-दुख-दुरित-रुजाली ।।… Read More