रात्रिसूक्त ॥ रात्रिसूक्त ॥ ऋग्वेद के दशम मण्डल दशम अध्याय का १२७वाँ सूक्त रात्रिसूक्त कहलाता है, इसमें आठ ऋचाएँ पठित हैं, जिनमें रात्रिदेवी की महिमा का गान किया गया है । इस सूक्त में बताया गया है कि रात्रिदेवी जगत् के समस्त जीवों के शुभाशुभ कर्मों की साक्षी है और तदनुरूप फल प्रदान करती हैं ।… Read More
देवी-सूक्त / वाक्-सूक्त / आत्म-सूक्त / अम्भृाणी-सूक्त देवी-सूक्त / वाक्-सूक्त / आत्म-सूक्त / अम्भृाणी-सूक्त भगवती पराम्बा के अर्चनपूजन के साथ देवीसूक्त के पाठ की विशेष महिमा है । ऋग्वेद के दशम मण्डल दशम अध्याय का १२५वाँ सूक्त जिसमें आठ ऋचाएँ हैं ‘वाक्-सूक्त’ कहलाता है । इसे ‘आत्मसूक्त’ भी कहते हैं । इसमें अम्भृण-ऋषि की पुत्री वाक् ब्रह्मसाक्षात्कार से सम्पन्न होकर अपनी… Read More
रुद्रसूक्त ( नीलसूक्त) ॥ रुद्रसूक्त ( नीलसूक्त) ॥ भूतभावन भगवान् सदाशिव की प्रसन्नता के लिये रुद्रसूक्त पाठ का विशेष महत्त्व बताया गया है । पूजा में भगवान शंकर को सबसे प्रिय जलधारा है । इसलिये भगवान् शिव के पूजन में रुद्राभिषेक की परम्परा है और अभिषेक में इस ‘रुद्रसूक्त’ की ही प्रमुखता है । रुद्राभिषेक के अन्तर्गत रुद्राष्टाध्यायी… Read More
वैदिक गणेश-स्तवन ॥ वैदिक गणेश-स्तवन ॥ गणानां त्वा गणपतिᳬ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिᳬ हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ (शु०यजु० २३ । १९) हे परमदेव गणेशजी ! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों-प्राणियों के पालक और समस्त सुख-निधियों के निधिपति ! आपका हम आवाहन करते हैं । आप सृष्टि… Read More
ब्रह्मणस्पतिसूक्त ॥ ब्रह्मणस्पतिसूक्त ॥ वैदिक देवता विघ्नेश गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ‘ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मयके अधिष्ठाता हैं । आचार्य सायण से भी प्राचीन वेदभाष्यकार श्रीस्कन्दस्वामी (वि०सं० ६८७) अपने ऋग्वेदभाष्य के प्रारम्भ में लिखते हैं — “विघ्नेश विधिमार्तण्ड़चन्द्रेन्द्रोपेन्द्रवन्दित । नमो गणपते तुभ्यं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते ॥” अर्थात् ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र… Read More
वरुणसूक्त वरुणसूक्त ऋषि — शुनःशेप, आजीगर्ति एवं वशिष्ठ, निवास स्थान —- द्युस्थानीय, ऋग्वेद संहिता, प्रथम मंडल सूक्त 25 ऋग्वेदके प्रथम मण्डल का पचीसवाँ सूक्त वरुणसूक्त कहलाता है । इस सूक्त में शुनःशे पके द्वारा वरुणदेवता की स्तुति की गयी है । शुनःशेप की कथा वेदों, ब्राह्मणग्रन्थों तथा पुराणों में विस्तार से आयी है । कथासार यह… Read More
सूर्य / सौर सूक्त सूर्य सूक्त (क) इस ऋग्वेदीय ‘सूर्य सूक्त ‘ ( १ / ११५ )— के ऋषि ‘कुत्स आङ्गिरस’ हैं, देवता सूर्य हैं और छन्द त्रिष्टुप् है । इस सूक्त के देवता सूर्य सम्पूर्ण विश्व के प्रकाशक ज्योतिर्मय नेत्र हैं, जगत् की आत्मा हैं और प्राणि-मात्र को सत्कर्मों में प्रेरित करनेवाले देव हैं, देवमण्डल में इनका अन्यतम… Read More
॥ गायत्र्यथर्वशीर्षम् ॥ ॥ गायत्र्यथर्वशीर्षम् ॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ नमस्कृत्य भगवान् याज्ञवल्क्यः स्वयं परिपृच्छति- त्वं ब्रूहि भगवन् ! गायत्र्या उत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि ॥ १ ॥ ब्रह्मोवाच – प्रणवेन व्याहृतयः प्रवर्तन्ते । तमसस्तु परं ज्योतिः कः पुरुषः स्वयम्भूर्विष्णुरिति हताः स्वाङ्गुल्याः मथयेत् पाठान्तर – … Read More
वशीकरण हेतु मन्त्र वशीकरण हेतु मन्त्र प्रबल वशीकरण हेतु यह एक अत्यन्त ही विश्वसनीय और अति प्रभावशाली प्रयोग है। इस प्रयोग को विधिपूर्वक नियमानुसार किया जाए तो मनोवांछित लाभ की पूर्ति अवश्य होती है।… Read More
॥ पार्वती – मंगल ॥ – हिन्दी भावार्थ सहित ॥ पार्वती – मंगल ॥ – हिन्दी भावार्थ सहित ॥ श्रीहरि: ॥ ॥ पार्वती-मंगल ॥ बिनइ गुरहि गुनिगनहि गिरिहि गननाथहि । हृदयँ आनि सिय राम धरे धनु भाथहि ॥ १ ॥ गावउँ गौरि गिरीस बिबाह सुहावन । पाप नसावन पावन मुनि मन भावन ॥ २ ॥ ‘गुरु’ की, ‘गुणी लोगों’ (विज्ञजनों) – की, ‘पर्वतराज’ (हिमालय)… Read More