श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-41 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकचत्वारिंशोऽध्यायः इकतालीसवाँ अध्याय ब्रह्माजी का इन्द्र तथा देवताओं को साथ लेकर श्रीहरि के पास जाना, श्रीहरि का उनसे लक्ष्मी के रुष्ट होने के कारणों को बताना, समुद्रमन्थन तथा उससे लक्ष्मीजी का प्रादुर्भाव श्रीलक्ष्म्युपाख्यानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे ब्रह्मन् ! भगवान्… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-40 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चत्वारिंशोऽध्यायः चालीसवाँ अध्याय दुर्वासा के शाप से इन्द्र का श्रीहीन हो जाना लक्ष्म्युत्पत्तिवर्णनम् नारदजी बोले — [हे भगवन्!] वे श्रेष्ठ महालक्ष्मी भगवान् नारायण की प्रिया होकर वैकुण्ठ में निवास करती हैं। वे सनातनी भगवती वैकुण्ठ की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-39 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः उनतालीसवाँ अध्याय भगवती लक्ष्मी का प्राकट्य, समस्त देवताओं द्वारा उनका पूजन लक्ष्म्युपाख्यानवर्णनम् नारदजी बोले — [ हे भगवन् ! ] मैं सावित्री तथा धर्मराज के संवाद में निराकार मूलप्रकृति भगवती गायत्री का निर्मल यश सुन चुका। उनके गुणों का… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-38 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-अष्टत्रिंशोऽध्यायः अड़तीसवाँ अध्याय धर्मराज का सावित्री से भगवती की महिमा का वर्णन करना और उसके पति को जीवनदान देना सावित्र्युपाख्यानवर्णनम् सावित्री बोली — [ हे प्रभो ! ] आप मुझे भगवती की भक्ति प्रदान कीजिये; वह देवीभक्ति समस्त तत्त्वों का… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-37 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-सप्तत्रिंशोऽध्यायः सैंतीसवाँ अध्याय विभिन्न नरककुण्ड तथा वहाँ दी जानेवाली यातना का वर्णन नानानरककुण्डवर्णनम् धर्मराज बोले — हे साध्वि ! वे सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमा की भाँति गोलाकार तथा बहुत गहरे हैं। अनेक प्रकार के पत्थरों से बनाये गये हैं ।… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-36 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-षट्‌त्रिंशोऽध्यायः छतीसवाँ अध्याय धर्मराज द्वारा सावित्री से देवोपासना से प्राप्त होने वाले पुण्यफलों को कहना देवपूजनात् सर्वारिष्टनिवृत्तिवर्णनम् सावित्री बोली — हे वेद-वेदांग में पारंगत महाभाग धर्मराज! नानाविध पुराणों तथा इतिहासों में जो सारस्वरूप है, उसे प्रदर्शित कीजिये। अब आप मुझसे… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-35 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-पञ्चत्रिंशोऽध्यायः पैंतीसवाँ अध्याय विभिन्न पापकर्मों से प्राप्त होने वाली विभिन्न योनियों का वर्णन नानाकर्मविपाकफलकथनम् धर्मराज बोले — हे साध्वि ! देवताओं की उपासना के बिना कर्म-बन्धन से मुक्ति नहीं होती । शुद्ध कर्म का बीज शुद्ध होता है और कुकर्म… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-34 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चतुस्त्रिंशोऽध्यायः चौंतीसवाँ अध्याय विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण प्राप्त होने वाले नरकों का वर्णन नानाकर्मविपाकफलवर्णनम् यमराज बोले — [ हे सावित्रि!] भारतवर्ष में जो कोई निर्दयी तथा क्रूर व्यक्ति खड्ग से किसी जीव को काटता है या कोई नरघाती धन… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-33 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः तैंतीसवाँ अध्याय विभिन्न नरककुण्डों में जाने वाले पापियों तथा उनके पापों का वर्णन नानाकर्मविपाकफलकथनम् धर्मराज बोले — हे साध्वि ! भगवान् श्रीहरि की सेवामें संलग्न रहने वाला, विशुद्धात्मा, योगसिद्ध, व्रती, तपस्वी तथा ब्रह्मचारी पुरुष निश्चित ही नरक में नहीं… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-32 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-द्वात्रिंशोऽध्यायः बतीसवाँ अध्याय धर्मराज का सावित्री को अशुभ कर्मों के फल बताना सावित्र्युपाख्याने कुण्डसंख्यानिरूपणम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] सूर्यपुत्र यमराज सावित्री को विधिपूर्वक भगवती के महामन्त्र मायाबीज की दीक्षा प्रदानकर उसे प्राणियों के अशुभ कर्म का फल बताने… Read More