May 26, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-41 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकचत्वारिंशोऽध्यायः इकतालीसवाँ अध्याय ब्रह्माजी का इन्द्र तथा देवताओं को साथ लेकर श्रीहरि के पास जाना, श्रीहरि का उनसे लक्ष्मी के रुष्ट होने के कारणों को बताना, समुद्रमन्थन तथा उससे लक्ष्मीजी का प्रादुर्भाव श्रीलक्ष्म्युपाख्यानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे ब्रह्मन् ! भगवान् श्रीहरि का ध्यान करके देवराज इन्द्र बृहस्पति को आगे करके सम्पूर्ण देवताओं के साथ ब्रह्मा की सभा में गये । इन्द्रसमेत सभी देवताओं ने गुरु बृहस्पति के साथ शीघ्र ही ब्रह्मलोक जाकर पद्मयोनि ब्रह्माजी का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया ॥ २ ॥ तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पति ने ब्रह्माजी से सारा वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर ब्रह्माजी हँस करके देवराज इन्द्र से कहने लगे ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे वत्स ! तुम मेरे वंश में उत्पन्न हुए हो और मेरे बुद्धिमान् प्रपौत्र हो, इसके अतिरिक्त बृहस्पति के शिष्य हो और स्वयं देवताओं के स्वामी हो । परम प्रतापी तथा विष्णुभक्त दक्षप्रजापति तुम्हारे नाना हैं। जिसके तीनों कुल पवित्र हों, वह पुरुष अहंकारी कैसे हो सकता है ? जिसकी माता पतिव्रता, पिता शुद्धस्वरूप और नाना तथा मामा जितेन्द्रिय हों, वह अहंकारयुक्त कैसे हो सकता है ? पिता के दोष, नाना के दोष और गुरु के दोष — इन्हीं तीन दोषों से ही मनुष्य भगवान् श्रीहरि का द्रोही हो जाता है ॥ ४-७ ॥ सभी की अन्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सभी प्राणियों के शरीर में विराजमान रहते हैं । वे भगवान् जिसके शरीर से निकल जाते हैं, वह प्राणी उसी क्षण शव हो जाता है ॥ ८ ॥ मैं प्राणियों के शरीर में इन्द्रियों का स्वामी मन बनकर रहता हूँ, शंकर ज्ञान का रूप धारण करके रहते हैं और विष्णु की प्राणस्वरूपा भगवती श्रीराधा मूलप्रकृति के रूप में और साध्वी भगवती दुर्गा बुद्धिरूप में विराजमान हैं। निद्रा आदि सभी शक्तियाँ भगवती प्रकृति की कलाएँ हैं । आत्मा का प्रतिबिम्ब भोगशरीर धारण करके जीवरूप में प्रतिष्ठित है। शरीर के स्वामी रूप आत्मा के देह से निकल जाने पर ये सब उसी के साथ तुरंत उसी प्रकार चले जाते हैं, जैसे मार्ग में चलते हुए राजा के पीछे-पीछे उसके अनुचर आदि चलते हैं ॥ ९-११ ॥ मैं, शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म, महाविराट् तथा तुम सब लोग जिनके अंश तथा भक्त हैं; उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र पुष्प का तुमने अपमान कर दिया है ॥ १२ ॥ शंकरजी ने जिस पुष्प से भगवान् श्रीहरि के चरणकमल की पूजा की थी, वही पुष्प मुनि दुर्वासा के द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया था; किंतु तुमने दैववश उसका तिरस्कार कर दिया ॥ १३ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल से च्युत वह पुष्प जिसके मस्तक पर स्थान पाता है, उसकी पूजा सभी देवताओं में सबसे पहले होती है ॥ १४ ॥ तुम तो दैव के द्वारा ठग लिये गये हो । प्रारब्ध सबसे अधिक बलशाली होता है । भाग्यहीन तथा मूर्ख व्यक्ति की रक्षा करने में कौन समर्थ है ? ॥ १५ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित किये जाने वाले पुष्प का तुम्हारे द्वारा त्याग किये जाने के कारण वे भगवती श्रीदेवी कोप करके इस समय तुम्हारे पास से चली गयी हैं । अत: तुम इसी समय मेरे तथा गुरु बृहस्पति के साथ वैकुण्ठ चलो। मेरे वर के प्रभाव से वहाँ पर लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि की सेवा करके तुम लक्ष्मी को पुनः प्राप्त कर लोगे ॥ १६१/२ ॥ [ हे नारद!] ऐसा कहकर ब्रह्माजी ने सभी देवताओं के साथ वैकुण्ठलोक पहुँचकर परब्रह्म सनातन भगवान् श्रीहरि को देखा। वे तेजस्वरूप प्रभु अपने ही तेज से देदीप्यमान हो रहे थे, वे ग्रीष्म ऋतु मध्याह्नकालीन सौ करोड़ सूर्यों की प्रभा से युक्त थे, आदि-अन्त- मध्य से रहित अनन्तरूप लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि शान्तभाव से विराजमान थे, वे प्रभु चार भुजाओं वाले पार्षदों तथा भगवती सरस्वती के साथ सुशोभित हो रहे थे और चारों वेदोंसहित देवी गंगा भक्तिभाव से युक्त होकर उनके पास विराजमान थीं । उन प्रभु को देखकर ब्रह्मा के सभी देवताओं ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। भक्ति तथा विनय से युक्त होकर अनुगामी देवताओं ने नेत्रों में आँसू भरकर उन परमेश्वर की स्तुति की ॥ १७–२१ ॥ तत्पश्चात् स्वयं ब्रह्माजी ने हाथ जोड़कर भगवान् श्रीहरि से सारा वृत्तान्त कहा। अपने अधिकार से वंचित सभी देवता उस समय रो रहे थे ॥ २२ ॥ उन भगवान् श्रीहरि ने देखा कि सभी देवगण विपत्ति से ग्रस्त, भय से व्याकुल, रत्न तथा आभूषण से विहीन, वाहन आदि से रहित, शोभाशून्य, श्रीहीन, निस्तेज तथा अत्यन्त भयग्रस्त हैं । उन्हें इस प्रकार कष्ट से व्याकुल देखकर संसार का भय दूर करने वाले प्रभु कहने लगे ॥ २३-२४ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे ब्रह्मन्! हे देवगण ! आप लोग मत डरिये । मेरे रहते आप लोगों को किस बात का भय है। मैं आप लोगों को परम ऐश्वर्य की वृद्धि करने वाली स्थिर लक्ष्मी प्रदान करूँगा। किंतु मेरी कुछ समयोचित बात सुनिये; जो हितकर, सत्य, सारभूत तथा परिणाम में सुखकारी है ॥ २५-२६ ॥ जैसे अनन्त ब्रह्माण्डों में रहने वाले सभी प्राणी निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने भक्तों के अधीन रहता हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ । मेरे प्रति समर्पित मेरा निरंकुश भक्त जिस-जिसके ऊपर रुष्ट होता है, उसके घर मैं लक्ष्मी के साथ कभी नहीं ठहरता — यह निश्चित है ॥ २७-२८ ॥ भगवान् शंकर के अंश से उत्पन्न ऋषि दुर्वासा महान् वैष्णव हैं तथा मेरे प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं । उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है, अतः मैं आप लोगों के घर से लक्ष्मीसहित चला आया हूँ ॥ २९ ॥ जहाँ शंखध्वनि नहीं होती, तुलसी नहीं रहतीं, शिव की पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणों को भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं ॥ ३० ॥ हे ब्रह्मन् ! हे देवगण! जहाँ मेरी तथा मेरे भक्तों की निन्दा होती है, वहाँ से महालक्ष्मी अत्यन्त रुष्ट होकर चली जाती हैं और उसका पराभव हो जाता है ॥ ३१ ॥ जो मूर्ख मनुष्य मेरी भक्ति से रहित है तथा एकादशी और मेरे जन्म के दिन (जन्माष्टमी आदि ) – को भोजन करता है, उसके भी घर से लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ३२ ॥ जो व्यक्ति मेरे नाम का तथा अपनी कन्या का विक्रय करता है और जिसके यहाँ अतिथि भोजन नहीं करता, उसके घर से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ३३ ॥ जो ब्राह्मण वेश्या का पुत्र है अथवा उसका पति है, वह महापापी है। जो विप्र ऐसे पापी के घर जाता है तथा शूद्र का श्राद्धान्न खाता है, उसके घर से कमलासना महालक्ष्मी अत्यन्त रुष्ट होकर चली जाती हैं ॥ ३४१/२ ॥ हे देवगण! जो द्विजाधम शूद्रों का शव जलाता है, वह भाग्यहीन हो जाता है। उससे रुष्ट होकर कमलवासिनी लक्ष्मी उसके घर से चली जाती हैं ॥ ३५१/२ ॥ जो ब्राह्मण शूद्रों के यहाँ भोजन पकाने का काम करता है तथा जो बैल हाँकता है, उसका जल पीने से लक्ष्मी डरती हैं और उसके घर से चली जाती हैं ॥ ३६१/२ ॥ जो ब्राह्मण अशुद्ध हृदय वाला, क्रूर, हिंसक, दूसरों की निन्दा करने वाला तथा शूद्रों का यज्ञ कराने- वाला होता है, उसके घर से भगवती लक्ष्मी चली जाती हैं। जो ब्राह्मण पति-पुत्रहीन स्त्री का अन्न खाता है, उसके घर से भी जगज्जननी लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ३७-३८ ॥ जो नखों से निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है अथवा नखों से भूमि को कुरेदता रहता है तथा जिसके यहाँ से ब्राह्मण निराश होकर चला जाता है, उसके घर से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ३९ ॥ जो ब्राह्मण सूर्योदय के समय भोजन करता है, दिन में शयन करता है तथा दिन में मैथुन करता है, उसके यहाँ से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४० ॥ जो ब्राह्मण आचारहीन, शूद्रों से दान ग्रहण करने वाला, दीक्षा से विहीन तथा मूर्ख है; उसके भी घर से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४१ ॥ जो अल्पज्ञ भींगे पैर अथवा नग्न होकर सोता है तथा वाचाल की भाँति निरन्तर बोलता रहता है, उसके घर से वे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४२ ॥ जो व्यक्ति अपने सिर पर तेल लगाकर उसी हाथ से दूसरे के अंग का स्पर्श करता है और अपने किसी अंग को बाजे की तरह बजाता है, उससे रुष्ट होकर वे लक्ष्मी उसके घर से चली जाती हैं ॥ ४३ ॥ जो ब्राह्मण व्रत-उपवास नहीं करता, सन्ध्या- वन्दन नहीं करता, सदा अपवित्र रहता है तथा भगवान् विष्णु की भक्ति से रहित है, उसके यहाँ से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४४ ॥ जो व्यक्ति ब्राह्मण की निन्दा करता है और उससे सदा द्वेषभाव रखता है, जीवों की हिंसा करता है तथा प्राणियों के प्रति दयाभाव नहीं रखता है; सबकी जननी लक्ष्मी उस व्यक्ति से दूर चली जाती हैं ॥ ४५ ॥ जिस-जिस जगह भगवान् विष्णु की पूजा होती है तथा उनका गुणगान होता है, वहाँ सम्पूर्ण मंगलों को भी मंगल प्रदान करने वाली वे भगवती लक्ष्मी निवास करती हैं ॥ ४६ ॥ हे पितामह! जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके भक्तों का यशोगान किया जाता है, वहाँ उन श्रीकृष्ण की प्रिया भगवती लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं ॥ ४७ ॥ जहाँ शंखध्वनि होती है और शंख, शालग्रामशिला तथा तुलसीदल — ये रहते हैं एवं उनकी सेवा, वन्दना तथा ध्यान किया जाता है; वहाँ वे लक्ष्मी सर्वदा निवास करती हैं ॥ ४८ ॥ जहाँ शिवलिंग की पूजा तथा उनके गुणों का शुभ कीर्तन और भगवती दुर्गा का पूजन तथा उनका गुणगान किया जाता है, वहाँ पद्मनिवासिनी देवी लक्ष्मी वास करती हैं ॥ ४९ ॥ जहाँ ब्राह्मणों की सेवा होती है, उन्हें उत्तम भोजन कराया जाता है और सभी देवताओं की पूजा होती है, वहाँ कमल के समान मुखवाली साध्वी लक्ष्मी विराजमान रहती हैं ॥ ५० ॥ [ हे नारद!] समस्त देवताओंसे ऐसा कहकर लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि ने लक्ष्मीजी से कहा — क्षीरसागर के यहाँ तुम अपनी एक कला से जन्म ग्रहण करो ॥ ५१ ॥ लक्ष्मीजी से ऐसा कहकर जगत्प्रभु श्रीहरि ने ब्रह्माजी से पुनः कहा — हे कमलोद्भव ! आप समुद्रमन्थन करके उससे प्रकट होने वाली लक्ष्मी देवताओं को सौंप दीजिये ॥ ५२ ॥ हे मुने! ऐसा कहकर लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरि अन्तःपुर में चले गये और देवताओं ने भी कुछ काल के अनन्तर क्षीरसागर की ओर प्रस्थान किया ॥ ५३ ॥ समस्त देवताओं तथा राक्षसों ने मन्दराचल-पर्वत को मथानी, कच्छप को आधार और शेषनाग को मथानी की रस्सी बनाकर समुद्रमन्थन किया । उसके परिणामस्वरूप उन्हें धन्वन्तरि, अमृत, इच्छित उच्चैःश्रवा नामक अश्व, अनेकविध रत्न, हाथियों में रत्नस्वरूप ऐरावत, लक्ष्मी, सुदर्शन चक्र और वनमाला आदि प्राप्त हुए । हे मुने! तब विष्णुपरायणा साध्वी लक्ष्मी ने वह वनमाला क्षीरसागर में शयन करने वाले मनोहर सर्वेश्वर श्रीविष्णु को समर्पित कर दी ॥ ५४-५६ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्मा, शिव तथा देवताओं के द्वारा पूजा तथा स्तुति किये जाने पर भगवती लक्ष्मी ने देवताओं के भवन पर अपनी कृपादृष्टि डाली, फलस्वरूप वे देवगण मुनि दुर्वासा के शाप से मुक्त हो गये । हे नारद! इस प्रकार महालक्ष्मी के अनुग्रह तथा वरदान से उन देवताओं ने दैत्यों के द्वारा अधिकृत किये गये तथा भयंकर बना दिये गये अपने राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया ॥ ५७-५८ ॥ इस प्रकार मैंने लक्ष्मी का अत्यन्त उत्तम, सुखप्रद तथा सारभूत सम्पूर्ण उपाख्यान आपसे कह दिया, अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं?॥ ५९ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘श्रीलक्ष्मी- उपाख्यानवर्णन’ नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥ Content is available only for registered users. 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