अग्निपुराण – अध्याय 258
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
व्यवहार के वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य, साहस, विक्रियासम्प्रदान, सम्भूय-समुत्थान, स्तेय, स्त्री-संग्रहण तथा प्रकीर्णक- इन विवादास्पद विषयों पर विचार
वाक्‌पारुष्यादिप्रकरणं

वाक्पारुष्य
[अब ‘वाक्पारुष्य’ (कठोर गाली देने आदि) के विषय में विचार किया जाता है। इसका लक्षण नारदजी ने इस प्रकार बताया है “देश, जाति और कुल आदि को कोसते हुए उनके सम्बन्ध में जो अश्लील और प्रतिकूल अर्थवाली बात कही जाती है, उसको ‘वाक्पारुष्य’ कहते हैं।” प्रतिकूल अर्थ वाली से तात्पर्य है उद्वेगजनक वाक्य से। जैसे कोई कहे ‘गौडदेशवाले बड़े झगड़ालू होते हैं’ तो यह देश पर आक्षेप हुआ। ‘ब्राह्मण बड़े लालची होते हैं’यह जाति पर आक्षेप हुआ, तथा ‘विश्वामित्रगोत्रीय बड़े क्रूर चरित्र वाले होते हैं’ यह कुल पर आक्षेप हुआ। यह ‘वाक्पारुष्य’ तीन प्रकार का होता है ‘निष्ठुर’, ‘अश्लील’ और ‘तीव्र’। इनका दण्ड भी उत्तरोत्तर भारी होता है। आक्षेपयुक्त वचन को ‘निष्ठुर’ कहते हैं, जिसमें अभद्र बात कही जाय, वह ‘अश्लील’ है और जिससे किसी पर पातको होने का आरोप हो, वह वाक्य ‘तीव्र’ है। जैसे किसी ने कहा ‘तू मूर्ख है, मौगड़ है, तुझे धिक्कार है’ यह साक्षेप वचन ‘निष्ठुर’ की कोटि में आता है, किसी की माँ-बहिन के लिये गाली निकालना ‘अश्लील’ है और किसी को यह कहना कि ‘तू शराबी है, गुरुपत्नीगामी है’ ऐसा कटुवचन ‘तीव्र’ कहा गया है। इस तरह वाक्पारुष्य के अपराधों पर दण्डविधान कैसे किया जाता है, इसी का यहाँ विचार है ]’

अग्निदेव कहते हैं — जो न्यूनाङ्ग (लँगड़े-लूले आदि) हैं, न्यूनेन्द्रिय (अन्धे बहरे आदि) हैं तथा जो रोगी (दूषित चर्म वाले, कोढ़ी आदि) हैं, उनपर सत्यवचन, असत्यवचन अथवा अन्यथा-स्तुति के द्वारा कोई आक्षेप करे तो राजा उस पर साढ़े बारह पण दण्ड लगाये। (“इन महोदय की दोनों आँखें नहीं हैं, इसलिये लोग इन्हें ‘अंधा’ कहते हैं” यह सत्यवचन द्वारा आक्षेप हुआ। “इनकी आँखें तो सही-सलामत हैं, फिर भी लोग इन्हें ‘अंधा’ कहते हैं” यह असत्यवचन द्वारा आक्षेप हुआ। ‘तुम विकृताकार होने से ही दर्शनीय हो गये हो’ यह ‘अन्यथास्तुति’ है।) ॥ १ ॥

जो मनुष्य किसी पर आक्षेप करते हुए इस प्रकार कहे कि ‘मैं तेरी बहिन से, तेरी माँ से समागम करूँगा’ तो राजा उस पर पचीस पण का अर्थदण्ड लगाये। यदि गाली देने वाले की अपेक्षा गाली पाने वाला अधम 1  है तो उसको गाली देने के अपराध में श्रेष्ठ पुरुष पर उक्त दण्ड का आधा लगेगा तथा परायी स्त्री एवं उच्चजातिवाले को अधम के द्वारा गाली दी गयी हो तो उसके ऊपर पूर्वोक्त दण्ड दुगुना लगाया जाय। वर्ण और जाति की लघुता और श्रेष्ठता को देखकर राजा दण्ड की व्यवस्था करे। वर्णकि ‘प्रातिलोम्यापवाद में अर्थात् निम्नवर्ण के पुरुष द्वारा उच्चवर्ण के पुरुष पर आक्षेप किये जाने पर दुगुने और तिगुने दण्ड का विधान है। जैसे ब्राह्मण को कटुवचन सुनाने वाले क्षत्रिय पर पूर्वोक्त द्विगुण दण्ड, पचास पण से दुगुने दण्ड सौ पण, लगाये जाने चाहिये तथा वही अपराध करने वाले वैश्य पर तिगुने, अर्थात् डेढ़ सौ पण दण्ड लगने चाहिये। इसी तरह ‘आनुलोम्यापवाद ‘ में, अर्थात् उच्चवर्ण द्वारा हीनवर्ण के मनुष्य पर आक्षेप किये जाने पर क्रमशः आधे आधे दण्ड की कमी हो जाती है। अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय पर आक्रोश करे तो पचास पण दण्ड दे, वैश्य पर करे तो पच्चीस पण और यदि शूद्र पर करे तो साढ़े बारह पण दण्ड दे। यदि कोई मनुष्य वाणी द्वारा दूसरों को इस प्रकार धमकावे कि ‘मैं तुम्हारी बाँह उखाड़ लूँगा, गर्दन मरोड़ दूँगा, आँखें फोड़ दूंगा और जाँघ तोड़ डालूँगा’ तो राजा उस पर सौ पण का दण्ड लगावे और जो पैर, नाक, कान और हाथ आदि तोड़ने को कहे, उस पर पचास पणका अर्थदण्ड लागू करे। यदि असमर्थ मनुष्य ऐसा कहे, तो राजा उसपर दस पण दण्ड लगावे और समर्थ मनुष्य असमर्थ को ऐसा कहे, तो उससे पूर्वोक्त सौ पण दण्ड वसूल करे। साथ ही असमर्थ मनुष्य की रक्षा के लिये उससे कोई ‘प्रतिभू’ (जमानतदार) भी माँगे। किसी को पतित सिद्ध करने के लिये आक्षेप करने वाले मनुष्य को मध्यम साहस का दण्ड देना चाहिये तथा उपपातक का मिथ्या आरोप करने वाले पर प्रथम साहस का दण्ड लगाना चाहिये। वेदविद्या-सम्पन्न ब्राह्मण, राजा अथवा देवता की निन्दा करने वालों को उत्तम साहस, जातियों के सङ्घ की निन्दा करने वाले को मध्यम साहस और ग्राम या देश की निन्दा करने वाले को प्रथम साहस का दण्ड देना चाहिये ॥ २-८ ॥

दण्डपारुष्य
[अब ‘दण्डपारुष्य’ प्रस्तुत किया जाता है। नारद जी के कथनानुसार उसका स्वरूप इस प्रकार है ” दूसरों के शरीर पर, अथवा उसकी स्थावर- जङ्गम वस्तुओं पर हाथ, पैर, अस्त्र-शस्त्र तथा पत्थर आदि से जो चोट पहुंचायी जाती है तथा राख, धूल और मल-मूत्र आदि फेंककर उसके मन में दुःख उत्पन्न किया जाता है, यह दोनों ही प्रकार का व्यवहार ‘दण्डपारुष्य’ कहलाता है।” उसके तीन कारण बताये जाते हैं ‘ अवगोरण’ (मारने के लिये उद्योग), ‘निः सङ्गपातन’ (निष्ठुरतापूर्वक नीचे गिरा देना) और ‘क्षतदर्शन’ (रक्त निकाल देना)। इन तीनों के द्वारा हीन द्रव्य पर, मध्यम द्रव्य पर और उत्तम द्रव्य पर जो आक्रमण होता है, उसको दृष्टि में रखकर ‘दण्डपारुष्य के तीन भेद किये जाते हैं। ‘दण्डपारुष्य का निर्णय करके उसके लिये अपराधी को दण्ड दिया जाता है। उसके स्वरूप में संदेह होने पर निर्णय के कारण बता रहे हैं ]

यदि कोई मनुष्य राजा के पास आकर इस आशय का अभियोगपत्र दे कि ‘अमुक व्यक्ति ने एकान्त स्थान में मुझे मारा है’, तो राजा इस कार्य में चिह्नों से, युक्तियों से, आशय (जनप्रवादसे) तथा दिव्य प्रमाण से निश्चय करे। ‘अभियोग लगाने वाले ने अपने शरीर पर घाव का कपटपूर्वक चिह्न तो नहीं बना लिया है’, इस संदेह के कारण उसका परीक्षण (छानबीन) आवश्यक है। दूसरे के ऊपर राख, कीचड़ या धूल फेंकने वाले पर दस पण और अपवित्र वस्तु या थूक डालने वाले, अथवा अपने पैर की एड़ी छुआ देने वाले पर राजा बीस पण दण्ड लगाये। यह दण्ड समान वर्णवालों के प्रति ऐसा अपराध करने वालों के लिये ही बताया गया है। परायी स्त्रियों और अपने से उत्तम वर्णवाले पुरुषों के प्रति पूर्वोक्त व्यवहार करने पर मनुष्य दुगुने दण्ड का भागी होता है और अपने से हीन वर्ण वालों के प्रति ऐसा व्यवहार करने पर मनुष्य आधा दण्ड पाने का अधिकारी होता है। यदि कोई मोह एवं मद के वशीभूत (नशे में) होकर ऐसा अपराध कर बैठे तो उसे दण्ड नहीं देना चाहिये ॥ ९-११ ॥

ब्राह्मणेतर मनुष्य अपने जिस अङ्ग से ब्राह्मण को पीड़ा दे-मारे-पीटे, उसका वह अङ्ग छेदन कर देने योग्य है। ब्राह्मण के वध के लिये शस्त्र उठा लेने पर उस पुरुष को प्रथम साहस का दण्ड मिलना चाहिये। यदि उसने मारने की इच्छा से शस्त्र आदि का स्पर्शमात्र किया हो तो उसे प्रथम साहस के आधे दण्ड से दण्डित करना चाहिये। अपने समान जाति वाले मनुष्य को मारने के लिये हाथ उठाने वाले को दस पण, लात उठाने वाले को बीस पण और एक-दूसरे के वध के लिये शस्त्र उठाने पर सभी वर्णक लोगों को मध्यम साहस का दण्ड देना चाहिये। किसी के पैर, केश, वस्त्र और हाथ इनमें से कोई सा भी पकड़कर खींचने या झटका देने पर अपराधी को दस पण का दण्ड लगावे। इसी तरह दूसरे को कपड़े में लपेटकर जोर-जोर से दबाने, घसीटने और पैरों से आघात करने पर आक्रामक से सौ पण वसूल करे। जो किसी पर लाठी आदि से ऐसा प्रहार करे कि उसे दुःख तो हो, किंतु शरी रसे रक्त न निकले, तो उस मनुष्य पर बत्तीस पण दण्ड लगावे। यदि उस प्रहार से रक्त निकल आवे तो अपराधी पर इससे दूना, चौंसठ पण दण्ड लगाया जाना चाहिये। किसी के हाथ-पाँव अथवा दाँत तोड़ने वाले, नाक कान काटने वाले, घाव को कुचल देने वाले या मारकर मृतकतुल्य बना देने वाले पर मध्यम साहस पाँच सौ पण का दण्ड लगाया जाय। किसी की चेष्टा, भोजन या वाणी को रोकने वाले आँख, जिह्वा आदि को फोड़ने या छेदने वाले या कंधा, भुजा और जाँघ तोड़ने वाले को भी मध्यम साहस का दण्ड देना चाहिये। यदि बहुत से मनुष्य मिलकर एक मनुष्य का अङ्गभङ्ग करें तो जिस-जिस अपराध के लिये जो-जो दण्ड बताया गया है, उससे दूना दण्ड प्रत्येक को दे। परस्पर कलह होते समय जिसने जिसकी जो वस्तु हड़प ली हो, राजा की आज्ञा से उसे उसकी वह वस्तु लौटा देनी होगी और अपहरण के अपराध में उस अपहृत वस्तु के मूल्य से दूना दण्ड राजा के लिये देना होगा। जो मनुष्य किसी पर प्रहार करके उसे घायल कर दे, वह उसके घाव भरने और स्वस्थ होने तक औषध, पथ्य एवं चिकित्सा में जितना व्यय हो, उसका भार वहन करे। साथ ही जिस कलह के लिये जो दण्ड बताया गया है, उतना अर्थदण्ड भी चुकाये। नाव से लोगों को पार उतारने वाला नाविक यदि स्थलमार्ग का शुल्क ग्रहण करता है तो उस पर दस पण दण्ड लगाना चाहिये। यदि यजमान  के पास वैभव हो और पड़ोस में विद्वान् और सदाचारी ब्राह्मण बसते हों तो श्रद्ध आदि में उनको निमन्त्रण न देने पर उस यजमान पर भी वही दण्ड लगाना चाहिये। किसी की दीवार पर मुद्गर आदि से आघात करने वाले पर पाँच पण, उसे विदीर्ण करने वाले पर दस पण तथा उसको फोड़ने या दो टूक करने वाले पर बीस पण दण्ड लगाया जाय और वह दीवार गिरा देने वाले से पैंतीस पण दण्ड वसूल किया जाय। साथ ही उस दीवार के मालिक को नये सिरे से दीवार बनाने का व्यय उससे दिलाया जाय। किसी के घर में दुःखोत्पादक वस्तु-कण्टक आदि फेंकने वाले पर सोलह पण और शीघ्र प्राण हरण करने वाली वस्तु-विषधर सर्प आदि फेंकने पर मध्यम साहस-पाँच सौ पण दण्ड देने का विधान है। क्षुद्र पशु को पीड़ा पहुँचाने वाले पर दो पण, उसके शरीर से रुधिर निकाल देने वाले पर चार पण, सींग तोड़ने वाले पर छः पण तथा अङ्ग भङ्ग करने वाले पर आठ पण दण्ड लगावे। क्षुद्र पशु का लिङ्ग-छेदन करने या उसको मार डालने पर मध्यम साहस का दण्ड दे और अपराधी से स्वामी को उस पशु का मूल्य दिलाये। महान् पशु-हाथी घोड़े आदि के प्रति दुःखोत्पादन आदि पूर्वोक्त अपराध करने पर क्षुद्र पशुओं की अपेक्षा दूना दण्ड जानना चाहिये। जिनकी डालियाँ काटकर अन्यत्र लगा दी जाने पर अङ्कुरित हो जाती हैं, वे बरगद आदि वृक्ष ‘प्ररोहिशाखी’ कहलाते हैं। ऐसे प्ररोही वृक्षों की तथा जिनकी डालियाँ अङ्कुरित नहीं होतीं, परंतु जो जीविका चलाने के साधन बनते हैं, उन आम आदि वृक्षों की शाखा, स्कन्ध तथा मूलसहित समूचे वृक्ष का छेदन करने पर क्रमशः बीस पण, चालीस पण और अस्सी पण दण्ड लगाने का विधान है ॥ १२-२५ ॥

साहस प्रकरण
(अब ‘साहस’ नामक विवादपद का विवेचन करने के लिये पहले उसका लक्षण बताते हैं) सामान्य द्रव्य अथवा परकीय द्रव्य का बलपूर्वक अपहरण ‘साहस’ कहलाता है। (यहाँ यह कहा गया कि राजदण्ड का उल्लङ्घन करके, जनसाधारण के आक्रोश की कोई परवा किये बिना राजकीय पुरुषों से भिन्न लोगों के सामने जो मारण, अपहरण तथा परस्त्री के प्रति बलात्कार आदि किया जाता है, वह सब ‘साहस’ की कोटि में आता है।) जो दूसरोंके द्रव्यका अपहरण करता है, उसके ऊपर उस अपहृत द्रव्यके मूल्यसे दूना दण्ड लगाना चाहिये। जो ‘साहस’ (लूट-पाट, डकैती आदि) कर्म करके उसे स्वीकार नहीं करता- ‘मैंने नहीं किया है’ ऐसा उत्तर देता है, उसके ऊपर वस्तुके मूल्यसे चौगुना दण्ड लगाना उचित है ॥ २६ ॥

जो मनुष्य दूसरे से डकैती आदि ‘साहस’ करवाता है, उससे उस साहस के लिये कथित दण्ड से दूना दण्ड लेना चाहिये। जो ऐसा कहकर कि “मैं तुम्हें धन दूँगा, तुम ‘साहस’ (डकैती आदि) करो”, दूसरे से ‘साहस’ का काम कराता है, उससे साहसिक के लिये नियत दण्ड की अपेक्षा चौगुना दण्ड वसूल करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष (आचार्य आदि) की निन्दा या आज्ञा का उल्लङ्घन करने वाले, भ्रातृपत्नी (भौजाई या भयहु) पर प्रहार करने वाले, प्रतिज्ञा करके न देने वाले, किसी के बंद घर का ताला तोड़कर खोलने वाले तथा पड़ोसी और कुटुम्बीजनों का अपकार करने वाले पर राजा पचास पण का दण्ड लगावे, यह शास्त्र का निर्णय है ॥ २७-२८ ॥

(बिना नियोग के) स्वेच्छाचारपूर्वक विधवा से गमन करने वाले, संकटग्रस्त मनुष्य के पुकारने पर उसकी रक्षा के लिये दौड़कर न जाने वाले, अकारण ही लोगों को रक्षा के लिये पुकारने वाले, चाण्डाल होकर श्रेष्ठ जाति वालों का स्पर्श करने वाले, दैव एवं पितृकार्य में संन्यासी को भोजन कराने वाले, शूद्र, अनुचित शपथ करने वाले, अयोग्य (अनधिकारी) होने पर भी योग्य (अधिकारी) – के कर्म (वेदाध्ययनादि) करने वाले, बैल एवं क्षुद्र पशु-बकरे आदि को बधिया करने वाले, साधारण वस्तुमें भी ठगी करने वाले तथा दासी का गर्भ गिराने वाले पर एवं पिता-पुत्र, बहिन-भाई, पति-पत्नी तथा आचार्य शिष्य — ये पतित न होते हुए भी यदि एक-दूसरे का त्याग करते हों तो इनके ऊपर भी सौ पण दण्ड लगावे। यदि धोबी दूसरों के वस्त्र पहने तो तीन पण और यदि बेचे, भाड़े पर दे, बन्धक रखे या मँगनी दे, तो दस पण अर्थदण्ड के योग्य होता है।2  तोलनदण्ड, शासन, मान (प्रस्थ, द्रोण आदि) तथा नाणक (मुद्रा आदि से चिह्नित निष्क आदि)- इनमें जो कूटकारी (मान के वजन में कमी-बेशी तथा सुवर्ण में ताँबे आदि को मिलावट करने वाला) हो तथा उससे कूट-तुला आदि व्यवहार करता हो, उन दोनों को पृथक् पृथक् उत्तम साहस के दण्ड से दण्डित करना चाहिये। सिक्कों को परीक्षा करते समय यदि पारखी असली सिक्के को नकली या नकली सिक्के को असली बतावे तो राजा उससे भी प्रथम साहस का दण्ड वसूल करे। जो वैद्य आयुर्वेद को न जानने पर भी पशुओं, मनुष्यों और राजकर्मचारियों की मिथ्या चिकित्सा करे, उसे क्रमशः प्रथम, मध्यम और उत्तम साहस के दण्ड से दण्डित करे। जो राजपुरुष कैद न करने योग्य (निरपराध) मनुष्यों को राजा की आज्ञा के बिना कैद करता है और बन्धन के योग्य बन्दी को उसके अभियोग का निर्णय होने के पहले ही छोड़ देता है, उसे उत्तम साहस का दण्ड देना चाहिये। जो व्यापारी कूटमान अथवा तुला से धान-कपास आदि पण्यद्रव्य का अष्टमांश हरण करता है, वह दो सौ पण के दण्ड से दण्डनीय होता है। अपहृत द्रव्य यदि अष्टमांश से अधिक या कम हो तो दण्ड में भी वृद्धि और कमी करनी चाहिये। ओषधि, घृत, तेल, लवण, गन्धद्रव्य, धान्य और गुड़ आदि पण्य वस्तुओं में जो निस्सार वस्तु का मिश्रण कर देता है, राजा उसपर सोलह पण दण्ड लगावे ॥ २९-३९ ॥

यदि व्यापारी लोग संगठित होकर राजा के द्वारा निश्चित किये हुए भाव को जानते हुए भी लोभवश कारु और शिल्पियों को पीड़ा देने वाले मूल्य की वृद्धि या कमी करें तो राजा उन पर एक हजार पण का दण्ड लागू करे। राजा निकटवर्ती हो तो उनके द्वारा जिस वस्तु का जो मूल्य निर्धारित कर दिया गया हो, व्यापारीगण प्रतिदिन उसी भाव से क्रय-विक्रय करें; उसमें जो बचत हो, वही बनियों के लिये लाभकारक मानी गयी है। व्यापारी देशज वस्तु पर पाँच प्रतिशत लाभ रखे और विदेशी द्रव्य को यदि शीघ्र ही क्रय- विक्रय कर ले तो उसपर दस प्रतिशत लाभ ले। राजा दूकान का खर्च पण्यवस्तु पर रखकर उसका भाव इस प्रकार निश्चित करे, जिससे क्रेता और विक्रेता को लाभ हो ॥ ४०-४३ ॥

विक्रीयासम्प्रदान

(प्रसङ्गप्राप्त ‘साहस’ का प्रकरण समाप्त करके अब ‘विक्रीयासम्प्रदान’ आरम्भ करते हैं। नारदजी के वचनानुसार ‘विक्रीयासम्प्रदान’ का स्वरूप इस प्रकार है — “मूल्य लेकर पण्यवस्तु का विक्रय करके जब खरीददार को वह वस्तु नहीं दी जाती है, तब वह ‘विक्रीयासम्प्रदान’ (बेचकर भी वस्तु को न देना) नामक विवादास्पद कहलाता है।” विक्रेय वस्तु ‘चल’ और ‘अचल ‘के भेद से दो प्रकार की होती है। फिर उसके छः भेद किये गये हैं — गणित, तुलित, मेय, क्रियोपलक्षित, रूपोपलक्षित और दीप्ति से उपलक्षित। सुपारी के फल आदि ‘गणित’ हैं; क्योंकि वे गिनकर बेचे जाते हैं। सोना, कस्तूरी और केसर आदि ‘तुलित’ हैं; क्योंकि वे तौलकर बेचे जाते हैं। शाली (अगहनी धान) आदि ‘मेय’ हैं; क्योंकि वे पात्रविशेष से माप कर दिये जाते हैं। ‘क्रियोपलक्षित’ वस्तु में घोड़े, भैंस आदि की गणना है; क्योंकि उनकी चाल और दोहन आदि को क्रिया को दृष्टि में रखकर ही उनका क्रय-विक्रय होता है। ‘रूपोपलक्षित’ वस्तु में पण्यस्त्री (वेश्या) आदि की गणना है; क्योंकि उनके रूप के अनुसार ही उनका मूल्य होता है। ‘दीप्ति से उपलक्षित’ वस्तुओं में हौरा, मोती, मरकत और पद्मराग आदि की गणना है। इन छहों प्रकार की पण्यवस्तु को बेचकर, मूल्य लेकर भी यदि क्रेता को वह वस्तु नहीं दी जाती तो विक्रेता को किस प्रकार दण्डित करना चाहिये, यह बताते हैं —) जो व्यापारी मूल्य लेकर भी ग्राहक को माल न दे, उससे वृद्धिसहित वह माल ग्राहक को दिलाया जाय। यदि ग्राहक परदेश का हो तो उसके देश में ले जाकर बेचने से जो लाभ होता है, उस लाभसहित वह वस्तु राजा व्यापारी से ग्राहक को दिलावे। यदि पहला ग्राहक माल में किसी प्रकार संदेह होने पर वस्तु को न लेना चाहे तो व्यापारी उस बेची हुई वस्तु को भी दूसरे के हाथ बेच सकता है। यदि विक्रेता के देने पर भी ग्राहक न ले और वह पण्य वस्तु राजा या दैव की बाधा से नष्ट हो जाय तो वह हानि क्रेता के ही दोष से होने के कारण वही उस हानि को सहन करेगा, बेचने वाला नहीं। यदि ग्राहक के माँगने पर भी उस बेची हुई पण्य वस्तु को बेचने वाला नहीं दे और वह पण्य द्रव्य राजा या दैव के कोप से उपहत हो जाय तो वह हानि विक्रेता की होगी ॥ ४४-४६ ॥

जो व्यापारी किसी को बेची हुई वस्तु दूसरे के हाथ बेचता है, अथवा दूषित वस्तु को दोषरहित बतलाकर बेचता है, राजा उसपर वस्तु के मूल्य से दुगुना अर्थदण्ड लगावे। जान-बूझकर खरीदे हुए पण्यद्रव्यों का मूल्य खरीदने के बाद यदि बढ़ गया या घट गया तो उससे होने वाले लाभ या हानि को जो ग्राहक नहीं जानता, उसे ‘अनुशय’ (माल लेने में आनाकानी) नहीं करनी चाहिये। विक्रेता भी यदि बढ़े हुए दाम के कारण अपने को लगे हुए घाटे को नहीं जान पाया है तो उसे भी माल देने में आनाकानी नहीं करनी चाहिये। इससे यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है कि खरीद-बिक्री के पश्चात् यदि ग्राहक को घाटा दिखायी दे तो वह माल लेने में आपत्ति कर सकता है। इसी तरह विक्रेता उस भाव पर माल देने में यदि हानि देखे तो वह उस माल को रोक सकता है। यदि अनुशय न करने की स्थिति में क्रेता या विक्रेता अनुशय करें तो उनपर पण्य वस्तु के मूल्य का छठा अंश दण्ड लगाना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥

सम्भूयसमुत्थान
जो व्यापारी सम्मिलित होकर लाभ के लिये व्यापार करते हैं, वे अपने नियोजित धन के अनुसार अथवा पहले के समझौते के अनुसार लाभ-हानि में भाग ग्रहण करें। यदि उनमें कोई अपने साझीदारों के मना करने पर या उनके अनुमति न देने पर, अथवा प्रमादवश किसी वस्तु में हानि करेगा, तो क्षतिपूर्ति उसे ही करनी होगी। यदि उनमें से कोई पण्यद्रव्य की विप्लवों से रक्षा करेगा तो वह दशमांश लाभ का भागी होगा ॥ ४९-५० ॥

पण्यद्रव्यों का मूल्य निश्चित करने के कारण राजा मूल्य का बीसवाँ भाग अपने शुल्क के रूप में ग्रहण करे। यदि कोई व्यापारी राजा के द्वारा निषिद्ध एवं राजोपयोगी वस्तु को लाभ के लोभ से किसी दूसरे के हाथ बेचता है तो राजा उससे वह वस्तु बिना मूल्य दिये ले सकता है। जो मनुष्य शुल्कस्थान में वस्तु का मिथ्या परिमाण बतलाता है, अथवा वहाँ से खिसक जाने की चेष्टा करता है तथा जो कोई बहाना बनाकर किसी विवादास्पद वस्तु का क्रय-विक्रय करता है — इन सब पर पण्यवस्तु के मूल्य से आठगुना दण्ड लगाना चाहिये। यदि संघबद्ध होकर काम करने वालों में से कोई देशान्तर में जाकर मृत्यु को प्राप्त हो जाय तो उसके हिस्से के द्रव्य को दायाद (पुत्र आदि), बान्धव (मातुल आदि) अथवा ज्ञाति (सजातीय- सपिण्ड) आकर ले लें। उनके न होने पर उस धन को राजा ग्रहण करे। संघबद्ध होकर काम करने वालों में जो कुटिल या वञ्चक हो, उसे किसी तरह का लाभ दिये बिना ही संघ से बाहर कर दे। उनमें से जो अपना कार्य स्वयं करने में असमर्थ हो, वह दूसरे से करावे। होता आदि ऋत्विजों, किसानों तथा शिल्पकर्मोपजीवी नट, नर्तकादिकों के लिये भी रहन-सहन का ढंग उपर्युक्त कथन से स्पष्ट कर दिया गया ॥ ५१-५४ ॥

स्तेय-प्रकरण
(अब ‘स्तेय’ अथवा चोरी के विषय में बताया जाता है। मनुजी ने ‘साहस’ और ‘चोरी’ में अन्तर बताते हुए लिखा है — “जो द्रव्य-रक्षकों के समक्ष बलात् पराये धन को लूटा जाता है, वह ‘साहस’ या ‘डकैती’ है। तथा जो पराया धन स्वामी की दृष्टि से बचकर या किसी को चकमा देकर हड़प लिया जाता है, तथा ‘मैंने यह कर्म किया है’ यह बात भय के कारण छिपायी जाती है, किसी पर प्रकट नहीं होने दी जाती, वह सब ‘स्तेय’ (चोरी) कर्म है।” चोर को कैसे पकड़ना चाहिये, यह बात बता रहे हैं 一)

किसी के यहाँ चोरी होने पर ग्राहक-राजकीय कर्मचारी या आरक्षा विभाग का सिपाही ऐसे व्यक्ति को पकड़े, जो लोगों में चोरी के लिये विख्यात हो — जिसे सब लोग चोर कहते हैं, अथवा जिसके पास चोरी का चिह्न — चोरी गया हुआ माल मिल जाय, उसे पकड़े। अथवा चोरी के दिन से ही चोर के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए पता लग जाने पर उस चोर को बंदी बनावे। जो पहले भी चौर्य-कर्म का अपराधी रहा हो तथा जिसका कोई शुद्ध-निश्चित निवासस्थान न हो, ऐसे व्यक्ति को भी संदेह में कैद करे। जो पूछने पर अपनी जाति और नाम आदि को छिपावें, जो द्युतक्रीडा, वेश्यागमन और मद्यपान में आसक्त हों, चोरी के विषय में पूछने पर जिनका मुँह सूख जाय और स्वर विकृत हो जाय, जो दूसरों के धन और घर के विषय में पूछते फिरें, जो गुप्तरूप से विचरण करें, जो आय न होने पर भी बहुत व्यय करने वाले हों तथा जो विनष्ट द्रव्यों (फटे-पुराने वस्त्रों और टूटे-फूटे बर्तन आदि) को बेचते हों — ऐसे अन्य लोगों को भी चोरी के संदेह में पकड़ लेना चाहिये। जो मनुष्य चोरी के संदेह में पकड़ा गया हो, वह यदि अपनी निदर्दोषिता को प्रमाणित न कर सके तो राजा उससे चोरी का धन दिलाकर उसे चोर का दण्ड दे। राजा चोर से चोरी का धन दिलाकर उसे अनेक प्रकार के शारीरिक दण्ड देते हुए मरवा डाले। यह दण्ड बहुमूल्य वस्तुओं की भारी चोरी होने पर ही देने योग्य है; किंतु यदि चोरी करने वाला ब्राह्मण हो तो उसके ललाट में दाग देकर उसको अपने राज्य से निर्वासित कर दे। यदि गाँव में मनुष्य आदि किसी प्राणी का वध हो जाय, अथवा धन की चोरी हो जाय और चोर के गाँव से बाहर निकल जाने का कोई चिह्न न दिखायी दे तो सारा दोष ग्रामपाल पर आता है। वही चोर को पकड़कर राजा के हवाले करे। यदि ऐसा न कर सके तो जिसके घर में धन की चोरी हुई है, उस गृहस्वामी को चोरी का सारा धन अपने पास से दे। यदि चोर के गाँव से बाहर निकल जाने का कोई चिह्न वह दिखा सके तो जिस भूभाग में चोर का प्रवेश हुआ है, उसका अधिपति ही चोर को पकड़वावे, अथवा चोरी का धन अपने पास से दे। यदि विवीत स्थान में अपहरण की घटना हुई है तो विवीत स्वामी का ही सारा दोष है। यदि मार्ग में या विवीत-स्थान से बाहर दूसरे क्षेत्र में चोरी का कोई माल मिले या चोर का ही चिह्न लक्षित हो तो चोर पकड़ने के काम पर नियुक्त हुए मार्गपाल का अथवा उस दिशा के संरक्षक का दोष होता है। यदि गाँव से बाहर, किंतु ग्राम की सीमा के अंदर के क्षेत्र में चोरी आदि की घटना घटित हो तो उस ग्राम के निवासी ही क्षतिपूर्ति करें। उनपर यह उत्तरदायित्व तभीतक आता है, जबतक चौर का पदचिह्न सीमा के बाहर गया हुआ नहीं दिखायी देता। यदि सीमा के बाहर गया दिखायी पड़े, तो जिस ग्राम आदि में उसका प्रवेश हो, वहीं के लोग चोर को पकड़‌वाने और चोरी का माल वापस देने के लिये जिम्मेदार हैं। यदि अनेक गाँवों के बीच में एक कोस की सीमा से बाहर हत्या और चोरी की घटना घटित हुई हो और अधिक जनसमूह की दौड़-धूप से चोर का पदचिह्न मिट गया हो तो पाँच गाँव के लोग अथवा दस गाँव के लोग मिलकर चोर को पकड़वाने तथा चोरी का माल वापस देने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लें। बंदी को गुप्तरूप से जेल से छुड़ाकर भगा ले जाने वाले, घोड़ों और हाथियों की चोरी करने वाले तथा बलपूर्वक किसी की हत्या करने वाले लोगों को राजा शूली पर चढ़वा दे। राजा वस्त्र आदि की चोरी करने वाले और गठरी आदि काटने वाले चोरों के प्रथम अपराध में क्रमशः अङ्गुष्ठ और तर्जनी कटवा दे और दूसरी बार वही अपराध करने पर उन दोनों को क्रमशः एक हाथ तथा एक पैर से हीन कर दे। जो मनुष्य जान बूझकर चोर या हत्यारे को भोजन, रहने के लिये स्थान, सर्दी में तापने के लिये अग्नि, प्यासे हुए को जल, चोरी करने के तौर-तरीके की सलाह, चोरी के साधन और उसी कार्य के लिये परदेश जाने के लिये मार्गव्यय देता है. उसको उत्तम साहस का दण्ड देना चाहिये। दूसरे के शरीर पर घातक शस्त्र से प्रहार करने तथा गर्भवती स्त्री के गर्भ गिराने पर भी उत्तम साहस का ही दण्ड देना उचित है। किसी भी पुरुष या स्त्री की हत्या करने पर उसके शील और आचार को दृष्टि में रखते हुए उत्तम या अधम साहस का दण्ड देना चाहिये। जो पुरुष की हत्या करने वाली तथा दूसरों को जहर देकर मारने वाली है, ऐसी स्त्री के गले में पत्थर बाँधकर उसे पानी में फेंक देना चाहिये; (परंतु यदि वह गर्भवती हो तो उस समय उसे ऐसा दण्ड न दे।) विष देने वाली, आग लगाने वाली तथा अपने पति, गुरु या संतान को मारने वाली स्त्री को कान, हाथ नाक और ओठ काटकर उसे साँड़ों से कुचलवाकर मरवा डाले। खेत, घर, वन, ग्राम, रक्षित भूभाग अथवा खलिहान में आग लगाने वाले या राजपत्नी से समागम करने वाले मनुष्य को सूखे नरकुल या सरकंडों-तिनकों से ढककर जला दे ॥ ५५-६७ ॥

स्त्री-संग्रहण
(अब ‘स्त्री-संग्रहण’ नामक विवाद पर विचार किया जाता है। परायी स्त्री और पराये पुरुष का मिथुनीभाव (परस्पर आलिङ्गन) ‘स्त्री-संग्रहण’ कहलाता है। दण्डनीयता की दृष्टि से इसके तीन भेद हैं — प्रथम, मध्यम और उत्तम। अयोग्य देश और काल में, एकान्त स्थान में, बिना कुछ बोले- चाले परायी स्त्री को कटाक्षपूर्वक देखना और हास्य करना ‘प्रथम साहस’ माना गया है। उसके पास सुगन्धित वस्तु इत्र-फुलेल आदि, फूलों के हार, धूप, भूषण और वस्त्र भेजना तथा उन्हें खाने-पीने का प्रलोभन देना ‘मध्यम साहस’ कहा गया है। एकान्त स्थानों में एक साथ एक आसन पर बैठना, आपस में सटना, एक-दूसरे के केश पकड़ना आदि को ‘उत्तम संग्रहण’ या ‘उत्तम साहस’ माना गया है। संग्रहण के कार्य में प्रवृत्त पुरुष को बंदी बना लेना चाहिये — यह बात निम्नाङ्कित श्लोक में बता रहे हैं —)

केशग्रहणपूर्वक परस्त्री के साथ क्रीड़ा करने वाले पुरुष को व्यभिचार के अपराध में पकड़ना चाहिये। सजातीय नारी से समागम करने वाले को एक हजार पण, अपने से नीच जाति की स्त्री से सम्भोग करने वाले को पाँच सौ पण एवं उच्चजाति की नारी से संगम करने वाले को वध का दण्ड दे और ऐसा करने वाली स्त्री के नाक-कान आदि कटवा डाले। जो पुरुष परस्त्री की नीवी (कटिवस्त्र), स्तन, कञ्जुकी, नाभि और केशों का स्पर्श करता है, अनुचित देशकाल में सम्भाषण करता है, अथवा उसके साथ एक आसन पर बैठता है, उसे भी व्यभिचार के दोष में पकड़ना चाहिये। जो स्त्री मना करने पर भी परपुरुष के साथ सम्भाषण करे, उसको सौ पण और जो पुरुष निषेध करने पर भी परस्त्री के साथ सम्भाषण करे तो उसे दो सौ पण का दण्ड देना चाहिये। यदि वे दोनों मना करने के बाद भी सम्भाषण करते पाये जायें तो उन्हें व्यभिचार का दण्ड देना चाहिये। पशु के साथ मैथुन करने वाले पर सौ पण तथा नीचजाति की स्त्री या गौ से समागम करने वाले पर पाँच सौ पण का दण्ड करे। किसी की अवरुद्धा (खरीदी हुई) दासी तथा रखेल स्वी के साथ उसके समागम के योग्य होने पर भी समागम करने वाले पुरुष पर पचास पण का दण्ड लगाना चाहिये। दासी के साथ बलात्कार करने वाले के लिये दस पण का विधान है। चाण्डाली या संन्यासिनी से समागम करने वाले मनुष्य के ललाट में ‘भग ‘ का चिह्न अङ्कित करके उसे देश से निर्वासित कर दे ॥ ६८-७३ ॥

प्रकीर्णक प्रकरण
जो मनुष्य राजाज्ञा को न्यूनाधिक करके लिखता है, अथवा व्यभिचारी या चोर को छोड़ देता है, राजा उसे उत्तम साहस का दण्ड दे। ब्राह्मण को अभक्ष्य पदार्थ का भोजन कराके दूषित करने वाला उत्तम साहस के दण्ड का भागी होता है। कृत्रिम स्वर्ण का व्यवहार करने वाले तथा मांस बेचने वाले को एक हजार पण का दण्ड दे और उसे नाक, कान और हाथ —इन तीन अङ्गों से हीन कर दे। यदि पशुओं का स्वामी समर्थ होते हुए भी अपने दाड़ों और सींगोंवाले पशुओं से मारे जाते हुए मनुष्य को छुड़ाता नहीं है तो उसको प्रथम साहस का दण्ड दिया जाना चाहिये। यदि पशु के आक्रमण का शिकार होने वाला मनुष्य जोर-जोर से चिल्लाकर पुकारे कि ‘अरे! मैं मारा गया। मुझे बचाओ’, उस दशा में भी यदि पशुओं का स्वामी उसके प्राण नहीं बचाता तो वह दूने दण्ड का भागी होता है। जो अपने कुल में कलङ्क लगने के डर से घर में घुसे हुए जार (परस्त्रीलम्पट) को चोर बताता है, अर्थात् ‘चोर-चोर’ कहकर निकालता है, उसपर पाँच सौ पण दण्ड लगाना चाहिये। जो राजा को प्रिय न लगने वाली बात बोलता है, राजा की ही निन्दा करता है तथा राजा की गुप्त मन्त्रणा का भेदन करता – शत्रुपक्ष के कानोंत क पहुँचा देता है, उस मनुष्य की जीभ काटकर उसे राज्य से निकाल देना चाहिये। मृतक के अङ्ग से उतारे गये वस्त्र आदि का विक्रय करने वाले, गुरु की ताड़ना करने वाले तथा राजा की सवारी और आसन पर बैठने वाले को राजा उत्तम साहस का दण्ड दे। जो क्रोध में आकर किसी की दोनों आँखें फोड़ देता है, उस अपराधी को, जो राजा के अनन्य हितचिन्तकों में न होते हुए भी राजा के लिये अनिष्टसूचक फलादेश करता है, उस ज्यौतिषी को तथा जो ब्राह्मण बनकर जीविका चला रहा हो, उस शूद्र को आठ सौ पण के दण्ड से दण्डित करना चाहिये। जो मनुष्य न्याय से पराजित होने पर भी अपनी पराजय न मानकर पुनः न्याय के लिये उपस्थित होता है, उसको धर्मपूर्वक पुनः जीतकर उसके ऊपर दुगुना दण्ड लगावे। राजा ने अन्यायपूर्वक जो अर्थदण्ड लिया हो, उसे तीस गुना करके वरुणदेवता को निवेदन करने के पश्चात् स्वयं ब्राह्मणों को बाँट दे। जो राजा धर्मपूर्वक व्यवहारों को देखता है, उसे धर्म, अर्थ, कीर्ति, लोकपंक्ति, उपग्रह (अर्थसंग्रह), प्रजाओं से बहुत अधिक सम्मान और स्वर्गलोक में सनातन स्थान — ये सात गुण प्राप्त होते हैं ॥ ७४-८३ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वाक्पारुष्यादि प्रकरणों का कथन’ नामक दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याप पूरा हुआ ॥ २५८ ॥

1. गुण और आचरण की दृष्टि से गिरा हुआ ।

2. उपर्युक्त अपराधों के लिये जो राजदण्ड है, वही मूल में बताया गया है; परंतु जो वस्त्र उसने गायब कर दिया हो, उसका मूल्य वह वस्त्र-स्वामी को अलग से दे । मनुजी ने यह व्यवस्था दी है कि ‘यदि वस्त्र एक बार का धुला है तो धोबी उसके मूल्य का अष्टमांश कम करके शेष मूल्य स्वामी को चुकावे। इसी तरह कई बार के धुले हुए वस्त्र का पादांश, तृतीयांश इत्यादि कम करके वह लौटावे ।’

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