July 9, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 257 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय सीमा-विवाद, स्वामिपाल विवाद, अस्वामिविक्रय, दत्ताप्रदानिक, क्रीतानुशय, अभ्युपेत्याशुश्रूषा, संविद्व्यतिक्रम, वेतनादान तथा द्यूतसमाह्वय का विचार सीमाविवादादिनिर्णयः सीमा-विवाद अग्निदेव कहते हैं — दो गाँवों से सम्बन्ध रखने वाले खेत की सीमा के विषय में विवाद उपस्थित होने पर तथा एक ग्राम के अन्तर्वर्ती खेत की सीमा का झगड़ा खड़ा होने पर सामन्त (सब ओर उस खेत से सटकर रहने वाले), स्थविर (वृद्ध) आदि, गोप (गाय के चरवाहे), सीमावर्ती किसान तथा समस्त वनवारी मनुष्य — ये सब लोग पूर्वकृत स्थल (ऊँची भूमि) कोयले, धान की भूसी तथा बरगद आदि के वृक्षों द्वारा सीमा का निश्चय 1 करें। वह सीमा कैसी हो, इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं — वह सीमा सेतु (पुल), वल्मीक (बाँबी), चैत्य (पत्थर के चबूतरे या देवस्थान), बाँस और बालू आदि से उपलक्षित होनी चाहिये 2 ॥ १-२ ॥’ सामन्त अथवा निकटवर्ती ग्रामवाले चार, आठ अथवा दस मनुष्य लाल फूलों की माला और लाल वस्त्र धारण करके, सिर पर मिट्टी रखकर सीमा का निर्णय करें। सीमा विवाद में सामन्तों के असत्य-भाषण करने पर राजा सबको अलग-अलग मध्यम साहस का दण्ड दे। सीमा का ज्ञान कराने वाले चिह्नों के अभाव में राजा ही सीमा का प्रवर्तक होता है। आराम (बाग), आयतन (मन्दिर या खलिहान), ग्राम, वापी या कूप, उद्यान (क्रीडावन), गृह और वर्षा के जल को प्रवाहित करने वाले नाले आदि की सीमा के निर्णय में भी यही विधि जाननी चाहिये। मर्यादा का भेदन, सीमा का उल्लङ्घन एवं क्षेत्र का अपहरण करने पर राजा क्रमशः अधम, उत्तम और मध्यम साहस का दण्ड दे। यदि सार्वजनिक सेतु (पुल या बाँध) और छोटे क्षेत्र में अधिक जल वाला कुआँ बनाया जा रहा हो तथा वह दूसरे की कुछ भूमि अपनी सीमा में ले रहा हो, परंतु उससे हानि तो बहुत कम हो और बहुत-से लोगों की अधिक भलाई हो रही हो तो उसके निर्माण में रुकावट नहीं डालनी चाहिये। जो क्षेत्र के स्वामी को सूचना दिये बिना उसके क्षेत्र में सेतु का निर्माण करता है, वह उस सेतु से प्राप्त फल का उपभोग स्वयं नहीं कर सकता, क्षेत्र का स्वामी ही उसके फल का भोगी-भागी होगा और उसके अभाव में राजा का उसपर अधिकार होगा। जो कृषक किसी के खेत में एक बार हल चलाकर भी उसमें स्वयं खेती न करे और दूसरे से भी न कराये, राजा उससे क्षेत्रस्वामी को कृषि का सम्भावित फल दिलाये और खेत को दूसरे किसान से जुतवाये ॥ ३-९ ॥ स्वामिपाल-विवाद (अब गाय-भैंस या भेड़-बकरी चराने वाले चरवाहे जब किसी के खेत चरा दें तो उन्हें किस प्रकार दण्ड देना चाहिये इसका विचार किया जाता है —) राजा दूसरे के खेत की फसल को नष्ट करने वाली भैंस पर आठ माष (पण का बीसवाँ भाग) दण्ड लगावे। गौ पर उससे आधा और भेड़-बकरी पर उससे भी आधा दण्ड लगावे। यदि भैंस आदि पशु खेत चरकर वहीं बैठ जायें, तो उनपर पूर्वकथित से दूना दण्ड लगाना चाहिये। जिसमें अधिक मात्रा में तृण और काष्ठ उपजता है, ऐसा भू-प्रदेश जब स्वामी से लेकर उसे सुरक्षित रखा जाता है तो उसे ‘विवीत’ (रक्षित या रखांतु) कहते हैं। उस रखांतु को भी हानि पहुँचाने पर इन भैंस आदि पशुओं पर अन्य खेतों के समान ही दण्ड समझे। इसी अपराध में गदहे और ऊँटों पर भी भैंस के समान ही दण्ड लगाना चाहिये। जिस खेत में जितनी फसल पशुओं के द्वारा नष्ट की जाय, उसका सामन्त आदि के द्वारा अनुमानित फल गो-स्वामी को क्षेत्रस्वामी के लिये दण्ड के रूप में देना चाहिये और चरवाहों को तो केवल शारीरिक दण्ड देना (कुछ पीट देना चाहिये)। यदि गो-स्वामी ने स्वयं चराया हो तो उससे पूर्वोक्त दण्ड ही वसूल करना चाहिये, ताड़ना नहीं देनी चाहिये। यदि खेत रास्ते पर हो, गाँव के समीप हो अथवा ग्राम के ‘विवीत’ (सुरक्षित) भूमि के निकट हो और वहाँ चरवाहे अथवा गो स्वामी की इच्छा न होने पर भी अनजाने में पशुओं ने चर लिया अथवा फसल को हानि पहुँचा दी तो उसमें गो-स्वामी तथा चरवाहा- दोनों में से किसी का दोष नहीं माना जाता, अर्थात् उसके लिये दण्ड नहीं लगाना चाहिये; किंतु यदि स्वेच्छा से जान बूझकर खेत चराया जाय तो चराने वाला और गो-स्वामी दोनों चोर की भाँति दण्ड पाने के अधिकारी हैं। साँड़, वृषोत्सर्ग की विधि से या देवी-देवता को चढ़ाकर छोड़े गये पशु, दस दिन के भीतर की व्यायी हुई गाय तथा अपने यूथ से बिछुड़कर दूसरे स्थान पर आया हुआ पशु — ये दूसरे की फसल चर लें तो भी दण्डनीय नहीं हैं, छोड़ देने योग्य हैं। जिसका कोई चरवाहा न हो, ऐसे देवोपहत तथा राजोपहत पशु भी छोड़ ही देने योग्य हैं। गोप (चरवाहा) प्रातः काल गौओं के स्वामी के सँभलाये हुए पशु सायंकाल उसी प्रकार लाकर स्वामी को सौंप दे। वेतनभोगी ग्वाले के प्रमाद से मृत अथवा खोये हुए पशु राजा उससे पशु- स्वामी को दिलाये। गोपालक के दोष से पशुओं का विनाश होने पर उसके ऊपर साढ़े तेरह पण दण्ड लगाया जाय और वह स्वामी को नष्ट हुए पशु का मूल्य भी दे। ग्रामवासियों की इच्छा से अथवा राजा की आज्ञा के अनुसार गोचारण के लिये भूमि छोड़ दे; उसे जोते-बोये नहीं। ब्राह्मण सदा, सभी स्थानों से तूण, काष्ठ और पुष्प ग्रहण कर सकता है। ग्राम और क्षेत्र का अन्तर सौ धनुष के प्रमाण का हो, अर्थात् गाँव के चारों ओर सौ-सौ धनुष भूमि परती छोड़ दी जाय और उसके बाद की भूमि पर ही खेती की जाय। खर्वट (बड़े गाँव) और क्षेत्र का अन्तर दो सौ धनुष एवं नगर तथा क्षेत्र का अन्तर चार सौ धनुष होना चाहिये ॥ १०-१८ ॥ अस्वामिविक्रय (अब अस्वामिविक्रय नामक व्यवहारपद पर विचार आरम्भ करते हैं —) नारदजी ने ‘अस्वामिविक्रय’ का लक्षण इस प्रकार बताया है — निक्षिप्तं वा परद्रव्यं नष्टं लब्ध्वापहृत्य वा । विक्रीयतेऽसमक्षं यत् स ज्ञेयोऽस्वामिविक्रयः ॥ अर्थात् धरोहर के तौर पर रखे हुए पराये द्रव्य को खोया हुआ पाकर अथवा स्वयं चुराकर जो स्वामी के परोक्ष में बेच दिया जाता है, वह ‘अस्वामिविक्रय’ कहलाता है।’ द्रव्य का स्वामी अपनी वस्तु दूसरे के द्वारा बेची हुई यदि किसी खरीददार के पास देखे तो उसे अवश्य पकड़े — अपने अधिकार में ले ले। यहाँ ‘विक्रीत’ शब्द ‘दत्त’ और ‘आहित’ का भी उपलक्षण है। अर्थात् यदि कोई दूसरे की रखी हुई वस्तु उसे बताये बिना दूसरे के यहाँ रख दे या दूसरे को दे दे तो उस पर यदि स्वामी की दृष्टि पड़ जाय तो स्वामी उस वस्तु को हठात् ले ले या अपने अधिकार में कर ले; क्योंकि उस वस्तु से उसका स्वामित्व निवृत्त नहीं हुआ। यदि खरीददार उस वस्तु को खरीदकर छिपाये रखे, किसी पर प्रकट न करे तो उसका अपराध माना जाता है। तथा जो हीन पुरुष है, अर्थात् उस द्रव्य की प्राप्ति के उपाय से रहित है, उससे एकान्त में कम मूल्य में और असमय में (रात्रि आदि में) उस वस्तु को खरीदने वाला मनुष्य चोर होता है, अर्थात् चोर के समान दण्डनीय होता है। अपनी खोयी हुई या चोरी में गयी हुई वस्तु जिसके पास देखे, उसे स्थानपाल आदि राजकर्मचारी से पकड़वा दे। यदि उस स्थान अथवा समय में राजकर्मचारी न मिले तो चोर को स्वयं पकड़कर राजकर्मचारी को सौंप दे। यदि खरीददार यह कहे कि ‘मैंने चोरी नहीं की है, अमुक से खरीदी है’, तो वह बेचने वाले को पकड़वा देने पर शुद्ध (अभियोग से मुक्त) हो जाता है। जो नष्ट या अपहत वस्तु का विक्रेता है, उसके पास से द्रव्य का स्वामी द्रव्य, राजा अर्थदण्ड और खरीदने वाला अपना दिया हुआ मूल्य पाता है। वस्तु का स्वामी लेख्य आदि आगम या उपभोग का प्रमाण देकर खोयी हुई वस्तु को अपनी सिद्ध करे। सिद्ध न करने पर राजा उससे वस्तु का पञ्चमांश दण्ड के रूप में ग्रहण करे। जो मनुष्य अपनी खोयी हुई अथवा चुरायी गयी वस्तु को राजा को बिना बतलाये दूसरे से ले ले, राजा उसपर छानबे पण का अर्थदण्ड लगावे। शौल्किक (शुल्क के अधिकारी) या स्थानपाल (स्थानरक्षक) जिस खोये अथवा चुराये गये द्रव्य को राजा के पास लायें, उस द्रव्य को एक वर्ष के पूर्व ही वस्तु का स्वामी प्रमाण देकर प्राप्त कर ले; एक वर्ष के बाद राजा स्वयं उसे ले ले। घोड़े आदि एक खुरवाले पशु खोने के बाद मिलें, तो स्वामी उनकी रक्षा के निमित्त चार पण राजा को दे; मनुष्यजातीय द्रव्य के मिलने पर पाँच पण; भैंस, ऊँट और गौ के प्राप्त होने पर दो-दो पण तथा भेड़-बकरी के मिलने पर पण का चतुर्थांश राजा को अर्पित करे ॥ १९-२५ ॥ दत्ताप्रदानिक [‘दत्ताप्रदानिक’ का स्वरूप नारद ने इस प्रकार बताया है —” जो असम्यग् रूप से (अयोग्य मार्ग का आश्रय लेकर) कोई द्रव्य देने के पश्चात् फिर उसे लेना चाहता है, उसे ‘दत्ताप्रदानिक’ नामक व्यवहारपद कहा जाता है।” इस प्रकरण में इसी पर विचार किया जाता है —] जीविका का उपरोध न करते हुए ही अपनी वस्तु का दान करे; अर्थात् कुटुम्ब के भरण-पोषण से बचा हुआ धन ही देने योग्य है। स्त्री और पुत्र किसी को न दे। अपना वंश होने पर किसी को सर्वस्व का दान न करे। जिस वस्तु को दूसरे के लिये देने की प्रतिज्ञा कर ली गयी हो, वह वस्तु उसी को दे, दूसरे को न दे। प्रतिग्रह प्रकटरूप में ग्रहण करे। विशेषतः स्थावर भूमि, वृक्ष आदि का प्रतिग्रह तो सबके सामने ही ग्रहण करना चाहिये। जो वस्तु जिसे धर्मार्थ देने की प्रतिज्ञा की गयी हो, वह उसे अवश्य दे दे और दी हुई वस्तु का कदापि फिर अपहरण न करे-उसे वापस न ले ॥ २६-२७ ॥ क्रीतानुशय (अब ‘क्रीतानुशय’ बताया जाता है। इसका स्वरूप नारदजी ने इस प्रकार कहा है — “जो खरीददार मूल्य देकर किसी पण्य वस्तु को खरीदने के बाद उसे अधिक महत्त्व की वस्तु नहीं मानता है, अतः उसे लौटाना चाहता है तो यह मामला ‘क्रीतानुशय’ नामक विवादपद कहलाता है। ऐसी वस्तु को जिस दिन खरीदा जाय, उसी दिन अविकृतरूप से माल धनी को लौटा दिया जाय। यदि दूसरे दिन लौटावे तो क्रेता मूल्य से १/३०वाँ भाग छोड़ दे। यदि तीसरे दिन लौटावे तो १/१५वाँ भाग छोड़ दे। इसके बाद वह वस्तु खरीददार की ही हो जाती है, वह उसे लौटा नहीं सकता।”) अब बीज आदि के विषय में बताते हैं — ॥ २७१/२ ॥ बीज की दस दिन, लोहे की एक दिन, वाहन की पाँच दिन, रत्नों की सात दिन, दासी की एक मास, दूध देने वाले पशु को तीन दिन और दास की एक पक्ष तक परीक्षा होती है। सुवर्ण अग्नि में डालने पर क्षीण नहीं होता; परंतु चाँदी प्रतिशत दो पल, राँगे और सीसे में प्रतिशत आठ पल, ताँबे में पाँच पल और लोहे में दस पल कमी होती है। ऊन और रूई के स्थूल सूत से बुने हुए कपड़े में सौ पल में दस पल की वृद्धि होती है। इसी प्रकार मध्यम सूत में पाँच पल और सूक्ष्म सूत में तीन पल की वृद्धि जाननी चाहिये। कार्मिक (अनेक रङ्ग के चित्रों से युक्त) और रोमबद्ध (किनारे पर गुच्छों से युक्त) वस्त्र में तीसवाँ भाग क्षय होता है। रेशम और वल्कल के बुने हुए वस्त्र में न तो क्षय होता है और न वृद्धि हो। उपर्युक्त द्रव्यों के नष्ट होने पर द्रव्य-ज्ञानकुशल व्यक्ति देश, काल, उपयोग और नष्ट हुए वस्तु के सारासार की परीक्षा करके जितनी हानि का निर्णय कर दें, राजा उस हानि की शिल्पियों से अवश्य पूर्ति कराये ॥ २८-३२ ॥ अभ्युपेत्याशुश्रूषा (सेवा स्वीकार करके जो उसे नहीं करता है, उसका यह बर्ताव ‘अभ्युपेत्याशुश्रूषा’ नामक व्यवहारपद है।) जो बलपूर्वक दास बनाया गया है और जो चोरों के द्वारा चुराकर किसी के हाथ बेचा गया है — ये दोनों दासभाव से मुक्त हो सकते हैं। यदि स्वामी इन्हें न छोड़े तो राजा अपनी शक्ति से इन्हें दासभाव से छुटकारा दिलाये। जो स्वामी को प्राणसंकट से बचा दे, वह भी दासभाव से मुक्त कर देने योग्य है। जो स्वामी से भरण-पोषण पाकर उसका दास्य स्वीकार करके कार्य कर रहा है, वह भरण-पोषण में स्वामी का जितना धन खर्च करा चुका है, उतना धन वापस कर दे तो दास भाव से छुटकारा पा जाता है। जितना धन लेकर स्वामी ने किसी को किसी धनी के पास बन्धक रख दिया है, अथवा जितना धन देकर किसी धनी ने किसी ऋणग्राही को ऋणदाता से छुड़ाया है, उतना धन सूदसहित वापस कर देने पर आहित दास भी दासत्व से छुटकारा पा सकता है। प्रव्रज्यावसित (संन्यासभ्रष्ट अथवा आरूपतित) मनुष्य यदि इसका प्रायश्चित्त न कर ले तो मरणपर्यन्त राजा का दास होता है। चारों वर्ण अनुलोमक्रम से ही दास हो सकते हैं, प्रतिलोमक्रम से नहीं। विद्यार्थी विद्याग्रहण के पश्चात् गुरु के घर में आयुर्वेदादि शिल्प-शिक्षा के लिये यदि रहना चाहे तो समय निश्चित करके रहे। यदि निश्चित समय से पहले वह शिल्प-शिक्षा प्राप्त कर ले तो भी उतने समय तक वहाँ अवश्य निवास करे। उन दिनों वह गुरु के घर भोजन करे और उस शिल्प से उपार्जित धन गुरु को ही समर्पित करे ॥ ३३-३५ ॥ संविद्-व्यतिक्रम (नियत की हुई व्यवस्था का नाम ‘समय’ या ‘संविद्’ है। उसका उल्लङ्घन ‘संविद् व्यतिक्रम’ कहलाता है। यह विवाद का पद है।) राजा अपने नगर में भवन निर्माण कराकर उनमें वेदविद्या-सम्पन्न ब्राहाणों को जीविका देकर बसावे और उनसे प्रार्थना करे कि ‘आप यहाँ रहकर अपने धर्म का अनुष्ठान कीजिये।’ ब्राह्मणों को अपने धर्म में बाधा न डालते हुए जो सामयिक और राजा द्वारा निर्धारित धर्म हो, उसका भी यत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। जो मनुष्य समूह या संस्था का द्रव्यग्रहण और मर्यादा का उल्लङ्घन करता हो, राजा उसका सर्वस्व छीनकर उसे राज्य से निर्वासित कर दे। अपने समाज के हितैषी मनुष्यों के कथनानुसार ही सब मनुष्यों को कार्य करना चाहिये। जो मनुष्य समाज के विपरीत आचरण करे, राजा उसे प्रथम साहस का दण्ड 3 दे। समूह के कार्य की सिद्धि के लिये राजा के पास भेजा हुआ मनुष्य राजा से जो कुछ भी मिले, वह समाज के श्रेष्ठ व्यक्तियों को बुलाकर समर्पित कर दे। यदि वह स्वयं लाकर नहीं देता तो राजा उससे ग्यारहगुना धन दिलावे। जो वेदज्ञान-सम्पन्न, पवित्र अन्तःकरण वाले, लोभशून्य तथा कार्य का विचार करने में कुशल हों, उन समूह के हितैषी मनुष्यों का वचन सबके लिये पालनीय है। ‘श्रेणी’ (एक व्यापार से जीविका चलाने वाले), ‘नैगम’ (वेदोक्त धर्म का आचरण करने वाले), ‘पाखण्डी’ (वेदविरुद्ध आचरण वाले) और ‘गण’ (अस्त्र-शस्त्रों से जीविका चलाने वाले) — इन सब लोगों के लिये भी यही विधि है। राजा इनके धर्मभेद और पूर्ववृत्ति का संरक्षण करे ॥ ३६-४२ ॥ वेतनादान जो भृत्य वेतन लेकर काम छोड़ दे, वह स्वामी को उस वेतन से दुगुना धन लौटाये। वेतन न लिया हो तो वेतन के समान धन उससे ले। भृत्य सदा खेती आदि के सामान की रक्षा करे। जो वेतन का निश्चय किये बिना भृत्य से काम लेता है, राजा उसके वाणिज्य, पशु और शस्य की आय का दशांश भृत्य को दिलाये। जो भृत्य देश काल का अतिक्रमण करके लाभ को अन्यथा (औसत से भी कम) कर देता है, उसे स्वामी अपने इच्छानुसार वेतन दे। परंतु औसत से अधिक लाभ प्राप्त कराने पर भृत्य को वेतन से अधिक दे। वेतन निश्चित करके दो मनुष्यों से एक ही काम कराया जाय और यदि वह काम उनसे समाप्त न हो सके तो जिसने जितना काम किया हो, उसको उतना वेतन दे और यदि कार्य सिद्ध हो गया हो तो पूर्वनिश्चित वेतन दे। यदि भारवाहक से राजा और देवता-सम्बन्धी पात्र के सिवा दूसरे का पात्र फूट जाय तो राजा भारवाहक से पात्र दिलाये। यात्रा में विघ्न करने वाले भृत्य पर वेतन से दुगुना अर्थदण्ड करे। जो भृत्य यात्रारम्भ के समय काम छोड़ दे, उससे वेतन का सातवाँ भाग, कुछ दूर चलकर काम छोड़ दे, उससे चतुर्थ भाग और जो मार्ग के मध्य में काम छोड़ दे, उससे पूरा वेतन राजा स्वामी को दिलावे। इसी प्रकार भृत्य का त्याग करने वाले स्वामी से राजा भृत्य को दिलाये ॥ ४३-४८ ॥ द्यूत-समाह्वय (जूए में छल से काम लेना ‘द्यूतसमाह्वय’ है। प्राणिभिन्न पदार्थ — सोना, चाँदी आदि से खेला जाने वाला जूआ ‘द्यूत’ कहलाता है। किंतु प्राणियों को घुड़दौड़ आदि में दाँव पर लगाकर खेला जाय तो उसको ‘समाह्वय’ कहा जाता है।) परस्पर की स्वीकृति से जुआरियों द्वारा कल्पित पण (शर्त) को ‘ग्लह’ कहते हैं। जो जुआरियों को खेलने के लिये सभा-भवन प्रदान करता है, वह ‘सभिक’ कहलाता है। ‘ग्लह’ या दाँव में सौ या इससे अधिक वृद्धि (लाभ) प्राप्त करने वाले धूर्त जुआरी से ‘सभिक’ प्रतिशत पाँच पण अपने भरण-पोषण के लिये ले। फिर दूसरी बार उतनी ही वृद्धि प्राप्त करने वाले अन्य जुआरी से प्रतिशत दस पण ग्रहण करे। राजा के द्वारा भलीभाँति सुरक्षित द्यूत का अधिकारी सभिक राजा का निश्चित भाग उसे दे। जीता हुआ धन जीतने वाले को दिलाये और क्षमा- परायण होकर सत्य-भाषण करे। जब द्यूत का सभिक और प्रख्यात जुआरियों का समूह राजा के समीप आये तथा राजा को उनका भाग दे दिया गया हो तो राजा जीतने वाले को जीत का धन दिला दे, अन्यथा न दिलाये। द्यूत-व्यवहार को देखने वाले सभासद के पद पर राजा उन जुआरियों को ही नियुक्त करे तथा साक्षी भी द्यूतकारों को ही बनाये। कृत्रिम पाशों से छलपूर्वक जूआ खेलने वाले मनुष्यों के ललाट में चिह्न करके राजा उन्हें देश से निर्वासित कर दे। चोरों को पहचानने के लिये द्यूत में एक ही किसी को प्रधान बनावे, यही विधि ‘प्राणि द्यूत-समाह्वय’ (घुड़दौड़) आदि में भी जाननी चाहिये ॥ ४९-५३ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सीमा विवादादि के कथन का निर्णय’ नामक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५७ ॥ 1. ‘सीमा’ कहते हैं — क्षेत्र आदि की मर्यादा को । वह चार प्रकार की होती है— जनपद सीमा, ग्राम-सीमा, क्षेत्र-सीमा और गृह-सीमा । वह यथासम्भव पाँच लक्षणों से युक्त होती है, जैसा कि नारदजी ने बताया है — ‘ध्वजिनी’, ‘मत्स्यिनी’, ‘नैधानी’, ‘भयवर्जिता’ तथा ‘राजशासननीता’। इनमें से जो सीमा वृक्ष आदि से लक्षित या प्रकाशित हो, वह ‘ध्वजिनी’ कही गयी है। ‘मत्स्य’ शब्द जल का उपलक्षण है। अतः ‘मत्स्यिनी’ का अर्थ है — जलवती । वहाँ जल से वह सीमा उपलक्षित होती है। ‘नैधानी’ कहते हैं — धान की भूसी या कोयले आदि गाड़कर निश्चित की हुई सीमा को । ‘भयवर्जिता’ वह सीमा है, जिसे अर्थी और प्रत्यर्थी दोनों ने मिलकर अपनी स्वीकृति निर्धारित किया हो । जहाँ सीमा का ज्ञापक कोई चिह्न न हो, वहाँ राजा की इच्छा से जो सीमा निर्मित होती है, उसको ‘राजशासननीता’ कहते हैं। भूमि सम्बन्धी विवाद के छः हेतु हैं। आधिक्य, न्यूनता, अंश का होना, न होना, अभोगभुक्ति तथा मर्यादा — भूमि-विवाद छः कारण हैं, ऐसा कात्यायन का मत है। जैसे एक कहता है कि ‘मेरी भूमि यहाँ पाँच हाथ से अधिक है’ तो दूसरा कहता है, ‘अधिक नहीं है’ — यह ‘आधिक्य’ को लेकर विवाद हुआ। इसी तरह यदि एक कहे, ‘मेरी भूमि यहाँ तीन हाथ है’ और दूसरा कहे कि ‘नहीं, तीन हाथ से कम है’, तो यह ‘न्यूनता’ को लेकर विवाद हुआ। एक कहता है, ‘मेरे हिस्से में इतनी भूमि है ‘ और दूसरा कहता है, ‘यहाँ तुम्हारा हिस्सा ही नहीं है’ तो यह अंशविषयक ‘अस्तित्व’ और ‘नास्तित्व’ को लेकर विवाद हुआ। एक का आरोप है कि ‘यह मेरी भूमि है, पहले तुम्हारे उपभोग में कभी नहीं रही। इस समय तुम बलपूर्वक इसे अपने उपभोगमें ला रहे हो’ । दूसरा कहता है, ‘नहीं, सदा से या चिरकाल से यह भूमि मेरे अधिकार में है ‘ — यह ‘अभोगभुक्ति’ विषयक विवाद हुआ। एक कहता है, ‘यह सीमा है’ और दूसरा कहता है, ‘नहीं, यह है’ तो वह ‘सीमाविषयक’ विवाद हुआ। 2. सीमा के परिचायक चिह्न दो प्रकार के होने चाहिये — ‘प्रकाश’ और ‘अप्रकाश’। बरगद, पीपल, पलाश, सेमल, साखू, ताड़, दूधवाले वृक्ष, गुल्म, वेणु, शमी और लताबेलोंसे युक्त स्थल — ये सब ‘प्रकाश चिह्न’ हैं । पोखरे, कुआँ, बावड़ी, झरने और देवमन्दिर आदि भी प्रकाश-चिह्न के ही अन्तर्गत हैं। सीमाज्ञान के लिये कुछ छिपे हुए चिह्न भी होने चाहिये। जैसे — पत्थर, हड्डी, गौ के बाल, धान की भूसी, राख, खोपड़ी, कर्सी, ईंटा, कोयला, कंकड़ और बालू —भूमि में गाड़ दिये जायँ । 3. ‘नारदस्मृति’ में कहा है कि ‘प्रथम’ साहस का दण्ड सौ पण, ‘मध्यम’ साहस का दण्ड पाँच सौ पण और ‘उत्तम’ साहस का दण्ड एक हजार पण है। Content is available only for registered users. 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