अग्निपुराण – अध्याय 256
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ छप्पनवाँ अध्याय
पैतृक धन के अधिकारी; पत्नियों का धनाधिकार; पितामह के धन के अधिकारी; विभाज्य और अविभाज्य धन; वर्ण क्रम से पुत्रों के धनाधिकार; बारह प्रकार के पुत्र और उनके अधिकार पत्नी पुत्री आदि के, संसृष्टी के धन का विभाग; क्लीब आदि का अनधिकार; स्त्रीधन तथा उसका विभाग
दायविभागकथनम्

दाय-विभाग-प्रकरण

[‘दाय’ शब्द से वह धन समझना चाहिये, जिस पर स्वामी के साथ सम्बन्ध के कारण दूसरों का स्वत्व हो जाता है। ‘दाय’ के दो भेद हैं — ‘अप्रतिबन्ध’ और ‘सप्रतिबन्ध”। पुत्रों और पौत्रों का पुत्रत्व और पौत्रत्व के कारण पिता और पितामह के धन पर अनायास ही स्वत्व होता है, इसलिये वह ‘अप्रतिबन्ध दाय’ है। चाचा और भाई आदि को पुत्र और स्वामी के अभाव में धन पर अधिकार प्राप्त होता है, इसलिये वह ‘सप्रतिबन्ध दाय’ है। इसी प्रकार उनके पुत्र आदि के लिये भी समझ लेना चाहिये। जिसके अनेक स्वामी हैं, ऐसे धन को बाँटकर एक-एक के अंश को पृथक् पृथक् व्यवस्थित कर देना ‘विभाग’ कहलाता है। इस अध्याय में दाय विभाग और स्वत्व पर विचार किया गया है, जो धर्म शास्त्रकारों एवं महर्षियों को अभिमत है।]’

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! यदि पिता अपने जीवन में सब पुत्रों में धन का विभाजन करे तो वह इच्छानुसार ज्येष्ठ पुत्र को श्रेष्ठ भाग दे या सब पुत्रों को समांश भागी बनाये।1  यदि पिता सब पुत्रों को समान भाग दे, तो अपनी उन स्त्रियों को भी समान भाग दे, जिनको पति अथवा श्वशुर की ओर से स्त्रीधन न मिला हो। जो पुत्र धनोपार्जन में समर्थ होने के कारण पैतृक धन की इच्छा न रखता हो, उसे भी थोड़ा-बहुत धन देकर विभाजन का कार्य पूर्ण करना चाहिये। पिता के द्वारा दिया हुआ न्यूनाधिक भाग, यदि धर्मसम्मत है, तो वह पितृकृत होने से निवृत्त नहीं हो सकता, ऐसा स्मृतिकारों का मत है। माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् पुत्र पिता के धन और ऋण को बराबर बराबर बाँट लें।2  माता द्वारा लिये गये ऋण को चुकाने के बाद बचा हुआ मातृधन पुत्रियाँ आपस में बाँट लें।3  उनके अभाव में पुत्र आदि उस धन का विभाग कर लें। पैतृक धन को हानि न पहुँचाकर जो धन स्वयं उपार्जित किया गया हो, मित्र से मिला हो और विवाह में प्राप्त हुआ हो, भाई आदि दायाद उसके अधिकारी नहीं होते। यदि सब भाइयों ने सम्मिलित रहकर धन की वृद्धि की हो तो उस धन में सबका समान भाग माना जाता है ॥ १-५१/२

(यहाँतक पैतृक सम्पत्ति में पुत्रों का विभाग किस प्रकार हो, यह बतलाया गया। अब पितामह के धन में पौत्रों का विभाग कैसे हो, इस विषय में विशेष बात बताते हैं —) यद्यपि पितामह के धन में पौत्रों का पुत्रों के समान जन्म से ही स्वत्व है, तथापि यदि वे पौत्र अनेक पितावाले हैं तो उनके पिताओं को द्वार बनाकर ही पितामह के द्रव्य का विभाजन होगा। सारांश यह कि यदि संयुक्त परिवार में रहते हुए ही अनेक भाई अनेक पुत्रों को उत्पन्न करके परलोकवासी हो गये और उनमें से एक के दो, दूसरे के तीन और तीसरे के चार पुत्र हों, तो उन पौत्रों की संख्या के अनुसार पितामह की सम्पत्ति का बँटवारा नहीं होगा, अपितु उन पौत्रों के पिताओं की संख्या के अनुसार होगा। जिसके दो पुत्र हैं, उसे अपने पिता का एक अंश प्राप्त है, जिसके तीन पुत्र हैं, उसे भी अपने पिता का एक अंश प्राप्त होगा और जिसे चार हैं, उसे भी अपने पिता का एक ही अंश मिलेगा। पितामह द्वारा अर्जित भूमि, निबन्ध और द्रव्य में पिता और पुत्र दोनों का समान स्वामित्व है। धन का विभाग होने के बाद भी सवर्णा स्त्री में उत्पन्न हुआ पुत्र विभाग का अधिकारी होता है। अथवा आय और व्यय का संतुलन करने के बाद दृश्य धन में उसका विभाग होता है। पिता-पितामह आदि के क्रम से आया हुआ जो द्रव्य दूसरों ने हर लिया हो और असमर्थतावश पिता आदि ने उसका उद्धार नहीं किया हो, उसे पुत्रों में से एक कोई भी पुत्र अन्य बन्धुओं की अनुमति लेकर यदि अपने प्रयास से प्राप्त कर ले तो वह उस धन को स्वयं ले ले, अन्य दायादों को न बाँटे। परंतु खेत का उद्धार करने पर उद्धारकर्ता उसका चौथाई अंश स्वयं ले, शेष भाग सब भाइयों को बराबर-बराबर बाँट दे। इसी तरह विद्या से (शास्त्रों को पढ़ने-पढ़ाने या उसकी व्याख्या करने से) जो धन प्राप्त हो, उसको भी दायादों में न बाँटे। माता-पिता अपनी जो वस्तु जिसे दे दें, वह उसी का धन होगा। यदि पिता के मरने पर पुत्रगण पैतृक धन का विभाजन करें तो माता भी पुत्रों के समान भाग की अधिकारिणी होती है। विभाजन के समय जिन भाइयों के विवाह आदि संस्कार न हुए हों, उनके संस्कार वे भाई, जिनके संस्कार पहले हो चुके हैं, संयुक्त धन से करें। अविवाहिता बहिनों के भी विवाह-संस्कार सब भाई अपने भाग का चतुर्थांश देकर करें। ब्राह्मण से ब्राह्मणी आदि विभिन्न वर्षों की स्त्रियों में उत्पन्न हुए पुत्र वर्णक्रम से चार, तीन, दो और एक भाग प्राप्त करें। इसी प्रकार क्षत्रिय से क्षत्रिया आदि में उत्पन्न तीन, दो एवं एक भाग और वैश्य से वैश्यजातीय एवं शूद्रजातीय स्त्री में उत्पन्न पुत्र क्रमशः दो और एक अंश के अधिकारी होते हैं। धनविभाग के पश्चात् जो धन भाइयों द्वारा एक दूसरे से अपहृत किया गया दृष्टिगोचर हो, उसे सब भाई पुनः समान अंशों में विभाजित कर लें, यह शास्त्रीय मर्यादा है। पुत्रहीन पुरुष के द्वारा दूसरे के क्षेत्र में नियोग की विधि से उत्पन्न पुत्र धर्म के अनुसार दोनों पिताओं के धन और पिण्डदान का अधिकारी है ॥ ६-१४ ॥

अपने समान वर्ण की स्त्री जब धर्मविवाह के अनुसार ब्याहकर लायी जाती है तो उसे ‘धर्मपन्नी’ कहते हैं। अपनी धर्मपत्नी से स्वकीय वीर्य द्वारा उत्पादित पुत्र ‘औरस’ कहलाता है। यह सब पुत्रों में मुख्य है। दूसरा ‘पुत्रिकापुत्र’ है। यह भी औरस के ही समान है। अपनी स्त्री के गर्भ से किसी सगोत्र या सपिण्ड पुरुष के द्वारा अथवा देवर के द्वारा उत्पन्न पुत्र ‘क्षेत्रज’ कहलाता है। पति के घर में छिपे तौर पर जो सजातीय पुरुष से उत्पन्न होता है, वह ‘गूढ़ज’ माना गया है। अविवाहिता कन्या से उत्पन्न पुत्र ‘कानीन’ कहलाता है। वह नाना का पुत्र माना गया है। जो अक्षतयोनि अथवा क्षतयोनि की विधवा से सजातीय पुरुष द्वारा उत्पन्न पुत्र है, उसको ‘पौनर्भव’ कहते हैं। जिसे माता अथवा पिता किसी को गोद दे दें, वह ‘दत्तक’ पुत्र कहा गया है। जिसे किसी माता- पिता ने खरीदा और दूसरे माता-पिता ने बेचा हो, वह ‘क्रीतपुत्र माना गया है। किसी को स्वयं धन आदि का लोभ देकर पुत्र बनाया गया हो तो वह ‘कृत्रिम’ कहा गया है। जो माता-पिता से रहित बालक ‘मुझे अपना पुत्र बना लें’ — ऐसा कहकर स्वयं आत्मसमर्पण करता है, वह ‘दत्तात्मा’ पुत्र है। जो विवाह से पूर्व ही गर्भ में आ गया और गर्भवती के विवाह होने पर उसके साथ परिणीत हो गया, वह ‘सहोढज’ पुत्र माना गया है। जिसे माता-पिता ने त्याग दिया हो, वह समान वर्ण का पुत्र यदि किसी ने ले लिया तो वह उसका ‘अपविद्ध पुत्र’ माना गया है। ये जो पूर्वकथित बारह पुत्र हैं, इनमें से पूर्व पूर्व के अभाव में उत्तर-उत्तर पिण्डदाता और धनांशभागी होता है। मैंने सजातीय पुत्रों में धन-विभाग की यह विधि बतलायी है ॥ १५-१९१/२

शूद्र के धनविभाग की विशेष विधि —

शूद्र द्वारा दासी में उत्पन्न पुत्र भी पिता की इच्छा से धन में भाग प्राप्त करेगा। पिता की मृत्यु के पश्चात् शूद्र की विवाहिता पत्नी से उत्पन्न पुत्र अपने पिता के दासीपुत्र को भी भाई की हैसियत से आधा भाग दे। यदि शूद्र की परिणीता से कोई पुत्र न हो तो वह भ्रातृहीन दासीपुत्र पूरे धन पर अधिकार कर लेः (परंतु यह तभी सम्भव है, जब उसकी परिणीता की पुत्रियों के पुत्र न हों। उनके होने पर तो वह आधा भाग ही पा सकता है।) जिसके पूर्वोक्त बारह प्रकार के पुत्रों में से कोई नहीं है, ऐसा पुत्रहीन पुरुष यदि स्वर्गवासी हो जाय तो उसके धन के भागी क्रमशः पत्नी, पुत्रियाँ, माता-पिता, सहोदर भाई, असहोदर भाई, भ्रातृपुत्र, गोत्रज (सपिण्ड या समानोदक) पुरुष, बन्धु-बान्धव4  (आचार्य), शिष्य तथा सजातीय सहपाठी होते हैं — इनमें पूर्व-पूर्व के अभाव में उत्तरोत्तर धन के भागी होते हैं। सब वर्णों के लिये धन के विभाजन की यही विधि शास्त्रविहित है ॥ २०-२३ ॥

वानप्रस्थ, संन्यासी और नैष्ठिक ब्रह्मचारियों के धन के अधिकारी क्रमशः एक आश्रम में रहने वाला धर्मभ्राता, श्रेष्ठ शिष्य और आचार्य 5  होते हैं। बँटे हुए धन को फिर मिला दिया जाय तो वह ‘संसृष्ट’ कहलाता है। ऐसा संसृष्ट धन जिन लोगों के पास है, वे सभी ‘संसृष्टी’ कहे गये हैं। ‘संसृष्टत्व सम्बन्ध’ जिस किसी के साथ नहीं हो सकता, किंतु पिता, भाई अथवा पितृव्य (चाचा) के साथ ही हो सकता है। यदि कोई संसृष्टी मर जाय तो उसके हिस्से का धन दूसरा संसृष्टी पुरुष मृत-संसृष्टी की मृत्यु के बाद उसकी भार्या से उत्पन्न हुए पुत्र को दे दे। पुत्र न हो तो वह संसृष्टी स्वयं ही ले ले। पत्नी आदि को वह धन नहीं मिल सकता। यदि सहोदर संसृष्टी मर जाय तो दूसरा सहोदर संसृष्टी उसकी मृत्यु के पश्चात् पैदा हुए पुत्र को उसका अंश दे दे। यदि पुत्र न हो तो वह स्वयं ही उस संसृष्टी के अंश को ले ले; असहोदर भाई संसृष्टी होने पर भी उसे नहीं ले सकता। अन्य माता के पेट से पैदा हुआ सौतेला भाई भी यदि संसृष्टी हो तो वह संसृष्टी भ्राता के धन को ले सकता है। यदि वह असंसृष्टी है तो उस धन को नहीं ले सकता। अथवा असंसृष्टी भी उस संसृष्टी के धन को ले सकता है, जबकि वह संसृष्टी उस असंसृष्टी का सहोदर भाई रहा हो ॥ २४-२६ ॥

नपुंसक, पतित, उसका पुत्र, पङ्गु, उन्मत्त, जड, अन्ध, असाध्य रोग से ग्रस्त और आश्रमान्तर में गये हुए पुरुष केवल भरण-पोषण पाने के योग्य हैं। इन्हें हिस्सा बँटाने का अधिकार नहीं है। इन लोगों के औरस एवं क्षेत्रज पुत्र क्लीबत्व आदि दोषों से रहित होने पर भाग लेने के अधिकारी होंगे। इनकी पुत्रियों का भी तबतक भरण-पोषण करना चाहिये, जबतक कि वे पत्ति के अधीन न कर दी जायें। इन क्लीब, पतितः आदि की पुत्रहीन सदाचारिणी स्त्रियों का भी भरण-पोषण करना चाहिये। यदि वे व्यभिचारिणी या प्रतिकूल आचरण करने वाली हों तो उनको घर से निर्वासित कर देना चाहिये ॥ २७-२९ ॥

स्त्रीधन

जो पिता-माता, पति और भाई ने दिया हो, जो विवाहकाल में अग्नि के समीप मामा आदि की ओर से मिला हो तथा जो आधिवेदनिक 6  आदि धन हो, वह ‘स्त्रीधन’ कहा गया है। जिसे कन्या की माता के बन्धु-बान्धवों ने दिया हो, जिसे पिता के बन्धु-बान्धवों ने दिया हो तथा जो वर पक्ष की ओर से कन्या के लिये शुल्करूप में मिला हो एवं विवाह के पश्चात् पतिकुल से जो वधू को भेंट मिला हो, वह सब ‘स्त्रीधन’ कहा गया है। यदि स्त्री संतानहीना हो – जिसके बेटी, दौहित्री, दौहित्र, पुत्र और पौत्र कोई भी न हों, ऐसी स्त्री यदि दिवंगत हो जाय तो उसके पति आदि बान्धवजन उसका धन ले सकते हैं। ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य — इन चार प्रकार के विवाहों की विधि से विवाहित स्त्रियों के निस्संतान मर जाने पर उनका धन पति को प्राप्त होता है। यदि वे संतानवती रही हों तो उनका धन उनकी पुत्रियों को प्राप्त होता है और शेष चार गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच विवाह की विधि से विवाहित होकर मरी हुई संतानहीना स्त्रियों का धन उनके पिता को प्राप्त होता है ॥ ३०-३२ ॥

जो कन्या का वाग्दान करके कन्यादान नहीं करता, वह राजा के द्वारा दण्डनीय होता है तथा वाग्दान के निमित्त वर ने अपने सम्बन्धियों और कन्या-सम्बन्धियों के स्वागत सत्कार में जो धन खर्च किया हो, वह सब सूदसहित कन्यादाता वर को लौटावे। यदि वाग्दत्ता कन्या की मृत्यु हो जाय, तो वर अपने और कन्यापक्ष दोनों के व्यय का परिशोधन करके जो अवशिष्ट व्यय हो, वही कन्यादाता से ले। दुर्भिक्ष में, धर्मकार्य में, रोग या बन्धन से मुक्ति पाने के लिये यदि पति दूसरा कोई धन प्राप्त न होने पर स्त्रीधन को ग्रहण करे, तो पुनः उसे लौटाने को बाध्य नहीं है। जिस स्त्री को श्वशुर अथवा पति से स्त्रीधन न प्राप्त हुआ हो, उस स्त्री के रहते हुए दूसरा विवाह करने पर पति ‘आधिवेदनिक’ के समान धन दे। अर्थात् ‘अधिवेदन’ (द्वितीय विवाह) में जितना धन खर्च होता हो, उतना ही धन उसे भी दिया जाय। यदि उसे पति और श्वशुर की ओर से स्त्रीधन प्राप्त हुआ हो, तब आधिवेदनिक धन का आधा भाग ही दिया जाय। विभाग का अपलाप होने पर यदि संदेह उपस्थित हो तो कुटुम्बीजनों, पिता के बन्धु- बान्धवों, माता के बन्धु-बान्धवों, पूर्वोक्त लक्षण वाले साक्षियों तथा अभिलेख विभागपत्र के सहयोग से विभाग का निर्णय जानना चाहिये। इसी प्रकार यौतक (दहेज में मिले हुए धन) तथा पृथक् किये गये गृह और क्षेत्र आदि के आधार पर भी विभाग का निर्णय जाना जा सकता है ॥ ३३-३६ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महा पुराण में ‘दाय विभागका कथन’ नामक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५६ ॥

1. पिता के द्वारा स्वयं उपार्जित किया हुआ जो धन है, उसका बँटवारा वह अपनी रुचि के अनुसार कर सकता है। जिस पुत्र पर अधिक संतुष्ट हो, उसे वह अधिक दे सकता है और जिसके व्यवहार से उसको संतोष न हो, उसे कम भी दे सकता है। परंतु जो पिता-पितामहों की परम्परा से आया हुआ धन है, उसमें विषम विभाजन नहीं चल सकता। उसमें वह सब पुत्रों को समांशभागी ही बनावे ।
2. यद्यपि शास्त्रों में पैतृकधन का विषम-विभाजन भी मिलता है, तथापि वह ईर्ष्या और कलह का मूल होने के कारण लोकविद्विष्ट है; अतः व्यवहार में लाने योग्य नहीं है; इसलिये सम-विभाजन ही सर्वसम्मत है ।
3. माता का ऋण भी पुत्र ही मातृधन से चुका दें, पत्नियाँ नहीं । ऋण चुकाने से अवशिष्ट धन पुत्रियों में बँट जाना चाहिये।

4. बन्धु-बान्धव तीन प्रकार के हैं — अपने बन्धु-बान्धव, पिता के बन्धु बान्धव तथा माता के बन्धु बान्धव । इनमें यही क्रम अभीष्ट है। अर्थात् पूर्व अभाव में उत्तरोत्तर धन के भागी होते हैं ।
5. यहाँ श्लोक में आचार्य, शिष्य और धर्मभ्राता — इस क्रम से उल्लेख है, परंतु मिताक्षराकार ने यह निर्णय दिया है कि यहाँ विलोम-क्रम लेना चाहिये।
6. जिसके विवाह के बाद पति दूसरा विवाह करे, वह स्त्री ‘ अधिविन्ना’ कहलाती है। ऐसे विवाह के लिये उससे आज्ञा ली जाती है और इस आज्ञा के निमित्त उसको जो धन दिया जाता है, वह ‘अधिवेदन-निमित्तक’ होने के कारण ‘आधिवेदनिक’ कहा गया है।

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