July 8, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 255 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पचपनवाँ अध्याय साक्षी, लेखा तथा दिव्यप्रमाणों के विषय में विवेचन दिव्यानि प्रमाणानि ‘साक्षी-प्रकरण’ अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। तपस्वी, कुलीन, दानशील, सत्यवादी, कोमल हृदय, धर्मात्मा, पुत्रयुक्त, धनी, पञ्चयज्ञ आदि वैदिक क्रियाओं से युक्त अपनी जाति और वर्ग के पाँच या तीन साक्षी होने चाहिये। अथवा सभी मनुष्य सबके साक्षी हो सकते हैं; किंतु स्त्री, बालक, वृद्ध, जुआरी, मत्त (शराब आदि पीकर मतवाला), उन्मत्त (भूत या ग्रह के आवेश से युक्त), अभिशस्त (पातकी), रंगमञ्च पर उतरने वाला चारण, पाखण्डी, कूटकारी (जालसाज), विकलेन्द्रिय (अंधा, बहरा आदि), पतित, आप्त (मित्र या सगे-सम्बन्धी), अर्थ सम्बन्धी (विवादास्पद अर्थ से सम्बन्ध रखने वाला), सहायक, शत्रु, चोर, साहसी (दुस्साहसपूर्ण कार्य करने वाला), दृष्टदोष (जिसका पूर्वापर-विरुद्ध बोलने का स्वभाव देखा गया हो, वह) तथा निर्भूत (भाई बन्धुओं से परित्यक्त) आदि साक्षी बनाने योग्य नहीं हैं। वादी और प्रतिवादी — दोनों के मान लेने पर एक भी धर्मवेत्ता पुरुष साक्षी हो सकता है। किसी स्त्री को बलपूर्वक पकड़ लेना, चोरी करना, किसी को कटुवचन सुनाना या कठोर दण्ड देना तथा हत्या आदि दुःसाहसपूर्ण कार्य करना — इन अपराधों में सभी साक्षी बनाये जा सकते हैं ॥ १-५ ॥’ जो मनुष्य साक्षी होना स्वीकार करके तीन पक्ष के भीतर गवाही नहीं देता है, राजा छियालीसवें दिन उससे सारा ऋण सूदसहित वादी को दिलावे और अपना दशांश भाग भी उससे वसूल करे। जो नराधम जानते हुए भी साक्षी नहीं होता, वह कूटसाक्षी (झूठी गवाही देने वालों) के समान दण्ड और पाप का भागी होता है। न्यायाधिकारी वादी एवं प्रतिवादी के समीप स्थित साक्षियों को यह वचन सुनावे — ‘पातकियों और महापातकियों को तथा आग लगाने वालों और स्त्री एवं बालकों की हत्या करने वालों को जो लोक (नरक) प्राप्त होते हैं, झूठी गवाही देने वाला मनुष्य उन सभी लोकों (नरकों) को प्राप्त होता है। तुमने सैकड़ों जन्मों में जो कुछ भी पुण्य अर्जित किया है, वह सब उसी को प्राप्त हुआ समझो, जिसे तुम असत्यभाषण से पराजित करोगे।’ साक्षियों की बातों में द्विविधा (परस्पर विरुद्धभाव) हो तो उनमेंसे बहुसंख्यक साक्षियों का वचन ग्राह्य होता है। यदि समान संख्या वाले साक्षियों की बातों में विरोध हो, अर्थात् जहाँ दो एक तरह की बात कहते हों और दो दूसरे तरह की बात, वहाँ गुणवानों की बात को प्रमाण मानना चाहिये। यदि गुणवानों की बातों में भी विरोध उपस्थित हो तो उनमें जो सबसे अधिक गुणवान् हो, उसकी बात को विश्वसनीय एवं ग्राह्य माने। साक्षी जिसकी प्रतिज्ञा (दावा) को सत्य बतायें, वह विजयी होता है। वे जिसके दावे को मिथ्या बतलायें, उसकी पराजय निश्चित है ॥ ६-११ ॥ साक्षियों के साक्ष्य देने पर भी यदि गुणों में इनसे श्रेष्ठ अन्य पुरुष अथवा पूर्वसाक्षियों से दुगुने साक्षी उनके साक्ष्य को असत्य बतलायें तो पूर्वसाक्षी कूट (झूठे) माने जाते हैं। उन लोगों को, जो कि धन का प्रलोभन देकर गवाहों को झूठी गवाही देने के लिये तैयार करते हैं तथा जो उनके कहने से झूठी गवाही देते हैं, उनको भी पृथक् पृथक् दण्ड दे। विवाद में पराजित होने पर जो दण्ड बताया गया है, उससे दूना दण्ड झूठी गवाही दिलाने वाले और देने वाले से वसूल करना चाहिये। यदि दण्ड का भागी ब्राह्मण हो तो उसे देश से निकाल देना चाहिये। जो अन्य गवाहों के साथ गवाही देना स्वीकार करके, उसका अवसर आने पर रागादि दोषों से आक्रान्त हो अपने साक्षीपन को दूसरे साक्षियों से अस्वीकार करता है, अर्थात् यह कह देता है कि ‘मैं इस मामले में साक्षी नहीं हूँ’, वह विवाद में पराजय प्राप्त होने पर जो नियत दण्ड है, उससे आठगुना दण्ड देने का अधिकारी है। उससे उतना दण्ड वसूल करना चाहिये। परंतु जो ब्राह्मण उतना दण्ड देने में असमर्थ हो, उसको देश से निर्वासित कर देना चाहिये। जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के वध की सम्भावना हो, वहाँ (उनके रक्षार्थ साक्षी झूठ बोले (कदापि सत्य न कहे। यदि किसी हत्यारे के विरुद्ध गवाही देनी हो तो सत्य ही कहना चाहिये) ॥ १२-१५ ॥ लेखा-प्रकरण धनी और अधमर्ण (साहु और खदुका) के बीच जो सुवर्ण आदि द्रव्य परस्पर अपनी ही रुचि से इस शर्त के साथ कि ‘इतने समय में इतना देना है और प्रतिमास इतनी वृद्धि चुकानी है’, व्यवस्थापूर्वक रखा जाता है, उस अर्थ को लेकर कालान्तर में कोई मतभेद या विवाद उपस्थित हो जाय तो उसमें वास्तविक तत्त्व का निर्णय करने के लिये कोई लेखापत्र तैयार कर लेना चाहिये। उसमें पूर्वोक्त योग्यता वाले साक्षी रहें और धनी (साहू) का नाम भी पहले लिखा गया हो। लेखा में संवत्, मास, पक्ष, दिन, तिथि, साहु और खदुका के नाम, जाति तथा गोत्र के उल्लेख के साथ साथ शाखा-प्रयुक्त गौण नाम (बहृच, कठ आदि) तथा धनी और ऋणी के अपने-अपने पिता के नाम आदि लिखे रहने चाहिये। लेखा में वाञ्छनीय विषय का उल्लेख पूर्ण हो जाने पर ऋण लेने वाला अपने हाथ से लेखा पर यह लिख दे कि ‘ अमुक का पुत्र मैं अमुक इस लेखा में जो लिखा गया है, उससे सहमत हूँ।’ तदनन्तर साक्षी भी अपने हाथ से यह लिखे कि ‘आज मैं अमुक का पुत्र अमुक इस लेखा का साक्षी होता हूँ।’ साक्षी सदा समसंख्या (दो या चार) में होने चाहिये। लिपिज्ञानशून्य ऋणी अपनी सम्मति किसी दूसरे व्यक्ति से लिखवा ले और अपढ़ साक्षी अपना मत सब साक्षियों के समीप दूसरे साक्षी से लिखवाये। अन्त में लेखक (कातिब) यह लिख दे कि आज अमुक धनी और अमुक ऋणी के कहने पर अमुक के पुत्र मुझ अमुक ने यह लेखा लिखा। साक्षियों के न होने पर भी ऋणी के हाथ का लिखा हुआ लेखा पूर्ण प्रमाण माना जाता है, किंतु वह लेखा बल अथवा छल के प्रयोग से लिखवाया गया न हो। लेखा लिखकर लिया हुआ ऋण तीन पीड़ियों तक ही देय होता है, परंतु बन्धक की वस्तु तबतक धनी के उपभोग में आती है, जबतक कि लिया हुआ ऋण चुका नहीं दिया जाता है। यदि लेखापत्र देशान्तर में हो, उसकी लिखावट दोषपूर्ण अथवा संदिग्ध हो, नष्ट हो गया हो, घिस गया हो, अपहृत हो गया हो, छिन्न-भिन्न अथवा दग्ध हो गया हो, तब धनी ऋणी की अनुमति से दूसरा लेखा तैयार करवावे। संदिग्ध लेख की शुद्धि स्वहस्तलिखित आदि से होती है, अर्थात् लेखक अपने हाथ से दूसरा लेखा लिखकर दिखावे। जब दोनों के अक्षर समान हों, तब संदेह दूर हो जाता है। ‘आदि’ पद से यह सूचित किया गया है कि साक्षी और लेखक से दूसरा कुछ लिखवाकर यह देखा जाय कि दोनों लेखों के अक्षर मिलते हैं या नहीं। यदि मिलते हों तो पूर्वलेखा के शुद्ध होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है। युक्तिप्राप्ति1 , क्रिया2 , चिह्न3 , सम्बन्ध4 और आगम5 — इन हेतुओं से भी लेखा की शुद्धि होती है। ऋणी जब-जब ऋण का धन धनी को दे, तब-तब लेखापत्र की पीठ पर लिख दिया करे। अथवा धनी जब-जब जितना धन पावे, तब-तब अपने हाथ से लेखा की पीठ पर उसको लिखकर अङ्कित कर दे। ऋणी जब ऋण चुका दे तो लेखा को फाड़ डाले, अथवा (लेखा किसी दुर्गम स्थान में हो या नष्ट हो गया, तो) ऋणशुद्धि के लिये धनी से भरपाई लिखवा ले। यदि लेखापत्र में साक्षियों का उल्लेख हो तो उनके सामने ऋण चुकावे ॥ १६-२७ ॥ दिव्य-प्रकरण तुला, अग्नि, जल, विष तथा कोष — ये पाँच दिव्य प्रमाण धर्मशास्त्र में कहे गये हैं, जो संदिग्ध अर्थ के निर्णय अथवा संदेह की निवृत्ति के लिये देने चाहिये। जब अभियोग बहुत बड़े हों और अभियोक्ता परले सिरे पर, अर्थात् व्यवहार के जय- पराजय-लक्षण चतुर्थपाद में पहुँच गया हो, तभी इन दिव्य-प्रमाणों का आश्रय लेना चाहिये। वादी और प्रतिवादी-दोनों में से कोई एक परस्पर बातचीत करके, स्वीकृति देकर अपनी रुचि के अनुसार दिव्य-प्रमाण के लिये प्रस्तुत हो और दूसरा सम्भावित शारीरिक या आर्थिक दण्ड के लिये तैयार रहे। राजद्रोह या महापातक का संदेह होने पर शीर्षक स्थिति में आये बिना भी तुला आदि दिव्य-प्रमाणों को स्वीकार करे। एक हजार पण से कम के अभियोग में अग्नि, विष और तुला — इन दिव्य प्रमाणों को ग्रहण न करावे; किंतु राजद्रोह और महापातक के अभियोग में सत्पुरुष सदा इन्हीं प्रमाणों का वहन करे। सहस्त्र पण के अभियोग में तुला आदि तीन दिव्य-प्रमाणों को प्रस्तुत करे, किंतु अल्प अभियोग में भी कोश कराये। शपथ ग्रहण करने वाले के शुद्ध प्रमाणित होने पर उसे वादी से पचास पण दिलावे और दोषी प्रमाणित होने पर उसे दण्ड दे। न्यायाधिकारी दिव्य प्रमाण के लिये प्रस्तुत मनुष्य को पहले दिन उपवास करवाये तथा दूसरे दिन सूर्योदय के समय वस्त्रसहित स्नान कर लेने पर बुलाये। फिर राजा और ब्राह्मणों के सम्मुख उससे सभी दिव्य-प्रमाण ग्रहण करावे। किसी भी जाति अथवा वय की स्त्री, किसी भी जाति का सोलह वर्ष की अवस्था से कम का बालक, कम-से-कम अस्सी वर्ष की अवस्था का बूढ़ा, अन्ध (नेत्रहीन), पङ्गु (पादरहित), जातिमात्र का ब्राह्मण तथा रोगी — इन सबकी शुद्धि के लिये, अर्थात् इन पर लगे हुए अपराधविषयक संदेह का निवारण करने के लिये ‘तुला’ नामक दिव्य-प्रमाण ही ग्राह्य है। क्षत्रिय के लिये अग्नि (गरम किया हुआ फाल और तपाया हुआ माष), वैश्य के लिये जलमात्र तथा शूद्र के लिये सात जौ विष इनकी शुद्धि के लिये आवश्यक बताये गये हैं ॥ २८-३३ ॥ तुला-दिव्यप्रमाण जो तराजू उठाना या तौलना जानते हों, ऐसे लोगों से अभियुक्त को तुला के एक पलड़े में बैठाकर दूसरे पलड़े में कोई मिट्टी या प्रस्तर का उतने ही वजन का टुकड़ा रखकर उससे उसको ठीक- ठीक तौले। फिर जिस संनिवेश में वह बराबर तौला गया है, उसमें सफेद खड़िया से रेखा करके उस व्यक्ति को उतार लिया जाय। उतरने पर वह निम्नाङ्कित प्रार्थना-वाक्य पढ़कर तुला को अभिमन्त्रित करे — आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिस्च उभे च सन्ध्ये धर्म्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ ३५ ॥ त्वं तुले सत्यधामासि पुरा देवैविनिर्मिता । सत्यं वदस्व कल्याणि संशयान्मां विमोचय ॥ ३६ ॥ यद्यस्मि पापकृन्मातस्ततो मां त्वमधो नय । शुद्धश्चेद्गमयोद्र्ध्वम्मां तुलामित्यभिमन्त्रयेत् ॥ ३७ ॥ ‘सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, दोनों संध्याकाल और धर्म — ये सब मनुष्य के वृत्तान्त को जानते हैं। तुले! तुम सत्य का धाम (स्थान) हो, पूर्वकाल में देवताओं ने तुम्हारा निर्माण किया है। अतः कल्याणि । तुम सत्य को प्रकट करो और मुझे संशय से मुक्त कर दो। मातः यदि मैं पापी या अपराधी हूँ तो मेरा पलड़ा नीचे कर दो और यदि मैं दोषरहित हूँ तो मुझे ऊपर उठा दी’ ॥ ३४-३७ ॥ अग्नि-दिव्यप्रमाण अग्नि का दिव्य ग्रहण करने वाले के हाथों में धान मसलकर, हाथों के काले तिल आदि चिह्नों को देखकर उन्हें महावर आदि से रंग दे। फिर उसके हाथों की अञ्जलि में पीपल के सात पत्ते रखे। हाथसहित उन पत्तों को धागे से आवेष्टित कर दे। इसके बाद दिव्य ग्रहण करने वाला अग्नि की प्रार्थना करे — ‘अग्ग्रिदेव! आप सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के अन्तःकरण में विचरते हैं। आप सबको पवित्र करने वाले और सब कुछ जानने वाले हैं। आप साक्षी की भाँति मेरे पुण्य और पाप का निरीक्षण करके सत्य को प्रकट कीजिये ‘ ॥ ३८-३९ ॥ शपथ ग्रहण करने वाले के ऐसा कहने पर उसके दोनों हाथों में पचास पल का जलता हुआ लौहपिण्ड रख दे। दिव्य ग्रहण करने वाला मनुष्य उसे लेकर धीरे-धीरे सात मण्डलों तक चले। मण्डल की लम्बाई और चौड़ाई सोलह सोलह अङ्गल की हो तथा एक मण्डल से दूसरे मण्डल की दूरी भी उतनी ही हो। तदनन्तर शपथ करने वाला अग्निपिण्ड को गिराकर हाथों में पुनः धान मसले। यदि हाथ न जले हों तो शपथ करने वाला मनुष्य शुद्ध माना जाता है। यदि लौहपिण्ड बीच में ही गिर पड़े या कोई संदेह हो तो शपथकर्ता पूर्ववत् लौहपिण्ड लेकर चले ॥ ४०-४२ ॥ जल-दिव्य जल का दिव्य ग्रहण करने वाले को निम्नाङ्कित रूप से वरुणदेव की प्रार्थना करनी चाहिये — ‘वरुण! आप पवित्रों में भी पवित्र हैं और सबको पवित्र करने वाले हैं। मैं शुद्धि के योग्य हूँ। मेरी शुद्धि कीजिये। सत्य के बल से मेरी रक्षा कीजिये।’ —इस प्रार्थना मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके वह मनुष्य नाभिपर्यन्त जल में खड़े हुए पुरुष की जङ्घा पकड़कर जल में डूबे। उसी समय कोई व्यक्ति बाण चलावे। जबतक एक वेगवान् मनुष्य उस छूटे हुए बाण को ले आवे, तबतक यदि शपथकर्ता जल में डूबा रहे तो वह शुद्ध होता है 6 ॥ ४३-४४१/२ ॥ विष-दिव्य विष का दिव्य-प्रमाण ग्रहण करने वाला इस प्रकार विष की प्रार्थना करे — ‘विष! तुम ब्रह्मा के पुत्र हो और सत्यधर्म में अधिष्ठित हो; इस कलङ्क से मेरी रक्षा एवं सत्य के प्रभाव से मेरे लिये अमृतरूप हो जाओ।’ ऐसा कहकर शपथकर्ता हिमालय पर उत्पन्न शार्ङ्ग विष का भक्षण करे। यदि विष बिना वेग के पच जाय, तो न्यायाधिकारी उसकी शुद्धि का निर्देश करें ॥ ४५-४६१/२ ॥ कोश-दिव्य कोश-दिव्य लेने वाले के लिये न्यायाधिकारी उग्र देवताओं का पूजन करके उनके अभिषेक का जल ले आवे। फिर शपथकर्ता को यह बतलाकर उस में से तीन पसर जल पिला दे। यदि चौदहवें दिन तक राजा अथवा देवता से घोर पीडा न प्राप्त हो, तो वह निःसंदेह शुद्ध होता है ॥ ४७-४८ ॥ अल्प मूल्यवाली वस्तु के अभियोग में संदेह उपस्थित होने पर सत्य, वाहन, शस्त्र, गौ, बीज, सुवर्ण, देवता, गुरुचरण एवं इष्टापूर्त आदि पुण्यकर्म इनकी सहजसाध्य शपथ विहित है ॥ ४९-५० ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘दिव्य प्रमाण-कथन’ नामक दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५५ ॥ 1. इस देश में इस काल में इस पुरुष के पास इतने द्रव्य का होना सम्भव है – इसे ‘युक्तिप्राप्ति’ कहते हैं । 2. साक्षियों का उल्लेख ‘क्रिया’ है। 3. असाधारण लिङ्ग — जैसे ‘श्री’, ‘ओम्’ आदि का उल्लेख ‘चिह्न’ कहलाता है । 4. अर्थी और प्रत्यर्थी — दोनों में पहले भी परस्पर विश्वासपूर्वक देन – लेन का व्यवहार होना ‘सम्बन्ध’ है । 5. इस व्यक्ति को इतने धन की प्राप्ति का उपाय सम्भावना से परे नहीं है, यह निर्णय ‘आगम’ कहलाता है। 6. मिताक्षरा में इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया गया है — तीन बाण छोड़ने पर एक वेगवान् मनुष्य मध्यम बाण के गिरने के स्थान पर जाकर उसे लेकर वहीं खड़ा हो जाता है। दूसरा वेगवान् पुरुष जहाँ से बाण छोड़ा गया। उस मूलस्थान पर खड़ा हो जाता है। इस प्रकार उन दोनों के स्थित हो जाने पर तीन बार ताली बजती है। तीसरी ताली के बजते ही जिसकी शुद्धि अपेक्षित है, वह पुरुष पानी में डूबता है । उसी समय मूलस्थान पर खड़ा हुआ पुरुष बड़े वेग से दौड़कर मध्यम शरपातस्थान तक जाता है। उसके वहाँ पहुँचते ही जो बाण लेकर पहले से खड़ा है, वह बड़े वेग से दौड़कर मूलस्थान पर आ जाता है । वहाँ पहुँचकर वह डूबे हुए मनुष्य की ओर देखता है। यदि उसके अङ्ग डूबे हुए ही रहें, दृष्टि में न आवें तो उसकी शुद्धि मानी जाती है। Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe