अग्निपुराण – अध्याय 254
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ चौवनवाँ अध्याय
ऋणादान तथा उपनिधि सम्बन्धी विचार
व्यवहारः

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! यदि ऋण लेने वाले पुरुष के अनेक ऋणदाता साहु हों और वे सब के-सब एक ही जाति के हों तो राजा उन्हें ग्रहणक्रम के अनुसार ऋण लेने वाले से धन दिलवावे। अर्थात् जिस धनी ने पहले ऋण दिया हो, उसे पहले और जिसने बाद में दिया हो, उसे बाद में ऋणग्राही पुरुष ऋण लौटाये। यदि ऋणदाता धनी अनेक जाति के हों तो ऋणग्राही पुरुष सबसे पहले ब्राह्मण धनी को धन देकर उसके बाद क्षत्रिय आदि को देय-धन अर्पित करे। राजा को चाहिये कि वह ऋण लेने वाले से उसके द्वारा गृहीत धन के प्रमाण द्वारा सिद्ध हो जाने पर दस प्रतिशत धन दण्ड के रूप में वसूल करे तथा जिसने अपना धन वसूल कर लिया है, उस ऋणदाता पुरुष से पाँच प्रतिशत धन ग्रहण कर ले और उस धन को न्यायालय के कर्मचारियों के भरण-पोषण में लगावे ॥ १-२ ॥’

यदि ऋण लेने वाला पुरुष ऋणदाता की अपेक्षा हीन जाति का हो और निर्धन होने के कारण ऋण की अदायगी न कर सके, तब ऋणदाता उससे उसके अनुरूप कोई काम करा ले और इस प्रकार उस ऋण का भुगतान कर ले। यदि ऋण लेने वाला ब्राह्मण हो और वह भी निर्धन हो गया हो तो उससे कोई काम न लेकर उसे अवसर देना चाहिये और धीरे-धीरे जैसे-जैसे उसके पास आय हो, वैसे-वैसे (उसके कुटुम्ब को कष्ट दिये बिना) ऋण की वसूली करे। जो वृद्धि के लिये ऋण के रूप में दिये हुए अपने धन को लोभवश ऋणग्राही के लौटाने पर भी नहीं लेता है, उसके देय-धन को यदि किसी मध्यस्थ के यहाँ रख दिया जाय तो उस दिन से उसपर वृद्धि नहीं होती ब्याज नहीं बढ़ता; परन्तु उस रखे हुए धन को भी ऋणदाता के माँगने पर न दिया जाय तो उसपर पूर्ववत् ब्याज बढ़ता ही रहता है ॥ ३-४ ॥

दूसरे का द्रव्य जब खरीद आदि के बिना ही अपने अधिकार में आता है तो उसे ‘रिक्थ’ कहते हैं। विभाग द्वारा जो उस रिक्थ को ग्रहण करता है, वह ‘रिक्थग्राह’ कहलाता है। जो जिसके द्रव्य को रिक्थ के रूप में ग्रहण करता है, उसीसे उसके ऋण को भी दिलवाया जाना चाहिये। उसी तरह जो जिसकी स्त्री को ग्रहण करता है, वही उसका ऋण भी दे। रिक्थ-धन का स्वामी यदि पुत्रहीन है तो उसका ऋण वह कृत्रिम पुत्र चुकावे, जो एकमात्र उसी के धन पर जीवन निर्वाह करता है। संयुक्त परिवार में समूचे कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिये एक साथ रहने वाले बहुत से लोगों ने या उस कुटुम्ब के एक-एक व्यक्ति ने जो ऋण लिया हो, उसे उस कुटुम्ब का मालिक दे। यदि वह मर गया या परदेश चला गया तो उसके धन के भागीदार सभी लोग मिलकर वह ऋण चुकावें। पति के किये हुए ऋण को स्त्री न दे, पुत्र के किये हुए ऋण को माता न दे, पिता भी न दे तथा स्त्री के द्वारा किये गये ऋण को पति न दे; किंतु यह नियम समूचे कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिये किये गये ऋण पर लागू नहीं होता है। ग्वाले, शराब बनाने वाले, नट, धोबी तथा व्याध की स्त्रियों ने जो ऋण लिया हो, उसे उनके पति अवश्य दें; क्योंकि उनको वृत्ति (जीविका) उन स्त्रियों के ही अधीन होती है। यदि पति मुमूर्ष हो या परदेश जानेवाला हो, उसके द्वारा नियुक्त स्त्री ने जो ऋण लिया हो, वह भी यद्यपि पति का ही किया हुआ ऋण है, तथापि उसे पत्नी को चुकाना होगा; अथवा पति के साथ रहकर भार्या ने जो ऋण किया हो, वह भी पति और पुत्र के अभाव में उस भार्या को ही चुकाना होगा; जो ऋण स्त्री ने स्वयं किया हो, उसकी देनदार तो यह है ही। इसके सिवा दूसरे किसी प्रकार के पतिकृत ऋण को चुकाने का भार स्त्री पर नहीं है ॥ ५-९ ॥

यदि पिता ऋण करके बहुत दूर परदेश में चला गया, मर गया अथवा किसी बड़े भारी संकट में फँस गया तो उसके ऋण को पुत्र और पौत्र चुकावें। (पिता के अभाव में पुत्र और पुत्र के अभाव में पौत्र उस ऋण की अदायगी करे।) यदि वे अस्वीकार करें तो अर्थी न्यायालय में अभियोग उपस्थित करके साक्षी आदि के द्वारा उस ऋण की यथार्थता प्रमाणित कर दे। उस दशा में तो पुत्र- पौत्रों को वह ऋण देना ही पड़ेगा। जो ऋण शराब पीने के लिये लिया गया हो, परस्त्री- लम्पटता के कारण कामभोग के लिये किया गया हो, जूए में हारने पर जो ऋण लिया गया हो, जो धन दण्ड और शुल्क का शेष रह गया हो तथा जो व्यर्थ का दान हो, अर्थात् धूर्तों और नट आदि को देने के लिये किया गया हो, इस तरह के पैतृक ऋण को पुत्र कदापि न दे। भाइयों के, पति- पत्नी के तथा पिता-पुत्र के अविभक्त धन में ‘प्रातिभाव्य’ ऋण और साक्ष्य नहीं माना गया है ॥ १०-१२ ॥

विश्वास के लिये किसी दूसरे पुरुष के साथ जो समय शर्त या मर्यादा निश्चित की जाती है, उसका नाम है — ‘प्रातिभाव्य’। वह विषय-भेद से तीन प्रकार का होता है। जैसे (१) दर्शनविषयक प्रातिभाव्य। अर्थात् कोई दूसरा पुरुष यह उत्तरदायित्व ले कि जब-जब आवश्यकता होगी, तब-तब इस व्यक्ति को मैं न्यायालय के सामने उपस्थित कर दूँगा अर्थात् दिखाऊँगा- हाजिर कर दूँगा। (‘दर्शन-प्रतिभू’ को आजकल की भाषा में ‘हाजिर जामिन’ कहते हैं।) (२) प्रत्ययविषयक प्रातिभाव्य। ‘प्रत्यय’ कहते हैं विश्वास को ‘विश्वास प्रतिभू’ को ‘विश्वास-जामिन’ कहा जाता है। जैसे कोई कहे कि ‘आप मेरे विश्वास पर इसको धन दीजिये, यह आपको ठगेगा नहीं; क्योंकि यह अमुक का बेटा है। इसके पास उपजाऊ भूमि है और इसके अधिकार में एक बड़ा-सा गाँव भी है’ इत्यादि। (३) दानविषयक प्रातिभाव्य। ‘दान-प्रतिभू ‘को ‘माल-जामिन’ कहते हैं। ‘दान-प्रतिभू’ यह जिम्मेदारी लेता है कि ‘यदि यह लिया हुआ धन नहीं देगा तो मैं स्वयं ही अपने पास से दूँगा’ इत्यादि। इस प्रकार दर्शन (उपस्थिति), प्रत्यय (विश्वास) तथा दान (वसूली) के लिये प्रातिभाव्य किया जाता है —जामिन देने की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से प्रथम दो, अर्थात् ‘दर्शन-प्रतिभू’ और ‘विश्वास-प्रतिभू’ इनकी बात झूठी होने पर, स्वयं धनी ऋण चुकाने के लिये विवश है, अर्थात् राजा उनसे धनी को वह धन अवश्य दिलवावे; परंतु जो तीसरा ‘दान-प्रतिभू’ है, उसकी बात झूठी होने पर वह स्वयं तो उस धन को लौटाने का अधिकारी है ही, किंतु यदि वह बिना लौटाये ही विलुप्त हो जाय तो उसके पुत्रों से भी उस धन की वसूली की जा सकती है। जहाँ ‘दर्शन प्रतिभू’ अथवा ‘विश्वास-प्रतिभू’ परलोकवासी हो जायें, वहाँ उनके पुत्र उनके दिलाये हुए ऋण को न दें; परंतु जो स्वयं लौटा देने के लिये जिम्मेदारी ले चुका है, वह ‘दान-प्रतिभू’ यदि मर जाय तो उसके पुत्र अवश्य उसके दिलाये हुए ऋण को दें। यदि एक ही धन को दिलाने के लिये बहुत-से प्रतिभू (जामिनदार) बन गये हों, तो उस धन के न मिलने पर वे सभी उस ऋण को बाँटकर अपने-अपने अंश से चुकावें। यदि सभी प्रतिभू एक-से ही हों, अर्थात् जैसे ऋणग्राही सम्पूर्ण धन लौटाने को उद्यत रहा है, उसी प्रकार प्रत्येक प्रतिभू यदि सम्पूर्ण धन लौटाने के लिये प्रतिज्ञाबद्ध हो तो धनी पुरुष अपनी रुचि के अनुसार उनमें से किसी एक से ही अपना सारा धन वसूल कर सकता है। ऋण देने वाले धनी के द्वारा दबाये जाने पर प्रतिभू राजा के आदेश से सबके सामने उस धनी को जो धन देता है, उससे दूना धन ऋण लेने वाले लोग उस प्रतिभू को लौटावें ॥ १३-१६ ॥

मादा पशुओं को यदि ऋण के रूप में दिया गया हो तो उस धन की वृद्धि के रूप में केवल उनकी संतति ली जा सकती है। धान्य की अधिक से अधिक वृद्धि तीनगुने तक मानी गयी है। वस्त्र वृद्धि के क्रम से बढ़ता हुआ चौगुना तथा रस (घी, तेल आदि) अधिक-से-अधिक आठगुना तक हो सकता है। यदि कोई वस्तु बन्धक रखकर ऋण लिया गया हो और उस ऋण की रकम ब्याज के द्वारा बढ़ते-बढ़ते दूनी हो गयी हो, उस दशा में भी ऋणग्राही यदि सारा धन लौटाकर उस वस्तु को छुड़ा नहीं लेता है, तो वह वस्तु नष्ट हो जाती है — उसके हाथ से निकलकर ऋणदाता की अपनी वस्तु हो जाती है। जो धन समय-विशेष पर लौटाने की शर्त पर लिया जाता है और उसके लिये कोई जेवर आदि बन्धक रखा जाता है, वह समय बीत जाने पर वह बन्धक नष्ट हो जाता है, फिर वापस नहीं मिलता। परंतु जिसका फलमात्र भोगने के योग्य होता है, वह बगीचा या खेत आदि बन्धक के रूप में रखा गया हो तो वह कभी नष्ट नहीं होता; उसपर मालिक का स्वत्व बना ही रहता है ॥ १७-१८ ॥

यदि कोई गोपनीय आधि (बन्धक में रखी हुई वस्तु ताँबे की कराही आदि) ऋणदाता के उपभोग में आये तो उसपर दिये हुए धन के लिये ब्याज नहीं लगाया जा सकता। यदि बन्धक में कोई उपकारी प्राणी (बैल आदि) रखा गया हो और उसके काम लेकर उसकी शक्ति क्षीण कर दी गयी हो तो उसपर दिये गये ऋण के ऊपर वृद्धि नहीं जोड़ी जा सकती। यदि बन्धक की वस्तु नष्ट हो जाय-टूट-फूट जाय तो उसे ठीक कराकर लौटाना चाहिये और यदि वह सर्वथा विलुप्त (नष्ट) हो जाय तो उसके लिये भी उचित मूल्य आदि देना चाहिये। यदि दैव अथवा राजा के प्रकोप से वह वस्तु नष्ट हुई हो तो उसपर उक्त नियम लागू नहीं होता। उस दशा में ऋणग्राही धनी को वृद्धिसहित धन लौटाये अथवा वृद्धि रोकने के लिये दूसरी कोई वस्तु बन्धक रखे। ‘आधि’ चाहे गोप्य हो या भोग्य, उसके स्वीकार (उपभोग) मात्र से आधि-ग्रहण की सिद्धि हो जाती है। उस आधि की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने पर भी यदि वह कालवश निस्सार हो जाय वृद्धिसहित मूलधन के लिये पर्याप्त न रह जाय तो ऋणग्राही को दूसरी कोई वस्तु आधि के रूप में रखनी चाहिये अथवा धनी को उसका धन लौटा देना चाहिये ॥ १९-२० ॥

सदाचार को ही बन्धक मानकर उसके द्वारा जो द्रव्य अपने या दूसरे के अधीन किया जाता है, उसको ‘चरित्र-बन्धककृत’ 1  धन कहते हैं। ऐसे धन को ऋणग्राही वृद्धिसहित धनी को लौटावे या राजा ऋणग्राही से धनी को वृद्धिसहित वह धन दिलवाये। यदि ‘सत्यङ्कारकृत’ द्रव्य बन्धक रखा गया हो तो धनी को द्विगुण धन लौटाना चाहिये। तात्पर्य यह कि यदि बन्धक रखते समय ही यह बात कह दी गयी हो कि ‘ऋण की रकम बढ़ते बढ़ते दूनी हो जाय तो भी मैं दूना द्रव्य ही दूँगा। मेरी बन्धक रखी हुई वस्तु पर धनी का अधिकार नहीं होगा’ इस शर्त के साथ जो ऋण लिया गया हो वह ‘सत्यङ्कारकृत’ द्रव्य कहलाता है। इसका एक दूसरा स्वरूप भी है। क्रय-विक्रय आदि की व्यवस्था (मर्यादा) के निर्वाह के लिये जो दूसरे के हाथ में कोई आभूषण इस शर्त के साथ समर्पित किया जाता है कि व्यवस्था भङ्ग करने पर दुगुना धन देना होगा, उस दशा में जिसने वह भूषण अर्पित किया है, यदि वही व्यवस्था भङ्ग करे तो उसे वह भूषण सदा के लिये छोड़ देना पड़ेगा। यदि दूसरी ओर से व्यवस्था भङ्ग की गयी तो उसे उस भूषण को द्विगुण करके लौटाना होगा। यह भी ‘सत्यङ्कारकृत’ ही द्रव्य है। यदि धन देकर बन्धक छुड़ाने के लिये ऋणग्राही उपस्थित हो तो धनदाता को चाहिये कि वह उसका बन्धक लौटा दे। यदि सूद के लोभ से वह बन्धक लौटाने में आनाकानी करता या विलम्ब लगाता है तो वह चोर की भाँति दण्डनीय है। यदि धन देने वाला कहीं दूर चला गया हो तो उसके कुल के किसी विश्वसनीय व्यक्ति के हाथ में वृद्धिसहित मूलधन रखकर ऋणग्राही अपना बन्धक वापस ले सकता है। अथवा उस समय तक उस बन्धक को छुड़ाने का जो मूल्य हो, वह निश्चित करके उस बन्धक को धनी के लौटने तक उसी के यहाँ रहने दे, उस दशा में उस धन पर आगे कोई वृद्धि नहीं लगायी जा सकती। यदि ऋणग्राही दूर चला गया हो और नियत समय तक न लौटे तो धनी ऋणग्राही के विश्वसनीय पुरुषों और गवाहों के साथ उस बन्धक को बेचकर अपना प्राप्तव्य धन ले ले (यदि पहले बताये अनुसार ऋण लेते समय हो केवल द्रव्य लौटाने की शर्त हो गयी हो, तब बन्धक को नहीं बेचा या नष्ट किया जा सकता है)। जब किया हुआ ऋण अपनी वृद्धि के क्रम से दूना होकर आधि पर चढ़ जाय और धनिक को आधि से दूना धन प्राप्त हो गया हो तो वह आधि को छोड़ दे। (ऋणग्राही को लौटा दे) ॥ २१-२४ ॥

‘उपनिधि-प्रकरण’ — यदि निक्षेप द्रव्य के आधारभूत वासन या पेटी आदि में धरोहर की वस्तु रखकर उसे सील-मोहरसहित बन्द करके वस्तु का स्वरूप या संख्या बताये बिना ही विश्वास करके किसी दूसरे के हाथ में रक्षा के लिये उसे दिया जाता है तो उसे ‘उपनिधि द्रव्य’ कहते हैं। उसे स्थापक के माँगने पर ज्यों-का-त्यों लौटा देना चाहिये।2  यदि उपनिधि की वस्तु राजा ने बलपूर्वक ले ली हो या दैवी बाधा (आग लगने आदि) से नष्ट हुई हो, अथवा उसे चोर चुरा ले गये हों तो जिसके यहाँ वह वस्तु रखी गयी थी, उसको वह वस्तु देने या लौटाने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि स्वामी ने उस वस्तु को माँगा हो और धरोहर रखने वाले ने नहीं दिया हो, उस दशा में यदि राजा आदि की बाधा से उस वस्तु का नाश हुआ हो तो रखने वाला उस वस्तु के अनुरूप मूल्य मालधनी को देने के लिये विवश किया जा सकता है और राजा को उससे उतना ही दण्ड दिलाया जाय। जो मालधनी की अनुमति लिये बिना स्वेच्छा से उपनिधि की वस्तु को भोगता या उससे व्यापार करता है, वह दण्डनीय है। यदि उसने उस वस्तु का उपभोग किया है तो वह सूदसहित उस वस्तु को लौटाये और यदि व्यापार में लगाकर लाभ उठाया है तो लाभसहित वह वस्तु मालधनी को लौटाये और उतना ही दण्ड राजा को दे। याचित3 , अन्वाहित4 , न्यास5  और निक्षेप6  आदि में यह उपनिधि सम्बन्धी विधान ही लागू होता है ॥ २५-२७ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘व्यवहारका कथन’ नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५४ ॥

1. जैसे धनी के सदाचार से प्रभावित हो ऋणग्राही बहुत अधिक मूल्य की त्रस्तु उसके यहाँ बन्धक रखकर स्वल्प ही ऋण लेता है, उसे यह विश्वास है कि धनी मेरी बहुमूल्य वस्तु नष्ट नहीं करेगा; इसी प्रकार ऋणग्राही के सद्भाव पर विश्वास रखकर धनी स्वल्प मूल्य की वस्तु बन्धक के तौर पर लेकर अधिक धन ऋण में दे देता है, अथवा कुछ भी बन्धक न रखकर पर्याप्त ऋण दे देता है, ये सब ‘चरित्रबन्धककृत’ धन की श्रेणी में आते हैं।

2. .जो वस्तु बिना गिनती या स्वरूप बताये सील-मोहर करके धरोहर रखी जाती है, उसे ‘उपनिधि’ समझे और जो गिनकर, दिखाकर रखी जाती है, उसे ‘निक्षेप’ माना जाता है। जैसा कि नारद का वचन है —
असंख्यातमविज्ञातं समुद्रं यन्निधीयते ।
तज्जानीयादुपनिधिं निक्षेपं गणितं विदुः ॥’

3. विवाह आदि उत्सवों में मँगनी के तौर पर माँगकर लाये हुए वस्त्र और आभूषण आदि को ‘याचित’ कहते हैं।
4. एक के हाथ में रखी हुई वस्तु को वहाँ से लेकर दूसरे के हाथ में रखी जाय तो उसे ‘अन्वाहित’ कहते हैं।
5. घर के मालिक के परोक्ष में ही घरवालों के हाथ में जो धरोहर की वस्तु यह कहकर दी जाती है कि गृहस्वामी के आने पर उन्हें यह वस्तु दे दी जाय तो उसको ‘न्यास’ कहते हैं ।
6. सबके सामने गिनकर, दिखाकर जो वस्तु धरोहर रखी जाती है, उसका नाम ‘निक्षेप’ है।

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