July 8, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 253 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तिरपनवाँ अध्याय व्यवहारशास्त्र तथा विविध व्यवहारों का वर्णन व्यवहारः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं व्यवहार का वर्णन करता हूँ, जो नय और अनय का विवेक प्रदान करने वाला है। उसके चार चरण, चार स्थान और चार साधन बतलाये गये हैं। वह चार का हितकारी, चार में व्याप्त और चार का कर्ता कहा जाता है। वह आठ अङ्ग, अठारह पद, सौ शाखा, तीन योनि, दो अभियोग, दो द्वार और दो गतियों से युक्त है ॥ १-२१/२ ॥’ धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन ये व्यवहारदर्शन के चार चरण हैं। इनमें उत्तरोत्तर पाद पूर्व-पूर्व पाद के साधक हैं। इन सबमें ‘धर्म’ का आधार सत्य है, ‘व्यवहार’ का आधार साक्षी (गवाह) है, ‘चरित्र’ पुरुषों के संग्रह पर आधारित है और ‘शासन’ राजा की आज्ञा पर अवलम्बित है। साम, दान, दण्ड और भेद — इन चार उपायों से साध्य होने के कारण वह ‘चार साधनों वाला’ है। चारों आश्रमों की रक्षा करने से वह ‘चतुर्हित’ है। अभियोक्ता, साक्षी, सभासद और राजा — इनमें एक-एक चरण से उसकी स्थिति है — इसलिये उसे ‘चतुर्व्यापी’ माना गया है। वह धर्म, अर्थ, यश और लोकप्रियता — इन चारों की वृद्धि करने वाला होने से ‘चतुष्कारी’ कहा जाता है। राजपुरुष, सभासद, शास्त्र, गणक, लेखक, सुवर्ण, अग्नि और जल — इन आठ अङ्गों से युक्त होने के कारण वह ‘अष्टाङ्ग’ है। काम, क्रोध और लोभ — इन तीन कारणों से मनुष्य की इसमें प्रवृत्ति होती है, इसीलिये व्यवहार को ‘त्रियोनि’ कहा जाता है; क्योंकि ये तीनों ही विवाद कराने वाले हैं। अभियोग के दो भेद हैं- (१) शङ्काभियोग और (२) तत्त्वाभियोग । इसी दृष्टि से वह दो अभियोग वाला है। ‘शङ्का’ असत् पुरुषों के संसर्ग से होती है और ‘तत्त्वाभियोग’ होढा (चिह्न या प्रमाण) देखने से होता है। यह दो पक्षों से सम्बन्धित होने के कारण ‘दो द्वारोंवाला’ कहा जाता है। इनमें पूर्ववादअभियोग का उपस्थापक या ‘मुद्दई’ । ‘पक्ष’ और उत्तरवाद अभियोग का प्रतिवादी या ‘मुद्दालेह’ । ‘प्रतिपक्ष’ कहलाता है। ‘भूत’ और ‘छल’ इनका अनुसरण करने से यह दो गतियों से माना जाता है ॥ ३-१२ ॥ कैसा ऋण देय है, कैसा ऋण अदेय है कौन दे, किस समय दे, किस प्रकार से दे, ऋण देने की विधि या पद्धति क्या है तथा उसे लेने या वसूल करने का विधान क्या है? इन सब बातों का विचार’ ‘ऋणादान’1 कहा गया है। जब कोई मनुष्य किसी पर विश्वास करके शङ्कारहित होकर उसके पास अपना कोई द्रव्य धरोहर के तौर पर देता है, तब उसे विद्वान् लोग ‘निक्षेप’ नामक व्यवहारपद कहते हैं। जब वणिक् आदि अनेक मनुष्य मिलकर सहकारिता या साझेदारी के तौर पर कोई कार्य करते हैं तो उसको ‘सम्भूयसमुत्थान’ संज्ञक विवादपद बतलाते हैं। यदि कोई मनुष्य पहले विधिपूर्वक किसी द्रव्य का दान देकर पुनः उसे रख लेने की इच्छा करे, तो वह ‘दत्ताप्रदानिक’ नामक विवादपद कहा जाता है। जो सेवा स्वीकार करके भी उसका सम्पादन नहीं करता या उपस्थित नहीं होता, उसका यह व्यवहार ‘अभ्युपेत्य अशुश्रूषा’ नामक विवादपद होता है। भृत्यों को वेतन देने-न-देने से सम्बन्ध रखने वाला विवाद ‘वेतनानपाक्रम’ माना गया है। धरोहर में रखे हुए या खोये हुए पराये द्रव्य को पाकर अथवा चुराकर स्वामी के परोक्ष में बेचा जाय तो यह ‘अस्वामिविक्रय’ नामक विवादपद है। यदि कोई व्यापारी किसी पण्य द्रव्य का मूल्य लेकर विक्रय कर देने के बाद भी खरीददार को वह द्रव्य नहीं देता है तो उसको ‘विक्रीयासम्प्रदान’ नामक विवादपद कहा जाता है। यदि ग्राहक किसी वस्तु का मूल्य देकर खरीदने के बाद उस वस्तु को ठीक नहीं समझता, तो उसका यह आचरण ‘क्रीतानुशय’ नामक विवादपद कहलाता है। यदि ग्राहक या खरीददार मूल्य देकर वस्तु को खरीद लेने के बाद यह समझता है कि यह खरीददारी ठीक नहीं है, (अतः वह वस्तु लौटाकर दाम वापस लेना चाहता है) तो उसी दिन यदि वह लौटा दे तो विक्रेता उसका मूल्य पूरा-पूरा लौटा दे, उसमें काट-छाट न करे 2 ॥ १३-२१ ॥ पाखण्डी और नैगम आदि की स्थिति को ‘समय’ कहते हैं। इससे सम्बद्ध विवादपद को ‘समयानपा कर्म’ कहा जाता है। (याज्ञवल्क्य ने इसे ‘संविद् व्यतिक्रम’ नाम दिया है।) क्षेत्र के अधिकार को लेकर सेतु, केदार (मेड़) और क्षेत्रसीमा के घटने-बढ़ने के विषय में जो विवाद होता है, वह ‘क्षेत्रज’ कहा गया है। जो स्त्री और पुरुष के विवाहादि से सम्बन्धित विवादपद है, उसे ‘स्त्री-पुंस योग’ कहते हैं। पुत्रगण पैतृक धन का जो विभाजन करते हैं, विद्वानों ने उसको ‘दायभाग’ नामक व्यवहारपद माना है। बल के अभिमान से जो कर्म सहसा किया जाता है, उसे ‘साहस’ नामक विवादपद बतलाया गया है। किसी के देश, जाति एवं कुल आदि पर दोषारोपण करके प्रतिकूल अर्थ से युक्त व्यंग्यपूर्ण वचन कहना ‘वाक्-पारुष्य’ माना गया है। दूसरे के शरीर पर हाथ-पैर या आयुध से प्रहार अथवा अग्नि आदि से आघात करना ‘दण्ड-पारुष्य’ कहलाता है। पासे, वन (चमड़े की पट्टी) और शलाका (हाथीदाँत की गोटियों) से जो क्रीडा होती है, उसको ‘द्यूत’ कहा जाता है। (घोड़े आदि) पशुओं और (बटेर आदि) पक्षियों से होने वाली क्रीडा को ‘प्राणिद्युत’ समझना चाहिये। राजा की आज्ञा का उल्लङ्घन और उसका कार्य न करना यह ‘प्रकीर्णक’ नामक व्यवहारपद जानना चाहिये। यह विवादपद राजा पर आश्रित है। इस प्रकार व्यवहार अठारह पदों से युक्त है। इनके भी सौ भेद माने गये हैं। मनुष्यों की क्रिया के भेद से यह सौ शाखाओं वाला कहा जाता है ॥ २२-३१ ॥ राजा क्रोधरहित होकर ज्ञान-सम्पन्न ब्राह्मणोंके साथ व्यवहारका विचार करे और ऐसे मनुष्योंको सभासद बनाये, जो वेदवेत्ता, लोभरहित और शत्रु एवं मित्रको समान दृष्टिसे देखनेवाले हों। यदि राजा कार्यवश स्वयं व्यवहारका विचार न कर सके तो सभासदोंके साथ विद्वान् ब्राह्मणको नियुक्त करे। यदि सभासद राग, लोभ या भयसे धर्मशास्त्र एवं आचारके विरुद्ध कार्य करे, तो राजा प्रत्येक सभासदपर अलग-अलग विवादसे दुगुना अर्थदण्ड करे। यदि कोई मनुष्य दूसरंकि द्वारा धर्मशास्त्र और समयाचारके विरुद्ध मार्गसे धर्षित किया गया हो और वह राजाके समीप आवेदन करे तो उसको ‘व्यवहार’ (पद3 ) कहते हैं। वादीने जो निवेदन किया हो, राजा उसको वर्ष, मास, पक्ष, दिन, नाम और जाति आदिसे चिह्नित करके प्रतिवादीके सामने लिख ले। (वादीके आवेदन या बयानको ‘भाषा’, ‘प्रतिज्ञा’ अथवा ‘पक्ष’ कहते हैं।) प्रतिवादी वादीका आवेदन सुनकर उसके सामने ही उसका उत्तर4 लिखावे। तब वादी उसी समय अपने निवेदन का प्रमाण लिखावे। निवेदन के प्रमाणित हो जाने पर वादी जीतता है, अन्यथा पराजित हो जाता है ॥ ३२-३७ ॥ इस प्रकार विवादमें चार पाद (अंश 5 ) से युक्त व्यवहार दिखाया गया है। जब तक अभियुक्त के वर्तमान अभियोग का निर्णय (फैसला) न हो जाय, तब तक उसके ऊपर दूसरे अपराध का मामला न चलाये। जिस पर किसी दूसरे ने अभियोग कर दिया हो, उसपर भी कोई वादी दूसरा अभियोग न चलावे। आवेदन के समय जो कुछ कहा गया हो, अपने उस कथन के विपरीत (विरुद्ध) कुछ न कहे। (हिंसा आदि) का अपराध बन जाय तो पूर्व अभियोग का फैसला होने के पहले ही मामला चलाया जा सकता है ॥ ३८-३९ ॥ सभासदों सहित सभापति या प्राड्विवाक को चाहिये कि वह वादी और प्रतिवादी दोनों के सभी विवादों में जो निर्णय का कार्य है, उसके सम्पादन में समर्थ पुरुष को ‘प्रतिभू’ बनावे।6 अर्थी के द्वारा लगाये गये अभियोग को यदि प्रत्यर्थी ने अस्वीकार कर दिया और अर्थी ने गवाही आदि देकर अपने दावे को पुनः उससे स्वीकार करा लिया, तब प्रत्यर्थी अर्थी को अभियुक्त धन दे और दण्डस्वरूप उतना ही धन राजा को भी दे। यदि अर्थी अपने दावे को सिद्ध न कर सका तो स्वयं मिध्याभियोगी (झूठा मुकदमा चलाने वाला) हो गया; उस दशा में वहीं अभियुक्त धनराशि से दूना धन राजा को अर्पित करे ॥ ४०१/२ ॥ हत्या या डकैती चोरी, वाक्पारुष्य (गाली गलौज), दण्डपारुष्य (निर्दयतापूर्वक की हुई मारपीट), दूध देने वाली गाय के अपहरण, अभिशाप (पातक का अभियोग), अत्यय (प्राणघात) एवं धनातिपात तथा स्त्रियों के चरित्र सम्बन्धी विवाद प्राप्त होने पर तत्काल अपराधी से उत्तर माँगे, विलम्ब न करे। अन्य प्रकार के विवादों में उत्तरदान का समय वादी, प्रतिवादी, सभासद् तथा प्राड्विवाक की इच्छा के अनुसार रखा जा सकता है ॥ ४११/२ ॥ (दुष्टों की पहचान इस प्रकार करे) अभियोग के विषय में बयान या गवाही देते समय जो एक जगह से दूसरी जगह जाता-आता है, स्थिर नहीं रह पाता, दोनों गलफर चाटता है, जिसके भाल-देश में पसीना हुआ करता है, चेहरे का रंग फीका पड़ जाता है, गला सूखने से वाणी अटकने लगती है, जो बहुत तथा पूर्वापर-विरुद्ध बातें कहा करता है, जो दूसरे की बात का ठीक ठीक उत्तर नहीं दे पाता और किसी से दृष्टि नहीं मिला पाता है, जो ओठ टेढ़े-मेढ़े किया करता है, इस प्रकार जो स्वभाव से ही मन, वाणी, शरीर तथा क्रिया-सम्बन्धी विकार को प्राप्त होता है, वह ‘दुष्ट’ कहा गया है ॥ ४२-४३१/२ ॥ जो संदिग्ध अर्थ को, जिसे अधमर्ण ने अस्वीकार कर दिया है, बिना किसी साधन के मनमाने ढंग से सिद्ध करने की चेष्टा करता है तथा जो राजा के बुलाने पर उसके समक्ष कुछ भी नहीं कह पाता है, वह भी हीन और दण्डनीय माना गया है ॥ ४४१/२ ॥ दोनों वादियों के पक्षों के साधक साक्षी मिलने सम्भव हो तो पूर्ववादी के साक्षियों से ही पूछे, अर्थात् उन्हीं की गवाही ले। जो वादी के उत्तर में यह कहे कि ‘मैंने बहुत पहले इस क्षेत्र को दान में पाया था और तभी से यह हमारे उपयोग में है’, वही यहाँ पूर्ववादी है; जिसने पहले अभियोग दाखिल किया है, वह नहीं। यदि कोई यह कहे कि ‘ठीक है कि यह सम्पत्ति इसे दान में मिली थी और इसने इसका उपयोग भी किया है, तथापि इसके यहाँ से अमुक ने वह क्षेत्र सम्पत्ति खरीद ली और उसने पुनः इसे मुझको दे दिया’ तब पूर्वपक्ष असाध्य होने के कारण दुर्बल पड़ जाता है। ऐसा होने पर उत्तरवादी के साक्षी ही प्रष्टव्य हैं; उन्हीं की गवाही ली जानी चाहिये ॥ ४५१/२ ॥ यदि विवाद किसी शर्त के साथ किया गया हो, अर्थात् यदि किसी ने कहा हो कि ‘यदि मैं अपना पक्ष सिद्ध न कर सकूँ तो पाँच सौ पण अधिक दण्ड दूँगा’ , तब यदि वह पराजित हो जाय तो उसके पूर्वकृत पणरूपी दण्ड का धन राजा को दिलवावे। परंतु जो अर्थी धनी है, उसे राजा विवाद का आस्पदभूत धन ही दिलवावे ‘ ॥ ४६१/२ ॥ राजा छल छोड़कर वास्तविकता का आश्रय ले व्यवहारों का अन्तिम निर्णय करे। यथार्थ वस्तु भी यदि लेखबद्ध न हुई हो तो व्यवहार में वह पराजय का कारण बनती है। सुवर्ण, रजत और वस्त्र आदि अनेक वस्तुएँ अर्थी के द्वारा अभियोग पत्र में लिखा दी गयी हैं, परंतु प्रत्यर्थी उन सबको अस्वीकार कर देता है, उस दशा में यदि साक्षी आदि के प्रमाण से एक वस्तु को भी प्रत्यर्थी ने स्वीकार कर लिया, तब राजा उससे अभियोग पत्र में लिखित सारी वस्तुएँ दिलवाये। यदि कोई वस्तु पहले नहीं लिखायी गयी और बाद में उसकी भी वस्तुसूची में चर्चा की गयी हो तो उसको राजा नहीं दिलवावे। यदि दो स्मृतियों अथवा धर्मशास्त्र वचनों में परस्पर विरोध की प्रतीति होती हो तो उस विरोध को दूर करने के लिये विषय-व्यवस्थापना आदि में उत्सर्गापवाद-लक्षण न्याय को बलवान् समझना चाहिये। एक वाक्य उत्सर्ग या सामान्य है और दूसरा अपवाद अथवा विशेष है, अतः अपवाद उत्सर्ग का बाधक हो जाता है। उस न्याय की प्रतीति कैसे होगी? व्यवहार से। अन्यय-व्यतिरेक-लक्षण जो वृद्धव्यवहार है, उससे उक्त न्याय का अवगमन हो जायगा। इस कथन का भी अपवाद है। अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र के वचनों में विरोध होने पर अर्थशास्त्र से धर्मशास्त्र ही बलवान् है; यह ऋषि-मुनियों की बाँधी मर्यादा है। ॥ ४७-४९१/२ ॥ (अर्थी या वादी पुरुष सप्रमाण अभियोग- पत्र उपस्थित करे, यह बात पहले कही गयी है। प्रमाण दो प्रकार का होता है — ‘मानुष-प्रमाण’ और ‘दैविक प्रमाण‘। ‘मानुष-प्रमाण’ तीन प्रकार का होता है, वही यहाँ बताया जाता है) लिखित, भुक्ति और साक्षी — ये तीन ‘मानुष प्रमाण’ कहे गये हैं। (लिखित के दो भेद हैं — ‘शासन’ और ‘चीरक’। ‘शासन’ का लक्षण पहले कहा गया है और ‘चीरक’ का आगे बताया जायगा।) ‘भुक्ति का अर्थ है — उपभोग (कब्जा)। (साक्षियों के स्वरूप-प्रकार आगे बताये जायेंगे।) यदि मानुष-प्रमाण के इन तीनों भेदों में से एक की भी उपलब्धि न हो तो आगे बताये जाने वाले दिव्य प्रमाणों में से किसी एक को ग्रहण करना आवश्यक बताया जाता है ॥ ५०१/२ ॥ ऋण आदि समस्त विवादों में उत्तर क्रिया बलवती मानी गयी है। यदि उत्तर क्रिया सिद्ध कर दी गयी तो उत्तरवादी विजयी होता है और पूर्ववादी अपना पक्ष सिद्ध कर चुका हो तो भी वह हार जाता है। जैसे किसी ने सिद्ध कर दिया कि ‘अमुक ने मुझसे सौ रुपये लिये हैं; अतः वह उतने रुपयों का देनदार है’; तथापि लेने वाला यदि यह जवाब लगा दे कि ‘मैंने लिया अवश्य था, किंतु अमुक तिथि को सारे रुपये लौटा दिये थे’ और यदि उत्तरदाता प्रमाण से अपना यह कथन सिद्ध कर दे, तो अर्थी या पूर्ववादी पराजित हो जाता है; परंतु ‘आधि’ (किसी वस्तु को गिरवी रखने), प्रतिग्रह लेने अथवा खरीदने में पूर्वक्रिया ही प्रबल होती है। जैसे किसी खेत को उसके मालिक ने किसी धनी के यहाँ गिरवी रखकर उससे कुछ रुपये ले लिये। फिर उसी खेत को दूसरे से भी रुपये लेकर उसने उसके यहाँ गिरवी रख दिया, ऐसे मामलों में जहाँ पहले खेत को गिरवी रखा है, उसी का स्वत्व प्रबल माना जायगा, दूसरे का नहीं ॥ ५११/२ ॥ यदि भूमिस्वामी के देखते हुए कोई दूसरा उसकी भूमि का उपभोग करता है और वह कुछ नहीं बोलता तो बीस वर्षों तक ऐसा होने पर वह भूमि उसके हाथ से निकल जाती है। इसी प्रकार हाथी, घोड़े आदि धन का कोई दस वर्ष तक उपभोग करे और स्वामी कुछ न बोले तो वह उपभोक्ता ही उस धन का स्वामी हो जाता है, पहले के स्वामी को उस धन से हाथ धोना पड़ता है ॥ ५२१/२ ॥ आधि, सीमा और निक्षेप सम्बन्धी धन को, जड और बालकों के धन को तथा उपनिधि, राजा, स्त्री एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणों के धन को छोड़कर हो पूर्वोक्त नियम लागू होता है, अर्थात् इनके धन का उपभोग करने पर भी कोई उस धन का स्वामी नहीं हो सकता। आधि से लेकर श्रोत्रिय-पर्यन्त धन का चिरकाल से उपभोग के बल पर अपहरण करने वाले पुरुष से उस विवादास्पद धन को लेकर राजा धन के असली स्वामी को दिलवा दे और अपहरण करने वाले से उस धन के बराबर ही दण्डस्वरूप धन राजा को दिलवाया जाय। अथवा अपहरणकर्ता की शक्ति के अनुसार अधिक या कम धन भी दण्ड के रूप में लिया जाय। स्वत्व का हेतुभूत जो प्रतिग्रह और क्रय आदि है, उसको ‘आगम’ कहते हैं। वह ‘आगम’ भोग की अपेक्षा भी अधिक प्रबल माना गया है। स्वत्व का बोध कराने के लिये आगमसापेक्ष भोग ही प्रमाण है। परंतु पिता, पितामह आदि के क्रम से जिस धन का उपभोग चला आ रहा है, उसको छोड़कर अन्य प्रकार के उपभोग में ही आगम की प्रबलता है; पूर्व-परम्परा प्राप्त भोग तो आगम से भी प्रबल है; परंतु जहाँ थोड़ा-सा भी उपभोग नहीं है, उस आगम में भी कोई बल नहीं है ॥ ५३-५५१/२ ॥ विशुद्ध आगम से भोग प्रमाणित होता है। जहाँ विशुद्ध आगम नहीं है, वह भोग प्रमाणभूत नहीं होता है। जिस पुरुष ने भूमि आदि का आगम (अर्जन) किया है, वही ‘कहाँ से तुम्हें क्षेत्र आदि की प्राप्ति हुई’ — यह पूछे जाने पर लिखितादि प्रमाणों द्वारा आगम (प्रतिग्रह आदि जनित अर्जन) का उद्धार (साधन) करे। (अन्यथा वह दण्ड का भागी होता है।) उसके पुत्र अथवा पौत्र को आगम के उद्धार को आवश्यकता नहीं है। वह केवल भोग प्रमाणित करे। उसके स्वत्व की सिद्धि के लिये परम्परागत भोग ही प्रमाण है ॥ ५६-५७१/२ ॥ जो अभियुक्त व्यवहार का निर्णय होने से पहले ही परलोकवासी हो जाय, उसके धन के उत्तराधिकारी पुत्र आदि ही लिखितादि प्रमाणों द्वारा उसके धनागम का उद्धार (साधन) करें; क्योंकि उस व्यवहार (मामले) में आगम के बिना केवल भोग प्रमाण नहीं हो सकता ॥ ५८१/२ ॥ जो मामले बलात्कार से अथवा भय आदि उपाधि के कारण चलाये गये हों, उन्हें लौटा दे। इसी प्रकार जिसे केवल स्त्री ने चलाया हो, जो रात में प्रस्तुत किया गया हो, घर के भीतर घटित घटना से सम्बद्ध हो अथवा गाँव आदि के बाहर निर्जन स्थान में किया गया हो तथा किसी शत्रु ने अपने द्वेषपात्र पर कोई अभियोग लगाया हो इस तरह के व्यवहारों को न्यायालय में विचार के लिये न ले लौटा दे ॥ ५९१/२ ॥ (अब यह बताते हैं कि किनका चलाया हुआ अभियोग सिद्ध नहीं होता) जो मादक द्रव्य पीकर मत्त हो गया हो, वात, पित्त, कफ, सन्निपात अथवा ग्रहावेश के कारण उन्मत्त हो, रोग आदि से पीड़ित हो, इष्ट के वियोग अथवा अनिष्ट की प्राप्ति से दुःखमग्न हो, नाबालिग हो और शत्रु आदि से डरा हुआ हो, ऐसे लोगों द्वारा चलाया हुआ व्यवहार ‘असिद्ध’ माना गया है। जिनका अभियुक्त वस्तु से कोई सम्बन्ध न हो, ऐसे लोगों का चलाया हुआ व्यवहार भी सिद्ध नहीं होता (विचारणीय नहीं समझा जाता) ॥ ६०१/२ ॥ यदि किसी का चोरों द्वारा अपहृत सुवर्ण आदि धन शौल्किक (टैक्स लेने वाले) तथा स्थानपाल आदि राजकर्मचारियों को प्राप्त हो जाय और राजा को समर्पित किया जाय तो राजा उसके स्वामी- धनाधिकारी को वह धन लौटा दे। यह तभी करना चाहिये, जब धन का स्वामी खोयी हुई वस्तु के रूप, रंग और संख्या आदि चिह्न बताकर उसपर अपना स्वत्व सिद्ध कर सके। यदि वह चिह्नों द्वारा उस धन को अपना सिद्ध न कर सके तो मिथ्यावादी होने के कारण उससे उतना ही धन दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिये ॥ ६११/२ ॥ राजा को चाहिये कि वह चोरों द्वारा चुराया हुआ द्रव्य उसके अधिकारी राज्य के नागरिक को लौटा दे। यदि वह नहीं लौटाता है तो जिसका वह धन है, उसका सारा पाप राजा अपने ऊपर ले लेता है ॥ ६२ ॥ (अब ऋणादान-सम्बन्धी व्यवहार पर विचार करते हैं) यदि कोई वस्तु बन्धक रखकर ऋण लिया जाय तो ऋण में लिये हुए धन का भाग प्रतिमास ब्याज धर्मसंगत होता है; अन्यथा बन्धकरहित ऋण देने पर ब्राह्मणादि वर्णों के क्रम से प्रतिशत कुछ-कुछ अधिक ब्याज लेना भी धर्मसम्मत है। अर्थात् ब्राह्मण से जितना ले क्षत्रिय से, वैश्य से और शूद्र से क्रमशः उससे कुछ-कुछ अधिक प्रतिशत सूद या वृद्धि की रकम ली जा सकती है ॥ ६३ ॥ ऋण के रूप में प्रयुक्त मादा पशुओं के लिये वृद्धि के रूप में उसकी संतति ही ग्राह्य है। तेल, घी आदि रसद्रव्य किसी के यहाँ चिरकाल तक रह गया और बीच में यदि उसकी वृद्धि (सूद वृद्धि की रकम) नहीं ली गयी तो वह बढ़ते बढ़ते आठगुना तक हो सकती है। इससे आगे उसपर वृद्धि नहीं लगायी जाती। इसी प्रकार वस्त्र, धान्य तथा सुवर्ण – इनकी क्रमशः चौगुनी, तिगुनी और दुगुनी तक वृद्धि हो सकती है, इससे आगे नहीं ॥ ६४ ॥ व्यापार के लिये दुर्गम वनप्रदेश को लाँधकर यात्रा करने वाले लोग ऋणदाता को दस प्रतिशत ब्याज दें और जो समुद्र की यात्रा करने वाले हैं, वे बीस प्रतिशत वृद्धि प्रदान करें। अथवा सभी वर्ण के लोग अवन्धक या सबन्धक ऋण में अपने लिये धन के स्वामी द्वारा नियत की हुई वृद्धि सभी जातियों के लिये दें ॥ ६५ ॥ ऋण लेने वाले पुरुष ने पहले जो धन लिया है और जो साक्षी आदि के द्वारा प्रमाणित है, उसको वसूल करने वाला धनी राजा के लिये वाच्य (निवारणीय) नहीं होता; अर्थात् राजा उस न्यायसंगत धन को वसूल करने से उस ऋणदाता को न रोके। (यदि वह अप्रमाणित या अदत्त धन की वसूली करता है तो वह अवश्य राजा के द्वारा निवारणीय है।) जो पूर्वोक्त रूप से न्यायसंगत धन की वसूली करने पर भी ऋणदाता के विरुद्ध शिकायत लेकर राजा के पास जाय, वह राजा के द्वारा दण्ड पाने के योग्य है। राजा उससे वह धन अवश्य दिलवावे ॥ ६६ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘व्यवहारकथन’ नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५३ ॥ 1. ऋणादान के सात प्रकार हैं — १ – अमुक प्रकार का ऋण ‘देय’ है, २- अमुक प्रकार का ऋण ‘अदेय’ है, ३- अमुक अधिकारी को ऋण देने का अधिकार है, ४- अमुक समय में ऋण देना चाहिये, ५ – इस प्रकार से ऋण दिया जाना चाहिये — ये पाँच अधमर्ण (ऋण लेने वाले) व्यक्ति को लक्ष्य करके विचारणीय हैं और शेष दो बातें साहूकार के लिये विचारणीय हैं – ६ – साहूकार किस विधान से ऋण दे तथा ७-किस विधान से उसको वसूल करे। इन्हीं सातों बातों को इस श्लोक में स्पष्ट किया गया है। ‘नारद – स्मृति’ में भी इसका इसी रूप में उल्लेख ‘हुआ है। इन सब बातों के विचारपूर्वक जो ऋण का आदान-प्रदान होता है, उसे ‘ऋणादान’ नामक व्यवहारपद समझना चाहिये । 2. ‘नारदस्मृति’ में भी इन श्लोकों का ठीक ऐसा ही पाठ है। वहाँ इस विषय में कुछ अधिक बातें बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं — द्वितीयेऽह्नि ददत् क्रेता मूल्यात् त्रिंशांशमाहरेत् । द्विगुणं तु तृतीयेऽह्नि परतः क्रेतुरेव तत् ॥ ‘यदि ग्राहक नापसंद माल (पहले ही दिन न लौटाकर) दूसरे दिन लौटावे तो वह वस्तु के पूरे मूल्य का १/३ अर्थात् ३१/३ प्रतिशत क्षतिपूर्ति (हरजाना) के तौर पर विक्रेता को दे। यदि वह तीसरे दिन लौटाये तो इससे दूनी रकम हर्जाने के तौर पर दे। इसके बाद ‘अनुशय’ का अधिकार समाप्त हो जाता है । फिर तो ग्राहक को माल लेना ही पड़ेगा।’ याज्ञवल्क्य और मिताक्षराकार की दृष्टि में यह नियम बीज आदि से भिन्न वस्तुओं पर लागू होता है। बीज, लोहा, बैल-घोड़े आदि वाहन, मोती-मूँगा आदि रत्न, दासी, दूध देने वाली भैंस आदि तथा दास — इनके परीक्षण का काल अधिक है । यथा — बीज के परीक्षण का समय दस दिन, लोहे के एक दिन, बैल आदि के पाँच दिन, रत्न के एक सप्ताह, दासी के एक मास, दूध देने वाली भैंस आदि के तीन दिन तथा दास के परीक्षण का समय पंद्रह दिन तक है । इस समय के भीतर ही ये ठीक न जँचें तो इनको लौटाया जा सकता है; अन्यथा नहीं। मनु ने गृह, क्षेत्र आदि वस्तुओं को दस दिन के अंदर ही लौटाने का आदेश दिया है। इसके बाद लौटाने का अधिकार नहीं रह जाता । 3. मिताक्षराकार ने व्यवहार के सात अङ्ग बताये हैं। यथा — प्रतिज्ञा, उत्तर, संशय, हेतु-परामर्श, प्रमाण, निर्णय एवं प्रयोजन । 4. उत्तर के चार भेद हैं — ‘सम्प्रतिपत्ति’, ‘मिथ्या’, ‘प्रत्यवस्कन्दन’ तथा ‘प्राङ्न्याय’ । उत्तर वह अच्छा माना गया है, जो पक्ष के खण्डन में समर्थ, न्यायसंगत, संदेहरहित, पूर्वापर – विरोध से वर्जित तथा सुबोध हो — उसे समझने के लिये व्याख्या अथवा टीका-टिप्पणी न करनी पड़े । 5. १ – भाषापाद, २ – उत्तरपाद, ३- क्रियापाद और ४ – साध्य – सिद्धिपाद । 6. प्रतिभू के अभाव में वेतन देकर रक्षक-पुरुषों की नियुक्ति करनी चाहिये। जैसा कि कात्यायन का कथन है — अथ चेत् प्रतिभूर्नास्ति कार्ययोगस्तु वादिनः । स रक्षितो दिनस्यान्ते दद्याद् भृत्याय वेतनम् ॥ Content is available only for registered users. 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