July 9, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 259 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनसठवाँ अध्याय ऋग्विधान-विविध कामनाओं की सिद्धि के लिये प्रयुक्त होने वाले ऋग्वेदीय मन्त्रों का निर्देश ऋग्विधानं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं महर्षि पुष्कर के द्वारा परशुरामजी के प्रति वर्णित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का विधान कहता हूँ, जिस के अनुसार मन्त्रों के जप और होम से भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥ १ ॥ पुष्कर बोले — परशुराम । अब मैं प्रत्येक वेद के अनुसार तुम्हारे लिये कर्तव्य-कर्मों का वर्णन करता हूँ। पहले तुम भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले ‘ऋग्विधान’ को सुनो। गायत्री मन्त्र का विशेषतः प्राणायामपूर्वक जल में खड़े होकर तथा होम के समय जप करने वाले पुरुष की समस्त मनोवाञ्छित कामनाओं को गायत्री देवी पूर्ण कर देती हैं। ब्रह्मन् ! जो दिनभर उपवास करके केवल रात्रि में भोजन करता और उसी दिन अनेक बार स्नान करके गायत्री मन्त्र का दस सहस्र जप करता है, उसका वह जप समस्त पापों का नाश करने वाला है। जो गायत्री का एक लाख जप करके हवन करता है, वह मोक्ष का अधिकारी होता है। ‘प्रणव’ परब्रह्म है। उसका जप सभी पापों का हनन करने वाला है। नाभिपर्यन्त जल में स्थित होकर ॐकार का सौ बार जप करके अभिमन्त्रित किये गये जल को जो पीता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। गायत्री के प्रथम अक्षर प्रणव की तीन मात्राएँ — अकार, उकार और मकार ये ही — ‘ऋक्’, ‘साम’ और ‘यजुष्’ तीन वेद हैं, ये ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवता हैं तथा ये ही गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि — तीनों अग्नियाँ हैं। गायत्री की जो सात महाव्याहृतियाँ हैं, वे ही सातों लोक हैं। इनके उच्चारणपूर्वक गायत्री मन्त्र से किया हुआ होम समस्त पापों का नाश करने वाला होता है। सम्पूर्ण गायत्री मन्त्र तथा महाव्याहृतियाँ — ये सब जप करने योग्य एवं उत्कृष्ट मन्त्र हैं। परशुरामजी ! अघमर्षण-मन्त्र ‘ऋतं च सत्यं च०’ (१० । १९० । १-३) इत्यादि जल के भीतर डुबकी लगाकर जपा जाय तो सर्वपापनाशक होता है ।’ ‘अग्निमीळे पुरोहितम्०’ (ऋग्वेद १ । १ । १) — यह ऋग्वेद का प्रथम मन्त्र अग्निदेवता का सूक्त है। अर्थात् ‘अग्नि’ इसके देवता हैं। जो मस्तक पर अग्नि का पात्र धारण करके एक वर्ष तक इस सूक्त का जप करता है, तीनों काल स्नान करके हवन करता है, गृहस्थों के घर में चूल्हे की आग बुझ जाने पर उनके यहाँ से भिक्षान्न लाकर उससे जीवननिर्वाह करता है तथा उक्त प्रथम सूक्त के अनन्तर जो वायु आदि देवताओं के सात सूक्त (१ । १ । २ से ८ सूक्त) कहे गये हैं, उनका भी जो प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर जप करता है, वह मनोवाञ्छित कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। जो मेधा (धारण शक्ति) को प्राप्त करना चाहे, वह प्रतिदिन ‘सदसस्पति०’ (१ । १८ । ६-८) इत्यादि तीन ऋचाओं का जप करे ॥ २-११ ॥ ‘अम्बयो यन्त्यध्वभिः०’ (१ । २३ । १६-२४) आदि ये नौ ऋचाएँ अकालमृत्यु का नाश करने वाली कही गयी हैं। कैद में पड़ा हुआ या अवरुद्ध (नजरबंद) द्विज ‘शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः०’ (१ । २४ । १२-१४) इत्यादि तीन ऋचाओं का जप करे। इसके जप से पापी समस्त पापों से छूट जाता है और रोगी रोगरहित हो जाता है। जो शाश्वत कामना की सिद्धि एवं बुद्धिमान् मित्र की प्राप्ति चाहता हो, वह प्रतिदिन इन्द्रदेवता के ‘इन्द्रस्थ०’ आदि सोलह ऋचाओं का जप करे। ‘हिरण्यस्तूपः०’ (१० । १४९ । ५) इत्यादि मन्त्र का जप करने वाला शत्रुओं की गतिविधि में बाधा पहुँचाता है। ‘ये ते पन्थाः०’ (१ । ३५ । ११) का जप करने से मनुष्य मार्ग में क्षेम का भागी होता है। जो रुद्रदेवता-सम्बन्धिनी छः ऋचाओं से प्रतिदिन शिव की स्तुति करता है, अथवा रुद्रदेवता को चरु अर्पित करता है, उसे परम शान्ति की प्राप्ति होती है। जो प्रतिदिन ‘उद्वयं तमसः०’ (१ । ५० । १०) तथा ‘उदुत्यं जातवेदसम्०‘ (१ । ५० । १) – इन ऋचाओं से प्रतिदिन उदित होते हुए सूर्य का उपस्थान करता है तथा उनके उद्देश्य से सात बार जलाञ्जलि देता है, उसके मानसिक दुःख का विनाश हो जाता है। ‘द्विषन्तं०’ इत्यादि आधी ऋचा से लेकर ‘यद्विप्राः०’ इत्यादि मन्त्र तक का जप और चिन्तन करे। इसके प्रभाव से अपराधी मनुष्य सात ही दिनों में दूसरों के विद्वेष का पात्र हो जाता है ॥ १२-१७१/२ ॥ आरोग्य की कामना करने वाला रोगी ‘पुरीष्यासोऽग्नयः०’ (३।२२।४) – इस ऋचा का जप करे। इसी ऋचा का आधा भाग शत्रुनाश के लिये उत्तम है। अर्थात् शत्रु की बाधा दूर करने के लिये इसका जप करना चाहिये। इसका सूर्योदय के समय जप करने से दीर्घ आयु, मध्याह्न में जप करने से अक्षय तेज और सूर्यास्त की वेला में जप करने से शत्रुनाश होता है। ‘नव यः० (८ । ९३ । २) आदि सूक्त का जप करने वाला शत्रुओं का दमन करता है। सुपर्ण सम्बन्धिनी ग्यारह ऋचाओं का जप सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति कराने वाला है। अध्यात्म का प्रतिपादन करने वाली ‘क०’ आदि ऋचाओं का जप करने वाला मोक्ष प्राप्त करता है ॥ १८-२१ ॥ ‘आ नो भद्राः ( १ । ८९ । १)- इस ऋचा के जप से दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। हाथ में समिधा लिये ‘त्वं सोम० (९ । ८६ । २४) – इस ऋचा से शुक्लपक्ष की द्वितीया के चन्द्रमा का दर्शन करे। जो हाथ में समिधा लेकर उक्त मन्त्र से चन्द्रमा का उपस्थान करता है, उसे निस्संदेह वस्त्रों की प्राप्ति होती है। दीर्घ आयु चाहनेवाला ‘इमं०’ (१ । ९४) आदि कौत्ससूक्त का सदा जप करे। जो मध्याह्नकाल में ‘अप नः शोशुचदघम्०’ (१ । ९७ । १-८ ) इत्यादि ऋचा के द्वारा सूर्यदेव की स्तुति करता है, वह अपने पापों को उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे कोई मनुष्य तिनके से सींक को अलग कर लेता है। यात्री ‘जातवेदसे० (१ । ९९ । १)- इस मङ्गलमयी ऋचा का मार्ग में जप करे। ऐसा करके वह समस्त भयों से छूट जाता और कुशलपूर्वक घर लौट आता है। प्रभातकाल में इसका जप करने से दुःस्वप्न का नाश होता है। ‘प्र मन्दिने पितुमदर्चता० (१ । १०१ । १) – इस ऋचा का जप करने से प्रसव करने वाली स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है। ‘इन्द्रम्०’ (१ । १०६ । १) इत्यादि ऋचा का जप करते हुए सात बार बलिवैश्वदेव- कर्म करके घृत का होम करने से मनुष्य समस्त पापों से छूट जाता है। ‘इमाम्० (१० । ८५ । ४५)- इस ऋचा का सदा जप करने वाला अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। तीन दिन उपवास करके पवित्रतापूर्वक ‘मा नस्तोके’ (१ । ११४ । ८-९) आदि दो ऋचाओं द्वारा गूलर की घृतयुक्त समिधाओं का हवन करे। ऐसा करने से मनुष्य मृत्यु के समस्त पाशों का छेदन करके रोगहीन जीवन बिताता है। दोनों बाँहें ऊपर उठाकर इसी ‘मा नस्तोके०’ (१ । ११४ । ८) आदि ऋचा से भगवान् शंकर की स्तुति करके शिखा बाँध लेने पर मनुष्य सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के लिये अजेय हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। जो मनुष्य हाथ में समिधाएँ लेकर ‘चित्रं देवानाम्०’ (१ । ११५ । १) इत्यादि मन्त्र से प्रतिदिन तीनों संध्याओं के समय भगवान् भास्कर का उपस्थान करता है, वह मनोवाञ्छित धन प्राप्त कर लेता है। ‘स्वप्नेनाभ्युप्या चुमुरिम्० (२ । १५ । ९) आदि ऋचा का प्रातः, मध्याह्न और अपराह्न में जप करने से सम्पूर्ण दुःस्वप्न का नाश होता है एवं उत्तम भोजन की प्राप्ति होती है। ‘उभे पुनामि रोदसी०’ (१ । १३३ । १)- यह मन्त्र राक्षसों का विनाशक कहा गया है। ‘उभयासो जातवेदः० (२ । २ । १२-१३) आदि ऋचाओं का जप करने वाला मनोऽभिलषित वस्तुओं को प्राप्त करता है। ‘तमागन्म सोमरयः० (८ । १९ । ३२) ऋचा का जप करने वाला मनुष्य आततायी के भय से छुटकारा पाता है ॥ २२-३४ ॥ ‘कया शुभा सवयसः०’ (१ । १६५ । १) इस ऋचा का जप करने वाला अपनी जाति में श्रेष्ठता को प्राप्त करता है। ‘इमं नु सोमम् ०’ (१ । १७९ । ५) इस ऋचा का जप करने से मनुष्य को समस्त कामनाओं की प्राप्ति होती है। ‘पितुं नु स्तोषं०’ (१ । १८७ । १) ऋचा से नित्य उपस्थान करने पर नित्य अन्न उपस्थित होता है। ‘अग्ने नय सुपथा०’ (१ । १८९ । १) – इस सूक्त से घृत का होम किया जाय तो वह परलोक में उत्तम मार्ग प्रदान करने वाला होता है। जो सदा सुश्लोक का जप करता है, वह वीरों को न्याय के मार्ग पर ले जाता है। ‘कङ्कतो न कङ्कतो० (१ । १९१ । १)- इस सूक्त का जप सब प्रकार के विघ्नों का प्रभाव दूर कर देता है। ‘यो जात एव प्रथमो० (२ । १२)- इस सूक्त का जप करने वाला सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। ‘गणानां त्वा०’ (२ । २३ । १) सूक्त के जप से उत्तम स्निग्ध पदार्थ प्राप्त होता है। ‘यो मे राजन्०’ (२ । २८ । १०) – यह ऋचा दुःस्वप्नों का शमन करने वाली है। मार्ग में प्रस्थित हुआ जो मनुष्य अपने सामने प्रशस्त या अप्रशस्त शत्रु को खड़ा हुआ देखे, वह ‘कुविदङ्ग०’ इत्यादि मन्त्र का जप करे, इससे उसकी रक्षा हो जाती है। बाईसवें उत्तम आध्यात्मिक सूक्त का पर्वकाल में जप करने वाला मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। ‘कृणुष्व पाजः०’ (४ । ४ । १)- इस सूक्त का जप करते हुए एकाग्रचित्त से घी की आहुति देने वाला पुरुष शत्रुओं के प्राण ले सकता है तथा राक्षसों का भी विनाश कर सकता है। जो स्वयं ‘परि०’ इत्यादि सूक्त से प्रतिदिन अग्नि का उपस्थान करता है, विश्वतोमुख अग्निदेव स्वयं उसकी सब ओर से रक्षा करते हैं। ‘हंसः शुचिषत्’ (४ । ४० । ५) इत्यादि मन्त्र का जप करते हुए सूर्य का दर्शन करे। ऐसा करने से मनुष्य पवित्र हो जाता है ॥ ३५-४३ ॥ कृषि में संलग्न गृहस्थ मौन रहकर क्षेत्र के मध्यभाग में विधिवत् स्थालीपाक होम करे। ये आहुतियाँ ‘इन्द्राय स्वाहा। मरुद्भयः स्वाहा। पर्जन्याय स्वाहा। एवं भगाय स्वाहा।’ कहकर उन-उन देवताओं के निमित्त अग्नि में डाले। फिर जैसे स्त्री की योनि में बीज-वपन के लिये जननेन्द्रिय का व्यापार होता है, उसी तरह किसान धान्य का बीज बोने के लिये हराई के साथ हल का संयोग करे और ‘शुनासीराविमां० (४ । ५७ । ५) – इस ऋचा का जप भी करावे। इसके बाद गन्ध, माल्य और नमस्कार के द्वारा इन सबके अधिष्ठाता देवताओं की पूजा करे। ऐसा करने पर बीज बोने, फसल काटने और फसल को खेत से खलिहान में लाने के समय किया हुआ सारा कर्म अमोघ होता है, कभी व्यर्थ नहीं जाता। इससे सदैव कृषि की वृद्धि होती है। ‘समुद्रादूर्मिर्मधुमान्०’ (४ । ५८ । १) इस सूक्त के जप से मनुष्य अग्निदेव से अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति करता है। जो ‘विश्वानि नो दुर्गहा० (५ । ४ । ९-१०) आदि दो ऋचाओं से जो अग्निदेव का पूजन करता है, वह सम्पूर्ण विपत्तियों को पार कर जाता है और अक्षय यश की प्राप्ति करता है। इतना ही नहीं, वह विपुल लक्ष्मी और उत्तम विजय को भी हस्तगत कर लेता है। ‘अग्ने त्वम्० (५ । २४ । १) इस ऋचा से अग्नि की स्तुति करने पर धन की प्राप्ति होती है। संतान की अभिलाषा रखने वाला वरुणदेवता-सम्बन्धी तीन ऋचाओं का नित्य जप करे ॥ ४४-५० ॥ ‘स्वस्ति न इन्द्रो०’ (१ । ८९ । ६-८) आदि तीन ऋचाओं का सदा प्रातःकाल जप करे। यह महान् स्वस्त्ययन है। ‘स्वस्ति पन्थामनु चरेम० (५ । ५१ । १५)- इस ऋचा का उच्चारण करके मनुष्य मार्ग में सकुशल यात्रा करता है। ‘वि जिहीष्व वनस्पते०’ (५ । ७८ । ५) के जप से शत्रु रोगग्रस्त हो जाते हैं। इसके जप से गर्भवेदना से मूर्च्छित स्त्री को गर्भ के संकट से भलीभाँति छुटकारा मिल जाता है। वृष्टि की कामना करने वाला निराहार रहकर भीगे वस्त्र पहने हुए ‘अच्छा बद०’ (५ । ८३) आदि सूक्त का प्रयोग करे। इससे शीघ्र ही प्रचुर वर्षा होती है। पशुधन की इच्छा रखने वाला मनुष्य ‘मनसः कामम्०’ (श्रीसूक्त १०) इत्यादि ऋचा का जप करे। संतानाभिलाषी पुरुष पवित्र व्रत ग्रहण करके ‘कर्दमेन० (श्रीसूक्त ११)- इस मन्त्र से स्नान करे। राज्य की कामना रखने वाला मानव ‘अश्वपूर्वा०’ (श्रीसूक्त ३) इत्यादि ऋचा का जप करता हुआ स्नान करे। ब्राह्मण विधिवत् रोहितचर्म पर, क्षत्रिय व्याघ्रचर्म पर एवं वैश्य बकरे के चर्म पर स्नान करे। प्रत्येक के लिये दस-दस सहस्र होम करने का विधान है। जो सदा अक्षय गोधन की अभिलाषा रखता हो, वह गोष्ठ में जाकर ‘आ गावो अग्मन्नुत भद्रम्० (६ । २८ । १) ऋचा का जप करता हुआ लोकमाता गौ को प्रणाम करे और गोचरभूमि तक उसके साथ जाय। राजा ‘उप०’ आदि तीन ऋचाओं से अपनी दुन्दुभियों को अभिमन्त्रित करे। इससे वह तेज और बल की प्राप्ति करता है और शत्रु पर भी काबू पाता है। दस्युओं से घिर जाने पर मनुष्य हाथ में तूण लेकर ‘रक्षोघ्न-सूक्त’ (१० । ८७) का जप करे। ‘ये के च ज्या० (६।५२।१५) इस ऋचा का जप करने से दीर्घायु की प्राप्ति होती है। राजा ‘जीमूत सूक्त से सेना के सभी अङ्गों को उसके चिह्न के अनुसार अभिमन्त्रित करे। इससे वह रणक्षेत्र में शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ होता है। ‘प्राग्नये’ (७ । ५) आदि तीन सूक्तों के जप से मनुष्य को अक्षय धन की प्राप्ति होती है। ‘अमीवहा’ (७ । ५५)- इस सूक्त का पाठ करके रात्रि में भूतों की स्थापना करे। फिर संकट, विषम एवं दुर्गम स्थल में, बन्धन में या बन्धनमुक्त अवस्था में, भागते अथवा पकड़े जाते समय सहायता की इच्छा से इस सूक्त का जप करे। तीन दिन नियमपूर्वक उपवास रखकर खीर और चरु पकावे। फिर ‘त्र्यम्बकं यजामहे० (७ । ५९ । १२) मन्त्र से उसकी सौ आहुतियाँ भगवान् महादेव के उद्देश्य से अग्नि में डाले तथा उसी से पूर्णाहुति करे। दीर्घकाल तक जीवित रहने की इच्छावाला पुरुष स्नान करके ‘तच्चक्षुर्देवहितम्०’ (७ । ६६ । १६) – इस ऋचा से उदयकालिक एवं मध्याह्नकालिक सूर्य का उपस्थान करे। ‘न हि०’ आदि चार ऋचाओं के पाठ से मनुष्य महान् भय से मुक्त हो जाता है। ‘पर ऋणा सावीः” (२ । २८ । ९-१०) आदि दो ऋचाओं से होम करने पर ऐश्वर्य की उपलब्धि होती है। ‘इन्द्रा सोमा तपतम्० (७ । १०४) से प्रारम्भ होने वाला सूक्त शत्रुओं का विनाश करने वाला कहा गया है। मोहवश जिसका व्रत भङ्ग हो गया अथवा व्रात्य संसर्गक कारण जो पतित हो गया है, वह उपवास करके ‘त्वमग्ने व्रतपा० (८ । ११ । १)- इस ऋचा से घृत का होम करे। ‘आदित्य’ और ‘सम्राजा’ – इन दोनों ऋचाओं का जप करने वाला शास्त्रार्थ में विजयी होता है। ‘मही०’ आदि चार ऋचाओं के जप से महान् भय से मुक्ति मिलती है। ‘यदि०’ इत्यादि ऋचा का जप करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। इन्द्रदेवतासम्बन्धिनी बयालीसवीं ऋचा का जप करने से शत्रुओं का विनाश होता है। ‘वाचं मही०’ इस ऋचा का जप करके मनुष्य आरोग्यलाभ करता है। प्रयत्नपूर्वक पवित्र हो ‘शं नो भव०’ (८ । ४८ । ४-५) – इन दो ऋचाओं के जपपूर्वक भोजन करके हृदय का हाथ से स्पर्श करे। इससे मनुष्य कभी व्याधिग्रस्त नहीं होता। स्नान करके ‘उत्तमेदम्०’ इस मन्त्र से हवन करके पुरुष अपने शत्रुओं का विनाश कर डालता है। ‘शं नो अग्नि०’ (७ । ३५) – इस सूक्त से हवन करने पर मनुष्य धन पाता है। ‘कन्या वाखायती०’ (८ । ९१)- इस सूक्त का जप करके वह दिग्भ्रम के दोष से छुटकारा पाता है। सूर्योदय के समय ‘यदद्यकच्च०’ (८ । ९३ । ४) – इस ऋचा का जप करने से सम्पूर्ण जगत् वशीभूत हो जाता है। ‘यद्वा० (८ । १०० । १०)- इत्यादि ऋचा के जप से वाणी संस्कारयुक्त होती है। ‘वचोविदम्’ (८ । १०१ । १६) ऋचा का मन-ही-मन जप करने वाला वाक्-शक्ति प्राप्त करता है। पावमानी ऋचाएँ परम पवित्र मानी गयी हैं। वैखानस सम्बन्धिनी तीस ऋचाएँ भी परम पवित्र मानी गयी हैं। ऋषिश्रेष्ठ परशुराम । ‘परस्य०’ इत्यादि बासठ ऋचाएँ भी पवित्र कही गयी हैं। ‘स्वादिष्ठया०’ (९ । १-६७) इत्यादि सरसठ सूक्त समस्त पापों के नाशक, सबको पवित्र करने वाले तथा कल्याणकारी कहे गये हैं। छः सौ दस पावमानी ऋचाएँ कही गयी हैं। इनका जप और इनसे हवन करने वाला मनुष्य भयंकर मृत्युभय को जीत लेता है। पाप-भय के विनाश के लिये ‘आपो हि ष्ठाः’ (१० । ९ । १-३) इत्यादि ऋचा का जल में स्थित होकर जप करे। ‘प्र देवत्रा ब्रह्मणे’ (१० । ३० । १) – इस ऋचा का मरुप्रदेश में मनुष्य प्राणान्तक भय के उपस्थित होने पर नियमपूर्वक जप करे। उससे शीघ्र भयमुक्त होकर मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करता है। ‘प्रा वेपा मा बृहतः (१० । ३४ । १)- इस एक ऋचा का प्रातःकाल सूर्योदय के समय मानसिक जप करे। इससे द्यूत में विजय की प्राप्ति होती है। ‘मा प्र गाम’ (१० । ५७ । १)- इस ऋचा का जप करने से पथभ्रान्त मनुष्य उचित मार्ग को पा जाता है। यदि अपने किसी प्रिय सुहृद् की आयु क्षीण हुई जाने तो स्नान करके ‘यत्ते यमं०’ (१० । ५८ । १)- इस मन्त्र का जप करते हुए उसके मस्तक का स्पर्श करे। पाँच दिन तक हजार बार ऐसा करने से वह लंबी आयु प्राप्त करता है। विद्वान् पुरुष ‘इदमित्था रौद्रं गूर्तवचा०’ (१० । ६१ । १) – इस ऋचा से घृत की एक हजार आहुतियाँ दे। पशुओं की इच्छा करने वाले को गोशाला में और अर्थकामी को चौराहे पर हवन करना चाहिये। ‘वयः सुपर्णा०’ (१० । ७३ । ११)- इस ऋचा का जप करने वाला लक्ष्मी को प्राप्त करता है। ‘हविष्यान्तमजरं स्वर्विदि०’ (१० । ८८ । १) – इस मन्त्र का जप करके मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है, उसके रोग नष्ट हो जाते हैं तथा उसकी जठराग्नि प्रबल हो जाती है। ‘या ओषधयः०’ यह मन्त्र स्वस्त्ययन (मङ्गलकारक) है। इसके जप से रोगों का विनाश हो जाता है। वृष्टि की कामना करने वाला ‘बृहस्पते अति यदर्यो० (२ । २३ । १५) आदि ऋचा का प्रयोग करे। ‘सर्वत्र०’ इत्यादि मन्त्र के जप से अनुपम पराशान्ति की प्राप्ति होती है, ऐसा जानना चाहिये। संतान की कामना वाले पुरुषके लिये ‘संकाश्य- सूक्त का जप सदा हितकर बताया गया है। ‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिः०’ (१०। १२५ । १)- इस ऋचा के जप से मानव प्रवचनकुशल हो जाता है। ‘रात्री व्यख्यदायती०’ (१० । १२७ । १) – इस ऋचा का जप करने वाला विद्वान् पुरुष पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता। रात्रि के समय ‘रात्रिसूक्त’ का जप करने वाला मनुष्य रात्रि को कुशलपूर्वक व्यतीत करता है। ‘कल्पयन्ती’– इस ऋचा का नित्य जप करने वाला शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ होता है। ‘दाक्षायणसूक्त’ महान् आयु एवं तेज की प्राप्ति कराता है। ‘उत देवाः०’ (१० । १३७ । १)- यह रोगनाशक मन्त्र है। व्रतधारणपूर्वक इसका जप करना चाहिये। अग्नि से भय होने पर ‘अयमग्ने जरिता त्वे०’ (१० । १४२ । १) इत्यादि ऋचा का जप करे। जंगलों में ‘अरण्यान्य-रण्यानि०’ (१० । १४६ । १)- इस मन्त्र का जप करे तो भय का नाश होता है। ब्राह्मी को प्राप्त करके ब्रह्म-सम्बन्धिनी दो ऋचाओं का जप करे और पृथक् पृथक् जल से ब्राह्मी लता एवं शतावरी को ग्रहण करे। इससे मेधाशक्ति और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। ‘शाश इत्त्था०’ (१० । १५२ । १)- यह ऋचा शत्रुनाशिनी मानी गयी है। संग्राम में विजय की अभिलाषा रखने वाले वीर को इसका जप करना चाहिये। ‘ब्रह्मणाग्निः संविदानः (१० । १६२ । १)- यह ऋचा गर्भमृत्यु का निवारण करने वाली है ॥ ५१-९१ ॥ ‘अपेहि० (१० । १६४) इस सूक्त का पवित्र होकर जप करना चाहिये। यह दुःस्वप्न को नाश करने वाला है। ‘येनेदम्०’ इत्यादि ऋचा का जप करके साधक परम समाधि में स्थिर होता है। ‘मयोभूर्वातः०’ (१० । १६९ । १)- यह ऋचा गौओं के लिये परम मङ्गलकारक है। इसके द्वारा शाम्बरी माया अथवा इन्द्रजाल का निवारण करे। ‘ महि त्रीणामवोऽस्तु० (१० । १८५ । १) – इस कल्याणकारी ऋचा का मार्ग में जप करे। द्वेषपात्र के प्रति विद्वेष रखने वाला पुरुष ‘प्राग्नये०’ (१० । १८७ । १) इत्यादि ऋचा का जप करे, इससे शत्रुओं का नाश होता है। ‘वास्तोष्पते०’ आदि चार मन्त्रों से गृहदेवता का पूजन करे। यह जप की विधि बतायी गयी है। अब हवन में जो विशेष विधि है, वह जाननी चाहिये। होम के अन्त में दक्षिणा देनी चाहिये। होम से पाप की शान्ति, अन्न से होमकी शान्ति और स्वर्णदानसे अन्नको शान्ति होती है। इससे मिलनेवाले ब्राह्मणोंके आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाते। यजमानको सब ओरसे बाह्य स्नान करना चाहिये। सिद्धार्थक (सरसों), यव, धान्य, दुग्ध, दधि, घृत, क्षीरवृक्ष की समिधाएँ हवन में प्रयुक्त होने पर सम्पूर्ण कामनाओं को सिद्ध करने वाली हैं तथा अभिचार में कण्टकयुक्त समिधा, राई, रुधिर एवं विष का हवन करें। होमकाल में शिलोञ्छवृत्ति (“छाँटकर या शेष रह जाने वाले भोजन को पर्याप्त समझना”) से प्राप्त अन्न, भिक्षान्न, सत्तू, दूध, दही एवं फल-मूल का भोजन करना चाहिये। यह ‘ऋग्विधान’ कहा गया है ॥ ९२-९९ ॥ Content is available only for registered users. 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