श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय महाराज पृथु का आविर्भाव और राज्याभिषेक श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! इसके बाद ब्राह्मणों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री-पुरुष को जोड़ा प्रकट हुआ ॥ १ ॥ ब्रह्मवादी… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय राजा वेन की कथा श्रीमैत्रजी कहते हैं — वीरवर विदुरजी ! सभी लोकों की कुशल चाहनेवाले भृगु आदि मुनियों ने देखा कि अङ्ग के चले जाने से अब पृथ्वी की रक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय ध्रुववंश का वर्णन, राजा अङ्ग का चरित्र श्रीसूतजी कहते हैं — शौनकजी ! श्रीमैत्रेय मुनि के मुख से ध्रुवजी के विष्णुपद पर आरूढ़ होने का वृत्तान्त सुनकर विदुरी के हृदय में भगवान् विष्णु की भक्ति का… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय १२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बारहवाँ अध्याय ध्रुवजी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति श्रीमैत्रेयज़ी कहते हैं — विदुरजी ! ध्रुव का क्रोध शान्त हो गया है और वे यक्षों के वध से निवृत्त हो गये हैं, यह जानकर भगवान् कुबेर… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ११ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ग्यारहवाँ अध्याय स्वायम्भुव मनु का ध्रुवजी को युद्ध बंद करने के लिये समझाना श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! ऋषियों का ऐसा कथन सुनकर महाराज ध्रुव ने आचमन कर श्रीनारायण के बनाये हुए नारायणास्त्र को अपने धनुष पर… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय १० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दसवाँ अध्याय उत्तम का मारा जाना, ध्रुव का यक्षों के साथ युद्ध श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! ध्रुव ने प्रजापति शिशुमार की पुत्री भ्रमि के साथ विवाह किया, उससे उनके कल्प और वत्सर नाम के दो पुत्र… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नवाँ अध्याय ध्रुव का वर पाकर घर लौटना श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— विदुरजी ! भगवान् के इस प्रकार आश्वासन देने से देवताओं का भय जाता रहा और वे उन्हें प्रणाम करके स्वर्गलोक को चले गये । तदनन्तर विराट्स्वरूप भगवान्… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आठवाँ अध्याय ध्रुव का वन-गमन श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — शत्रुसूदन विदुरजी ! सनकादि, नारद, ऋभु, हंस, अरुणि और यति — ब्रह्माजीके इन नैष्टिक ब्रह्मचारी पुत्रों ने गहस्थाश्रम में प्रवेश नहीं किया (अतः उनके कोई सन्तान नहीं हुई)। अधर्म… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सातवाँ अध्याय दक्षयज्ञकी पूर्ति श्रीमैत्रेजी कहते हैं — महाबाहो विदुरजी ! ब्रह्माजी के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवान् शङ्कर ने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहा — सुनिये ॥ १ ॥ श्रीमहादेवजी ने कहा — ‘प्रजापते ! भगवान् की… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय छठा अध्याय ब्रह्मादि देवताओं का कैलास जाकर श्रीमहादेवजी को मनाना श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! इस प्रकार जब रुद्र के सेवकों ने समस्त देवताओं को हरा दिया और उनके सम्पूर्ण अङ्ग-प्रत्यङ्ग भूत-प्रेतों के त्रिशूल, पट्टिश, खड्ग, गदा,… Read More