श्रीबटुक-अपराध-क्षमापन-स्तोत्र श्रीबटुक-अपराध-क्षमापन-स्तोत्र ॐ गुरोः सेवां त्यक्त्वा गुरुवचन-शक्तोपि न भवे भवत्पूजा-ध्यानाज्जप 1 हवन-यागा 2 द्विरहितः । त्वदर्च-निर्माणे क्वचिदपि न यत्नं व कृतवान् जगज्जाल-ग्रसतो झटिति कुरु हार्दं मयि विभो ।।१ प्रभो ! दुर्गासूनो ! तव शरणतां सोऽधिगतवान् कृपालो ! दुःखार्तः कमपि भवदन्यं प्रकथये । सुहृत् 3 ! सम्पत्तेऽहं सरल 4-विरलः 5 साधकजन स्त्वदन्यः 6 कस्त्राता भव-दहन-दाहं शमयति ।।२… Read More
भैरव शाबर मन्त्र भैरव शाबर मन्त्र मन्त्रः- “ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र ! हाजिर होके, तुम मेरा कारज करो तुरत । कमर विराज मस्तंगा लँगोट, घूँघर-माल । हाथ बिराज डमरु खप्पर त्रिशूल । मस्तक बिराज तिलक सिन्दूर । शीश बिराज जटा-जूट, गल बिराज नोद जनेऊ । ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र ! हाजिर होके तुम मेरा… Read More
सर्व-कार्य-सिद्धि-प्रद शाबर भैरव मन्त्र सर्व-कार्य-सिद्धि-प्रद शाबर भैरव मन्त्र श्री काल-भैरव बटुक प्रयोग ॐ अस्य श्री वटुक-भैरव-स्तोत्रस्य सप्त-ऋषिः ऋषयः, मातृका छन्दः, श्रीवटुक-भैरो देवता, ममेप्सित-सिद्धयर्थ जपे विनियोगः । “ॐ काल-भैरौ, वटुक भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता-सर्व-सिद्धिर्भवेत् । शोक-दुःख-क्षय-करं निरञ्जनं, निराकारं नारायणं, भक्ति-पूर्ण त्वं महेशं । सर्व-काम-सिद्धिर्भवेत् । काल-भैरव, भूषण-वाहनं काल-हन्ता रुपं च, भैरव गुनी । महात्मनः योगिनां महा-देव-स्वरुपं । सर्व… Read More
हनुमत् ‘साबर’ मन्त्र प्रयोग हनुमत् ‘साबर’ मन्त्र प्रयोग ।। श्री पार्वत्युवाच ।। हनुमच्छावरं मन्त्रं, नित्य-नाथोदितं तथा । वद मे करुणा-सिन्धो ! सर्व-कर्म-फल-प्रदम् ।। ।। श्रीईश्वर उवाच ।। आञ्जनेयाख्यं मन्त्रं च, ह्यादि-नाथोदितं तथा । सर्व-प्रयोग-सिद्धिं च, तथाप्यत्यन्त-पावनम् ।। ।। मन्त्र ।। “ॐ ह्रीं यं ह्रीं राम-दूताय, रिपु-पुरी-दाहनाय अक्ष-कुक्षि-विदारणाय, अपरिमित-बल-पराक्रमाय, रावण-गिरि-वज्रायुधाय ह्रीं स्वाहा ।।” विधिः- ‘आञ्जनेय’ नामक उक्त मन्त्र का प्रयोग… Read More
गो-मय गणपति उपासना गो-मय गणपति उपासना ‘गो-मय गणपति उपासना’– २१ दिनों की अति-प्रभावी उपासना है। यह उपासना किसी भी मास की शुक्ल चतुर्थी या शुभ दिन से प्रारम्भ की जा सकती है। संकल्पः- ॐ तत्सत् अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्यि द्वितीय-प्रहरार्द्धे श्वेत-वराह-कल्पे जम्बू-द्वीपे भरत-खण्डे आर्यावर्त्त-देशे अमुक पुण्य-क्षेत्रे कलि-युगे कलि-प्रथम-चरणे ‘अमुक’-नाम संवत्सरे भाद्रपद-मासे शुक्ल-पक्षे चतुर्थी-तिथौ अमुक-वासरे अमुक-गोत्रोत्पन्नो अमुक नाम-शर्मा-वर्मा-दास गणपति-देवता -प्रीति-पूर्वक त्वरित… Read More
श्रीगणेशोपासनाः- शीघ्र विवाह हेतु श्रीगणेशोपासनाः- शीघ्र विवाह हेतु (१) ‘संकष्टी-चतुर्थी’ को उपासना प्रारम्भ करे। स्नान आदि से निवृत्त होकर श्रीगणेश जी के सामने बैठे। तथा-शक्ति ‘पूजन’ करे। ‘पूजा’ में रक्त अक्षत्, रक्त पुष्प, शमी-पत्र तथा दूर्वा चढ़ाए। फिर, हृदय में ‘श्रीगणेश’ का ‘ध्यान’ करे- “श्वेताभं शशि-शेखरं त्रिनयनं श्वेताम्बरालंकृतं। श्रीवाणी-सहितं रमेश-वरदं पीयूष-मूर्ति प्रभुम्।। पीयूषं निज-बाहुभिश्चदधतं पाशांकुशौ मुद्-गरं। नागास्यं सततं सुरैश्च… Read More
श्रीगणेशोपासनाः-पुत्र-प्राप्ति हेतु श्रीगणेशोपासनाः-पुत्र-प्राप्ति हेतु (१) श्रीसुधा-गणेश-साधनाः- यह एक निश्चित फल-प्रद साधना है। इसके लिए पहले दूर्वा (दूब) ले आए। दूर्वा तोड़ते समय निम्न मन्त्र पढ़ें- “दूर्वे अमृत-सम्पन्ने, शत-मूले शतांकुरे ! क्षमस्वोत्पाटनं देवि ! महद्दोषोऽत्र विद्यते।।” पूजन-सामग्री एकत्र करने के बाद स्वच्छ होकर भगवान् श्रीगणेश का यथा-शक्ति पूजन करे। पूजन के बाद निम्न-लिखित मन्त्र का जप करे। यथा-… Read More
भगवान् श्री गणेश की साधनाएँ भगवान् श्री गणेश की साधनाएँ (१) श्री सिद्ध-विनायक-व्रत ‘श्री सिद्ध-विनायक-व्रत’ भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को करे। पहले निम्न-लिखित मन्त्र का १००० या अधिक ‘जप’ करे। यथा- “सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवन्ता हतः। सुकुमार कामरोदीस्तव ह्येषः स्यमन्तकः।।” फिर श्री गणेश जी का षोडशोपचार पूजन कर, २१ मोदकों का नैवेद्य रखे। तब २१ दूर्वा लेकर उन्हें गन्ध-युक्त करे और… Read More
श्रीऋद्धि-सिद्धि सहित श्रीगणेश-साधना श्रीऋद्धि-सिद्धि सहित श्रीगणेश-साधना ‘कलौ चण्डी-विनायकौ’– कलियुग में ‘चण्डी’ और ‘गणेश’ की साधना ही श्रेयस्कर है। सच पूछा जाए, तो विघ्न-विनाशक गणेश और सर्व-शक्ति-रुपा माँ भगवती चण्डी के बिना कोई उपासना पूर्ण हो ही नहीं सकती। ‘भगवान् गणेश’ सभी साधनाओं के मूल हैं, तो ‘चण्डी’ साधना को प्रवहमान करने वाली मूल शक्ति है। यहाँ भगवान् गणेश… Read More
सर्व-सिद्धि-प्रद श्रीगणेश-कवच सर्व-सिद्धि-प्रद श्रीगणेश-कवच भगवान् गणेश का ध्यान कर, मानसोपचारों से उनका पूजन करे। तब निम्न ‘कवच-स्तोत्र’ का पाठ करे॰॰॰॰॰ श्रृणु वक्ष्यामि कवचं, सर्व-सिद्धि-करं प्रिये ! पठित्वा धारयित्वा च, मुच्यते सर्व-सङ्कटात्।। आमोदश्च शिरः पातु, प्रमोदश्च शिखोपरि। सम्मोदो भ्रू-युगे पातु, भ्रू-मध्ये तु गणाधिपः।। गण-क्रीडो नेत्र-युग्मे, नासायां गण-नायकः। गण-क्रीडान्वितः पातु, वदने सर्व-सिद्धये।। जिह्वायां सुमुखः पातु, ग्रीवायां दुर्मुखः सदा। विघ्नेशो… Read More