श्री बगलामुखी तन्त्रम् बगलामुखी देवी दश महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या का नाम से उल्लेखित है । वैदिक शब्द ‘वल्गा’ कहा है, जिसका अर्थ कृत्या सम्बन्ध है, जो बाद में अपभ्रंश होकर बगला नाम से प्रचारित हो गया । बगलामुखी शत्रु-संहारक विशेष है अतः इसके दक्षिणाम्नायी पश्चिमाम्नायी मंत्र अधिक मिलते हैं । नैऋत्य व पश्चिमाम्नायी मंत्र… Read More


।। अथ नवार्ण-मन्त्र जप विधानम् ।। “मन्त्र-महोदधि” व “श्रीदुर्गाकल्पतरु” में मन्त्र का उद्धार इस प्रकार है – ‘अथ नवाक्षरं मन्त्रं वक्ष्ये चण्डी-प्रवृत्तये । वाङ्-माया मदनो दीर्घा लक्ष्मीस्तन्द्री श्रुतीन्दु-युक्। डायै सदृग्-जलं कूर्म-द्वयं झिण्टीश-संयुतं – “ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” ।’ “मन्त्र-महार्णव” में उद्धार में प्रणव का उल्लेख नहीं है, किन्तु स्पष्ट मन्त्र को “ॐ” सहित दिया… Read More


फूल-मोहिनी-मन्त्र मन्त्रः- “ॐ नमो आदेश गुरु को । एक फूल, फूल भर दोना, चौंसठ जोगनी ने मिल किया टोना । फूल-फूल वह फूल न जानी, हनुमन्त वीर घेर-घेर दे आनी । जो सूँघे इस फूल की बास, उसका जी प्राण रहे हमारी पास । सूती होय, तो जगाइ लाव, बैठी होय, तो उठाइ लाव ।… Read More


अर्श (बवासीर) नाशक शाबर मन्त्र मन्त्रः- “ॐ नमो आदेश गुरु को । खुरासान सूं आया वीर, छप्पन सूर संग में तीर । सीस कटै और खून न आवै, टपका एक पड़न नहिं पावै ।। खूनी बादी कैसी होय, करो दूर पीड़ा कम होय । शब्द साँचा पिण्ड काँचा, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।।”… Read More


सर्व-सौभाग्य-दायक त्रिलौह मुद्रिका (अंगुठी) निर्माण विधिः ‘त्रिलौह-मुद्रिका’ का निर्माण स्वर्ण, रजत एवं ताम्र तारों को परस्पर लपेट कर और उन्हें रज्जु-वत् ऐंठ कर करना चाहिए। स्वर्ण, रजत और ताम्र का अनुपात 25:16:10 रखें। सामान्यतः सवा छः रत्ती स्वर्ण, चार रत्ती रजत तथा ढाई रत्ती ताम्र-तार समान लम्बाई में लेकर शुभ मुहूर्त में निर्माण करना चाहिए।… Read More


त्रिविध फल-दायक शाबर मन्त्र मन्त्रः- १॰ “या भुज ते महिषासुर मारि, औ शुम्भ-निशुम्भ दोऊ दल थम्बा । आरत हेतु पुकारत हौं, जाइ कहाँ बैठी जगदम्बा ?।। खड्ग टूटो कि खप्पर फूटो कि सिंह थको, तुमरो जगदम्बा ! आज तोहे माता भक्त शपथ, बिनु शान्ति दिए जनि सोवहु अम्बा ! ।।”… Read More


त्रि-विध-सिद्धि-प्रद मन्त्र मन्त्रः- “ॐ ह्रीं श्रीं ठं ठं ठं नमो भगवते मम सर्व-कार्याणि, साधय-साधय, मां रक्ष-रक्ष, शीघ्रं मां धनिनं कुरु-कुरु हुं फट्, श्रियं देहि, प्रज्ञां देहि, ममापत्तिं निवारय-निवारय स्वाहा ।”… Read More


त्रैलोक्य-विजय श्रीनृसिंह कवच ।। पूर्व-पीठिका : श्री नारद उवाच ।। इन्द्रादि-देव-वृन्देश ! ईश्वर, जगत्-पते ! महा-विष्णोर्नृसिंहस्य, कवचं ब्रूहि मे प्रभो ! यस्य प्रपठनाद् विद्वांस्त्रैलोक्य-विजयी भवेत् ।।१ ।। श्री प्रजापतिरुवाच ।।… Read More


दिव्य मातंगी कवच ।। श्रीदेव्युवाच ।। साधु-साधु महादेव ! कथयस्व सुरेश्वर ! मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ।। श्री-देवी ने कहा – हे महादेव ! हे सुरेश्वर ! मनुष्यों को सर्व-सिद्धि-प्रद दिव्य मातंगी-कवच अति उत्तम है, उस कवच को मुझसे कहिए ।… Read More