अग्निपुराण – अध्याय 123 अग्निपुराण – अध्याय 123 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तेईसवाँ अध्याय युद्धजयार्णव-सम्बन्धी विविध योगों का वर्णन युद्धजयार्णवीयनानायोगाः अग्निदेव कहते हैं — ( अब स्वर के द्वारा विजय- साधन कह रहे हैं -) मैं इस पुराण के युद्धजयार्णव प्रकरण में विजय आदि शुभ कार्यों की सिद्धि के लिये… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 122 अग्निपुराण – अध्याय 122 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बाईसवाँ अध्याय कालगणना – पञ्चाङ्गमान-साधन कालगणनं अग्निदेव कहते हैं — मुने! (अब मैं) वर्षों के समुदायस्वरूप ‘काल’ का वर्णन कर रहा हूँ और उस काल को समझने के लिये मैं गणित बतला रहा हूँ। (ब्रह्म-दिनादिकाल से अथवा सृष्ट्यारम्भकाल… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 121 अग्निपुराण – अध्याय 121 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय ज्योतिःशास्त्र का कथन [ वर-वधू के गुण और विवाहादि संस्कारों के काल का विचार; शत्रु के वशीकरण एवं स्तम्भन-सम्बन्धी मन्त्र; ग्रहण-दान; सूर्य संक्रान्ति एवं ग्रहों की महादशा ] ज्योतिःशास्त्रं अग्निदेव कहते हैं — मुने! अब मैं… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 120 अग्निपुराण – अध्याय 120 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बीसवाँ अध्याय भुवनकोश का वर्णन भुवनकोषः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! भूमि का विस्तार सत्तर हजार योजन बताया गया है। उसकी ऊँचाई दस हजार योजन है। पृथ्वी के भीतर सात पाताल हैं। एक-एक पाताल दस-दस हजार योजन… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 119 अग्निपुराण – अध्याय 119 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमि के विस्तार का वर्णन महाद्वीपादि अग्निदेव कहते हैं — जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है। वह सब ओर से एक लाख योजन विस्तृत खारे पानी के समुद्र से घिरा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 118 अग्निपुराण – अध्याय 118 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अठारहवाँ अध्याय भारतवर्ष का वर्णन भारतवर्षं अग्निदेव कहते हैं — समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण जो वर्ष है, उसका नाम ‘भारत’ है। उसका विस्तार नौ हजार योजन है। स्वर्ग तथा अपवर्ग पाने की इच्छावाले पुरुषों के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 117 अग्निपुराण – अध्याय 117 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सत्रहवाँ अध्याय श्राद्ध-कल्प पार्वणश्राद्ध श्राद्धकल्पः अग्निदेव कहते हैं — महर्षि कात्यायन ने मुनियों से जिस प्रकार श्राद्ध का वर्णन किया था, उसे बतलाता हूँ। गया आदि तीर्थों में, विशेषतः संक्रान्ति आदि के अवसर पर श्राद्ध करना चाहिये। अपराह्नकाल… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 116 अग्निपुराण – अध्याय 116 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सोलहवाँ अध्याय गया में श्राद्ध की विधि गयाश्राद्धविधिः अग्निदेव कहते हैं — गायत्री मन्त्र से ही महानदी में स्नान करके संध्योपासना करे। प्रातःकाल गायत्री के सम्मुख किया हुआ श्राद्ध और पिण्डदान अक्षय होता है। सूर्योदय के समय तथा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 115 अग्निपुराण – अध्याय 115 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय गया–यात्रा की विधि गयायात्राविधिः अग्निदेव कहते हैं — यदि मनुष्य गया जाने को उद्यत हो तो विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्री का वेष धारणकर अपने गाँव की परिक्रमा कर ले: फिर प्रतिदिन पैदल यात्रा करता रहे। मन… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 114 अग्निपुराण – अध्याय 114 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौदहवाँ अध्याय गया-माहात्म्य गयामाहात्म्यम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं गया के माहात्म्य का वर्णन करूँगा। गया श्रेष्ठ तीर्थों में सर्वोत्तम है। एक समय की बात है — गय नामक असुर ने बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की। उससे… Read More