अग्निपुराण – अध्याय 133 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय नाना प्रकार के बलों का विचार नानाबलानि शंकरजी कहते हैं — अब सूर्यादि ग्रहों की राशियों में पैदा हुए नवजात शिशु का जन्म-फल क्षेत्राधिप के अनुसार वर्णन करूँगा। सूर्य के गृह में अर्थात् सिंह लग्न में… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 132 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सेवाचक्र आदि का निरूपण सेवाचक्रम् शंकरजी कहते हैं — अब मैं ‘सेवाचक्र’ का प्रतिपादन कर रहा हूँ, जिससे सेवक को सेव्य से लाभ तथा हानि का ज्ञान होता है। पिता, माता तथा भाई एवं स्त्री-पुरुष —… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 131 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ इकतीसवाँ अध्याय घातचक्र आदि का वर्णन घातचक्रादि शंकरजी कहते हैं — पूर्वादि दिशाओं में प्रदक्षिणक्रम से अकारादि स्वरों को लिखे। उसमें शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, पूर्णिमा, त्रयोदशी, चतुर्दशी, केवल शुक्लपक्ष की एक अष्टमी (कृष्णपक्ष की अष्टमी नहीं), सप्तमी, कृष्णपक्ष… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 130 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तीसवाँ अध्याय विविध मण्डलों का वर्णन मण्डलं शंकरजी कहते हैं — भद्रे ! अब मैं विजय के लिये चार प्रकार के मण्डल का वर्णन करता हूँ। कृत्तिका, मघा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा, भरणी, पूर्वाभाद्रपदा — इन नक्षत्रों का ‘आग्नेय… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 129 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय अर्घकाण्ड का प्रतिपादन अर्घकाण्डम् शंकरजी कहते हैं — अब मैं वस्तुओं की मँहगी तथा सस्ती के सम्बन्ध में विचार प्रकट कर रहा हूँ। जब कभी भूतल पर उल्कापात, भूकम्प, निर्घात (वज्रापात), चन्द्र और सूर्य के ग्रहण… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 128 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय कोटचक्र का वर्णन कोटचक्रम् शंकरजी कहते हैं — अब मैं ‘कोटचक्र’ का वर्णन करता हूँ — पहले चतुर्भुज लिखे, उसके भीतर दूसरा चतुर्भुज, उसके भीतर तीसरा चतुर्भुज और उसके भीतर चौथा चतुर्भुज लिखे। इस तरह लिख… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 127 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय विभिन्न बलों का वर्णन नानाबलानि शंकरजी कहते हैं — ‘विष्कुम्भ योग’ की तीन घड़ियाँ, ‘शूल योग’ की पाँच ‘गण्ड’ तथा ‘अतिगण्ड योग’ की छः ‘व्याघात’ तथा ‘वज्र योग’ की नौ घड़ियों को सभी शुभ कार्यों में… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 126 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय नक्षत्र सम्बन्धी पिण्ड का वर्णन नक्षत्रनिर्णयः शंकरजी कहते हैं — देवि! अब मैं प्राणियों के शुभाशुभ फल की जानकारी के लिये नाक्षत्रिक पिण्ड का वर्णन करूँगा। (जिस राजा या मनुष्य के लिये शुभाशुभ फल का ज्ञान… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 125 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ पचीसवाँ अध्याय युद्धजयार्णव-सम्बन्धी अनेक प्रकार के चक्रों का वर्णन युद्धजयार्णवीयनानाचक्राणि शंकरजी ने कहा — ‘ॐ ह्रीं कर्णमोटनि बहुरूपे बहुदंष्ट्रे ह्रूं फट्, ॐ हः, ॐ ग्रस ग्रस, कृन्त कृन्तच्छक च्छक ह्रूं फट् नमः ।’  इस मन्त्र का नाम ‘कर्णमोटी… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 124 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौबीसवाँ अध्याय युद्धजयार्णवीय ज्यौतिषशास्त्र का सार युद्धजयार्णवीयज्योतिःशास्त्रसारः अग्निदेव कहते हैं — अब मैं युद्धजयार्णव- प्रकरण में ज्योतिषशास्त्र की सारभूत वेला (समय), मन्त्र और औषध आदि वस्तुओं का उसी प्रकार वर्णन करूँगा, जिस तरह शंकरजी ने पार्वतीजी से कहा… Read More