June 18, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 116 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सोलहवाँ अध्याय गया में श्राद्ध की विधि गयाश्राद्धविधिः अग्निदेव कहते हैं — गायत्री मन्त्र से ही महानदी में स्नान करके संध्योपासना करे। प्रातःकाल गायत्री के सम्मुख किया हुआ श्राद्ध और पिण्डदान अक्षय होता है। सूर्योदय के समय तथा मध्याह्नकाल में स्नान करके गीत और वाद्य के द्वारा सावित्री देवी की उपासना करे। फिर उन्हीं के सम्मुख संध्या करके नदी के तट पर पिण्डदान करे। तदनन्तर अगस्त्यपद में पिण्डदान करे। फिर ‘योनिद्वार’ (ब्रह्मयोनि) में प्रवेश करके निकले। इससे वह फिर माता की योनि में नहीं प्रवेश करता, पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् काकशिला पर बलि देकर कुमार कार्तिकेय को प्रणाम करे। इसके बाद स्वर्गद्वार, सोमकुण्ड और वायु-तीर्थ में पिण्डदान करे। फिर आकाशगङ्गा और कपिला के तट पर पिण्ड दे। वहाँ कपिलेश्वर शिव को प्रणाम करके रुक्मिणीकुण्ड पर पिण्डदान करे ॥ १-५ ॥’ कोटि तीर्थ में भगवान् कोटीश्वर को नमस्कार करके मनुष्य अमोघपद, गदालोल, वानरक एवं गोप्रचार तीर्थ में पिण्डदान दे। वैतरणी में गौ को नमस्कार एवं दान करके मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। वैतरणी के तट पर श्राद्ध एवं पिण्डदान करे। उसके बाद क्रौञ्चपाद में पिण्ड दे। तृतीया तिथि को विशाला, निश्चिरा, ऋणमोक्ष तथा पापमोक्ष तीर्थ में भी पिण्डदान करे। भस्मकुण्ड में भस्म से स्नान करने वाला पुरुष पाप से मुक्त हो जाता है। वहाँ भगवान् जनार्दन को प्रणाम करे और इस प्रकार प्रार्थना करे — ‘जनार्दन ! यह पिण्ड मैंने आपके हाथ में समर्पित किया है। परलोक में जाने पर यह मुझे अक्षयरूप में प्राप्त हो।’ गया में साक्षात् भगवान् विष्णु ही पितृदेव के रूप में विराजमान हैं ॥ ६-१० ॥ उन भगवान् कमलनयन का दर्शन करके मानव तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है। तदनन्तर मार्कण्डेयेश्वर को प्रणाम करके मनुष्य गृध्रेश्वर को नमस्कार करे। महादेवजी के मूलक्षेत्र धारा में पिण्डदान करना चाहिये। इसी प्रकार गृध्रकूट, गृध्रवट और धौतपाद में भी पिण्डदान करना उचित है। पुष्करिणी, कर्दमाल और रामतीर्थ में पिण्ड दे। फिर प्रभासेश्वर को नमस्कार करके प्रेतशिला पर पिण्डदान दे। उस समय इस प्रकार कहे — ‘दिव्यलोक, अन्तरिक्षलोक तथा भूमिलोक में जो मेरे पितर और बान्धव आदि सम्बन्धी प्रेत आदि के रूप में रहते हों, वे सब लोग इन मेरे दिये हुए पिण्डों के प्रभाव से मुक्ति-लाभ करें।’ प्रेतशिला तीन स्थानों में अत्यन्त पावन मानी गयी है— गयाशीर्ष, प्रभासतीर्थ और प्रेतकुण्ड । इनमें पिण्डदान करनेवाला पुरुष अपने कुल का उद्धार कर देता है ॥ ११-१५ ॥ वसिष्ठेश्वर को नमस्कार करके उनके आगे पिण्डदान दे। गयानाभि, सुषुम्ना तथा महाकोष्ठी में भी पिण्डदान करे। भगवान् गदाधर के सामने मुण्डपृष्ठ पर देवी के समीप पिण्डदान करे। पहले क्षेत्रपाल आदि सहित मुण्डपृष्ठ को नमस्कार कर लेना चाहिये। उनका पूजन करने से भय का नाश होता है, विष और रोग आदि का कुप्रभाव भी दूर हो जाता है। ब्रह्माजी को प्रणाम करने से मनुष्य अपने कुल को ब्रह्मलोक में पहुँचा देता है। सुभद्रा, बलभद्र तथा भगवान् पुरुषोत्तम का पूजन करने से मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करके अपने कुल का उद्धार कर देता और अन्त में स्वर्गलोक का भागी होता है। भगवान् हृषीकेश को नमस्कार करके उनके आगे पिण्डदान देना चाहिये । श्रीमाधव का पूजन करके मनुष्य विमानचारी देवता होता है ॥ १६- २० ॥ भगवती महालक्ष्मी, गौरी तथा मङ्गलमयी सरस्वती की पूजा करके मनुष्य अपने पितरों का उद्धार करता, स्वयं भी स्वर्गलोक में जाता और वहाँ भोग भोगने के पश्चात् इस लोक में आकर शास्त्रों का विचार करनेवाला पण्डित होता है। फिर बारह आदित्यों का, अग्नि का, रेवन्त का और इन्द्र का पूजन करके मनुष्य रोग आदि से छुटकारा पा जाता है और अन्त में स्वर्गलोक का निवासी होता है। ‘श्रीकपर्दि विनायक’ तथा कार्तिकेय का पूजन करने से मनुष्य को निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि प्राप्त होती है। सोमनाथ, कालेश्वर, केदार, प्रपितामह, सिद्धेश्वर, रुद्रेश्वर, रामेश्वर तथा ब्रह्मकेश्वर — इन आठ गुप्त लिङ्गों का पूजन करने से मनुष्य सब कुछ पा लेता है। यदि लक्ष्मीप्राप्ति की कामना हो तो भगवान् नारायण, वाराह, नरसिंह को नमस्कार करे। ब्रह्मा, विष्णु तथा त्रिपुरनाशक महेश्वर को भी प्रणाम करे। वे सब कामनाओं को देनेवाले हैं ॥ २१-२५ ॥ सीता, राम, गरुड़ तथा वामन का पूजन करने से मानव अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है और पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति करा देता है। देवताओं सहित भगवान् श्रीआदि गदाधर का पूजन करने से मनुष्य तीनों ऋणों से मुक्त होकर अपने सम्पूर्ण कुल को तार देता है। प्रेतशिला देवरूपा होने से परम पवित्र है। गया में वह शिला देवमयी ही है। गया में ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ तीर्थ न हो। गया में जिसके नाम से भी पिण्ड दिया जाता है, उसे वह सनातन ब्रह्म में प्रतिष्ठित कर देता है। फल्ग्वीश्वर, फल्गुचण्डी तथा अङ्गारकेश्वर को प्रणाम करके श्राद्धकर्ता पुरुष मतङ्गमुनि के स्थान में पिण्डदान दे। फिर भरत के आश्रम पर भी पिण्ड दे। इसी प्रकार हंस तीर्थ और कोटि तीर्थ में भी करना चाहिये। जहाँ पाण्डुशिला नद है, वहाँ अग्निधारा तथा मधुस्रवा तीर्थ में पिण्डदान करे। तत्पश्चात् इन्द्रेश्वर किलकिलेश्वर तथा वृद्धि विनायक को प्रणाम करे; तदनन्तर धेनुकारण्य में पिण्डदान करे, धेनुपद में गौ को नमस्कार करे। इससे वह अपने सम्पूर्ण पितरों का उद्धार कर देता है। फिर सरस्वती तीर्थ में जाकर पिण्ड दे। सायंकाल संध्योपासना करके सरस्वती देवी को प्रणाम करे। ऐसा करनेवाला पुरुष तीनों काल की संध्योपासना में तत्पर वेद-वेदाङ्गों का पारंगत विद्वान् ब्राह्मण होता है ॥ २६-३३ ॥ गया की परिक्रमा करके वहाँ के ब्राह्मणों का पूजन करने से गया तीर्थ में किया हुआ अन्नदान आदि सम्पूर्ण पुण्य अक्षय होता है। भगवान् गदाधर की स्तुति करके इस प्रकार प्रार्थना करे — ‘जो आदिदेवता, गदा धारण करनेवाले, गया के निवासी तथा पितर आदि को सद्गति देनेवाले हैं, उन योगदाता भगवान् गदाधर को मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिये प्रणाम करता हूँ। वे देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्राण और अहंकार से शून्य हैं। नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, द्वैतशून्य तथा देवता और दानवों से वन्दित हैं। देवताओं और देवियों के समुदाय सदा उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं; मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। वे कलि के कल्मष (पाप) और काल की पीड़ा का नाश करनेवाले हैं। उनके कण्ठ में वनमाला सुशोभित होती है। सम्पूर्ण लोकपालों का भी उन्हीं के द्वारा पालन होता है। वे सबके कुलों का उद्धार करने में मन लगाते हैं। व्यक्त और अव्यक्त – सबमें अपने स्वरूप को विभक्त करके स्थित होते हुए भी वे वास्तव में अविभक्तात्मा ही हैं। अपने स्वरूप में ही उनकी स्थिति है। वे अत्यन्त स्थिर और सारभूत हैं तथा भयंकर पापों का भी मर्दन करनेवाले हैं। मैं उनके चरणों में मस्तक झुकाता हूँ। देव! भगवान् गदाधर! मैं पितरों का श्राद्ध करने के निमित्त गया में आया हूँ। आप यहाँ मेरे साक्षी होइये। आज मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया। ब्रह्मा और शंकर आदि देवता मेरे लिये साक्षी बनें। मैंने गया में आकर अपने पितरों का उद्धार कर दिया। श्राद्ध आदि में गया के इस माहात्म्य का पाठ करने से मनुष्य ब्रह्मलोक का भागी होता है। गया में पितरों का श्राद्ध अक्षय होता है। वह अक्षय ब्रह्मलोक देनेवाला है ॥ ३४-४३ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गया में श्राद्ध की विधि’ विषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥ Content is available only for registered users. 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