श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-40 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चत्वारिंशोऽध्यायः चालीसवाँ अध्याय दुर्वासा के शाप से इन्द्र का श्रीहीन हो जाना लक्ष्म्युत्पत्तिवर्णनम् नारदजी बोले — [हे भगवन्!] वे श्रेष्ठ महालक्ष्मी भगवान् नारायण की प्रिया होकर वैकुण्ठ में निवास करती हैं। वे सनातनी भगवती वैकुण्ठ की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-39 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः उनतालीसवाँ अध्याय भगवती लक्ष्मी का प्राकट्य, समस्त देवताओं द्वारा उनका पूजन लक्ष्म्युपाख्यानवर्णनम् नारदजी बोले — [ हे भगवन् ! ] मैं सावित्री तथा धर्मराज के संवाद में निराकार मूलप्रकृति भगवती गायत्री का निर्मल यश सुन चुका। उनके गुणों का… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-38 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-अष्टत्रिंशोऽध्यायः अड़तीसवाँ अध्याय धर्मराज का सावित्री से भगवती की महिमा का वर्णन करना और उसके पति को जीवनदान देना सावित्र्युपाख्यानवर्णनम् सावित्री बोली — [ हे प्रभो ! ] आप मुझे भगवती की भक्ति प्रदान कीजिये; वह देवीभक्ति समस्त तत्त्वों का… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-37 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-सप्तत्रिंशोऽध्यायः सैंतीसवाँ अध्याय विभिन्न नरककुण्ड तथा वहाँ दी जानेवाली यातना का वर्णन नानानरककुण्डवर्णनम् धर्मराज बोले — हे साध्वि ! वे सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमा की भाँति गोलाकार तथा बहुत गहरे हैं। अनेक प्रकार के पत्थरों से बनाये गये हैं ।… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-36 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-षट्‌त्रिंशोऽध्यायः छतीसवाँ अध्याय धर्मराज द्वारा सावित्री से देवोपासना से प्राप्त होने वाले पुण्यफलों को कहना देवपूजनात् सर्वारिष्टनिवृत्तिवर्णनम् सावित्री बोली — हे वेद-वेदांग में पारंगत महाभाग धर्मराज! नानाविध पुराणों तथा इतिहासों में जो सारस्वरूप है, उसे प्रदर्शित कीजिये। अब आप मुझसे… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-35 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-पञ्चत्रिंशोऽध्यायः पैंतीसवाँ अध्याय विभिन्न पापकर्मों से प्राप्त होने वाली विभिन्न योनियों का वर्णन नानाकर्मविपाकफलकथनम् धर्मराज बोले — हे साध्वि ! देवताओं की उपासना के बिना कर्म-बन्धन से मुक्ति नहीं होती । शुद्ध कर्म का बीज शुद्ध होता है और कुकर्म… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-34 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चतुस्त्रिंशोऽध्यायः चौंतीसवाँ अध्याय विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण प्राप्त होने वाले नरकों का वर्णन नानाकर्मविपाकफलवर्णनम् यमराज बोले — [ हे सावित्रि!] भारतवर्ष में जो कोई निर्दयी तथा क्रूर व्यक्ति खड्ग से किसी जीव को काटता है या कोई नरघाती धन… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-33 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः तैंतीसवाँ अध्याय विभिन्न नरककुण्डों में जाने वाले पापियों तथा उनके पापों का वर्णन नानाकर्मविपाकफलकथनम् धर्मराज बोले — हे साध्वि ! भगवान् श्रीहरि की सेवामें संलग्न रहने वाला, विशुद्धात्मा, योगसिद्ध, व्रती, तपस्वी तथा ब्रह्मचारी पुरुष निश्चित ही नरक में नहीं… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-32 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-द्वात्रिंशोऽध्यायः बतीसवाँ अध्याय धर्मराज का सावित्री को अशुभ कर्मों के फल बताना सावित्र्युपाख्याने कुण्डसंख्यानिरूपणम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] सूर्यपुत्र यमराज सावित्री को विधिपूर्वक भगवती के महामन्त्र मायाबीज की दीक्षा प्रदानकर उसे प्राणियों के अशुभ कर्म का फल बताने… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-31 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकत्रिंशोऽध्यायः इकतीसवाँ अध्याय सावित्री का यमाष्टक द्वारा धर्मराज का स्तवन यमाष्टकवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] यम के मुख से भगवती के नामकीर्तन की महिमा सुनकर सावित्री के नेत्रों में अश्रु भर आये और उसका शरीर पुलकित हो गया।… Read More