May 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-31 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकत्रिंशोऽध्यायः इकतीसवाँ अध्याय सावित्री का यमाष्टक द्वारा धर्मराज का स्तवन यमाष्टकवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] यम के मुख से भगवती के नामकीर्तन की महिमा सुनकर सावित्री के नेत्रों में अश्रु भर आये और उसका शरीर पुलकित हो गया। वह यम से पुनः कहने लगी ॥ १ ॥ सावित्री बोली — हे धर्म ! शक्तिस्वरूपा भगवती जगदम्बा का नामकीर्तन सबका उद्धार करने वाला और श्रोता तथा वक्ता — दोनों के जन्म, मृत्यु तथा बुढ़ापे का नाश करने वाला है ॥ २ ॥ हे विभो! भगवती का यह कीर्तन दानवों, सिद्धों तथा तपस्वियों का परम पद है और समस्त योगों तथा वेदों का सेवनरूप ही है ॥ ३ ॥ मोक्षपद, अमरता और सभी प्रकार की सिद्धियाँ श्रीशक्ति के उपासक की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं ॥ ४ ॥ हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! मैं किस विधि से उन भगवती की उपासना करूँ, मुझे यह बताइये। मैंने आपसे मनुष्यों के शुभ कर्म का मनोहर फल सुन लिया, अब आप मुझे उनके अशुभ कर्मों का फल बताने की कृपा कीजिये ॥ ५१/२ ॥ हे ब्रह्मन् ! ऐसा कहकर वह सावित्री भक्तिभाव से अपना कन्धा झुकाकर वेदोक्त स्तोत्र के द्वारा उन धर्मराज की स्तुति करने लगी ॥ ६१/२ ॥ ॥ सावित्र्युवाच ॥ तपसा धर्ममाराध्य पुष्करे भास्करः पुरा ॥ ७ ॥ धर्मं सूर्यः सुतं प्राप धर्मराजं नमाम्यहम् । समता सर्वभूतेषु यस्य सर्वस्य साक्षिणः ॥ ८ ॥ अतो यन्नाम शमनमिति तं प्रणमाम्यहम् । येनान्तश्च कृतो विश्वे सर्वेषां जीविनां परम् ॥ ९ ॥ कामानुरूपं कालेन तं कृतान्तं नमाम्यहम् । बिभर्ति दण्डं दण्डाय पापिनां शुद्धिहेतवे ॥ १० ॥ नमामि तं दण्डधरं यः शास्ता सर्वजीविनाम् । विश्वं च कलयत्येव यः सर्वेषु च सन्ततम् ॥ ११ ॥ अतीव दुर्निवार्यं च तं कालं प्रणमाम्यहम् । तपस्वी ब्रह्मनिष्ठो यः संयमी सञ्जितेन्द्रियः ॥ १२ ॥ जीवानां कर्मफलदस्तं यमं प्रणमाम्यहम् । स्वात्मारामश्च सर्वज्ञो मित्रं पुण्यकृतां भवेत् ॥ १३ ॥ पापिनां क्लेशदो यस्तं पुण्यमित्रं नमाम्यहम् । यज्जन्म ब्रह्मणोंऽशेन ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा ॥ १४ ॥ यो ध्यायति परं ब्रह्म तमीशं प्रणमाम्यहम् । सावित्री बोली — प्राचीन काल में सूर्य ने पुष्करक्षेत्र में तपस्या के द्वारा धर्म की उपासना की थी। उस समय जिन धर्म को सूर्य ने पुत्ररूप में प्राप्त किया, उन धर्मराज को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ ७१/२ ॥ जो सभी प्राणियों में समभाव रखते हैं और जो सबके साक्षी हैं, अतः जिनका नाम शमन है — उन धर्मराज को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ ८१/२ ॥ जो काल के अनुसार इच्छापूर्वक विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों का अन्त करते हैं, उन भगवान् कृतान्त को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ ९१/२ ॥ जो सभी प्राणियों को नियन्त्रण में रखते तथा पापियों की शुद्धिहेतु उन्हें दण्डित करने के लिये हाथ में दण्ड धारण करते हैं, उन भगवान् दण्डधर को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ १०१/२ ॥ जो विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों के समय का निरन्तर परिगणन करते हैं तथा जो परम दुर्धर्ष हैं, उन भगवान् काल को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ १११/२ ॥ जो तपस्वी, ब्रह्मनिष्ठ, संयमी, जितेन्द्रिय तथा जीवों को उनके कर्मों का फल देने वाले हैं, उन भगवान् यम को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ १२१/२ ॥ जो अपनी आत्मा में रमण करने वाले, सर्वज्ञ, पुण्यात्माओं के मित्र तथा पापियों के लिये क्लेशप्रद हैं; उन भगवान् पुण्यमित्र को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्मा के अंश से जिनका जन्म हुआ है तथा जो सदा परब्रह्म का ध्यान करते रहते हैं – ब्रह्मतेज से दीप्तिमान् उन भगवान् ईश को मैं प्रणाम करती हूँ ॥ १४१/२ ॥ मुने! इस प्रकार प्रार्थना करके उस सावित्री ने यमराज को प्रणाम किया । तदनन्तर धर्मराज ने उस सावित्री को भगवती के मन्त्र तथा प्राणियों के कर्मफल के विषय में बतलाया ॥ १५१/२ ॥ जो मनुष्य प्रातः काल उठकर इस यमाष्टक का नित्य पाठ करता है, उसे यमराज से भय नहीं होता और वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। यदि महान् पापी मनुष्य भी भक्तिपूर्वक नित्य इसका पाठ करे, तो यमराज अपने कायव्यूह से निश्चितरूप से उसे शुद्ध कर देते हैं ॥ १६-१७ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘यमाष्टकवर्णन’ नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe