श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय २ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दूसरा अध्याय ग्राह के द्वारा गजेन्द्र का पकड़ा जाना श्रीशुकदेवजी ने कहा — परीक्षित् ! क्षीरसागर त्रिकूट नाम का एक प्रसिद्ध सुन्दर एवं श्रेष्ठ पर्वत था । वह दस हजार योजन ऊँचा था ।। १ ।। उसकी लंबाई-चौड़ाई… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय १ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पहला अध्याय मन्वन्तरों का वर्णन राजा परीक्षित् ने पूछा — गुरुदेव ! स्वायम्भुव मनु का वंश-विस्तार मैंने सुन लिया । इसी वंश में उनकी कन्याओं के द्वारा मरीचि आदि प्रजापतियों ने अपनी वंश-परम्परा चलायी थी । अब आप… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय गृहस्थों के लिये मोक्षधर्म का वर्णन नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर ! कुछ ब्राह्मणों की निष्ठा कर्म में, कुछ की तपस्या में, कुछ की वेदों के स्वाध्याय और प्रवचन में, कुछ आत्मज्ञान के सम्पादन तथा कुछ… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय गृहस्थ सम्बन्धी सदाचार राजा युधिष्ठिर ने पूछा — देवर्षि नारदजी ! मेरे जैसा गृहासक्त गृहस्थ बिना विशेष परिश्रम के इस पद को किस साधन से प्राप्त कर सकता है, आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥ १… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय यतिधर्म का निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद नारदजी कहते हैं — धर्मराज ! यदि वानप्रस्थी में ब्रह्मविचार का सामर्थ्य हो, तो शरीर के अतिरिक्त और सब कुछ छोड़कर वह संन्यास ले ले; तथा किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बारहवाँ अध्याय ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ-आश्रमों के नियम नारदजी कहते हैं — धर्मराज ! गुरुकुल में निवास करनेवाला ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर दास के समान अपने को छोटा माने, गुरुदेव के चरणों में सुदृढ़ अनुराग रक्खे… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय ११ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ग्यारहवाँ अध्याय मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — भगवन्मय प्रह्लादजी के साधुसमाज में सम्मानित पवित्र चरित्र सुनकर संतशिरोमणि युधिष्ठिर को बड़ा आनन्द हुआ । उन्होंने नारदजी से और भी पूछा ॥ १ ॥ युधिष्ठिरजी… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दसवाँ अध्याय प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा नारदजी कहते हैं — प्रह्लादजी ने बालक होने पर भी यही समझा कि वरदान माँगना प्रेम-भक्ति का विघ्न हैं; इसलिये कुछ मुसकराते हुए वे भगवान् से बोले ॥ १… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नवाँ अध्याय प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंह भगवान् की स्तुति नारदजी कहते हैं — इस प्रकार ब्रह्मा, शंकर आदि सभी देवगण नृसिंह भगवान् के क्रोधावेश को शान्त न कर सके और न उनके पास जा सके । किसी को… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय ८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आठवाँ अध्याय नृसिंहभगवान् का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपु का वध एवं ब्रह्मादि देवताओं द्वारा भगवान् की स्तुति नारदजी कहते हैं — प्रह्लादजी का प्रवचन सुनकर दैत्यबालकों ने उसी समय से निर्दोष होने के कारण, उनकी बात पकड़ ली । गुरुजी… Read More