श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-19
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकोनविंशोऽध्यायः
उनीसवाँ अध्याय
तुलसी के साथ शंखचूड़ का गान्धर्वविवाह, शंखचूड़ से पराजित और निर्वासित देवताओं का ब्रह्मा तथा शंकरजी के साथ वैकुण्ठधाम जाना, श्रीहरि का शंखचूड़ के पूर्वजन्म का वृत्तान्त बताना
शङ्‌खचूडेन सह तुलसीसङ्‌गमवर्णनम्

नारदजी बोले — [ हे भगवन्!] आपने यह अत्यन्त अद्भुत आख्यान सुनाया, जिसे सुनकर किसी भी प्रकार से मुझे तृप्ति नहीं हो रही है । हे महामते ! उसके बाद जो कुछ घटित हुआ, उसे आप मुझे बताइये ॥ ११/२

श्रीनारायण बोले — इस प्रकार [ शंखचूड़ तथा तुलसी को] आशीर्वाद देकर ब्रह्माजी अपने लोक चले गये। तब दानव शंखचूड़ने गान्धर्व – विवाह के अनुसार उस तुलसी को पत्नीरूप में ग्रहण कर लिया । उस अवसर पर स्वर्ग में दुंदुभियाँ बजने लगीं और पुष्पों की वर्षा होने लगी ॥ २-३ ॥ अब वह शंखचूड़ अपने सुन्दर भवन में तुलसी के साथ विलास करने लगा । आनन्द का अनुभव कर वह तुलसी मूर्च्छित – सी हो गयी । वह साध्वी उस समय सुखरूपी निर्जल सागर में निमग्न हो गयी थी ॥ ४१/२

कामशास्त्रमें जो चौंसठ प्रकार की कलाएँ तथा चौंसठ प्रका के सुख बताये गये हैं, वे रसिकजनों के लिये अत्यन्त प्रिय हैं । अंग-प्रत्यंग के स्पर्श करने से स्त्रियों को सुखप्रद लगनेवाले जो भी रस – शृंगार होते हैं, उन सबको रसिकेश्वर शंखचूड़ ने प्रस्तुत किया ॥ ५-६१/२

अनेक प्रकार के आभूषणों से विभूषित वह रसिक शंखचूड़ पुष्प-चन्दन से चर्चित तथा रत्नमय आभूषणों से अलंकृत उस तुलसी को साथ में लेकर अत्यन्त रमणीक तथा पूर्णरूप से निर्जन स्थान में पुष्प – चन्दन से सुरभित वायुयुक्त पुष्पोद्यान और पुष्प – चन्दन से सुशोभित नदी के तट पर पुष्प – चन्दन से चर्चित शय्या पर रासक्रीडा में निरत रहता था ॥ ७–९ ॥ कामक्रीड़ा के ज्ञाता वे दोनों कभी भी विलास से विरत नहीं होते थे। उस साध्वी तुलसी ने अपनी चंचल लीला से अपने पति का मन हर लिया था । इसी प्रकार रस-भावों के ज्ञाता शंखचूड़ ने भी रसिका तुलसी का मन अपनी ओर आकृष्ट कर लिया था । उस तुलसी ने राजा के वक्षःस्थल का चन्दन तथा मस्तक का तिलक मिटा दिया, उसी प्रकार उस शंखचूड़ ने भी तुलसी के सिन्दूर – बिन्दु को मिटा दिया। कामक्रीड़ा में शंखचूड़ ने प्रसन्नतापूर्वक उस तुलसी के वक्षःस्थल आदि पर और उसी प्रकार तुलसी ने उसके वाम पार्श्व में अपने हाथ के आभूषण का चिह्न बना दिया। इस प्रकार परस्पर आलिंगन आदि करते हुए कामकला का सम्यक् ज्ञान रखने वाले वे दोनों क्रीड़ा करने लगे ॥ १०–१४१/२

रतिक्रीड़ा से विरत होकर वे दोनों मन में जो-जो इच्छा रहती थी, उसके अनुसार एक-दूसरे का शृंगार करते थे । वह तुलसी शंखचूड़ के मस्तक पर कुमकुम- मिश्रित चंदन लगाती थी और उसके सभी मनोहर अंगों में चन्दन का लेप करती थी । वह शंखचूड़ को सुवासित ताम्बूल खिलाती थी, अग्नि के समान शुद्ध दो वस्त्र पहनाती थी, वृद्धावस्थारूपी रोग दूर करने वाला पारिजात पुष्प प्रदान करती थी, बहुमूल्य रत्नों से निर्मित उत्तम अँगूठी पहनाती थी और तीनों लोकों में दुर्लभ उत्तम मणियों के आभूषणों से अलंकृत करती थी — इस प्रकार शंखचूड़ का श्रृंगार करने के पश्चात् ‘मैं आपकी दासी हूँ’ – ऐसा बार- बार कहकर वह तुलसी महान् भक्ति के साथ अपने गुणवान् पति को प्रणाम करती थी । वह अपलक नेत्रों से कामदेव के समान अपने पति के मुखार-विन्द को मुसकराती हुई बार-बार देखती रहती थी ॥ १५–२०१/२

इसी प्रकार शंखचूड़ भी प्रिया तुलसी को आकृष्ट करके वक्ष से लगा लेता था और वस्त्र से ढँके हुए उसके मुसकानयुक्त मुखकमल को निहारने लगता था। वह तुलसी के कठोर कपोलों तथा बिम्बाफल के समान लाल ओठों का स्पर्श करने लगता था ॥ २१-२२ ॥ तदनन्तर उसने वरुण के यहाँ से प्राप्त वस्त्रों का जोड़ा और तीनों लोकों में दुर्लभ रत्नमयी माला उस तुलसी को प्रदान की । इसी प्रकार उसने स्वाहादेवी से प्राप्त दो मंजीर (पायजेब ), छाया से प्राप्त एक जोड़ी बाजूबन्द और रोहिणी से प्राप्त कुण्डल, रति से प्राप्त हाथ के आभूषण के रूप में रत्नमय अँगूठी और विश्वकर्मा के द्वारा प्रदत्त अद्भुत तथा मनोहर शंख तुलसी को प्रदान किये ॥ २३–२५ ॥ तदनन्तर विचित्र कमल-पुष्पों से सुसज्जित हुई अत्यन्त दुर्लभ शय्या तथा अन्य भूषण प्रदान करके राजा शंखचूड़ हँसने लगा। उसने उसकी चोटी में मांगलिक आभूषण लगाया और उसके गण्डस्थल पर सुगन्धित चन्दन से तीन चन्द्रलेखाओं से युक्त तथा चारों ओर कुमकुमबिन्दुओं से सुशोभित सुन्दर चित्र बनाया । शंखचूड़ ने उसके ललाट पर जलती हुई दीपशिखा के आकार के समान सिन्दूर – तिलक लगाया और स्थलकमलिनी को भी लज्जित कर देने वाले उसके दोनों कमलसदृश चरणों में तथा नाखूनों पर प्रसन्नतापूर्वक सुन्दर महावर लगाया। तत्पश्चात् तुलसी के महावरयुक्त चरणकमल को अपने वक्षःस्थल पर बार-बार रखकर ‘हे देवि ! मैं तुम्हारा दास हूँ’ – ऐसा बार – बार उच्चारण करते हुए उस शंखचूड़ ने रत्नमय आभूषणों से अलंकृत अपने हाथ से उसे अपने वक्षःस्थल से लगा लिया ॥ २६-३१ ॥

तदनन्तर राजा शंखचूड़ वह तपोवन छोड़कर अन्य स्थान पर चला गया। पुष्प तथा चन्दन से चर्चित शरीर वाला वह सकाम शंखचूड़ मलयपर्वत पर, देवस्थानों में, विभिन्न पर्वतों पर, तपोवनों में, अत्यन्त रमणीक स्थानों में, निर्जन पुष्पोद्यान में, समुद्र की तटवर्ती अत्यन्त सुन्दर कन्दराओं में, जल तथा वायु से युक्त पुष्पभद्रा नदी के मनोहर तट पर, नदियों तथा सरोवरों के दिव्य तटों पर, वसन्त ऋतु में भ्रमरों की मधुर ध्वनि से निनादित वनों में, अत्यन्त अनुपम तथा आनन्दकर गन्धमादनपर्वत पर, नन्दन नामक देवोद्यान में, अद्भुत चन्दनवन में, चम्पा-केतकी तथा माधवी के निकुंज में, कुन्द-मालती – कुमुद तथा कमलों के वन में, कल्पवृक्ष तथा पारिजात के वन में, निर्जन कांचन स्थान में, पवित्र कांचन-पर्वत पर, कांचीवन में, किंजलक, कंचुक और कांचनाकर आदि स्थानों में – वन में, जहाँ कोयल की मधुर ध्वनि सुनायी देती और पुष्प – चन्दन की सुगन्ध से सुरभित वायु बहती रहती थी, पुष्प – चन्दन से सुसज्जित शय्या पर कामनायुक्त रमणी तुलसी के साथ इच्छानुसार विहार किया करता था । किंतु न तो दानवेन्द्र शंखचूड़ तृप्त हुआ और न वह तुलसी ही तृप्त हुई; अपितु आहुति से बढ़ने वाली अग्नि की भाँति उन दोनों की वासना निरन्तर बढ़ती ही गयी ॥ ३२-४० ॥ तदनन्तर वह दानव शंखचूड़ उस तुलसी के साथ अपने आश्रम आकर के वहाँ अपने रमणीक क्रीड़ा-भवन में जाकर बार-बार विहार करने लगा। इस प्रकार महान् प्रतापी राजराजेश्वर शंखचूड़ ने पूरे एक मन्वन्तर तक राज्य का उपभोग किया ॥ ४१-४२१/२

वह देवताओं, असुरों, दानवों, गन्धर्वों, किन्नरों और राक्षसों को सदा शान्त कर देने वाला था । उसके द्वारा छिने हुए अधिकार वाले देवतागण भिक्षुकों की भाँति विचरण करते थे, अतः वे सभी अत्यन्त दुःखी होकर ब्रह्मा की सभा में गये । उन्होंने अपना वृत्तान्त बताया और बार- बार अत्यधिक विलाप  किया ॥ ४३–४५ ॥ तब विधाता ब्रह्माजी देवताओं को साथ लेकर भगवान् शंकर के स्थान पर गये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने मस्तक पर चन्द्रमा को धारण करने वाले सर्वेश्वर शिव से सारी बातें बतायीं ॥ ४६ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्मा और शिव उन देवताओं को साथ लेकर जरा तथा मृत्यु का नाश करने वाले, सभी के लिये अत्यन्त दुर्लभ तथा परमधाम श्रेष्ठ वैकुण्ठलोक में गये। जब वे श्रीहरि के लोकों के श्रेष्ठ प्रवेशद्वार पर पहुँचे, तब वहाँ पर उन्होंने रत्नमय सिंहासनपर बैठे हुए द्वारपालों को देखा। वे सभी पीताम्बरों से सुशोभित थे, वे रत्नमय आभूषणों से अलंकृत थे, उन्होंने वनमाला धारण कर रखी थी, उनके शरीर सुन्दर तथा श्यामवर्ण के थे, शंख-चक्र-गदा-पद्म से सुशोभित उनकी चार भुजाएँ थीं, उनके प्रसन्न मुखमण्डल पर मुसकान व्याप्त थी और उन मनोहर द्वारपालों के नेत्र कमल के समान थे ॥ ४७-५० ॥ ब्रह्माजी ने उन द्वारपालों को अपने आने का प्रयोजन बताया। तब उन द्वारपालों ने ब्रह्मा को अन्दर जाने की आज्ञा दे दी और ब्रह्माजी ने उनकी आज्ञा पाकर भीतर प्रवेश किया ॥ ५१ ॥

इस प्रकार ब्रह्माजी ने भीतर सोलह द्वारों को देखा और देवताओं के साथ उन्हें पार करके वे श्रीहरि की सभा में पहुँचे। वह सभा देवर्षियों तथा चार भुजावाले पार्षदों से घिरी हुई थी। वे सभी पार्षद नारायणस्वरूप थे और कौस्तुभमणि से अलंकृत थे । उस सभा का आकार नवीन चन्द्रमण्डल के समान था, वह मनोहर सभा चौकोर थी, वह सर्वोत्तम दिव्य मणियों से निर्मित थी, वह बहुमूल्य हीरों से सजी हुई थी, भगवान् श्रीहरि की इच्छा से निर्मित उस सभाभवन में बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे, मणिमयी मालाएँ उसमें जाली के रूप में शोभा दे रही थीं, मोतियों की झालरों से वह सुशोभित थी, मण्डलाकार करोड़ों रत्नमय विचित्र दर्पणों से वह सभा मण्डित थी, अनेक प्रकार के रेखाचित्रों से युक्त वह सभा अत्यन्त सुन्दर तथा अद्भुत प्रतीत हो रही थी, पद्मरागमणि से निर्मित वह सभा मणिमय पंकजों से परम सुन्दर प्रतीत हो रही थी, वह स्यमन्तकमणि से बनी हुई सौ सीढ़ियों से युक्त थी, वहाँ दिव्य चन्दन वृक्ष के सुन्दर पल्लव रेशम के सूत्रों से बँधे वन्दनवार के रूप में शोभा दे रहे थे, वह मनोहर सभा उत्तम कोटि के इन्द्रनीलमणि से निर्मित खम्भों से आवृत थी, वह उत्तम रत्नों से निर्मित अनेक कलशों से युक्त थी, पारिजात – पुष्पों की माला- पंक्तियों से तथा कस्तूरी और कुमकुम से रंजित सुगन्धित चन्दन के वृक्षों से वह सभा सुसज्जित थी, वह सर्वत्र सुगन्धित वासे सुरभित थी, बहुत-सी विद्याधरियों के नृत्य से उस सभा की शोभा बढ़ रही थी, वह सभा एक हजार योजन विस्तार वाली थी और बहुत से सेवकों से व्याप्त थी ॥ ५२-६१ ॥

देवताओं सहित ब्रह्मा तथा शिव ने सभा के मध्य भाग में विराजमान श्रीहरि को तारों से घिरे चन्द्रमा के समान देखा । वे बहुमूल्य रत्नों से निर्मित अद्भुत सिंहासन पर विराजमान थे । वे किरीट, कुण्डल तथा वनमाला से सुशोभित थे। उनके सम्पूर्ण अंग चन्दन से अनुलिप्त थे । वे अपने हाथ में लीला – कमल धारण किये हुए थे । वे प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए अपने सामने नृत्य – ‍गीत आदि का अवलोकन कर रहे थे । उन सरस्वतीकान्त भगवान् श्रीहरि का विग्रह शान्त था, लक्ष्मीजी उनके चरणकमल पकड़े हुए उनकी सेवामें संलग्न थीं और लक्ष्मीजी के द्वारा दिये गये सुवासित ताम्बूल का वे सेवन कर रहे थे । भगवती गंगा परम भक्ति के साथ श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रही थीं। वहाँ उपस्थित सभी लोग भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ ६२-६६ ॥ [हे नारद!] ऐसे उन विशिष्ट परिपूर्णतम भगवान् श्रीहरि को देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवता प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे। उस समय उनके सभी अंग पुलकित हो गये थे, आँखों में आँसू भर आये थे और वाणी गद्गद हो गयी थी । वे सभी भक्त परम भक्ति के साथ अपने कन्धे झुकाये भयभीत होकर उनके समक्ष खड़े होकर स्तुति कर रहे थे इसके बाद जगत् की रचना करने वाले ब्रह्माजी ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान् श्रीहरि के सामने विनम्रतापूर्वक सारा वृत्तान्त निवेदित कर दिया ॥ ६७-६९ ॥ उनकी यह बात सुनकर सभी अभिप्रायों को समझने वाले सर्वज्ञ श्रीहरि ने ब्रह्माजी से हँसकर मन को मुग्ध करने वाला एक अद्भुत रहस्य कहना आरम्भ किया ॥ ७० ॥

श्रीभगवान् बोले — हे पद्मज ! यह महान् तेजस्वी शंखचूड़ पूर्वजन्म में एक गोप था और मेरा परम भक्त था, मैं इसका सभी वृत्तान्त जानता हूँ । अब आप पुरातन इतिहास के रूप में निबद्ध उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनिये । गोलोक से सम्बन्ध रखने वाला यह चरित पापों का नाश करने वाला तथा पुण्य प्रदान करने वाला है ॥ ७१-७२ ॥ सुदामा नामक एक गोप मेरा प्रधान पार्षद था । राधिका के दारुण शाप के कारण उसे दानवयोनि में जन्म लेना पड़ा ॥ ७३ ॥

एक बार मैं अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय श्रेष्ठ विरजा को साथ में लेकर अपने निवास स्थान से रासमण्डल में गया था ॥ ७४ ॥ ‘मैं विरजा के साथ रासमण्डल में गया हूँ’– परिचारिका के मुख से ऐसा सुनकर कुपित हो राधिका वहाँ आ गयीं, किंतु उसने मुझे वहाँ नहीं देखा । बाद में मेरे अन्तर्धान होने तथा विरजा के नदीरूप में परिणत हो जाने का समाचार सुनकर राधा अपनी सखियों के साथ फिर अपने भवन चली गयीं ॥ ७५-७६ ॥ उस भवन में सुदामा के साथ मौन तथा स्थिरचित्त होकर मुझे बैठा हुआ देखकर देवी राधा ने मेरी बहुत भर्त्सना की ॥ ७७ ॥ उसे सुनकर सुदामा सहन नहीं कर सका और उन पर कुपित हो गया । उसने मेरे सामने ही राधा को क्रोध के साथ बहुत फटकारा ॥ ७८ ॥उसकी बात सुनकर राधिका क्रोधित हो उठीं और उनकी आँखें रक्तकमल के समान लाल हो गयीं ।  उन्होंने तत्काल भयभीत सुदामा को मेरी सभा से बाहर निकाल देने का आदेश दिया ॥ ७९ ॥

[ आज्ञा पाते ही] प्रबल तेज से सम्पन्न तथा दुर्निवार्य सखियों का समूह उठ खड़ा हुआ और उसे शीघ्र ही सभा से बाहर कर दिया। उस समय वह सुदामा बार-बार कुछ बोलता जा रहा था ॥ ८० ॥ इस तरह उन सखियों से सुदामा के विवाद करने के कारण राधा और भी कुपित हो उठीं और उन्होंने कुपित होकर शाप दे दिया ‘तुम दानवयोनि में जन्म प्राप्त करो’। ऐसा दारुण वचन कहा था ॥ ८१ ॥ तदनन्तर सुदामा मुझे प्रणाम करके रोता हुआ तथा सखियों को कोसता हुआ सभाभवन से बाहर जाने लगा, तब करुणामयी राधा ने कृपावश उसके ऊपर फिर प्रसन्न होकर उसे रोक लिया और रोते हुए कहा ‘ हे वत्स ! ठहरो, मत जाओ । कहाँ जा रहे हो ?’ – ऐसा बार – बार कहती हुई वे राधा व्याकुल होकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ीं ॥ ८२-८३ ॥

यह देखकर सभी गोपी और गोप अत्यन्त दुःखी होकर रोने लगे। तब मैंने राधिका को तथा उन सभी को समझाया कि शाप का पालन करके वह सुदामा आधे क्षण में ही वापस आ जायगा । हे सुदामन् ! तुम यहाँ अवश्य आ जाना –  ऐसा कहकर मैंने राधा को शान्त किया ॥ ८४-८५ ॥

हे सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने वाले ब्रह्मन् ! गोलोक के आधे क्षण में ही पृथ्वी लोक पर एक मन्वन्तर का समय व्यतीत हो जाता है; यह बात बिलकुल सत्य है । इस प्रकार यह सब कुछ पूर्वनिश्चित व्यवस्था के अनुसार ही हो रहा है। अतः सम्पूर्ण मायाओं का पूर्ण ज्ञाता, महान् बलशाली तथा योगेश्वर शंखचूड़ समय आने पर पुन: उसी गोलोक में वापस चला जायगा ॥ ८६-८७ ॥ अब आप लोग मेरा त्रिशूल लेकर शीघ्र भारतवर्ष में चलें और वहाँ पर शंकरजी मेरे त्रिशूल से उस राक्षस का संहार करें ॥ ८८ ॥ वह दानव शंखचूड़ अपने कण्ठ में मेरा सर्वमंगलकारी कवच निरन्तर धारण किये रहता है। इसी से वह सदा संसार – विजयी बना हुआ है ॥ ८९ ॥ हे ब्रह्मन्! उसके कण्ठ में उस कवच के रहते उसे मारने में कोई प्राणी समर्थ नहीं है । अतः मैं ही ब्राह्मण का रूप धारणकर उससे कवच की याचना करूँगा ॥ ९० ॥ जिस समय उसकी पत्नी का सतीत्व नष्ट होगा, उसी समय उसकी मृत्यु होगी ऐसा आपने उसे वर भी दे रखा है ॥ ९१ ॥ इसके लिये मैं अवश्य ही उसकी पत्नी के उदर में अपना तेज स्थापित करूँगा, जिससे उसी क्षण उस शंखचूड़ की मृत्यु हो जायगी; इसमें सन्देह नहीं है । तब उसकी पत्नी अपना शरीर त्यागकर पुन: मेरी प्रिया बन जायगी ॥ ९२१/२

ऐसा कहकर जगत् के स्वामी भगवान् श्रीहरि ने शंकरजी को त्रिशूल दे दिया और त्रिशूल देकर वे श्रीहरि प्रसन्नतापूर्वक तत्काल अन्तः पुर में चले गये। इसके बाद सभी देवताओं ने ब्रह्मा तथा शंकरजी को आगे करके भारतवर्ष के लिये प्रस्थान किया ॥ ९३-९४ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘शंखचूड़ के साथ तुलसी के संगम का वर्णन’ नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥

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