May 24, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-20 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-विंशोऽध्यायः बीसवाँ अध्याय पुष्पदन्त का शंखचूड़ के पास जाकर भगवान् शंकर का सन्देश सुनाना, युद्ध की बात सुनकर तुलसी का सन्तप्त होना और शंखचूड़ का उसे ज्ञानोपदेश देना शङ्खचूडेन सह देवानां सङ्ग्रामोद्योगवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [हे नारद!] उस दानव के संहारकार्य में शिवजी को नियुक्तकर ब्रह्माजी तत्काल अपने स्थान पर चले गये और अन्य देवता भी अपने- अपने स्थान के लिये प्रस्थित हो गये ॥ १ ॥ तदनन्तर महादेवजी देवताओं के अभ्युदय के उद्देश्य से चन्द्रभागानदी के तट पर एक मनोहर वटवृक्ष के नीचे आसीन हो गये ॥ २ ॥ उन्होंने अपने अत्यन्त प्रिय गन्धर्वराज चित्ररथ (पुष्पदन्त)-को दूत बनाकर तुरन्त प्रसन्नतापूर्वक शंखचूड़ के पास भेजा ॥ ३ ॥ सर्वेश्वर शिव की आज्ञा पाकर चित्ररथ तत्काल शंखचूड़ के उत्तम नगर में गया, जो इन्द्रपुरी से भी उत्कृष्ट तथा कुबेर के भवन से भी अधिक सुन्दर था ॥ ४ ॥ वह नगर पाँच योजन चौड़ा तथा उससे दुगुना लम्बा था । वह स्फटिक के आकार वाली मणियों से निर्मित था तथा उसके चारों ओर अनेक वाहन स्थित थे । वह नगर सात दुर्गम खाइयों से युक्त था । प्रज्वलित अग्नि के समान निरन्तर चमकने वाले करोड़ों रत्नों से उसका निर्माण किया गया था। वह नगर सैकड़ों वीथियों तथा मणिमय विचित्र वेदियों से सम्पन्न था। वह व्यापारियों के बड़े- बड़े महलों से आवृत था, जिनमें अनेक प्रकार की सामग्रियाँ विराजमान थीं। उसी प्रकार वह नगर सिन्दूर के समान लाल मणियों द्वारा निर्मित विचित्र, सुन्दर तथा दिव्य करोड़ों आश्रमों से सुशोभित था ॥ ५–८ ॥ हे मुने! नगर में पहुँचकर पुष्पदन्त ने उसके मध्य में स्थित शंखचूड़ का श्रेष्ठ भवन देखा, जो पूर्णचन्द्र- मण्डल की भाँति पूर्णतः वलयाकार था, प्रज्वलित अग्नि की लपटों के समान प्रतीत होने वाली चार परिखाओं से सुरक्षित था, शत्रुओं के लिये अत्यन्त दुर्गम था, किंतु दूसरे लोगों के लिये सुगम एवं सुखप्रद था, अत्यन्त ऊँचाई वाले गगनस्पर्शी मणि- निर्मित कंगूरों से सुशोभित था, द्वारपालों से युक्त बारह द्वारों से सुसज्जित था और सर्वोत्कृष्ट मणियों से निर्मित लाखों मन्दिरों, सोपानों तथा रत्नमय खम्भों से मण्डित था ॥ ९–१२ ॥ उसे देखकर पुष्पदन्त ने एक दूसरा प्रधान द्वार देखा। उस द्वार पर सुरक्षा हेतु नियुक्त एक पुरुष हाथ में त्रिशूल धारण किये मुसकराता हुआ वहाँ स्थित था। पुष्पदन्त ने पीली आँखों वाले तथा ताम्र वर्ण के शरीर वाले उस भयंकर पुरुष से सारी बातें बतायीं और फिर उसकी आज्ञा से वह आगे बढ़ा। उस द्वार को पार करके वह भीतर चला गया । यह युद्ध का सन्देश देने वाला दूत है — यह जानकर कोई उसे रोकता भी नहीं था ॥ १३–१५ ॥ भीतरी द्वार पर पहुँचकर उसने द्वारपाल से कहा — युद्ध का सम्पूर्ण वृत्तान्त [ राजा को ] बता दो, इसमें विलम्ब मत करो। उस द्वारपाल से ऐसा कहकर वह दूत [ पुष्पदन्त ] स्वयं जाने के लिये बोला । वहाँ जाकर उसने राजमण्डली के मध्य में स्वर्ण के सिंहासन पर बैठे हुए परम मनोहर शंखचूड़ को देखा। उस दिव्य सिंहासन में सर्वोत्तम मणियाँ जड़ी थीं, वह रत्नमय दण्डों से युक्त था, वह रत्ननिर्मित कृत्रिम तथा उच्च कोटि के पुष्पों से सदा सुशोभित था, एक सेवक शंखचूड के सिर के ऊपर स्वर्ण का मनोहर छत्र लगाये खड़ा था, सुन्दर तथा श्वेत चँवर डुलाते हुए पार्षदगण उसकी सेवामें संलग्न थे, सुन्दर वेष धारण करने तथा रत्नमय आभूषणों से अलंकृत होने के कारण वह रमणीय प्रतीत हो रहा था । हे मुने ! वह माला पहने था, शरीर में चन्दन का लेप किये हुआ था और दो महीन तथा सुन्दर वस्त्र धारण किये हुआ था। वह शंखचूड़ सुन्दर वेष धारण करने वाले तीन करोड़ दानवेन्द्रों से घिरा हुआ था । इसी प्रकार हाथ में अस्त्र धारण किये हुए सैकड़ों करोड़ अन्य दानव भी उसके चारों ओर इधर-उधर घूम रहे थे । इस प्रकार के उस शंखचूड़ को देखकर परम विस्मय को प्राप्त उस पुष्पदन्त ने शंकरजी के द्वारा जो युद्धविषयक समाचार कहा गया था, उसे बताना आरम्भ किया ॥ १६–२२३ ॥ पुष्पदन्त बोला — हे राजेन्द्र ! हे प्रभो ! मैं शंकरजीका सेवक हूँ, मेरा नाम पुष्पदन्त है | शंकरजी ने जो कुछ कहा है, मैं वही कह रहा हूँ, आप सुनिये — अब आप देवताओं का राज्य तथा अधिकार लौटा दीजिये; क्योंकि वे देवता देवेश श्रेष्ठ श्रीहरि की शरण में गये थे । उन श्रीहरि ने अपना त्रिशूल देकर आपके विनाशार्थ शिवजी को भेजा है। वे त्रिलोचन शिव इस समय भद्रशीला नदी के तट पर वटवृक्ष के नीचे विराजमान हैं। अतः आप उन देवताओं का राज्य लौटा दीजिये अथवा युद्ध कीजिये। अब आप मुझे यह भी बता दीजिये कि मैं शिवजी के पास जाकर उनसे क्या कहूँ? ॥ २३–२६१/२ ॥ [ हे नारद!] दूत की बात सुनकर शंखचूड़ ने हँसकर कहा — ‘तुम चलो, मैं प्रातःकाल वहाँ पहुँचूँगा’ ॥ २७१/२ ॥ तदनन्तर पुष्पदन्त ने वटवृक्ष के नीचे विराजमान परमेश्वर शिव के पास पहुँचकर शंखचूड़ के मुख से कही गयी वह बात ज्यों-की-त्यों उनसे कह दी ॥ २८१/२ ॥ इतने में ही कार्तिकेयजी भगवान् शंकर के पास आ गये । वीरभद्र, नन्दी, महाकाल, सुभद्र, विशालाक्ष, बाण, पिंगलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र, बाष्कल, कपिलाख्य, दीर्घदंष्ट्र, विकट, ताम्रलोचन, कालकण्ठ, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, बलोन्मत्त, रणश्लाघी, दुर्जय, दुर्गम तथा जो आठ भैरव, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और बारह आदित्य कहे गये हैं — वे सब, अग्नि, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनीकुमार, कुबेर, यमराज, जयन्त, नलकूबर, वायु, वरुण, बुध, मंगल, धर्म, शनि, ईशान तथा ओजस्वी कामदेव भी वहाँ आ गये ॥ २९–३५ ॥ उग्रद्रंष्ट्रा, उग्रचण्डा, कोटरा तथा कैटभी आदि देवियाँ भी वहाँ पहुँच गयीं। इसी प्रकार आठ भुजाएँ धारण करने वाली तथा भय उत्पन्न करने वाली साक्षात् भगवती भद्रकाली भी वहाँ पहुँच गयीं । वे सर्वोत्तम रत्नों से निर्मित विमान पर विराजमान थीं । वे लाल वस्त्र तथा लाल पुष्पों की माला धारण किये थीं और लाल चन्दन से अनुलिप्त थीं । वे प्रसन्नतापूर्वक नाचती, हँसती तथा मधुर स्वर में गाती हुई सुशोभित हो रही थीं। वे देवी अभया भक्तों को अभय तथा शत्रुओं को भय प्रदान करती हैं। वे योजनभर लम्बी तथा लपलपाती हुई भयंकर जीभ, शंख, चक्र, गदा, पद्म, खड्ग, ढाल, धनुष, बाण, एक योजन विस्तृत वर्तुलाकार गम्भीर खप्पर, आकाश को छूता हुआ विशाल त्रिशूल, एक योजन लम्बी शक्ति, मुद्गर, मुसल, वज्र, खेटक, प्रकाशमान फलक, वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, गन्धर्वास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गरुडास्त्र, पर्जन्यास्त्र, पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पर्वतास्त्र, माहेश्वरास्त्र, वायव्यास्त्र, सम्मोहन दण्ड, दिव्य अमोघ अस्त्र तथा दिव्य श्रेष्ठ सैकड़ों अस्त्र धारणकर तीन करोड़ योगिनियों और तीन करोड़ भयंकर डाकिनियों को साथ लिये वहाँ आकर विराजमान हो गयीं ॥ ३६–४४ ॥ भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, बेताल, राक्षस, यक्ष और किन्नर भी वहाँ उपस्थित हो गये । उन सभी देवियों [ तथा अन्य देवगणों ] – को साथ लेकर कार्तिकेय अपने पिता शिव को प्रणाम करके सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से उनकी आज्ञा से उनके पास बैठ गये ॥ ४५-४६ ॥ इधर, दूत के चले जाने पर प्रतापी शंखचूड़ ने अन्तःपुर में जाकर तुलसी को सारी बात बतायी ॥ ४७ ॥ युद्ध की बात सुनकर उस तुलसी के कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये और वह साध्वी तुलसी दुःखी मन से मधुर वाणी में कहने लगी ॥ ४८ ॥ तुलसी बोली — हे प्राणबन्धो ! हे नाथ ! हे प्राणेश्वर ! मेरे वक्षःस्थल पर क्षणभर के लिये विराजिये । हे प्राणाधिष्ठातृदेव ! क्षणभर मेरे प्राणों की रक्षा कीजिये । मैं क्षणभर अपने नेत्रों से आदरपूर्वक आपको देख लूँ और यह जन्म पाकर आप मेरे मन में विहार की जो अभिलाषा है, उसे पूर्ण कीजिये । आज ही रात्रि के अन्त में मैंने एक दुःस्वप्न देखा है, जिससे मेरे प्राण काँप रहे हैं और मन में लगातार जलन हो रही है ॥ ४९–५१ ॥ तुलसी की बात सुनकर परम ज्ञानसम्पन्न राजेन्द्र शंखचूड भोजन – पानादि से निवृत्त होकर तुलसी से हितकर, सत्य तथा यथोचित वचन कहने लगा ॥ ५२ ॥ शंखचूड़ बोला — कल्याण, हर्ष, सुख, दुःख, भय, शोक और मंगल — ये समस्त कर्मभोग के बन्धन काल के साथ बँधे हुए हैं ॥ ५३ ॥ समय से ही वृक्ष उगते हैं, समय से ही उनमें शाखाएँ निकलती हैं और फिर क्रमशः पुष्प तथा फल भी उनमें कालानुसार ही लगते हैं । तत्पश्चात् उन वृक्षों के फल भी समय से ही पकते हैं । अन्त में फलयुक्त वे सभी वृक्ष समयानुसार नष्ट भी हो जाते हैं ॥ ५४-५५ ॥ हे सुन्दरि ! समय से विश्व बनते हैं और समय पर नष्ट हो जाते हैं । काल की प्रेरणा से ही ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और विश्व के संहारक शम्भु संहार करते हैं। वे सब क्रमशः कालानुसार ही अपने-अपने कार्य में नियुक्त होते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओं की नियामिका वे पराप्रकृति ही हैं । वही परमेश्वर सृष्टि, रक्षा तथा संहार करने वाला है और वही परमात्मा काल को नचाने वाला है। उन्हीं प्रभु ने समयानुसार इच्छा-पूर्वक अपने से अभिन्न प्रकृति का निर्माणकर विश्व में रहने वाले समस्त स्थावर-जंगम जीवों की रचना की है । वे ही सबके ईश्वर हैं, सभी रूपों में वे ही विद्यमान हैं, वे ही सबकी आत्मा हैं और वे ही परम ईश्वर हैं ॥ ५६–५९ ॥ जो जन से जन की उत्पत्ति करता है, जन से जन की रक्षा करता है और जन से जन का संहार करता है, उन्हीं प्रभु की अब तुम उपासना करो ॥ ६० ॥ जिनकी आज्ञा से शीघ्रगामी पवनदेव प्रवाहित होते हैं, सूर्य यथासमय तपते हैं, इन्द्र समयानुसार वृष्टि करते हैं, मृत्यु सभी जीवों में विचरण करती है, अग्निदेव यथासमय दाह उत्पन्न करते हैं, शीतल चन्द्रमा आकाश में परिभ्रमण करते हैं — उन्हीं मृत्यु के भी मृत्यु, काल के भी काल, यमराज से भी बड़े यमराज, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के भी स्रष्टा, जगत् में माता की माता, संहार करने वाले शिव के भी संहर्ता परमप्रभु परमेश्वर की शरण में जाओ । हे प्रिये ! इस जगत् में कौन किसका बन्धु है; अतः सभी प्राणियों के बन्धुस्वरूप उन प्रभु की उपासना करो ॥ ६१-६४ ॥ मैं कौन हूँ और तुम कौन हो ? ब्रह्मा ने पहले मुझे तुम्हारे साथ संयुक्त कर दिया और फिर उन्हीं के द्वारा कर्मानुसार वियुक्त भी कर दिया जाऊँगा । शोक तथा विपत्ति में अज्ञानी मनुष्य भयभीत होता है, न कि विद्वान् । इस प्रकार मनुष्य कालचक्र क्रम से सुख तथा दुःख के चक्र में भ्रमण करता रहता है ॥ ६५-६६ ॥ अब तुम निश्चय ही सर्वेश्वर भगवान् नारायण को पतिरूप में प्राप्त करोगी, जिनके लिये तुमने पूर्वकाल में बदरिकाश्रम में रहकर तप किया था ॥ ६७ ॥ तपस्या तथा ब्रह्माजी के वरदान से तुम मुझे प्राप्त हुई हो । हे कामिनि ! उस समय जो तुम्हारी तपस्या थी, वह भगवान् श्रीहरि की प्राप्ति के लिये थी, अतः तुम उन्हीं गोविन्द श्रीहरि को गोलोक – स्थित वृन्दावन में प्राप्त करोगी। मैं भी अपना यह दानवी शरीर त्यागकर उसी लोक में चलूँगा, तब वहीं पर तुम मुझे देखोगी और मैं तुम्हें देखूँगा । हे प्रिये ! सुनो इस समय मैं राधिका के शाप से ही अगम तथा अत्यन्त दुर्लभ इस भारतवर्ष में आया हूँ और वहीं पर पुनः चला जाऊँगा, अतः मेरे लिये शोक क्या ? हे कान्ते ! तुम भी शीघ्र ही इस शरीर का त्यागकर दिव्य रूप धारण करके उन्हीं श्रीहरि को पतिरूप में प्राप्त करोगी, अतः दुःखी मत होओ ॥ ६८-७११/२ ॥ यह कहकर वह शंखचूड़ सायंकाल होने पर उस तुलसी के साथ पुष्प तथा चन्दन से चर्चित सुन्दर शय्या पर सो गया और अनेकविध विलास करने लगा। रत्न के दीपकों से सुशोभित अपने रत्नमय भवन में स्त्रीरत्नस्वरूपिणी सुन्दरी को पाकर राजा शंखचूड़ ने मांगलिक आमोद-प्रमोदों के द्वारा रात्रि व्यतीत की । तत्पश्चात् अत्यन्त दुःखित होकर रोती हुई, निराहार रहने के कारण कृश शरीरवाली तथा शोक – सागर में निमग्न अपनी उस प्रिया तुलसी को अपने वक्षःसे लगाकर वह ज्ञानसम्पन्न शंखचूड़ दिव्यज्ञान के द्वारा उसे पुनः समझाने लगा। प्राचीनकाल में भांडीरवन में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने जिस उत्तम, सभी शोकों को दूर करने वाले परम ज्ञान का उपदेश उसके लिये किया था, उसी सम्पूर्ण ज्ञान को शंखचूड़ ने उस तुलसी को प्रदान किया । ज्ञान पाकर देवी तुलसी का मुख तथा नेत्र प्रसन्नता से खिल उठा । ‘सब कुछ नश्वर है’ – ऐसा मानकर वह हर्षपूर्वक विहार करने लगी ॥ ७२–७७१/२ ॥ हे मुने! विहार करते हुए वे दोनों पति-पत्नी सुखके सागर में निमग्न हो गये । रतिक्रीडा के लिये उत्सुक वे दोनों निर्जन स्थान में परस्पर अंग-प्रत्यंग के स्पर्श से मूर्च्छित – जैसे हो गये । उस समय अत्यन्त प्रसन्नचित्त उन दोनों के सभी अंग पुलकित थे । वे दोनों एक अंग के रूप में होकर अर्धनारीश्वर के समान प्रतीत हो रहे थे । तुलसी अपने पति को प्राणों से भी अधिक प्रिय समझती थी और राजा शंखचूड़ भी अपनी उस साध्वी प्राणेश्वरी को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय समझता था । समान सौन्दर्य वाले वे दोनों ही तन्द्रायुक्त दम्पती सुखपूर्वक सोये हुए थे । सुन्दर वेष धारण किये हुए वे मनोहर दम्पती सम्भोगजनित सुख के कारण अचेत पड़े थे। जब कभी वे चेतना में आते, तब परस्पर रसमयी बातें करने लगते तथा मनोरम और दिव्य कथा कहने लगते, फिर हँसने लगते थे, इसके बाद क्षणभ रमें ही शृंगार भाव से युक्त होकर क्रीडा करने लगते थे। इस प्रकार कामकला के जानने वाले वे दोनों क्रीडा – विलास से कभी भी विरत नहीं होते थे। दोनों ही निरन्तर विजयी बने रहकर कभी क्षणभर को भी अपने को पराजित नहीं मानते थे ॥ ७८–८४ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘नारायण-नारद- संवाद में शंखचूड़ के साथ देवताओं का संग्रामोद्योगवर्णन’ नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ Content is available only for registered users. 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