अग्निपुराण — अध्याय 363
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय
भूमि, वनौषधि आदि वर्ग
भूमिवनौषध्यादिवर्गाः

अग्निदेव कहते हैं — अब मैं भूमि, पुर, पर्वत, वनौषधि तथा सिंह आदि वर्गों का वर्णन करूँगा । भू, अनन्ता, क्षमा, धात्री, क्ष्मा, कु तथा धरित्री — ये भूमि के नाम हैं। मृत् और मृत्तिका — ये मिट्टी का बोध कराने वाले है। अच्छी मिट्टी को मृत्स्ना और मृत्सा कहते हैं । जगत्, त्रिविष्टप, लोक, भुवन और जगती — ये सब समानार्थ हैं । ( अर्थात् ये सभी संसार के पर्यायवाची शब्द हैं ।) अयन, वर्त्म (वर्त्मन्), मार्ग, अध्व (अध्वन्), पन्था (पथिन्) पदवी, सृति, सरणि, पद्धति, पद्या, वर्तनी और एकपदी — ये मार्ग के वाचक हैं (इनमें से पद्या और एकपदी शब्द पगडंडी के अर्थ में आते हैं ।) पूः (स्त्रीलिङ्ग ‘पुर्’ शब्द), पुरी, नगरी, पत्तन, पुटभेदन, स्थानीय और निगम — ये सात नगर के नाम हैं। मूल नगर (राजधानी) — से भिन्न जो पुर होता है, उसे शाखानगर कहते हैं । वेश्याओं के निवास स्थान का नाम वेश और वेश्याजनसमाश्रय है । आपण, शब्द निषद्या ( बाजार, हाट, दूकान ) — के अर्थ में आता है । विपणि और पण्यवीथिका — ये दो बाजार की गली के नाम हैं । रथ्या, प्रतोली और विशिखा — ये शब्द गली तथा नगर के मुख्यमार्ग का बोध कराने वाले हैं। खाईं से निकालकर जमा किये हुए मिट्टी के ढेर को चय और वप्र कहते हैं । वप्र शब्द का केवल स्त्रीलिङ्ग में प्रयोग नहीं होता । प्राकार, वरण, शाल और प्राचीर — ये नगर के चारों ओर बने हुए घेरे (चहारदिवारी) — के नाम हैं ।’ भित्ति और कुड्य — ये दीवार के वाचक हैं। इनमें ‘भित्ति’ शब्द स्त्रीलिङ्ग है । एडूक ऐसी दीवार को कहते हैं, जिसके भीतर हड्डी लगायी गयी हो । वास और कुटी पर्यायवाचक हैं । इनमें कुटी शब्द स्त्रीलिङ्ग है तथा कुट शब्द के रूप में इसका पुंल्लिङ्ग में भी प्रयोग है। इसी प्रकार शाला और सभा पर्यायवाचक हैं। चार शालाओं से युक्त गृह को संजवन कहते हैं । मुनियों की कुटी का नाम पर्णशाला और उटज है । उटज शब्द का प्रयोग पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग — दोनों में होता है । चैत्य और आयतन – ये दोनों शब्द समान अर्थ और समान लिङ्ग वाले हैं । (ये यज्ञस्थान, वृक्ष तथा मन्दिर के अर्थ में आते हैं ।) वाजिशाला और मन्दुरा — ये घोड़ों के रहने की जगह के नाम हैं । साधारण धनियों के महल के नाम हर्म्य आदि हैं तथा देवताओं और राजाओं के महल को प्रासाद (मन्दिर) कहते हैं । द्वार्, द्वार और प्रतीहार — ये दरवाजे के नाम हैं । आँगन आदि में बैठने के लिये बने हुए चबूतरे को वितर्दि एवं वेदिका कहते हैं। कबूतरों (तथा अन्य पक्षियों ) — के रहने के लिये बने हुए स्थान को कपोतपालिका और विटङ्क कहते हैं । ‘विटङ्क’ शब्द पुंल्लिङ्ग और नपुंसक दोनों लिङ्गों में प्रयुक्त होता है। कपाट और अवर — ये दोनों समान लिङ्ग और समान अर्थ में आते हैं । इनका अर्थ है — किंवाड़ । निःश्रेणि और अधिरोहणी — ये सीढ़ी के नाम हैं । सम्मार्जनी और शोधनी — ये दोनों शब्द झाडु के अर्थ में आते हैं। संकर तथा अवकर झाड़ू से फेंकी जाने वाली धूल के नाम हैं। अद्रि, गोत्र, गिरि और ग्रावा — ये पर्वत के तथा गहन, कानन और वन — ये जंगल के बोधक हैं । कृत्रिम ( लगाये हुए) वन अर्थात् वृक्ष — समूह को आराम तथा उपवन कहते हैं । यही कृत्रिम वन, जो केवल राजासहित अन्तः पुर की रानियों के उपभोग में आता है, ‘प्रमदवन’ कहलाता है । वीथी, आलि, आवलि, पङ्कि, श्रेणी, लेखा और राजि — ये सभी शब्द पङ्क्ति (कतार ) — के अर्थ में आते हैं। जिसमें फूल लगकर फल लगते हों, उस वृक्ष का नाम ‘वानस्पत्य’ होता है तथा जिसमें बिना फूल के ही फल लगते हैं, उस गूलर (आदि) वृक्ष को ‘वनस्पति’ कहते हैं ॥ १–१३ ॥

फलों के पकने पर जिनके पेड़ सूख जाते हैं, उन धान — जौ आदि अनाजों को ‘ओषधि’ कहा जाता है । पलाशी, द्रु, द्रुम और अगम — ये सभी शब्द वृक्ष के अर्थ में आते हैं। स्थाणु, ध्रुव तथा शङ्कु — ये तीन ठूंठ वृक्ष के नाम हैं । इनमें स्थाणु शब्द वैकल्पिक पुंल्लिङ्ग है । अर्थात् उसका प्रयोग पुँल्लिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग – दोनों में होता है । प्रफुल्ल, उत्फुल्ल और संस्फुट — ये फूल से भरे हुए वृक्ष के लिये प्रयुक्त होते हैं । पलाश, छदन और पर्ण — ये पत्ते के नाम हैं । इध्म, एधस् और समिध् — ये समिधा ( यज्ञकाष्ठ) — के वाचक हैं। इनमें समिध् शब्द स्त्रीलिङ्ग है । बोधिद्रुम और चलदल — ये पीपल के नाम हैं । दधित्थ, ग्राही, मन्मथ, दधिफल, पुष्पफल और दन्तशठ — ये कपित्थ (कैथ) नामक वृक्ष का बोध कराने वाले हैं । हेमदुग्ध शब्द उदुम्बर ( गूलर) — के और द्विपत्रक शब्द केविदार (कचनार) — के अर्थ में आता है। सप्तपर्ण और विशालत्वक्—ये छितवन के नाम हैं । कृतमाल, सुवर्णक, आरेवत, व्याधिघात, सम्पाक और चतुरङ्गुल — ये सभी शब्द सोनालु अथवा धनबहेड़ा के वाचक हैं । दन्तशठ — शब्द जम्बीर ( जमीरी नीबू ) — के अर्थ में आता है । तिक्तशाक — शब्द वरुण (या वरण) — का वाचक है । पुंनाग, पुरुष, तुङ्ग, केसर तथा देववल्लभ — ये नागकेसर के नाम हैं । पारिभद्र, निम्बतरु, मन्दार और पारिजात — ये बकायन के नाम हैं । वञ्जुल और चित्रकृत — ये तिनिश — नामक वृक्ष के वाचक हैं । पीतन और कपीतन — ये आम्रातक (अमड़ा) — के अर्थ में आते हैं। गुडपुष्प और मधुद्रुम — ये मधूक (महुआ ) — के नाम हैं। पीलु अर्थात् देशी अखरोट को गुडफल और स्रंसी कहते हैं। नादेयी और अम्बुबेतस् — ये पानी में पैदा हुए बेंत के नाम हैं । शिग्र, तीक्ष्णगन्धक, काक्षीर और मोचक – ये शोभाञ्जन अर्थात् सहिजन के नाम हैं। लाल फूल वाले सहिजन को मधुशिग्रु कहते हैं । अरिष्ट और फेनिल — ये दोनों समान लिङ्ग वाले शब्द रीठे के अर्थ में आते हैं । गालव, शाबर, लोध्र, तिरीट, तिल्व और मार्जन — ये लोध के वाचक हैं । शेलु, श्लेष्मातक, शीत, उद्दाल और बहुवारक — ये लसोड़े के नाम हैं । वैकङ्कत, श्रुवावृक्ष, ग्रन्थिल और व्याघ्रपाल — ये वृक्षविशेष के वाचक हैं । ( यह वृक्ष विभिन्न स्थानों पर टैंटी, कठेर और कंटाई आदि नामों से प्रसिद्ध है ।) तिन्दुक, स्फूर्जक और काल ( या कालस्कन्ध ) — ये तेंदू वृक्ष के वाचक हैं । नादेयी और भूमिजम्बुक — ये नागरङ्ग अर्थात् नारंगी के नाम हैं । पीलुक शब्द काकतिन्दुक अर्थात् कुचिला के अर्थ में भी आता है । पाटलि, मोक्ष और मुष्कक — ये मोरवा या पाडल के नाम हैं। क्रमुक और पट्टिका — ये पठानी लोध के वाचक हैं । कुम्भी, कैडर्य और कट्फल — ये कायफल का बोध कराने वाले हैं। वीरवृक्ष, अरुष्कर, अग्निमुखी और भल्लातकी — ये शब्द भिलावा नामक वृक्ष के वाचक हैं । सर्जक, असन, जीव और पीतसाल — ये विजयसार के नाम हैं । सर्ज और अश्वकर्ण — ये साल वृक्ष के वाचक हैं । वीरद्रु ( वीर — तरु), इन्द्रद्रु, ककुभ और अर्जुन — ये अर्जुन नामक वृक्ष के पर्याय हैं। इङ्गुदी तपस्वियों का वृक्ष है; इसीलिये इसे तापस – तरु भी कहते हैं । (कहीं— कहीं यह ‘इंगुवा’ तथा गोंदी वृक्ष के नाम से भी प्रसिद्ध है ।) मोचा और शाल्मलि — ये सेमल के नाम हैं । चिरबिल्व, नक्तमाल, करञ्ज और करञ्जक — ये ‘कंजा’ नामक वृक्ष के अर्थ में आते हैं। (‘करञ्जक’ शब्द भृङ्गराज या भंगरइया का भी वाचक है।) प्रकीर्य और पूतिकरज— ये कँटीले करञ्ज के वाचक हैं । मर्कटी तथा अङ्गार — वल्लरी— ये करञ्ज के ही भेद हैं । रोही, रोहितक, प्लीहशत्रु और दाडिमपुष्पक – ये रोहेड़ा के नाम हैं । गायत्री, बालतनय, खदिर और दन्तधावन – ये खैरा नामक वृक्ष के वाचक हैं । अरिमेद और विट्खदिर — ये दुर्गन्धित खैरा के तथा कदर — यह श्वेत खैरा का नाम है। पञ्चाङ्गुल, वर्धमान, चञ्चु और गन्धर्वहस्तक – ये एरण्ड (रेड़) — के अर्थ में आते हैं । पिण्डीतक और मरुवक —ये मदन (मैनफल) नामक वृक्ष के बोधक हैं । पीतदारु, दारु, देवदारु और पूतिकाष्ठ – ये देवदारु के नाम हैं। श्यामा, महिलाह्वया, लता, गोवन्दिनी, गुन्दा, प्रियङ्गु, फलिनी और फली – ये प्रियंगु (कँगनी या टाँगुन) — के वाचक हैं । मण्डूकपर्ण पत्रोर्ण, कट्वङ्ग, टुण्टुक, श्योनाक, शुकनास, ऋक्ष, दीर्घवृन्त और कुटन्नट — ये शोणक ( सोनापाठा) का बोध कराने वाले हैं । पीतद्रु और सरल — ये सरल वृक्ष के नाम हैं । निचुल, अम्बुज और इज्जल (या हिज्जल) — ये स्थलवेतस् अथवा समुद्र — फल के वाचक हैं। काकोदुम्बरिका और फल्गु — ये कटुम्बरी या कठूमरेके बोधक हैं । अरिष्ट, पिचुमर्दक और सर्वतोभद्र — ये निम्ब— वृक्षके वाचक हैं। शिरीष और कपीतन — ये सिरस वृक्षके अर्थमें आते हैं। वकुल और वञ्जुल — ये मौलिश्री के नाम हैं । ( बञ्जुल शब्द अशोक आदि के अर्थ में आता है ।) पिच्छिला, अगरु और शिंशपा — ये शीशम के अर्थ में आते हैं। नट, जया, जयन्ती और तर्कारी — ये जैत वृक्ष के नाम हैं। कणिका, गणिकारिका, श्रीपर्ण और अग्निमन्थ — ये अरणि के वाचक हैं । (किसी के मत में जया से लेकर अग्निमन्थतक सभी शब्द अरणि के ही पर्याय हैं ।) वत्सक और गिरिमल्लिका— ये कुटज वृक्ष के अर्थ में आते हैं कालस्कन्ध, तमाल और तापिच्छ — ये तमाल के नाम हैं । तण्डुलीय और अल्पमारिष — ये चौंराई के बोधक हैं । सिन्धुवार और निर्गुण्डी— ये सेंदुवारि के नाम हैं । वही सेंदुवारि यदि जंगल में पैदा हुई हो तो उसे आस्फीता ( आस्फोटा या आस्फोता ) कहते हैं । [ किसी-किसी के मत में वनमल्लिका (वन — वेला) — का नाम आस्फोटा या आस्फीता है ।] गणिका, यूथिका और अम्बष्ठा — ये जूही के अर्थ में आते हैं। सप्तला और नवमालिका – ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। अतिमुक्त और पुण्ड्रक— ये माधवी लता के नाम हैं । कुमारी, तरणि और सहा — ये घीकुँआरि के वाचक हैं। लाल घीकुँआरि को कुरबक और पीली घीकुँआरि को कुरण्टक कहते हैं । नीलझिण्टी और बाणा— ये दोनों शब्द नीली कटसरैया के वाचक हैं। इनका पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग — दोनों लिङ्गों में प्रयोग होता है । झिण्टी और सैरीयक — ये सामान्य कटसरैया के वाचक हैं । वही लाल हो तो कुरबक और पीली हो तो सहचरी कहलाती है । यह शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग — दोनों में प्रयुक्त होता है। धूस्तूर ( या धत्तूर ), कितव और धूर्त — ये धतूर के नाम हैं । रुचक और मातुलुङ्ग — ये बीजपूर या बिजौरा नीबू के वाचक हैं । समीरण, मरुवक, प्रस्थपुष्प और फणिज्जक — ये मरुआ वृक्ष के नाम हैं । कुठेरक और पर्णास— ये तुलसी वृक्ष के पर्याय हैं। आस्फीत, वसुक और अर्क— ये आक (मदार ) — के नाम हैं। शिवमल्ली और पाशुपती— ये अगस्त्य वृक्ष अथवा बृहत् मौलसिरी के वाचक हैं। वृन्दा (वन्दा), वृक्षादनी — जीवन्तिका और वृक्षरुहा — ये पेड़ पर पैदा हुई लता के नाम हैं । गुडूची, तन्त्रिका, अमृता, सोमवल्ली और मधुपर्णी — ये गुरुचि वाचक हैं । मूर्वा, मोरटी, मधूलिका, मधुश्रेणी, गोकर्णी तथा पीलुपर्णी — ये मूर्वा नाम वाली लता के नाम हैं । पाठा, अम्बष्ठा, विद्धकर्णी, प्राचीना और वनतिक्तिका — ये पाठा नाम से प्रसिद्ध लता के वाचक हैं । कटु, कटम्भरा, चक्राङ्गी और शकुलादनी — ये कुटकी के नाम हैं। आत्मगुप्ता, प्रावृषायी, कपिकच्छु और मर्कटी — ये केवाँछु के वाचक हैं । अपामार्ग, शैखरिक, प्रत्यक्पर्णी तथा मयूरक — ये अपामार्ग (चिचिड़ा) — का बोध कराने वाले हैं । फञ्जिका ( या हञ्जिका), ब्राह्मणी और भार्गी — ये ब्रह्मनेटि के वाचक हैं । द्रवन्ती, शम्बरी तथा वृषा — ये आखुपर्णी या मूसाकानी के बोधक हैं । मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, समङ्गा और कालमेषिका — ये मजीठ के नाम हैं। रोदनी, कच्छुरा, अनन्ता, समुद्रान्ता और दुरालभा — ये यवासा एवं कचूर के वाचक हैं। पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, कलशि, धावनि और गुहा — ये पिठवन के नाम हैं । निर्दिग्धिका, स्पृशी, व्याघ्री, क्षुद्रा और दुःस्पर्शा — ये भटकटैया (या भजकटया) — के अर्थ में आते हैं। अवल्गुज, सोमराजी, सुवल्लि, सोमवल्लिका, कालमेषी, कृष्णफला, वाकुची और पूतिफली — ये वकुची के वाचक हैं । कणा, उष्णा और उपकुल्या — ये पिप्पली के बोधक हैं। श्रेयसी और गजपिप्पली— ये गजपिप्पली के वाचक हैं। चव्य और चविका — ये चव्य अथवा वचा के नाम हैं। काकचिञ्ची, गुञ्जा और कृष्णला — ये तीन गुञ्जा (घुघुची) — के अर्थ में आते हैं । विश्वा, विषा और प्रतिविषा — ये ‘ अतीस ‘ के बोधक हैं। वनशृङ्गाट और गोक्षुर — ये गोखुरू के वाचक हैं। नारायणी और शतमूली — ये शतावरी का बोध कराने वाले हैं। कालेयक, हरिद्रव, दार्वी, पचम्पचा और दारु— ये दारूहल्दी के नाम हैं। जिसकी जड़ सफेद हो, ऐसी वचा ( बच) — का नाम हैमवती है । वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी और शतपर्विका — ये बच के अर्थ में आते हैं। आस्फोता और गिरिकर्णी — ये दो शब्द विष्णुक्रान्ता या अपराजिता के नाम हैं। सिंहास्य, वासक और वृष—ये अड़से के अर्थ में आते हैं । मिशी, मधुरिका और छत्रा — ये वनसौंफ के वाचक हैं। कोकिलाक्ष, इक्षुर और क्षुर — ये तालमखाना के नाम हैं । विडंग और कृमिघ्न — ये वायविडंग के वाचक हैं । वज्रद्रु, स्रुक्, स्नुही और सुधा — ये सेहुँड़ के अर्थ में आते हैं। मृद्वीका, गोस्तनी और द्राक्षा — ये दाख या मुनक्का के नाम हैं। वला तथा वाट्यालक — ये वरियार के वाचक हैं। काला और मसूरविदला — ये श्यामलता या श्यामत्रिधारा के अर्थ में आते हैं । त्रिपुटा, त्रिवृत्ता और त्रिवृत्त — शुक्ल त्रिधारा के वाचक हैं । मधुक, क्लीतक, यष्टिमधुका और मधुयष्टिका — ये जेठी मधु के नाम हैं । विदारी, क्षीरशुक्ला, इक्षुगन्धा, क्रोष्ट्री और यासिता — ये भूमिकूष्माण्ड के बोधक हैं । गोपी, श्यामा, शारिवा, अनन्ता तथा उत्पल शारिवा — ये श्यामालता अथवा गौरीसर के वाचक हैं । मोचा, रम्भा और कदली— ये केले के नाम हैं। भण्टाकी और दुष्प्रधर्षिणी — ये भाँटे के अर्थ में आते हैं। स्थिरा, ध्रुवा और सालपर्णी — ये सरिवन के नाम हैं। शृङ्गी, ऋषभ और वृष—ये काकड़ासिंगी के वाचक हैं। (यह अष्टवर्ग की प्रसिद्ध ओषधि है ) गाङ्गेरुकी और नागबला — ये बला के भेद हैं । इन्हें हिंदी में गुलसकरी और गंगेरन भी कहते हैं । मुषली और तालमूलिका — ये मूसली के नाम हैं । ज्योत्स्नी, पटोलिका और जाली — ये तरोई के अर्थ में आते हैं। अजशृङ्गी और विषाणी — ये ‘मेडासिंगी ‘के वाचक हैं । लाङ्गलिकी और अग्निशिखा— ये करियारी का बोध कराने वाले हैं । ताम्बूली तथा नागवल्ली — ये ताम्बूल या पान के नाम हैं । हरेणु, रेणिका और कौन्ती — ये रेणुका नामक गन्धद्रव्य के वाचक हैं । ह्रीबेरी और दिव्यनागर—ये नेत्रबाला और सुगन्धबाला के नाम हैं । कालानुसार्य, वृद्ध, अश्मपुष्प, शीतशिव और शैलेय — ये शिलाजीत के वाचक हैं। तालपर्णी, दैत्या, गन्ध, कुटी और मुरा — ये मुरा नामक सुगन्धित द्रव्य का बोध कराने वाले हैं । ग्रन्थिपर्ण, और बर्हि (या बर्ह) — ये गठिवन के अर्थ में शुक आते हैं। बला, त्रिपुटा और त्रुटि — ये छोटी इलायची के वाचक हैं। शिवा और तामलकी— ये भुईं आमला के अर्थ में आते हैं। हनु और हद्दविलासिनी — ये नखी नामक गन्धद्रव्य के बोधक हैं । कुटन्नट, दाशपुर, वानेय और परिपेलव— ये मोथा के नाम हैं । तपस्विनी तथा जटामांसी— ये जटामांसी के अर्थ में आते हैं । पृक्का ( या स्पृक्का), देवी, लता और लघु या (लशू) — ये ‘असवरग ‘ के वाचक हैं | कर्चूरक और द्राविड़क—ये कर्चूर के नाम हैं । गन्धमूली और शठी शब्द भी कचूर के ही अर्थ में आते हैं । ऋक्षगन्धा, छगलान्त्रा, आवेगी तथा वृद्धदारक — ये विधारा के नाम हैं । तुण्डिकेरी, रक्तफला, बिम्बिका और पीलुपर्णी — ये कन्दूरी के वाचक हैं । चाङ्गेरी, चुक्रिका और अम्बष्ठा —ये अम्ललोड़िका (अम्लिलोना ) — के बोधक हैं । स्वर्णक्षीरी और हिमावती — ये मकोय के नाम हैं सहस्रवेधी, चुक्र, अम्लवेतस और शतवेधी — ये अम्लबेंत के अर्थ में आते हैं । जीवन्ती, जीवनी और जीवा — ये जीवन्ती के नाम हैं। भूमिनिम्ब और किरातक — ये चिरातिक्त या चिरायता के वाचक हैं । कूर्चशीर्ष और मधुरक— ये अष्टवर्गान्तक ‘जीवक’ नामक ओषधि के बोधक हैं । चन्द्र और कपिवृक— ये समानार्थक शब्द हैं । ( चन्द्रशब्द कर्पूर और काम्पिल्य आदि अर्थोंमें आता है ।) दद्रुघ्न और एडगज — ये चकवड़ नामक वृक्ष के वाचक हैं । वर्षाभू और शोथहारिणी — ये गदहपुर्ना के अर्थ में आते हैं। कुनन्दती, निकुम्भस्त्रा, यमानी और वार्षिका —ये लताविशेष के वाचक हैं । लशुन, गृञ्जन, अरिष्ट, महाकंद और रसोन — ये लहसुन के नाम हैं । वाराही, वरदा ( या वदरा) तथा गृष्टि — ये वराहीकंद के वाचक हैं। काकमाची और वायसी — ये समानार्थ शब्द हैं। शतपुष्पा, सितच्छत्रा, अतिच्छत्रा, मधुरामिसि, अवाकपुष्पी और कारवी — ये सौंफ के नाम हैं। सरणा, प्रसारिणी, कटम्भरा और भद्रवला — ये कुब्जप्रसारिणी नामक ओषधि के वाचक हैं। कर्पूर और शटी — ये भी कचूर के अर्थ में आते हैं। पटोल, कुलक, तिक्तक और पटु — ये परवल के नाम हैं। कारवेल्ल और कटिल्लक — ये करैला के अर्थ में आते हैं। कूष्माण्डक और कर्कारु — ये कोहड़ा के वाचक हैं। उर्वारु और कर्कटी — ये दोनों स्त्रीलिङ्ग शब्द ककड़ी के वाचक हैं। इक्ष्वाकु तथा कटुतुम्बी — ये कड़वी लौकी के बोधक हैं । विशाला और इन्द्रवारुणी — ये इन्द्रायन ( तँबी) नामक लता के नाम हैं । अर्शोघ्न, सूरण और कंद — ये सूरन या ओल के वाचक हैं। मुस्तक और कुरुविन्द — ये दोनों शब्द भी मोथा के अर्थ में आते हैं । त्वक्सार, कर्मार, वेणु, मस्कर और तेजन — ये वंश (बाँस) — के वाचक हैं । छत्रा, अतिच्छत्र और पालघ्न— ये पानी में पैदा होने वाले तृणविशेष के बोधक हैं । मालातृणक और भूस्तृण — ये भी तृणविशेष के ही नाम हैं । ताड़ के वृक्ष का नाम ताल और तृणराज है । घोण्टा, क्रमुक तथा पूग— ये सुपारी के अर्थ में आते हैं ॥ १४-७० ॥

शार्दूल और द्वीषी — ये व्याघ्र (बाघ) — के वाचक हैं । हर्यक्ष, केशरी (केसरी) तथा हरि— ये सिंह के नाम हैं। कोल, पोत्री और वराह— ये सूअर के तथा कोफ, ईहामृग और वृक भेड़िये के अर्थ में आते हैं। लूता, ऊर्णनाभि, तन्तुवाय और मर्कट — ये मकड़ी के नाम हैं । वृश्चिक और शूककीट बिच्छू के वाचक हैं। (‘शूककीट’ शब्द ऊन आदि चाटने वाले कीड़े के अर्थ में भी आता है ।) सारङ्ग और स्तोक — ये समान लिङ्ग में प्रयुक्त होने वाले शब्द पपीहा के वाचक हैं। कृकवाकु तथा ताम्रचूड — ये कुक्कुट (मुर्ग ) — के नाम हैं । पिक और कोकिल — ये कोयल के बोधक हैं । करट और अरिष्ट — काक ( कौए ) — के अर्थ में आते हैं । वक और कह्न — बगुले के नाम हैं। कोक, चक्र और चक्रवाक — ये चकवा के तथा कादम्ब और कलहंस — ये मधुरभाषी हंस या बत्तक के वाचक हैं। पतङ्गि का और पुत्तिका — ये मधु का छाता लगाने वाली छोटी मक्खियों के नाम हैं और सरधा तथा मधुमक्षिका— ये बड़ी मधुमक्खी के अर्थ में आते हैं । ( इसी को सरँगवा माछी भी कहते हैं ।) द्विरेफ, पुष्पलिह्, भृङ्ग, षट्पद, भ्रमर और अलि—ये भ्रमर (भौरे)—के नाम हैं । केकी तथा शिखी — मोर के नाम हैं 1 मोर की वाणी को ‘केका’ कहते हैं। शकुन्ति, शकुनि और द्विज— ये पक्षी के पर्याय हैं । स्त्रीलिङ्ग पक्षति — शब्द और पक्षमूल — ये पंख के वाचक हैं 1 चञ्च और तोटि — ये चोंच के अर्थ में आते हैं। इन दोनों का स्त्रीलिङ्ग में ही प्रयोग होता है । उड्डीन और संडीन — ये पक्षियों के उड़ने के विभिन्न प्रकारों के नाम हैं। कुलाय और नीड शब्द घोंसले के अर्थ में आते हैं। पेषी ( या पेशी), कोष और अण्ड — ये अण्डे के नाम हैं । इनमें प्रथम दो शब्द केवल पुँल्लिङ्ग में प्रयुक्त होते हैं । पृथुक, शावक, शिशु, पोत, पाक, अर्भक और डिम्भ — ये शिशुमात्र के बोधक हैं। संदोह, व्यूहक और गण, स्तोम, ओघ, निकर, व्रात, निकुरम्ब, कदम्बक, संघात, संचय, वृन्द, पुञ्ज, राशि और कूट — ये सभी शब्द ‘समूह’ अर्थ के वाचक हैं ॥ ७१-७८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कोशविषयक भूमि, वनौषधि आदि वर्ग का वर्णन’ नामक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६३ ॥

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