अग्निपुराण — अध्याय 364
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ चौसठवाँ अध्याय
मनुष्य-वर्ग
नृब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रवर्गाः

अग्निदेव कहते हैं — अब मैं नाम—निर्देशपूर्वक मनुष्यवर्ग, ब्राह्मण वर्ग, क्षत्रिय वर्ग, वैश्य वर्ग और शूद्रवर्ग का क्रमशः वर्णन करूँगा । ना, नर, पञ्चजन और मर्त्य — ये मनुष्य एवं पुरुष के वाचक हैं । स्त्री को योषित्, योषा, अबला और वधू कहते हैं। जो अपने अभीष्ट कामी पुरुष के साथ समागम की इच्छा से किसी नियत संकेत— स्थान पर जाती है, उसे अभिसारिका कहते हैं । कुलटा, पुंश्चली और असती — ये व्यभिचारिणी स्त्री के नाम हैं । नग्निका और कोटवी शब्द नंगी स्त्री का बोध कराने वाले हैं । ( रजोधर्म होने के पूर्व अवस्थावाली कन्या को भी ‘नग्निका’ कहते हैं ।) अर्धवृद्धा ( अधबुढ़ ) स्त्री को (जो गेरुआँ वस्त्र धारण करने वाली और पति — विहीना हो ) कात्यायनी कहते हैं । दूसरे के घर में रहकर (स्वाधीन वृत्ति से केश—प्रसाधन आदि कला के द्वारा) जीवन— निर्वाह करने वाली स्त्री का नाम सैरन्ध्री है। अन्तःपुर की वह दासी, जो अभी बूढ़ी न हुई हो — जिसके सिर के बाल सफेद न हुए हों, असिक्नी कहलाती है । रजस्वला स्त्री को मलिनी कहते हैं । वारस्त्री, गणिका और वेश्या — ये रंडियों के नाम हैं । भाइयों की स्त्रियाँ परस्पर याता कहलाती हैं । पति की बहन को ननान्दा कहते हैं । ‘सात पीढ़ी के अंदर के मनुष्य सपिण्ड और सनाभि कहे जाते हैं । समानोदर्य, सोदर्य, सगर्भ और सहज — ये समानार्थक शब्द सगे भाई का बोध करानेवाले हैं । सगोत्र, बान्धव, ज्ञाति, बन्धु, स्व तथा स्वजन — ये भी समान अर्थ के बोधक हैं । दम्पती, जम्पती, भार्यापती, जायापती —ये पति—पत्नी के वाचक हैं। गर्भाशय, जरायु, उल्व और कलल — ये चार शब्द गर्भ को लपेटने वाली झिल्ली के नाम हैं। कलल — शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग — दोनों में आता है। ( यह शुक्र और शोणित के संयोग से बने हुए गर्भाशय के मांस—पिण्ड का भी वाचक है ।) गर्भ और भ्रूण — ये दोनों शब्द गर्भस्थ बालक के लिये प्रयुक्त होते हैं। क्लीब, शण्ड ( षण्ढ ) और नपुंसक — ये पर्यायवाची शब्द हैं । डिम्भ — शब्द उत्तान सोने वाले नवजात शिशुओं के अर्थ में आता है । बालक को माणवक कहते हैं। लंबे पेट वाले पुरुष के अर्थ में पिचण्डिल और बृहत्कुक्षि शब्दों का प्रयोग होता है । जिसकी नाक कुछ झुकी हुई हो, उसको अवभ्रट कहते हैं । जिसका कोई अङ्ग कम या विकृत हो वह विकलाङ्ग और पोगण्ड कहलाता है। आरोग्य और अनामय — ये नीरोगता के वाचक हैं। बहरे को एड और वधिर तथा कुबड़े को कुब्ज और गड्डुल कहते हैं । रोग आदि के कारण जिसका हाथ खराब हो जाय, उसको तथा लूले मनुष्य को कुनि (या कुणि) कहा जाता है। क्षय, शोष और यक्ष्मा — ये राजयक्ष्मा (थाइसिस, टीबी या तपेदिक) — के नाम हैं। प्रतिश्याय और पीनस — ये जुकाम के अर्थ में आते हैं। स्त्रीलिङ्ग — क्षुत्, पुंल्लिङ्ग—क्षव और नपुंसक — क्षुत शब्द छींक के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । कास और क्षवथु—ये खाँसी के नाम हैं । इनका प्रयोग पुँल्लिङ्ग में होता है । शोथ, श्वयथु और शोफ — ये सूजन के अर्थ में आते हैं । पादस्फोट और विपादिका — ये बिवाई के नाम हैं । किलास और सिध्म — सेहुएँ को कहते हैं। कच्छू, पाम, पामा और विचर्चिका — ये खुजली के वाचक हैं । कोठ और मण्डलक उस कोढ़ को कहते हैं, जिसमें गोलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं। सफेद कोढ़ को कुष्ठ और श्वित्र कहते हैं । दुर्नामक और अर्शस् — ये बवासीर के नाम हैं। मल-मूत्र के निरोध को अनाह और विबन्ध कहते हैं । ग्रहणी और प्रवाहिका — ये संग्रहणी रोग के नाम हैं। बीज, वीर्य, इन्द्रिय और शुक्र — ये वीर्य के पर्याय हैं। पलल, क्रव्य और आमिष —ये मांस के अर्थ में आते हैं । बुक्का और अग्रमांस — ये छाती के मांस (हृत्पिण्ड) — का बोध कराने वाले हैं। (‘बुक्का’ शब्द केवल हृदय का भी वाचक है ।) हृदय और हृत् — ये मन के पर्याय हैं। मेदस्, वपा और वसा —ये मेदा के नाम हैं । गले के पीछे की नाड़ी को मन्या कहते हैं । नाडी, धमनि और शिरा — ये नाड़ी के वाचक हैं। तिलक और क्लोम — ये शरीर में रहने वाले काले तिल के अर्थ में आते हैं । मस्तिष्क दिमाग को और दूषिका आँखों की कीचड़ को कहते हैं । अन्त्र और पुरीतत् — ये आँत के अर्थ में आते हैं । गुल्म और प्लीहा — बरवट ( तिल्ली ) — को कहते हैं। प्लीहा ‘प्लीहन्’ शब्द का पुंल्लिङ्गरूप है। अङ्ग-प्रत्यङ्ग की संधियों के बन्धन को स्नायु और वस्त्रसा कहते हैं । कालखण्ड और यकृत्— जिगर या कलेजे के नाम हैं । कर्पर और कपाल शब्द ललाट के वाचक हैं । ‘कपाल’ शब्द पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग — दोनों में आता है। कीकस, कुल्य और अस्थि — ये हड्डी के नाम हैं । रक्त— मांस से रहित शरीर की हड्डी को कङ्काल कहते हैं । पीठ की हड्डी (मेरुदण्ड ) — का नाम कशेरुका है । ‘करोटि ‘ शब्द स्त्रीलिङ्ग है और यह मस्तक की हड्डी (खोपड़ी ) — के अर्थ में आता है । पँसली की हड्डी को पर्शुका कहते हैं । अङ्ग, प्रतीक, अवयव, शरीर, वर्ष्म तथा विग्रह — ये शरीर के पर्याय हैं । कट और श्रोणिफलक — ये चूतड़ के अर्थ में आते हैं । ‘कट’ शब्द पुंल्लिङ्ग है । कटि, श्रोणि और ककुद्मती — ये कमर का बोध कराने वाले हैं। ( किन्हीं — किन्हीं के मत में उपर्युक्त पाँचों ही शब्द पर्यायवाची हैं ।) स्त्री की कमर के पिछले भाग को नितम्ब और अगले भाग को जघन कहते हैं । ‘जघन’ शब्द नपुंसकलिङ्ग है । नितम्ब के ऊपर जो दो गड्ढे—से होते हैं, उन्हें कूपक एवं ककुन्दर कहते हैं । ‘ककुन्दर’ शब्द केवल नपुंसकलिङ्ग है । कटि के मांस — पिण्ड का नाम स्फिच् और कटिप्रोथ है। ‘स्फिच्’ शब्द का प्रयोग स्त्रीलिङ्ग में होता है। नीचे बताये जाने वाले भग और लिङ्ग — दोनों को उपस्थ कहा जाता है । भग और योनि — ये स्त्री — चिह्न के बोधक पर्यायवाची शब्द हैं । शिश्न, मेढ्र, मेहन और शेफस् — ये पुरुषचिह्न (लिङ्ग ) — के वाचक हैं । पिचण्ड, कुक्षि, जठर, उदर और तुन्द — ये पेट के अर्थ में आते हैं। कुच और स्तन पर्यायवाची शब्द हैं। कुचों के अग्रभाग का नाम चूचुक है । नपुंसकलिङ्ग क्रोड तथा भुजान्तर शब्द गोदी के वाचक हैं। स्कन्ध, भुजशिरस् और अंस — ये कंधे के अर्थ में आते हैं । ‘ अंस’ शब्द पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग है । कंधे की संधियों अर्थात् हँसली की हड्डी को जत्रु कहते हैं । पुनर्भव, कररुह, नख और नखर — ये नखों के नाम हैं। इनमें ‘नखर’ और ‘नख’ शब्द स्त्रीलिङ्ग के सिवा अन्य दो लिङ्गों में प्रयुक्त होते हैं । अँगूठे से लेकर तर्जनी तक फैलाये हुए हाथ को प्रादेश, अँगूठे से मध्यमा तक को ताल और अनामिका तक फैलाये हुए हाथ को गोकर्ण कहते हैं । इसी प्रकार अँगूठे से कनिष्ठिका अँगुली तक फैले हुए हाथ का नाम वितस्ति (बालिस्त या बित्ता ) है । इसकी लंबाई बारह अंगुल की होती है। जब हाथ की सभी अँगुलियाँ फैली हों, तब उसे चपेट, तल और प्रहस्त कहते हैं । मुट्ठी बँधे हुए हाथ का नाम रत्नि है। (कोहनी से लेकर मुट्ठी बँधे हुए हाथ तक के माप को भी ‘रत्नि’ कहते हैं ।) कोहनी से कनिष्ठा अँगुली तक की लंबाई का नाम अरत्नि है । शङ्ख के समान आकार वाली ग्रीवा का नाम कम्बुग्रीवा और त्रिरेखा है । गले की घाँटी को अवटु, घाटा और कृकाटिका कहते हैं। ओठ से नीचे के हिस्से का नाम चिबुक है । गण्ड और गल्ल गाल के वाचक हैं। गालों के निचले भाग को हनु कहते हैं । नेत्रों के दोनों प्रान्तों को अपाङ्ग कहा जाता है। उन्हें दिखाने की चेष्टा को कटाक्ष कहा जाता है । चिकुर, कुन्तल और वाल — ये केश के वाचक हैं । प्रतिकर्म और प्रसाधन शब्द सँवारने और शृङ्गार करने के अर्थ में आते हैं । आकल्प, वेश और नेपथ्य — ये शब्द प्रत्यक्ष नाटक आदि के खेल में भिन्न-भिन्न वेष धारण करने के अर्थ में आते हैं । मस्तक पर धारण किये जाने वाले रत्न का नाम चूडामणि और शिरोरत्न है । हार के बीच-बीच में पिरोये हुए रत्न को तरल कहते हैं । कर्णिका और तालपत्र — ये कान के आभूषण के नाम हैं । लम्बन और ललन्तिका गले में नीचे तक लटकने वाले हार को कहते हैं। मञ्जीर और नूपुर — ये पैर के आभूषण हैं । किङ्किणी और क्षुद्रघण्टिका घुँघुरू के नाम हैं । दैर्घ्य, आयाम और आनाह — ये वस्त्र आदि की लंबाई के बोधक हैं । परिणाह और विशालता — ये चौड़ाई ( पनहा या अर्ज) के अर्थ में आते हैं । पुराने वस्त्र को पटच्चर कहते हैं । संख्यान और उत्तरीय — ये चादर या दुपट्टे के अर्थ में आते हैं । फूल आदिसे बालों का शृङ्गार करने या कपोल आदि पर पत्रभङ्ग आदि बनाने को रचना और परिस्पन्द कहते हैं । प्रत्येक उपचार की पूर्णता का नाम आभोग है । ढक्कनदार पेटी को समुद्गक और सम्पुटक कहते हैं । प्रतिग्राह और पतद्ग्रह — ये पीकदान के नाम हैं ॥ १-२९ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कोशगत मनुष्य-वर्ग का वर्णन’ नामक तीन सौ चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६४ ॥

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