July 21, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 355 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचपनवाँ अध्याय समास-निरूपण समासः भगवान् कार्त्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! मैं छः 1 प्रकार के ‘समास’ बताऊँगा । फिर अवान्तर- भेदों से ‘समास’ के अट्ठाईस भेद हो जाते हैं । समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’ के भेद से दो प्रकार का है तथा ‘लुक्’ और ‘अलुक्’ के भेद से भी उसके दो प्रकार और हो जाते हैं । कुम्भकार और हेमकार ‘नित्य समास’ हैं । ( क्योंकि विग्रह- वाक्य द्वारा ये शब्द जातिविशेष का बोध नहीं करा सकते।) ‘राज्ञः+पुमान् = राजपुमान्’ – यह षष्ठी – तत्पुरुष समास स्वपदविग्रह होने के कारण ‘अनित्य’ है । कष्टश्रितः ( कष्टं + श्रितः ) – इसमें ‘लुक्’ समास है; क्योंकि ‘कष्ट’ पद के अन्त में स्थित द्वितीया विभक्ति का ‘लुक्’ (लोप) हो जाता है । ‘कण्ठेकालः’ आदि ‘अलुक्’ समास हैं; क्योंकि इसमें कण्ठशब्दोत्तरवर्तिनी सप्तमी विभक्ति का ‘लुक्’ नहीं होता। तत्पुरुष-समास आठ प्रकार का होता है। प्रथमान्त आदि शब्द सुबन्त के साथ समस्त होते हैं । ‘पूर्वकायः’ इस तत्पुरुषसमास में जब ‘पूर्वं कायस्य’ – ऐसा विग्रह किया जाता है, तब यह ‘प्रथमा-तत्पुरुष’ समास कहा जाता है। इसी प्रकार ‘अपरकायः ‘ — कायस्य अपरम्, इस विग्रह में, ‘अधरकायः ‘ — कायस्य अधरम् — इस विग्रह में और ‘उत्तरकायः ‘ – कायस्योत्तरम् — इस विग्रह में भी प्रथमा – तत्पुरुष समास कहा जाता है। ऐसे ही ‘अर्द्धकणा’ इसमें अर्द्धम् कणायाः — ऐसा विग्रह होने से प्रथमा-तत्पुरुष समास होता है एवं ‘भिक्षातुर्यम्’ — इसमें तुर्यं भिक्षायाः — ऐसा विग्रह होने से तुर्यभिक्षा और पक्षान्तर में ‘भिक्षातुर्यम्’ — ऐसा षष्ठी – तत्पुरुष होता है। ‘ ऐसे ही ‘आपन्नजीविकः ‘ यह द्वितीया – तत्पुरुष समास है। इसका विग्रह इस प्रकार होता है — ‘आपन्नो जीविकाम् ।’ पक्षान्तर में ‘जीविकापन्नः ‘ ऐसा रूप होता है । इसी प्रकार ‘माधवाश्रितः ‘ यह द्वितीया-समास है; इसका विग्रह ‘माधवम् आश्रितः ‘ — इस प्रकार है । ‘वर्षभोग्यः ‘ — यह द्वितीया – तत्पुरुष समास है — इसका विग्रह है ‘वर्षं भोग्यः।’‘धान्यार्थः’ यह तृतीया-समास है । इसका विग्रह ‘धान्येन अर्थः’ इस प्रकार है । ‘विष्णुबलिः ‘ यहाँ ‘विष्णवे बलिः ‘ – इस विग्रह में चतुर्थी- तत्पुरुष समास होता है। ‘वृकभीतिः ‘ — यह पञ्चमी- तत्पुरुष है। इसका विग्रह ‘ वृकाद् भीतिः ‘ — इस प्रकार है। ‘राजपुमान्’— यहाँ ‘राज्ञः पुमान्’ — इस विग्रह में षष्ठी – तत्पुरुष समास होता है । इसी प्रकार ‘वृक्षस्य फलम् – वृक्षफलम् ‘ — यहाँ षष्ठी- तत्पुरुष समास है। ‘अक्षशौण्डः ‘ ( द्यूतक्रीडा में निपुण) इसमें सप्तमी – तत्पुरुष समास है । अहितः – जो हितकारी न हो, वह – इसमें ‘नञ्समास’ है ॥ १–७ ॥ ‘नीलोत्पल’ आदि जिसके उदाहरण हैं, वह ‘कर्मधारय’ समास सात प्रकार का होता है १- विशेषणपूर्वपद ( जिसमें विशेषण पूर्वपद हो और विशेष्य उत्तरपद अथवा ) । इसका उदाहरण है — ‘नीलोत्पल’ (नीला कमल) । २- विशेष्योत्तर- विशेषणपद – इसका उदाहरण है — ‘ वैया- करणखसूचिः’ (कुछ पूछने पर आकाश की ओर देखने वाला वैयाकरण)। ३- विशेषणोभयपद (अथवा विशेषणद्विपद) जिसमें दोनों पद विशेषणरूप ही हों। जैसे – शीतोष्ण (ठंडा- गरम)। ४- उपमानपूर्वपद । इसका उदाहरण है – शङ्खपाण्डुरः (शङ्खके समान सफेद)। ५-उपमानोत्तरपद — इसका उदाहरण है – ‘पुरुष- व्याघ्रः’ (पुरुषो व्याघ्र इव) । ६- सम्भावना – पूर्वपद – (जिसमें पूर्वपद सम्भावनात्मक हो ) उदाहरण – गुणवृद्धिः (गुण इति वृद्धिः स्यात् । अर्थात् ‘गुण’ शब्द बोलने से वृद्धि की सम्भावना होती है)। तात्पर्य यह है कि ‘वृद्धि हो’ – यह कहने की आवश्यकता हो तो ‘गुण’ शब्द का ही उच्चारण करना चाहिये । ७- अवधारणपूर्वपद– [जहाँ पूर्वपद में ‘अवधारण’ (निश्चय) सूचक शब्द का प्रयोग हो, वह ] । जैसे – ‘सुहृदेव सुबन्धुकः’ (सुहृद् ही सुबन्धु है) । बहुव्रीहिसमास भी सात प्रकार का ही होता है ॥ ८-११ ॥ १- द्विपद, २-बहुपद, ३-संख्योत्तरपद, ४- संख्योभयपद, ५-सहपूर्वपद, ६- व्यतिहारलक्षणार्थ तथा ७- दिग्लक्षणार्थ। ‘द्विपद बहुव्रीहि ‘ में दो ही पदों का समास होता है । यथा – ‘ आरूढभवनो नरः ‘ । ( आरूढं भवनं येन सः — इस विग्रह के अनुसार जो भवन पर आरूढ हो गया हो, उस मनुष्य का बोध कराता है ।) ‘बहुपद बहुव्रीहि ‘में दो से अधिक पद समास में आबद्ध होते हैं। इसका उदाहरण है — ‘अयम् अर्चिताशेषपूर्वः । ‘ ( अर्चिता अशेषाः पूर्वा यस्य सोऽयम् अर्चिताशेषपूर्वः । ) अर्थात् जिसके सारे पूर्वज पूजित हुए हों, वह ‘अर्चिताशेषपूर्व’ है। इसमें ‘अर्चित’ ‘अशेष’ तथा ‘पूर्व’ — ये तीनों पद समास में आबद्ध हैं। ऐसा समास ‘बहुपद’ कहा गया है । ‘संख्योत्तरपद’ का उदाहरण है — ‘एते विप्रा उपदशाः ‘ — ये ब्राह्मण लगभग दस हैं ‘ । इसमें ‘दस’ संख्या उत्तरपद के रूप में प्रयुक्त है। ‘द्वित्राः द्व्येकत्रयः’ इत्यादि संख्योभयपद के उदाहरण हैं । ‘सहपूर्वपद’ का उदाहरण- ‘समूलोद्धृतकः तरुः ‘ ( सह मूलेन उद्धृतं कं शिखा यस्य सः । अर्थात् जडसहित उखड़ गयी है शिखा जिसकी, वह वृक्ष) — यहाँ पूर्वपद के स्थान में ‘सह’ (स) – का प्रयोग हुआ है । व्यतिहार- लक्षण का उदाहरण है – केशाकेशि, नखानखि युद्धम् (आपस में झोंटा – झुटौअल, परस्पर नखों से बकोटा-बकोटीपूर्वक कलह) ॥ १२–१४ ॥ दिग्लक्षणार्थ का उदाहरण — उत्तरपूर्वा (उत्तर और पूर्व के अन्तराल की दिशा ) । ‘द्विगु’ समास दो प्रकार का बताया गया है। ‘एकवद्भाव’ तथा ‘अनेकधा’ स्थिति को लेकर ये भेद किये गये हैं । संख्या पूर्वपदवाला समास ‘द्विगु’ है। इसे कर्मधारय का ही एक भेदविशेष स्वीकार किया गया है। ‘एकवद्भाव’ का उदाहरण है — द्विशृङ्गम् ( दो सींगों का समाहार) । ‘पञ्चमूली’ भी इसी का उदाहरण है । ‘अनेकधा’ या ‘अनेकवद्भाव’ का उदाहरण है — सप्तर्षयः इत्यादि । ‘पञ्च ब्राह्मणाः ‘में समास नहीं होगा; क्योंकि यहाँ संज्ञा नहीं है ॥ १५ ॥ ‘द्वन्द्व’ समास भी दो ही प्रकारका होता है — १- ‘ इतरेतरयोगी’ तथा २- ‘ समाहारवान्’ । प्रथम का उदाहरण है — ‘रुद्रविष्णू (रुद्रश्च विष्णुश्च – रुद्र तथा विष्णु) । यहाँ इतरेतर – योग है। समाहार का उदाहरण है — भेरीपटहम् (भेरी च पटहश्च, अनयोः समाहारः-अर्थात् भेरी और पटह का समाहार ) । यहाँ ‘तुर्याङ्ग’ होने से इनका एकवद्भाव होता है। अव्ययीभाव समास भी दो तरह का होता है — १-‘नामपूर्वपद’ और २-(‘यथा’ आदि) अव्यय- पूर्वपद । प्रथम का उदाहरण है — शाकस्य मात्रा – शाकप्रति। यहाँ ‘शाक’ पूर्वपद है और मात्रार्थक ‘प्रति’ अव्यय उत्तरपद । दूसरे का उदाहरण — ‘उपकुमारम्-उपरथ्यम्’ इत्यादि हैं। समास को प्रायः चार प्रकारों में विभक्त किया जाता है — १- उत्तरपदार्थ की प्रधानता से युक्त (तत्पुरुष), २- उभयपदार्थ-प्रधान द्वन्द्व समास, ३ – पूर्वपदार्थ – प्रधान ‘अव्ययीभाव’ तथा ४ अन्य अथवा बाह्यपदार्थ-प्रधान ‘बहुव्रीहि’ ॥ १६–१९ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘समास विभाग का वर्णन’ नामक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५५ ॥ 1. ‘जहाँ अनेक पदों का परस्पर एकार्थीभावरूप सामर्थ्य लक्षित हो, उनमें ‘समास’ होता है । कृत्, तद्धित, समास, एकशेष तथा सनाद्यन्त धातु — ये पाँच वृत्तियाँ मानी गयी हैं । परार्थ का अभिधान (कथन) ‘वृत्ति’ है । वृत्त्यर्थ के अवबोधक वाक्य को ‘विग्रह’ कहते हैं । ‘विग्रह’ दो प्रकार का होता है — ‘लौकिक’ और ‘अलौकिक’। परिनिष्ठित (प्रयोगार्ह) होने के कारण जो साधुवाक्य है, वह ‘लौकिक विग्रह’ कहलाता है। जो प्रयोगयोग्य न होने से असाधु है, वह ‘अलौकिक विग्रह’ है । ‘राज्ञः पुरुषः ‘ – यह ‘लौकिक विग्रह’ है ‘राजन्+डस्, पुरुष+सु’ यह अलौकिक विग्रह है। समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य ‘के भेद से दो प्रकार का है । जो अविग्रह ( लौकिक विग्रह से रहित ) या अस्वपद-विग्रह ( समस्यमान ‘यावत्’ पद से अघटित) हो, वह ‘नित्य-समास’ है; इसके विपरीत ‘अनित्य-समास’ है । प्राचीन विद्वानों ने समास के छः प्रकार बताये हैं । यथा — \ सुपां सुपा तिङा नाम्ना धातुनाथ तिङां तिङा । सुबन्तेनेति विज्ञेयः समासः षड्विधो बुधैः ॥ (१) उदाहरण के लिये सुबन्त का सुबन्त के साथ समास – राजपुरुषः । यहाँ (‘राज्ञः पुरुषः ‘ इस विग्रह के अनुसार) पूर्व और उत्तर दोनों पद ‘सुबन्त’ हैं । (२) सुबन्त का तिङ् के साथ समास – यथा — ‘ पर्यभूषत् ‘। (३) ‘सुबन्त’ को नाम के साथ — कुम्भकारः। हेमकारः इत्यादि । (४) ‘सुबन्त, का धातु के साथ समास । यथा — ‘कटप्रूः’, अजस्रम् इत्यादि। ( ५ ) तिङन्त का तिङन्त के साथ समास, यथा — पिबतखादता । खादतमोदता इत्यादि । ( ६ ) तिङन्त का सुबन्त के साथ समास, यथा — कृन्तविचक्षणा । इसका मयूरव्यंसकादिगण में पाठ है । ‘ Content is available only for registered users. 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