अग्निपुराण — अध्याय 356
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय
त्रिविध तद्धित—प्रत्यय
तद्धितसिद्दरूपं

कुमार स्कन्ध कहते हैं — कात्यायन ! अब त्रिविध ‘तद्धित’ का वर्णन करूँगा । ‘तद्धित ‘के तीन भेद हैं — सामान्यावृत्ति तद्धित, अव्यय तद्धित तथा भाववाचक तद्धित । ‘सामान्यावृत्ति—तद्धित’ इस प्रकार है — ‘ अंस’ शब्द से ‘लच्’ प्रत्यय होने पर ‘अंसलः ‘ बनता है; इसका अर्थ है —  बलवान्। ‘वत्स’ शब्द से ‘लच्’ प्रत्यय होने पर ‘वत्सलः ‘ रूप होता है, इसका अर्थ स्नेहवान् है 1  । ‘फेन’ शब्द से ‘इलच्’ प्रत्यय होने पर ‘फेनिलम्’ 2  रूप होता है, इसका अर्थ है — फेनयुक्त जल । लोमादिगण से ‘श’ प्रत्यय होता है, (विकल्प से ‘मतुप् ‘ भी होता है) — इस नियम के अनुसार ‘श’ प्रत्यय होने पर ‘लोमशः’ 3 प्रयोग बनता है । (‘मतुप् ‘ होने पर ‘लोमवान्’ होता है। इसी तरह ‘रोमशः, रोमवान्’ — ये प्रयोग सिद्ध होते हैं ।) पामादि शब्दों से ‘न’ होता है — इस नियम के अनुसार ‘पाम’ शब्द से ‘न’ होने पर ‘पामनः’ ‘अङ्गात् कल्याणे ।’ — इस वार्तिक के अनुसार ‘कल्याण’ अर्थ में ‘अङ्ग’ शब्द से ‘न’ होने पर ‘लक्ष्मणः’ (उत्तम लक्षणों से युक्त) ये रूप बनते हैं। वैकल्पिक ‘मतुप्’ होने पर तो ‘पामवान्’ आदि रूप होंगे। जिसे खुजली हुई हो, वह ‘पामन’ या ‘पामवान्’ है । ‘इसी तरह पिच्छादि शब्दों से ‘इलच्’ होता है — इस नियम के अनुसार ‘इलच्’ होने पर ‘पिच्छिलः’, ‘पिच्छवान्’; ‘उरसिलः’, ‘उरस्वान्’ इत्यादि रूप होते हैं । ‘पिच्छिलः’ का अर्थ ‘पंखवान्’ होता है । मार्ग का विशेषण होने पर यह फिसलनयुक्त का बोधक होता है — यथा ‘पिच्छिलः पन्थाः । ‘ ‘उरस्वान्’ का अर्थ ‘मनस्वी’ समझना चाहिये । [‘प्रज्ञाश्रद्धाचभ्यो णः । ‘ ( ५ । २ । १०१ ) — इस पाणिनि—सूत्र के अनुसार ] ‘ण’ प्रत्यय करने पर ‘प्रज्ञा’ शब्द से ‘प्राज्ञः’ (प्रज्ञावान्), ‘श्रद्धा’ शब्द से ‘श्राद्धः’ (श्रद्धावान्) और ‘अर्चा’ शब्द से ‘आर्चः ‘ (अर्चावान्) रूप बनते हैं। वाक्य में प्रयोग— ‘प्राज्ञो व्याकरणे ।’ स्त्रीलिङ्ग में ‘प्राज्ञा’ (प्रज्ञावती) रूप होगा। ‘ण’ प्रत्यय होने से अणन्तत्वप्रयुक्त ‘ङीप्’ प्रत्यय यहाँ नहीं होगा । यद्यपि ‘प्रकर्षेण जानातीति प्रज्ञः स एव प्रज्ञावान् ।’ प्रज्ञ एव प्राज्ञः । ( स्वार्थे अण् प्रत्ययः ) — इस प्रकार भी ‘प्राज्ञः’ की सिद्धि तो होती है, तथापि इससे स्त्रीलिङ्ग में ‘प्राज्ञी’ रूप बनेगा, ‘प्राज्ञा’ नहीं । ‘वृत्ति’ शब्द से भी ‘ण’ प्रत्यय होता है — ‘ वार्तः’ (वृत्तिमान्) । ‘वार्ता’ विद्या इत्यादि । ऊँचे दाँत हैं इसके इस अर्थ में ‘दन्त’ शब्द से ‘उरच्’ प्रत्यय होने पर ‘दन्तुरः ‘— यह रूप होता है। ‘दन्त उन्नत उरच् ।’ (५ । २ । १०६) — इस पाणिनि — सूत्र से उक्त अर्थ में ‘दन्तुरः ‘ इस पद की सिद्धि होती है। ‘मधु’ शब्द से ‘र’ प्रत्यय होने पर ‘मधुरम्’ 4 , ‘सुषि’ शब्द से  ‘र’ प्रत्यय होने पर ‘सुषिरम्’, ‘केश’ शब्द से ‘व’ प्रत्यय होने पर ‘केशवः’ 5 ‘हिरण्य’ तथा ‘मणि’ शब्दों से ‘व’ प्रत्यय होने पर ‘हिरण्यवमणि वः’ 6  7  ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘रजस्’ शब्द से ‘वलच्’ प्रत्यय होने पर ‘रजस्वलम्’ 8  पद की सिद्धि होती है ॥ १-३ ॥

‘धन’, ‘कर’ तथा ‘हस्त’ — इन शब्दों से ‘इनि’ प्रत्यय होने पर क्रमशः ‘धनी’, ‘करी’ और ‘हस्ती’ — ये पद सिद्ध होते हैं । ‘धन’ शब्द से ‘ठन्’ प्रत्यय होने पर ‘ धनिकं कुलम्’ या ‘धनिकः पुरुष : ‘ — ये प्रयोग सिद्ध होते हैं । ‘पयस्’ तथा ‘माया’ शब्दों से ‘विनि’ प्रत्यय होने पर ‘पयस्वी’, ‘मायावी’ — ये रूप बनते हैं । ‘ऊर्णा’ शब्द से मत्वर्थीय ‘युस्’ प्रत्यय होने पर ‘ऊर्णायुः’ पद की सिद्धि बतायी गयी है । 9  ‘वाच्’ शब्द से ‘ग्मिनि ‘ प्रत्यय होने पर ‘वाग्मी’ तथा ‘आलच्’ प्रत्यय होने पर ‘वाचालः ‘ — ये रूप बनते हैं । उसी से ‘ आटच्’ प्रत्यय होने पर ‘वाचाट: ‘ रूप बनता है । ‘फल’ तथा ‘बर्ह’ शब्दों से ‘इनच्’ प्रत्यय होने पर क्रमशः ‘फलिनः’, ‘बर्हिणः ‘ — ये रूप बनते हैं । ‘वृन्द’ शब्द से ‘आरकन्’ प्रत्यय होने पर ‘वृन्दारकः ‘— इस पद की सिद्धि होती है 10  ॥ ४-५ ॥

‘शीतं न सहते’, ‘हिमं न सहते’ — इस विग्रह में ‘शीत’ तथा ‘हिम’ शब्दों से ‘आलुच्’ प्रत्यय करने पर ‘शीतालुः’ तथा ‘हिमालुः’ रूप बनते हैं । ‘वात’ शब्द से ‘उलच्’ प्रत्यय होने पर ‘वातुलः’ रूप बनता है। ‘अपत्य’ अर्थ में ‘ अण्’ प्रत्यय होता है । ‘ वसिष्ठस्यापत्यं पुमान् वासिष्ठः । ‘, ‘कुरोरपत्यं पुमान् कौरवः । ‘ ( वसिष्ठ की संतान ‘वासिष्ठ’ कहलाती है तथा कुरु की संतति ‘कौरव’) — ‘ वहाँ उसका निवास है’ — इस अर्थ में सप्तम्यन्त ‘समर्थ’ शब्द से अण्’ प्रत्यय होता है। यथा ‘मथुरायां वासोऽस्येति माथुरः ।’ (मथुरा में निवास है इसका, इसलिये यह ‘माथुर ‘ है ।) ‘सोऽस्य वासः । ‘ — वह इसका वासस्थान है, इस अर्थ में भी प्रथमान्त ‘समर्थ से ‘ ‘अण्’ प्रत्यय होता है । ‘उसको जानता और उसे पढ़ता है’ — इस अर्थ में द्वितीयान्त ‘समर्थ’ पद से अण्’ प्रत्यय होता है । ‘ चान्द्रं व्याकरणमधीते तद् वेद वा इति चान्द्रः ।’ ( चान्द्र एव चान्द्रकः स्वार्थे कप्रत्ययः ) । ‘ क्रमादि’ शब्दों से ‘वुन्’ प्रत्यय होता है ( ‘वु’ के स्थान में ‘अक’ आदेश होता है ।) ‘क्रमं वेत्ति इति क्रमकः ‘— जो क्रमपाठ को जानता है, वह ‘क्रमक’ है । इसी तरह ‘ पदकः ‘, ‘शिक्षक:’, ‘मीमांसकः’ इत्यादि पद बनते हैं । ‘कोशम् अधीते वेद वा ।’ — जो कोश को जानता या पढ़ता है, वह ‘कौशक’ है ॥ ६-८ ॥

धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् ।’ (पा०सू० ५। २। १ ) — इस सूत्र अनुसार धान्यों की उत्पत्ति के आधारभूत क्षेत्रके अर्थ में षष्ठ्यन्त समर्थ धान्य— वाचक शब्द से ‘खञ्’ प्रत्यय होता है । (स्कन्द ने कात्यायन को जिसका उपदेश किया, उस कौमार-व्याकरण में भी यह नियम देखा जाता है ।) इसके अनुसार प्रियंगोर्भवनं क्षेत्रं प्रैयंगवीनम् — प्रियंगु ( कँगनी ) की उत्पत्ति के आधारभूत क्षेत्र का बोध कराने के लिये ‘खञ्’ प्रत्यय होने पर (‘ख’ के स्थानपर ‘ईन्’ आदेश हो जाने पर) ‘प्रैयंगवीनम् — यह पद बनता है। इसका अर्थ है — ‘प्रियंगु ( कँगनी) की उपज देने वाला खेत’ । इसी तरह मूँग, कोदो आदि की उत्पत्ति के उपयुक्त खेत को ‘मौद्गीन’ तथा ‘कौद्रवीण’ कहते हैं । यहाँ ‘मुद्ग’ शब्द से ‘खञ्’ होने पर ‘मौद्गीन’ शब्द और ‘कोद्रव’ शब्द से ‘खञ्’ होने पर ‘कौद्रवीण’ शब्द की सिद्धि होती है । ‘विदेहस्यापत्यम्’ (विदेह का पुत्र ) — इस अर्थ में ‘विदेह’ शब्द से ‘अण्’ प्रत्यय होने पर ‘वैदेहः’ पद की सिद्धि होती है | ( इन सबमें आदि स्वर की वृद्धि होती है ।) अकारान्त शब्द से ‘अपत्य’ अर्थ में ‘अण्’ का बाधक ‘इ’ प्रत्यय होता है । आदि स्वर की वृद्धि तथा अन्तिम स्वर का लोप । ‘दक्षस्यापत्यं— दाक्षिः, दशरथस्यापत्यं दाशरथिः ।’ इत्यादि पद बनते हैं । ‘नडादिभ्यः फक् ।’ ( ४। १ । ९९) — इस सूत्र के नियमानुसार ‘नड’ — आदि शब्दों से ‘फक्’ प्रत्यय होता है । ‘फ’ के स्थान में ‘आयन’ होता है । अतएव ‘नडस्य गोत्रापत्यं नाडायनः, चरस्य गोत्रापत्यं चारायणः ।’ इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। (‘कित्’ होने के कारण आदि वृद्धि हो जाती है ।) इसी तरह ‘अश्वस्य गोत्रापत्यम्, आश्वायन: ‘ होता है । इसमें ‘अश्वादिभ्यः फञ् (  ४। १। ११० ) — इस सूत्र के अनुसार ‘फञ्’ प्रत्यय होता है । (‘गोत्रे कुञ्जादिभ्यः फञ् ।’ ४। १। ९८) यह भी फञ् — विधायक सूत्र है । ब्रघ्न, शङ्ख, शकट आदि शब्द कुञ्जादि के अन्तर्गत हैं, अतएव ‘शाङ्खायनः’, ‘शाकटायनः’ आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं ।) ‘गर्गादिभ्यो यञ्’ (४। १ । १०५ ) — इस सूत्र के अनुसार गर्ग, वत्स आदि शब्दों से गोत्रापत्यार्थक ‘यञ्’ प्रत्यय होने पर ‘गार्ग्यः’, ‘वात्स्यः’ इत्यादि रूप बनते हैं । ‘स्त्रीभ्यो ढक् ।’ ( ४ । १ । १२० ) के नियमानुसार स्त्रीप्रत्ययान्त शब्दों से ‘अपत्य’ अर्थ में ‘ढक्’ प्रत्यय होता है । फिर उसके स्थान में ‘एय’ होता है । जैसे ‘विनतायाः पुत्रः ‘ ( विनता का पुत्र) ‘वैनतेय’ कहलाता है । ‘सुमित्रा’ आदि शब्द बाह्वादिगण में पठित हैं, अतः उनसे अपत्यार्थ में ‘इञ्’ प्रत्यय होता है । अतएव ‘सौमित्रेयः’ न होकर ‘सौमित्रिः ‘ रूप बनता है । ‘चटका’ शब्द से ‘चटकाया ऐरक् ।’ (४ । १ । १२८ ) — इस सूत्र के विधानानुसार ‘ऐरक्’ प्रत्यय होने पर ‘चटकाया अपत्यं पुमान्’ (चटका का नर पुत्र) ‘चाटकैर’ कहलाता है । ‘गोधा’ शब्द से ‘द्रक्’ का विधान है । ‘गोधाया ढक् ।’ (४। १ । १२९) अतः गोधा का अपत्य ‘गोधेर ‘ कहलाता है । ‘आरगुदीचाम् ।’ ( ४। १ । १३०) के नियमानुसार ‘आरक्’ प्रत्यय होने पर ‘गौधारः ‘ रूप बनता है । ऐसा वैयाकरणों ने बताया है ॥ ९-११ ॥

‘क्षत्र’ शब्द से ‘घ’ प्रत्यय होने पर ‘घ’ के स्थान में ‘इय’ होने के कारण ‘क्षत्रिय’ शब्द सिद्ध होता है । ‘क्षत्राद् घः।’ (४ । १ । १३८) — ‘जाति’ बोधक ‘घ’ प्रत्यय होने पर ही ‘क्षत्रियः’ रूप बनता है। अपत्यार्थ में तो ‘इञ्’ होकर ‘क्षत्रस्यापत्यं पुमान् क्षात्रि: ‘ — यही रूप बनेगा । ‘कुलात् खः । ‘ ( ४ । १ । १३९ ) के अनुसार ‘कुल’ शब्द से ‘ख’ प्रत्यय और ‘ख’ के स्थान में ‘ईन’ आदेश होने पर ‘कुलीनः ‘ — इस पद की सिद्धि होती है । ‘कुर्वादिभ्यो ण्यः । ‘ ( ४ । १ । १५१ ) के अनुसार अपत्यार्थ में ‘कुरु’ शब्द से ‘ण्य’ प्रत्यय होने पर आदिवृद्धिपूर्वक गुण — वान्तादेश होकर ‘कौरव्यः’ इत्यादि प्रयोग बनते हैं । ‘शरीरावयवाद् यत्।’ (५ । १ । ६) के नियमानुसार शरीरावयववाचक शब्दों से ‘यत्’ प्रत्यय होने पर ‘मूर्धन्य’ तथा ‘मुख्य’ आदि शब्द सिद्ध होते हैं । ‘सुगन्धिः ‘ — ‘ शोभनो गन्धो यस्य सः ‘ — इस लौकिक विग्रह में बहुव्रीहि समास करने के पश्चात् ‘गन्धस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः ।’ (५ । ४ । १३५) — इस सूत्र के अनुसार अन्त में ‘इ’ हो जाने से ‘सुगन्धिः ‘ — इस शब्दरूप की सिद्धि होती है ॥ १२ ॥

‘तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच् ।’ (५ । २। ३६ ) — तारकादिगण से ‘इतच्’ प्रत्यय होता है, इस नियम के अनुसार ‘तारकाः संजाता अस्य’ (तारे उग आये हैं, इसके ) इस अर्थ में ‘तारका’ शब्द से ‘इतच्’ प्रत्यय होने पर ‘तारकितं नभः’ इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं । ‘कुण्डमिव ऊधो यस्याः सा’ ( कुण्डा के समान है थन जिसका, वह ) — इस लौकिक विग्रह में बहुब्रीहि समास होने पर ‘ऊधसोऽनङ्।’ (५ । ४ । १३१) — इस सूत्र के अनुसार ऊधोऽन्त बहुब्रीहि से स्त्रीलिङ्ग में ‘अनङ्’ होता है। इस प्रकार ‘अनङ्’ होने पर ‘बहुव्रीहेरूधसो डीष् । ‘ ( ४ । १ । २५ ) — इस सूत्र से ‘डीष्’ प्रत्यय होता है। तत्पश्चात् अन्यान्य प्रक्रियात्मक कार्य होने के बाद ‘कुण्डोध्नी’ पद की सिद्धि होती है । ‘पुष्पं धनुर्यस्य स पुष्पधन्वा’ ( कामदेवः ), ‘सुष्ठु धनुर्यस्य स सुधन्वा ‘ ( श्रेष्ठ धनुष धारण करने वाला योद्धा) — इन दोनों बहुब्रीहि — पदों में ‘धनुषश्च।’ (५ । ४ । १३२ ) — इस सूत्र से ‘अनङ्’ होता है । तत्पश्चात् सुबादि सुबादि 24 प्रत्यय जिन प्रातिपदिकों के अन्त में प्रयुक्त होते हैं वे पद सुबन्त कहलाते हैं।कार्य होने पर ‘पुष्पधन्वा’ तथा ‘सुधन्वा ‘ — ये दोनों पद सिद्ध होते हैं ॥ १३ ॥

‘वित्तेन वित्तः इति वित्तचुञ्चुः ।’ — जो धन— वैभव के द्वारा प्रसिद्ध हो, वह ‘वित्तचुञ्चः ‘ है । शब्दशास्त्र में जिसकी प्रसिद्धि है, वह ‘शब्दचुञ्च’ कहलाता है। ये दोनों शब्द ‘चुञ्चुप्’ प्रत्यय होने पर
निष्पन्न होते हैं । इसी अर्थ में ‘चणप्’ प्रत्यय भी होता है । यथा — ‘केशचणः ‘ । जो अपने केशों से विदित है, वह ‘केशचणः’ कहा गया है। (इन प्रत्ययों का विधान ‘तेन वित्तश्चुञ्चपचणपौ ।’ (दा २ । २६ ) — इस सूत्र के अनुसार होता है । ‘पटु’ शब्द से ‘प्रशस्त’ अर्थ में ‘रूप’ प्रत्यय होने पर ‘पटुरूप:’ पद बनता है। ‘प्रशस्तः पटुः — पटरूपः ।’ जो प्रशस्त पटु है, वह ‘पटुरूप’ कहा जाता है । यह ‘रूप’ प्रत्यय ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’ — दोनों प्रकार के शब्दों से होता है । ‘तिङन्त’ शब्द से इस प्रकार होता है — प्रशस्तं पचति इति ‘पचतिरूपम् ।’ ‘पचतिरूपम्’ का अर्थ है — अच्छी तरह पकाता है। अतिशयार्थ — द्योतन के लिये ‘तमप्’, ‘इष्ठन्’, ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’ — ये प्रत्यय होते हैं । इनमें से ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’ — ये दोनों दो में से एक की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करते हैं और ‘तमप्’ तथा ‘इष्ठन् ‘ — ये दोनों बहुतों में से एक की श्रेष्ठता बताते हैं । पाणिनि ने इसके लिये दो सूत्रों का उल्लेख किया है — ‘अतिशायने तमबिष्ठनौ ।’ (५। ३। ५५) तथा ‘द्विवचनविभज्योत्तरपदे तरबीयसुनौ ।’ (५ । ३ । ५७) । इसके सिवा, यदि किसी द्रव्य का प्रकर्ष न बताना हो तो ‘तरप्’ ‘तमप्’ प्रत्ययों से परे ‘आम्’ हो जाता है। यह ‘आम्’ ‘किम्’ शब्द, ‘एदन्त’ शब्द, तिङन्त पद तथा अव्यय पद से भी होते हैं। इन सब नियमों के अनुसार ‘अयम् अनयोरतिशयेन पटुः । ‘ ( यह इन दोनों में अधिक पटु है) — इस अर्थ को बताने के लिये ‘पटु’ शब्द से ‘ईयसुन्’ प्रत्यय करने पर विभक्तिकार्यपूर्वक ‘पटीयान्’ रूप होता है। ‘अक्ष’ शब्द से ‘तरप्’ — प्रत्यय होने पर ‘अक्षतर’ और ‘पटु’ आदि शब्दों से उक्त प्रत्यय होने पर ‘पटुतरः’ आदि रूप बनते हैं । तिङन्त से ‘तरप्’ प्रत्यय करके अन्त में ‘आम्’ करने पर ‘पचतितराम्’ रूप बनता है ‘तमप्’ और ‘आम्’ प्रत्यय होने पर ‘अटतितमाम्’ इत्यादि उदाहरण उपलब्ध होते हैं ॥ १४-१५ ॥

किंचित् न्यूनता तथा असमाप्ति का भाव प्रकट करने के लिये ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’ शब्दों से ‘कल्पप्’, ‘देश्य’ तथा ‘देशीयर्’ प्रत्यय होते हैं । ‘ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः ‘ (५। ३। ६७ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘मृदु’ शब्द से ‘कल्पप्’ प्रत्यय होने पर ‘मृदुकल्पः ‘ प्रयोग बनता है । इसका अर्थ हुआ — ‘ कुछ कम मृदु या कोमल’ | ‘ईषदूनः इन्द्रः — इन्द्रकल्पः । ईषदूनः अर्कः—अर्ककल्पः । ‘ इत्यादि उदाहरण इसी तरह जानने योग्य हैं । ‘ईषदून: राजा’ — इस अर्थ में ‘राजन्’ शब्द से ‘देशीयर्’ प्रत्यय करने पर ‘राजदेशीयः ‘ तथा ‘देश्य’ प्रत्यय करने पर ‘राजदेश्यः’ — ये रूप बनते हैं । इसी तरह ‘पटु’ शब्द से ‘जातीय’ प्रत्यय करने पर ‘पटुजातीयः ‘ पद बनता है। इसका अर्थ है — पटुप्रकार— पटु के प्रकार का । ‘थल्’ प्रत्यय प्रकार मात्र का बोधक है, किंतु ‘जातीयर्’ प्रत्यय ‘प्रकारवान्’ का बोध कराता है। [इसका विधायक पा० सू० है — ‘प्रकारवचने जातीयर् ।’ ५। ३ । ६९ ] ‘ प्रमाणे द्वयसज्दध्ध्रञ्मात्रचः।’ (५ । २ । ३७ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘जल’ आदि का प्रमाण बताने के लिये ‘सुबन्त’ शब्दों से ‘द्वयसच्’ ‘दध्नच्’ तथा ‘मात्रच्’ प्रत्यय होते हैं । इस नियम से ‘मात्रच्’ प्रत्यय होने पर ‘जानुमात्रम्’ पद बनता है। इसका अर्थ है — घुटने तक ( पानी है) । ‘ ऊरु’ शब्द से ‘द्वयसच्’ प्रत्यय करने पर ‘ ऊरुद्वयसम्’ तथा ‘दध्नच्’ प्रत्यय करने पर ‘ ऊरुदध्ध्रम्’ — ये प्रयोग बनते हैं ॥ १६—१७ ॥

‘संख्याया अवयवे तयप् ।’ (पा०सू० ५।२। ४२) — इस सूत्र के अनुसार ‘पञ्चावयवा यस्य तत्’ (पाँच अवयव हैं, जिसके वह) इस अर्थ में ‘पञ्चन्’ शब्द से ‘तयप्’ प्रत्यय करने पर ‘पञ्चतयम्’ — यह रूप बनता है । ‘द्वारं रक्षति, द्वारे नियुक्तो वा दौवारिकः ‘ — जो द्वार की रक्षा करता है, अथवा द्वार पर रक्षा के लिये नियुक्त है, वह ‘दौवारिक’ है । ‘रक्षति ।’ (पा० सू० ४। ४ । ३३) अथवा ‘तत्र नियुक्तः । ‘ ( पा०सू० ४ । ४ । ६९) सूत्रसे यहाँ ‘ठक्’ प्रत्यय हुआ है । ‘ठ’ के स्थानमें ‘इक’ आदेश हो जाता है तथा ‘द्वारादीनां च ।’ (७ । ३ । ४) — इस सूत्र से ‘ऐच्’ का आगम होता है । फिर विभक्ति कार्य होने पर ‘दौवारिकः ‘ इस पद की सिद्धि होती है। इस प्रकार ‘ठक्’ प्रत्यय होने पर ‘दौवारिक’ शब्द की सिद्धि बतायी गयी है । यहाँ तक ‘तद्धित की सामान्यवृत्ति’ कही गयी अब ‘ अव्ययसंज्ञक तद्धित’ का निरूपण किया जाता है ॥ १८ ॥

‘यस्मादिति यतः’, ‘तस्मादिति ततः ‘ — यहाँ ‘पञ्चम्यास्तसिल्।’ (५ । ३ । ७) सूत्र के अनुसार ‘ तसिल्’ प्रत्यय होता है । इकार और लकार की इत्संज्ञा होकर उनका लोप हो जाता है ।  ‘ तसिल्’ प्रत्यय विभक्तिसंज्ञक होने के कारण ‘ त्यदादीनामः । ‘ ( ७ । २ । १०२ ) के नियमानुसार अकारान्तादेश हो जाता है । अतः, ‘यत्’ की जगह ‘य’ और तत् की जगह ‘त’ होने से ‘यतः ‘, ‘ ततः ‘— ये रूप बनते हैं । ‘ तसिलादयः प्राक् पाशपः । ‘ (‘तसिल्’ आदि से लेकर ‘पाशप्’ प्रत्यय के पूर्व तक जितने प्रत्यय विहित या अभिहित हुए हैं, उन सबकी ‘अव्ययसंज्ञा’ होती है) — इस परिगणना के अनुसार ‘यतः’, ‘ततः’ आदि शब्द ‘अव्यय’ माने गये हैं । ‘तसिल्’ आदि में ‘ त्रल्’ प्रत्यय भी आता है । इसका विधायक पाणिनिसूत्र है — ‘सप्तम्यास्त्रल् । ‘ (५ । ३ । १० ) । ‘ यस्मिन्निति यत्र’, | ‘तस्मिन्निति तत्र’ — इस लौकिक विग्रह में ‘ त्रल्’ प्रत्यय होने पर ‘यस्मिन् त्र’, ‘तस्मिन् त्र ।’ इस अवस्था में ‘कृत्तद्धितसमासाश्च’ (१ । २ । ४६ ) से प्रातिपदिक संज्ञा, ‘सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।’ (२ । ४। ७१) सूत्र से विभक्ति का लोप और ‘ त्यदादीनामः ।’ ( ७ । २ । १०२ ) सूत्र से अकारान्तादेश होने पर ‘यत्र तत्र’ — इन पदों की सिद्धि बतायी गयी है। ‘अस्मिन् काले’ — इस लौकिक विग्रह में ‘अधुना । ‘ (५ । ३ । १७) सूत्र से ‘अधुना’ प्रत्यय होने ‘अस्मिन् अधुना’ इस अवस्था में विभक्तिलोप, ‘इदम्’ के स्थान में ‘इश्’ अनुबन्धलोप तथा ‘यस्येति च । ‘ ( ६ । ४ । १४८) से इकारलोप होने पर ‘अधुना’ की सिद्धि हुई । इसी अर्थ में ‘दानीम् ‘ प्रत्यय होने पर ‘इदम्’ के स्थान में ‘इ’ होकर ‘इदानीम्’ रूप बनता है । ‘सर्वस्मिन् काले’ — इस विग्रह में ‘सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा’ (५। ३। १५) — इस सूत्र से ‘दा’ प्रत्यय होने पर ‘सर्वदा’ रूप बनता है । ‘तस्मिन् काले तर्हि’, ‘कस्मिन् काले — कर्हि’ यहाँ ‘तत्’ और ‘किम्’ शब्दों से ‘काल’ अर्थ में ‘अनद्यतने र्हिलन्यतरस्याम्।’ (५। ३ । २१ ) — इस सूत्र ‘र्हिल्’ प्रत्यय हुआ । फिर पूर्ववत् प्रातिपदिकावयव विभक्ति का लोप होकर ‘त्यदादीनामः । ‘ ( ७ । २ । १०२ ) — इस सूत्र से ‘तत्’ के स्थान पर ‘त’ और ‘किमः कः।’ (७। २। १०३) सूत्र से ‘किम्’ के स्थान में ‘क’ होने पर ‘तर्हि’ और ‘कर्हि’ — इन पदों की सिद्धि कही गयी है । ‘ अस्मिन् ‘ — इस विग्रह में ‘ त्रल्’ प्रत्यय की प्राप्ति हुई, किंतु उसे बाधित करके ‘इदमो हः । ‘ ( ५ । ३ । ११ ) — इस सूत्र से ‘हः ‘ प्रत्यय हो गया। फिर ‘इदम्’ के स्थान में इकार होने पर ‘इह’ रूप की सिद्धि हुई ॥ १९-२० ॥

‘येन प्रकारेण यथा, केन प्रकारेण कथम्’— इन स्थलों पर ‘प्रकारवचने थाल् ।’ (५ । ३ । २३) के अनुसार ‘थाल्’ प्रत्यय होने पर ‘यथा’, ‘ तथा ‘ आदि रूप होते हैं । ‘किम्’ शब्द से ‘किमश्च ।’ (५ । ३ । २५ ) के अनुसार ‘थम् ‘ प्रत्यय होता है । अतः ‘कथम्’ इस रूप की सिद्धि होती है । जो शब्द दिशा के अर्थ में रूढ़ होते हैं, ऐसे ‘दिशा’, ‘देश’ और ‘काल’ अर्थ में प्रयुक्त शब्दों से स्वार्थ में ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है। श्लोक में ‘पूर्वस्याम्’ यह सप्तमी विभक्ति का, ‘पूर्वस्याः ‘ यह पञ्चमी विभक्ति का तथा ‘पूर्वा’ यह प्रथमा विभक्ति का प्रतिरूप है। अर्थात् उक्त शब्द यदि सप्तम्यन्त, पञ्चम्यन्त और प्रथमान्त हों, तभी उनसे ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है । ‘पूर्व’, ‘अधर’ और ‘अवर’ शब्दों के स्थान में क्रमश: ‘पुर’ ‘अध’ और ‘अव’ आदेश होते हैं । ‘अस्ताति’ के स्थान में ‘असि प्रत्यय का भी विधान होता है। इन निर्दिष्ट नियमों के अनुसार ‘पूर्वस्यां दिशि’, ‘पूर्वस्याः दिशः ‘ ‘पूर्वा वा दिक्’ — इन लौकिक विग्रहों में ‘पुरः’, ‘पुरस्तात्’ — ये रूप होते हैं । उसी प्रकार अधः, अधस्तात्’ — ‘अवः, अवस्तात्’ — इत्यादि रूप जानने चाहिये। इनके वाक्यप्रयोग ‘पुरस्तात् संचरेद्’, ‘पुरस्ताद् गच्छेत्’ इत्यादि रूप में होते हैं । ‘समाने अहनि’ — इस अर्थ में ‘सद्यः ‘ — इस शब्द का प्रयोग होता है । ‘समान’ का ‘स’ और अहनि’ के स्थान में ‘द्यस्’ निपातित होकर ‘सद्यः’— इस पद की सिद्धि होती है । ‘पूर्वस्मिन् वर्षे परुत्’ — ‘ पूर्वतरवर्षे परारि’ इति ( पूर्व वर्ष में— इस अर्थ को बताने के लिये ‘परुत्’ शब्द का प्रयोग होता है तथा पूर्व से पूर्व वर्ष में — इस अर्थ का बोध कराने के लिये ‘परारि’ शब्द का प्रयोग होता है ।) पहले में ‘पूर्व’ शब्द के स्थान में ‘पर’ आदेश होता है और उससे ‘उत्’ प्रत्यय किया जाता है । दूसरे में ‘आरि’ प्रत्यय होता है और ‘पूर्व’ के स्थान में ‘पर’ आदेश । ‘ अस्मिन् संवत्सरे’ (इस वर्षमें) इस अर्थ का बोध कराने के लिये ‘ऐषमः ‘ पद का प्रयोग होता है। इसमें ‘इदम् ‘ शब्द के स्थान में ‘इकार’ आदेश और उससे परे ‘समसण्’ प्रत्यय का निपातन होता है। अकार — णकार की इत्संज्ञा हो जाने पर ‘इ+ समः ‘ — इस अवस्था में आदिवृद्धि और सकार के स्थान में मूर्धन्यादेश होनेप र ‘ऐषमः ‘ रूप की सिद्धि होती है। ‘परस्मिन्नहनि ‘ ( दूसरे दिन ) — के अर्थ में ‘पर’ शब्द से ‘एद्यवि’ प्रत्यय करने पर ‘परेद्यवि ‘ — यह रूप होता है । ‘ अस्मिन्नहनि ‘ ( आज के दिन ) इस अर्थ में ‘इदम्’ शब्द से ‘द्य’ प्रत्यय होता है और ‘इदम्’ के स्थान में ‘अ’ हो जाता है। इस प्रकार अद्य’ — यह रूप बनता है । ‘पूर्वस्मिन् दिने’ ( पहले दिन ) — इस अर्थ में ‘पूर्व’ शब्द से ‘एघुस्’ प्रत्यय होता है तो ‘ पूर्वेद्युः’ यह रूप बनता है । इसी प्रकार ‘परस्मिन् दिने’ — ‘परेद्युः’, ‘अन्यस्मिन् दिने’ — ‘अन्येद्युः’ इत्यादि प्रयोग जानने चाहिये ।

‘दक्षिणस्यां दिशि वसेत्’ (दक्षिण दिशा में निवास करे ।) — इस अर्थ में ‘दक्षिणा’ और ‘दक्षिणाहि’— ये रूप बनते हैं । पहले में ‘दक्षिणादाच्’ (५। ३ । ३६) — इस सूत्र से ‘आच्’ प्रत्यय होता है और दूसरे में ‘आहि च दूरे । ‘ ( ५। ३ । ३७ ) — इस सूत्र से ‘आहि’ प्रत्यय किया गया है । ‘दक्षिणाहि वसेत्’ का अर्थ हुआ — ‘ दक्षिण दिशा में दूर निवास करे ।’ ‘दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच् ।’ (५। ३। २८) तथा ‘उत्तराधरदक्षिणादातिः ।’ (५। ३ । ३४) — इन सूत्रों के अनुसार ‘दक्षिणतः ‘, ‘दक्षिणात्’, ‘उत्तरतः’, ‘उत्तरात्’ — ये दो रूप भी बनते हैं । ‘ उत्तरस्यां दिशि वसेत्’ (उत्तर दिशा में निवास करे ) — इस अर्थ में ‘उत्तराच्च । ‘ (५ | ३ | ३८ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘आच्’ और ‘आहि’ प्रत्यय होनेपर ‘उत्तरा’ तथा ‘उत्तराहि’— ये दोनों रूप सिद्ध होते हैं । ‘अस्ताति’ प्रत्यय के विषयभूत ‘ऊर्ध्व’ शब्द से ‘रिल्’ और ‘रिष्टातिल् ‘ प्रत्यय होते हैं तथा ‘ऊर्ध्व’ के स्थान में ‘उप’ आदेश हो जाता है । इस प्रकार ‘उपरि वसेत्’, ‘उपरिष्टाद् भवेत्’ इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं । ‘उत्तर’ शब्द से ‘एनप्’ प्रत्यय होने पर ‘उत्तरेण’ होता है। पूर्वोक्त ‘दक्षिणा’ शब्द की सिद्धि ‘आच्’ प्रत्यय होने से होती है — इसका निर्देश पहले किया जा चुका है । ‘आहि’ प्रत्यय होने पर ‘दक्षिणाहि’ पद बनता है — यह भी कहा जा चुका है । ‘दक्षिणाहि वसेत्’ इसका अर्थ भी दिया जा चुका है । ‘संख्याया विधार्थेधा ।’ (५। ३ । ४२) — इस सूत्र के अनुसार संख्यावाची शब्दों से ‘धा’ प्रत्यय करने पर द्विधा, त्रिधा, चतुर्धा, पञ्चधा इत्यादि रूप होते हैं । ‘द्विधा’ का अर्थ है — दो प्रकार का । ‘एक’ शब्द से प्रकार अर्थमें पूर्वोक्त नियमानुसार जो ‘धा’ प्रत्यय होता है, उसके स्थान में ‘ध्यमुञ्’ हो जाता है । ‘उञ्’ की इत्संज्ञा हो जाती है । ‘ध्यम्’ शेष रह जाता है । यथा — ऐकध्यम्, ‘एकधा’ (द्रष्टव्य पा० सू० ५ा ३ । ४४) । ‘ऐकध्यं कुरु त्वम्’ इस वाक्य का अर्थ है — ‘ तुम एक ही प्रकार से कर्म करो।’ इसी प्रकार ‘द्वि’ और ‘त्रि’ शब्द से ‘धा’ के स्थान में ‘धमुञ्’ होता है । विकल्प से (द्रष्टव्य — पा० सू० ५ । ३ । ४५) । ‘धमु’ होने पर ‘द्वैधम्, त्रैधम्’ रूप होते हैं और ‘धमुञ्’ न होने पर ‘द्विधा’, ‘त्रिधा’ । ‘द्वि’, ‘त्रि’ शब्दों से सम्बद्ध ‘ धा’ के स्थान में ‘एधाच्’ भी होता है । यथा — द्वेधा, त्रेधा । ये सभी प्रयोग सुष्ठुतर हैं ॥ २१-२७ ॥

यहाँ तक ‘निपातसंज्ञक तद्धित’ (अथवा अव्ययतद्धित) प्रत्यय बताये गये। अब ‘भाववाचक तद्धित का’ वर्णन किया जाता है । — ‘ तस्य भावस्त्वतलौ।’ (५। ११ । ११९ ) — इस सूत्र के अनुसार भावबोधक प्रत्यय दो हैं — ‘त्व’ और ‘तल्’ । प्रकृतिजन्य बोध में जो प्रकार होता है, उसे ‘भाव’ कहते हैं । ‘पटु’ शब्द से ‘पटोर्भावः ‘— इस अर्थ में ‘त्व’ प्रत्यय होने पर ‘पटुत्वम्’ रूप होता है और ‘तल्’ प्रत्यय होने पर ‘पटुता’ । ‘पृथोर्भावः’ (पृथुका भाव ) — इस अर्थ में ‘पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा ।’ (५ । १ । १२२ ) — इस सूत्र से वैकल्पिक ‘इमनिच्’ प्रत्यय होने पर ‘प्रथिमा’ — यह रूप बनता है । ‘प्रथिमा’ का अर्थ है — मोटापन । ‘सुखस्य भावः कर्म वा ‘ (सुखका भाव या कर्म) — इस अर्थ में ‘गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च । ‘ ( ५ । १ । १२४) — इस सूत्र के अनुसार ‘ष्यञ्’ प्रत्यय होने पर ‘सौख्यम्’ — इस पद की सिद्धि कही गयी है । ‘स्तेनस्य भावः कर्म वा’ (स्तेन— चोरका भाव या कर्म ) — इस अर्थ में ‘स्तेन’ शब्दसे ‘यत्’ प्रत्यय और ‘न’ — इस समुदायका लोप हो जाता है । (द्रष्टव्य — पा० सू० ५ । १ । १२५ ) । इस प्रकार ‘स्तेय’ शब्द की सिद्धि होती है । इसी प्रकार ‘सख्युर्भावः कर्म वा’ (सखा का भाव या कर्म ) — इस अर्थ में ‘य’ प्रत्यय होने पर ‘सख्यम्’ इस पद की सिद्धि कही गयी है । यहाँ ‘सख्युर्यः । ‘ ( ५ । १ । १२६ ) — इस सूत्र से ‘य’ प्रत्यय होता है । ‘ कपेर्भावः कर्म वा’ — इस अर्थ में ‘कपिज्ञात्योर्दक् ।’ (५ । १ । १२७ ) — इस सूत्र से ‘ढक्’ प्रत्यय होने पर ‘कापेयम्’ पद की सिद्धि होती है । ‘सेना एव सैन्यम्’ — यहाँ ‘चतुर्वर्णादीनां स्वार्थ उपसंख्यानम्’— इस वार्तिक के अनुसार स्वार्थ में ‘ष्यञ्’ प्रत्यय होता है । ‘शास्त्रीयात् पथः अनपेतम्’ (शास्त्रीय पथ से जो भ्रष्ट नहीं हुआ है, वह ) — इस अर्थ में ‘धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते । ‘ ( ४ । ४ । ९२ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘पथिन्’ शब्द से ‘यत्’ प्रत्यय होने पर ‘पथ्यम्’— यह रूप होता है । ‘अश्वस्य भावः कर्म वा आश्वम्’ — यहाँ ‘अश्व’ शब्दसे ‘अञ्’ हुआ है। ( ‘उष्ट्रस्य भावः कर्म वा औष्टम्’ — यहाँ भी ‘अञ्’ प्रत्यय हुआ है । ) ‘कुमारस्य भावः कर्म वा कौमारम्’ — इसमें भी ‘कुमार’ शब्दसे ‘अञ्’ प्रत्यय हुआ । ‘यूनोर्भावः कर्म वा यौवनम्’ — यहाँ भी पूर्ववत् ‘युवन्’ शब्द से ‘अञ्’ प्रत्यय हुआ है। इन सबमें ‘अञ्’ प्रत्यय विधायक सूत्र है— ‘प्राणभृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ्’ (५ | १| १२९) । ‘आचार्य’ शब्द से ‘कन्’ प्रत्यय होने पर ‘ आचार्यकम् ‘ — यह रूप बनता है । इसी तरह अन्य भी बहुत—से तद्धित प्रत्यय होते हैं, (उन्हें अन्य ग्रन्थों से जानना चाहिये) ॥ २८-३० ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘तद्धितान्त शब्दोंके रूपका कथन’ नामक तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५६ ॥

1. ‘पाणिनि — व्याकरण के अनुसार ‘वत्सांसाभ्यां कामबले ।’ (५ । २ । ९८ ) — इस सूत्र  से क्रमशः ‘कामवान्’ और ‘बलवान्’ के अर्थ में ‘वत्स’ और ‘अंस’ शब्दों से ‘लच्’ प्रत्यय होता है । सूत्र में ‘काम’ तथा ‘बल’ शब्द अर्श आद्यजन्य माने गये हैं। ‘काम’ शब्द यहाँ ‘स्नेह’ का वाचक है। यद्यपि लोक में ‘वत्स’ का अर्थ बछड़ा और ‘अंस’ का अर्थ कंधा समझा जाता है, तथापि तद्धित वृत्तिमें ‘वत्स’ और ‘अंस’ शब्द क्रमशः ‘स्नेह’ तथा ‘बल’ के अर्थमें ही लिये गये हैं ( तत्त्वबोधिनी)। इन अर्थोंमें ‘मतुप् ‘ प्रत्ययका समुच्चय नहीं होता; क्योंकि ‘मतुप् ‘ प्रत्यय करने पर उक्त अर्थों की प्रतीति न होकर अर्थान्तर की ही प्रतीति होती है। यथा ‘वत्सवती गौः । ‘ ‘अंसवान् दुर्बलः । ‘ इत्यादि ।
2. पाणिनि के अनुसार ‘फेनादिलच् च’ ( ५। २ । ९९ ) — इस सूत्र से ‘इलच्’ प्रत्यय होता है। यहाँ चकार से ‘लच्’ प्रत्यय का भी विकल्प से विधान सूचित होता है। ‘प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् ।’ (५। २ । ९६ ) — इस सूत्र से ‘ अन्यतरस्याम्’ पदकी अनुवृत्ति होती है, जिससे यहाँ ‘ मतुप् ‘ का भी समुच्चय होता है । इस प्रकार ‘फेन’ शब्द से तीन रूप होते हैं — ‘फेनिलः’, फेनलः ‘ तथा ‘फेनवान्’ सागरः ।

3. ‘लोमशः’ ‘पामनः’ और ‘पिच्छिलः’ आदि पदों के साधन के लिये पाणिनि ने एक ही सूत्र का उल्लेख किया है — ‘लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः ।’ (५|२| १००)
4. ‘ऊषसुषिमुष्कमधो रः’ (पा० सू० ५। २ । १०७ ) — इस सूत्र से ‘ र ‘ प्रत्यय होने पर ‘ऊष’ आदि शब्दों से ‘ऊषरः’, ‘सुषिरम्’, ‘मुष्करः’, ‘मधुरम् ‘ — ये प्रयोग सिद्ध होते हैं । ये क्रमशः ऊसर भूमि, छिद्र, अण्डकोशवान् तथा माधुर्ययुक्त के बोधक हैं।

5. ‘केशाद्वोऽन्यतरस्याम् ।’ (५। २ । १०९ ) — इस सूत्र से ‘केश’ शब्द से ‘व’ प्रत्यय होनेपर ‘केशवः ‘ रूप बनता है। ‘अन्यतरस्याम्’ की अनुवृत्ति प्रकरणतः प्राप्त होने से ‘मतुप् ‘ सिद्ध था; पुनः उक्त सूत्र में जो उसका ग्रहण किया गया, इससे ‘इन्’ और ‘ठन्’ का भी समावेश होता है, अतः केशवान्, केशी और केशिकः— ये तीन रूप और बनते हैं। ये सभी प्रयोग मत्वर्थीयप्रत्ययान्त हैं, तथापि व्यवहार में अन्तर है। ‘केशवः ‘ का अर्थ है — घुँघराले केशवाले भगवान् श्रीकृष्ण । अन्य किसी के लिये इस शब्द का प्रयोग नहीं देखा जाता । ‘केशी’ और ‘केशिक’ उस दैत्य का वाचक है, जो अश्वरूपधारी था और उसकी गर्दन पर बड़े—बड़े बाल (अयाल ) थे। ‘केशवान्’ पद सामान्यतः सभी केशधारियों के लिये प्रयुक्त होता है।
6.7.  ‘हिरण्यवः’ का अर्थ ‘हिरण्यवान्’ (सुवर्ण — सम्पत्ति से युक्त ) तथा ‘मणिव: ‘ शब्द ‘मणिधारी’ ( मनियारा) सर्प या नाग के लिये प्रयुक्त होता है ।
8. ‘रजः कृष्यासुतिपरिषदो वलच्’ (५। २ । ११२ ) — इस सूत्र से ‘वलच्’ प्रत्यय होने पर क्रमशः ‘रजस्वल’, ‘कृषीवल’, आसुतीवल’ तथा ‘परिषद्वल’ शब्द सिद्ध होते हैं। इनके अर्थ क्रमशः इस प्रकार हैं— धूलसे भरा, किसान, जुआरी तथा परिषत् — सभा या समूह से युक्त ।
9. ‘अत इनिठनौ’ (५। २ । ११५ ) — इस सूत्र से ‘इनि’ प्रत्यय होनेपर ‘धनी’ तथा ‘ठन्’ प्रत्यय होने पर ‘ धनिकः ‘ रूप बनते हैं । इसी प्रकार करी, करिकः, हस्ती, हस्तिकः — ये रूप बनते हैं । ‘धनी’ का अर्थ है— धनवान् तथा ‘करी’ और ‘हस्ती’ का अर्थ है — हाथी । ‘पयस्वी’ का अर्थ है — दूधवाला तथा ‘मायावी’ का अर्थ है — माया फैलानेवाला । ‘विनि’ प्रत्यय का विधायक सूत्र है—— अस्मायामेधास्रजो विनिः ।’ (५ । २ । १२१) । ‘ऊर्णाया युस् ।’ (५। २ । १२३ ) — इस सूत्र से ‘युस्’ प्रत्यय का विधान हुआ । ‘ऊर्णायुः माने ऊनी ।
10. ‘ वाचोग्मिनिः ।’ (५ । २ । १२४ ) — इस सूत्र से ‘ग्मिनि’ प्रत्यय होता है । ‘आलजाटचौ बहुभाषिणि ।’ ‘कुत्सित इति वक्तव्यम्’— इन वार्तिकोंद्वारा ‘आलच्’ और ‘आटच्’ प्रत्यय होते हैं। अच्छी बातको बहुत बोलनेवाला ‘वाग्मी’ कहलाता है और कुत्सित बात को अधिक बोलने वाला ‘वाचाल’ और ‘वाचाट’ कहलाता है । ‘फलबर्हाभ्यामिनच् ।’ इस वार्तिक से ‘इनच्’ और ‘शृङ्गवृन्दाभ्याम् आरकन् ।’ इस वार्तिक से ‘आरकन्’ प्रत्यय होने पर ‘फलिनः ‘ (फलवान्), ‘बर्हिणः’ (मोर) तथा ‘वृन्दारकः’ (देवता) — ये प्रयोग सिद्ध होते हैं ।

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