July 12, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 271 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ एकहत्तरवाँ अध्याय वेदों के मन्त्र और शाखा आदि का वर्णन तथा वेदों की महिमा वेद शाखादिकीर्तनं पुष्कर कहते हैं — परशुराम! वेदमन्त्र सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करने वाले तथा चारों पुरुषार्थों के साधक हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद — ये चार वेद हैं। इन के मन्त्रों की संख्या एक लाख है। ऋग्वेद की एक शाखा ‘सांख्यायन’ और दूसरी शाखा ‘आश्वलायन’ है। इन दो शाखाओं में एक सहस्त्र तथा ऋग्वेदीय ब्राह्मण भाग में दो सहस्र मन्त्र हैं। श्री कृष्ण द्वैपायन आदि महर्षियों ने ऋग्वेद को प्रमाण माना है। यजुर्वेद में उन्नीस सौ मन्त्र हैं। उस के ब्राह्मण ग्रन्थों में एक हजार मन्त्र हैं और शाखाओं में एक हजार छियासी। यजुर्वेद में मुख्यतया काण्वी, माध्यन्दिनी, कठी, माध्यकठी, मैत्रायणी, तैत्तिरीया एवं वैशम्पायनीया — ये शाखाएँ विद्यमान हैं। सामवेद में कौथुमी और आथर्वणायनी (राणायनीया) — ये दो शाखाएँ मुख्य हैं। इसमें वेद, आरण्यक, उक्था और ऊह —ये चार गान हैं। सामवेद में नौ हजार चार सौ पचीस मन्त्र हैं। वे ब्रह्म से सम्बन्धित हैं। यहाँ तक सामवेद का मान बताया गया ॥ १-७ ॥’ अथर्ववेद में सुमन्तु, जाजलि, श्लोकायनि, शौनक, पिप्पलाद और मुञ्जकेश आदि शाखाप्रवर्तक ऋषि हैं। इसमें सोलह हजार मन्त्र और सौ उपनिषद् हैं। व्यासरूप में अवतीर्ण होकर भगवान् श्रीविष्णु ने ही वेदों की शाखाओं का विभाग आदि किया है। वेदों के शाखाभेद आदि इतिहास और पुराण सब विष्णुस्वरूप हैं। भगवान् व्यास से लोमहर्षण सूत ने पुराण आदि का उपदेश पाकर उनका प्रवचन किया। उनके सुमति, अग्रिवर्चा, मित्रयु, शिंशपायन, कृतव्रत और सावर्णि — ये छः शिष्य हुए। शिंशपायन आदि ने पुराणों की संहिता का निर्माण किया। भगवान् श्रीहरि ही ‘ब्राह्म’ आदि अठारह पुराणों एवं अष्टादश विद्याओं के रूप में स्थित हैं। वे सप्रपञ्च निष्प्रपञ्च तथा मूर्त-अमूर्त स्वरूप धारण करने वाले विद्यारूपी श्रीविष्णु ‘आग्नेय महापुराण ‘ में स्थित हैं । उनको जानकर उनकी अर्चना एवं स्तुति करके मानव भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त कर लेता है। भगवान् विष्णु विजयशील, प्रभावसम्पन्न तथा अग्नि सूर्य आदि के रूप में स्थित हैं। वे भगवान् विष्णु ही अग्निरूप से देवता आदि के मुख हैं। वे ही सबकी परमगति हैं। वे वेदों तथा पुराणों में ‘यज्ञमूर्ति के नाम से गाये जाते हैं। यह ‘अग्निपुराण’ श्रीविष्णु का ही विरारूप है। इस अग्नि-आग्नेय पुराण के निर्माता और श्रोता श्रीजनार्दन ही हैं। इसलिये यह महापुराण सर्ववेदमय, सर्वविद्यामय तथा सर्वज्ञानमय है। यह उत्तम एवं पवित्र पुराण पठन और श्रवण करने वाले मनुष्यों के लिये सर्वात्मा श्रीहरिस्वरूप है। यह ‘आग्नेय- महापुराण’ विद्यार्थियों के लिये विद्याप्रद, अर्थार्थियों के लिये लक्ष्मी और धन-सम्पत्ति देने वाला, राज्यार्थियों के लिये राज्यदाता, धर्मार्थियों के लिये धर्मदाता, स्वर्गार्थियों के लिये स्वर्गप्रद और पुत्रार्थियोंके लिये पुत्रदायक है। गोधन चाहनेवालेको गोधन और ग्रामाभिलाषियोंको ग्राम देने वाला है। यह कामार्थी मनुष्योंको काम, सम्पूर्ण सौभाग्य, गुण तथा कीर्त्ति प्रदान करने वाला है। विजयाभिलाषी पुरुषों को विजय देता है, सब कुछ चाहने वालों को सब कुछ देता है, मोक्षकामियों को मोक्ष देता है और पापियों के पापों का नाश कर देता है ॥ ८-२२ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वेदों की शाखा आदि का वर्णन’ नामक दो सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७१ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe