अग्निपुराण – अध्याय 272
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय
विभिन्न पुराणों के दान तथा महाभारत-श्रवण में दान-पूजन आदि का माहात्म्य
दानादिमाहात्म्यम्

पुष्कर कहते हैं — परशुराम। पूर्वकाल में लोकपितामह ब्रह्मा ने मरीचि के सम्मुख जिस का वर्णन किया था, पचीस हजार श्लोकों से समन्वित उस ‘ब्रह्मपुराण’ को लिखकर ब्राह्मण को दान दे। स्वर्गाभिलाषी वैशाख की पूर्णिमा को जलधेनु के साथ ‘ब्रह्मपुराण’ का दान करे। ‘पद्मपुराण’ में जो पद्म संहिता (भूमिखण्ड) है, उस में बारह  हजार श्लोक हैं। ज्येष्ठमास की पूर्णिमा को गौ के साथ इसका दान करना चाहिये। महर्षि पराशर ने वाराह कल्प के वृत्तान्त को अभिगत करके तेईस हजार श्लोकों का ‘विष्णुपुराण’ कहा है। इसे आषाढ़ ‌की पूर्णिमा को जलधेनु सहित प्रदान करे। इससे मनुष्य भगवान् विष्णु के परमपद को प्राप्त होता है। चौदह हजार श्लोकों वाला ‘वायुपुराण’ भगवान् शंकर को अत्यन्त प्रिय है। इसमें वायुदेव ने श्वेतकल्प के प्रसङ्ग से धर्म का वर्णन किया है। इस पुराण को लिखकर श्रावण की पूर्णिमा को गुड़धेनु के साथ ब्राह्मण को दान करे। गायत्री मन्त्र का आश्रय लेकर निर्मित हुए जिस पुराण में भागवत धर्म का विस्तृत वर्णन है, सारस्वतकल्प का प्रसङ्ग कहा गया है तथा जो वृत्रासुर-वध की कथा से युक्त है — उस पुराण को ‘भागवत’ कहते हैं। इसमें अठारह हजार श्लोक हैं। इसको सोने के सिंहासन के साथ भाद्रपद की पूर्णिमा को दान करे। जिसमें देवर्षि नारद ने बृहत्कल्प के वृत्तान्त का आश्रय लेकर धर्मों की व्याख्या की है, वह ‘नारदपुराण’ है।’ उसमें पचीस हजार श्लोक हैं। आश्विन मास की पूर्णिमा को धेनु सहित उसका दान करे। इससे आत्यन्तिक सिद्धि प्राप्त होती है। जिसमें पक्षियों के द्वारा धर्माधर्म का विचार किया गया है, नौ हजार श्लोकों वाले उस ‘मार्कण्डेयपुराण’ का कार्तिक की पूर्णिमा को दान करे। अग्निदेव ने वसिष्ठ मुनि को जिसका श्रवण कराया है, वह ‘अग्निपुराण’ है। इस ग्रन्थ को लिखकर मार्गशीर्ष की पूर्णिमा तिथि में ब्राह्मण के हाथ में दे। इस पुराण का दान सब कुछ देने वाला है। इसमें बारह हजार ही श्लोक हैं और यह पुराण सम्पूर्ण विद्याओं का बोध कराने वाला है। ‘भविष्यपुराण’ सूर्य-सम्भव है। इसमें सूर्यदेव की महिमा बतायी गयी है। इसमें चौदह हजार श्लोक हैं। इसे भगवान् शंकर ने मनु से कहा है। गुड़ आदि वस्तुओं के साथ पौष की पूर्णिमा को इसका दान करना चाहिये। सावर्ण्य-मनु ने नारद से ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ का वर्णन किया है। इसमें रथन्तर- कल्प का वृत्तान्त है और अठारह हजार श्लोक हैं। माघमास की पूर्णिमा को इसका दान करे। वराह के चरित्र से युक्त जो ‘वाराहपुराण’ है, उसका भी माघ मास की पूर्णिमा को दान करे। ऐसा करने से दाता ब्रह्मलोक का भागी होता है। जहाँ अग्निमय लिङ्ग में स्थित भगवान् महेश्वर ने आग्नेयकल्प के वृत्तान्तों से युक्त धर्मों का विवेचन किया है, वह ग्यारह हजार श्लोकों वाला ‘लिङ्गपुराण’ है। फाल्गुन की पूर्णिमा को तिलधेनु के साथ उसका दान करके मनुष्य शिवलोक को प्राप्त होता है। ‘वाराहपुराण में भगवान् श्रीविष्णु ने भूदेवी के प्रति मानव जगत्‌ की प्रवृत्ति से लेकर वराह-चरित्र आदि उपाख्यानों का वर्णन किया है। इसमें चौबीस हजार श्लोक हैं। चैत्र की पूर्णिमा को ‘गरुड पुराण ‘ का सुवर्णक साथ दान करके मनुष्य विष्णुपद को प्राप्त होता है। ‘स्कन्दमहापुराण’ चौरासी हजार श्लोकों का है। कुमार स्कन्द ने तत्पुरुष-कल्प की कथा एवं शैवमत का आश्रय लेकर इस महापुराण का प्रवचन किया है। इसका भी चैत्र को पूर्णिमा को दान करना चाहिये। दस हजार श्लोकों से युक्त ‘वामनपुराण’ धर्मार्थ आदि पुरुषार्थों का अवबोधक है। इसमें श्री हरि को धौमकल्प से सम्बन्धित कथा का वर्णन है। शरद् पूर्णिमा में विषुव-संक्रान्ति के समय इसका दान करे। ‘कूर्मपुराण ‘ में आठ हजार श्लोक हैं। कूर्मावतार श्री हरि ने इन्द्रद्युम्न के प्रसङ्ग से रसातल में इसको कहा था। इसका सुवर्णमय कच्छप के साथ दान करना चाहिये। मत्स्यरूपी श्रीविष्णु ने कल्प के आदिकाल में मनु को तेरह हजार श्लोकों से युक्त ‘मत्स्यपुराण’ का श्रवण कराया था। इसे हेमनिर्मित मत्स्य के साथ प्रदान करे। आठ हजार श्लोकों वाले ‘गरुडपुराण’ का भगवान् श्री विष्णु ने तार्क्ष्यकल्प में प्रवचन किया था। इसमें विश्वाण्ड से गरुड़ की उत्पत्ति की कथा कही गयी है। इसका स्वर्णहंस के साथ दान करे। भगवान् ब्रह्मा ने ब्रह्माण्ड के माहात्म्य का आश्रय लेकर जिसे कहा है, बारह हजार श्लोकों वाले उस ‘ब्रह्माण्ड पुराण ‘ को भी लिखकर ब्राह्मण के हाथ में दान करे ॥ १-२२ ॥

महाभारत-श्रवणकाल में प्रत्येक पर्व की समाप्ति पर पहले कथावाचक का वस्त्र, गन्ध, माल्य आदि से पूजन करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणों को खीर का भोजन करावे। प्रत्येक पर्व की समाप्ति पर गौ, भूमि, ग्राम तथा सुवर्ण आदि का दान करे। महाभारत के पूर्ण होने पर कथावाचक ब्राह्मण और महाभारत-संहिता की पुस्तक का पूजन करे। ग्रन्थ को पवित्र स्थानप र रेशमी वस्त्र से आच्छादित करके पूजन करना चाहिये। फिर भगवान् नर-नारायण की पुष्प आदि से पूजा करे। गौ, अन्न, भूमि, सुवर्ण के दानपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराकर क्षमा-प्रार्थना करे। श्रोता को विविध रत्नों का महादान करना चाहिये। प्रत्येक मास में कथावाचक को दो या तीन माशे सुवर्ण का दान करे और अयन के प्रारम्भ में भी पहले उसके लिये सुवर्ण के दान का विधान है। द्विजश्रेष्ठ! समस्त श्रोताओं को भी कथावाचक का पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य इतिहास एवं पुराणों का पूजन करके दान करता है, वह आयु, आरोग्य, स्वर्ग और मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है 1 ॥ २३-२९ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पुराणदान आदि के माहात्म्य का कथन’ नामक दो सौ बहत्तर अध्याय पूरा हुआ ॥ २७२ ॥

1. इस अध्याय में विभिन्न पुराणों की जो श्लोक संख्याएँ दी गयी हैं, वे अन्य पुराणों के वर्णनों से बहुत अंश में मेल नहीं खाती हैं तथा उपलब्ध पुराणों को देखने से भी इन वर्णनों की प्रायः संगति नहीं बैठती है। पद्मपुराण में जहाँ छप्पन हजार श्लोक हैं, वहाँ इसमें बारह हजार ही श्लोक बताये गये हैं। सम्भव है, केवल पद्मसंहिता (भूमिखण्ड) के ही इतने श्लोक कहे गये हों। विष्णुपुराण में पाँच हजार श्लोक उपलब्ध होते हैं, किंतु इसमें तेईस हजार श्लोक कहे गये हैं। यदि विष्णुधर्मोत्तरपुराण के भी श्लोक इसके साथ सम्मिलित कर लिये जायें तो उक्त संख्या संगत हो सकती है। वाराहपुराण के चौबीस हजार श्लोक बताये गये हैं, किंतु वर्तमान पुस्तकों में उतने श्लोक नहीं मिलते। गरुडपुराण में आठ हजार श्लोक बताये गये हैं, परंतु उपलब्ध गरुडपुराण में इससे दूने से भी अधिक श्लोक मिलते हैं। यह भी सम्भव है कि भूल से गरुडपुराण की जगह वाराहपुराण और वाराहपुराण के स्थान में गरुडपुराण लिख गया हो।

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