अभयप्राप्तिसूक्त March 23, 2025 | aspundir | Leave a comment अभयप्राप्तिसूक्त जीवन में सर्वाधिक प्रिय वस्तु अपने प्राण ही होते हैं और सबसे बड़ा भय भी प्राणों से रहित होने का-मृत्यु का ही होता है। इसी दृष्टि से मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने सब प्रकार से भयमुक्त रहने के लिये प्राणों की प्रार्थना की है और कहा है-जिस प्रकार द्यौ, पृथिवी, अन्तरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा आदि सभी भयमुक्त… Read More
हिरण्यगर्भ सूक्त March 22, 2025 | aspundir | Leave a comment हिरण्यगर्भसूक्त हिरण्य को अग्नि का रेत कहते हैं। हिरण्यगर्भ अर्थात् सुवर्णगर्भ सृष्टि के आदि में स्वयं प्रकट होने वाला बृहदाकार- अण्डाकार तत्त्व है। यह सृष्टि का आदि अग्नि तत्त्व माना गया है। महासलिल में प्रकट हुए हिरण्यगर्भ की तीन गतियाँ बतायी गयी हैं- १- आपः (सलिल) में ऊर्मियों के उत्पन्न होने से समेषण हुआ। २-आगे… Read More
नासदीयसूक्त March 22, 2025 | aspundir | Leave a comment नासदीयसूक्त ऋग्वेद के १०वें मण्डल के १२९वें सूक्त के १ से ७ तक के मन्त्र ‘नासदीयसूक्त’ के नाम से सुविदित हैं। इस सूक्त के द्रष्टा ऋषि प्रजापति परमेष्ठी, देवता भाववृत्त तथा छन्द त्रिष्टुप् है। इस सूक्त में ऋषि ने बताया है कि सृष्टि का निर्माण कब, कहाँ और किससे हुआ। यह बड़ा ही रहस्यपूर्ण और… Read More
ऋत सूक्त March 22, 2025 | aspundir | Leave a comment ऋतसूक्त ऋग्वेद के १० वें मण्डल का १९० वाँ सूक्त ‘ऋतसूक्त’ है। यह अघमर्षणसूक्त भी कहलाता है। इसके ऋषि माधुच्छन्द अघमर्षण, देवता भाववृत्त तथा छन्द अनुष्टुप् है। यह सूक्त सृष्टि विषयक है। ऋषि ने परमपिता परमेश्वर की स्तुति करते हुए कहा है कि महान तप से सर्वप्रथम ऋत और सत्य प्रकट हुए। परम ब्रह्म की… Read More
कृषि सूक्त March 22, 2025 | aspundir | Leave a comment कृषिसूक्त अथर्ववेद के तीसरे काण्ड का १७वाँ सूक्त ‘कृषिसूक्त’ है। इस सूक्त के ऋषि ‘विश्वामित्र’ तथा देवता ‘सीता’ हैं। इसमें मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने कृषि को सौभाग्य बढ़ाने वाला बताया है। कृषि एक उत्तम उद्योग है। कृषि से ही मानव-जाति का कल्याण होता है। प्राणों के रक्षक अन्न की उत्पत्ति कृषि से ही होती है। ऋतु… Read More
गृहमहिमा सूक्त March 22, 2025 | aspundir | Leave a comment गृहमहिमासूक्त अथर्ववेदीय पैप्पलाद शाखा में वर्णित इस ‘गृहमहिमासूक्त की अतिशय महत्ता एवं लोकोपयोगिता है। इसमें मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने गृह में निवास करने वालों के लिये सुख, ऐश्वर्य तथा समृद्धि सम्पन्नता की कामना की है। गृहानैमि मनसा मोदमान ऊर्जं बिभ्रद् वः सुमतिः सुमेधाः । अघोरेण चक्षुषा मित्रियेण गृहाणां पश्यन्पय उत्तरामि ॥ १ ॥ इमे गृहा मयोभुव… Read More
मधुसूक्त [ मधुविद्या ] March 21, 2025 | aspundir | Leave a comment मधुसूक्त [ मधुविद्या ] अथर्ववेद के नवमकाण्ड में मधुविद्या विषयक एक मनोहर सूक्त प्राप्त है। इस सूक्त के ऋषि अथर्वा तथा देवता मधु एवं अश्विनीकुमार हैं। इस सूक्त में विशेषरूप से गो महिमा वर्णित है। गोदुग्धरूपी अमृतरस के स्रोत गौ – को बहुत महत्त्वपूर्ण तथा देवताओं की दिव्य शक्तियों से उत्पन्न बताया गया है। गोदुग्ध… Read More
ब्रह्मचारीसूक्त March 21, 2025 | aspundir | Leave a comment ब्रह्मचारीसूक्त विद्याध्ययन तथा ज्ञानार्जन बिना ब्रह्मचर्य व्रत के सफल नहीं हो सकता। ब्रह्मचर्य और ज्ञान का अभेद सम्बन्ध है। अध्यात्म-साधना की दृष्टि से ब्रह्मचर्य की जितनी महिमा है, उतनी ही लोक-जीवन के लिये भी उसकी आवश्यकता है। जो ब्रह्मचर्यव्रत धारण करता है, वह ब्रह्मचारी कहलाता है। अथर्ववेद के ११ वें काण्ड में एक सूक्त पठित… Read More
ओषधिसूक्त March 21, 2025 | aspundir | Leave a comment ओषधिसूक्त ऋग्वेद दशम मण्डल का ९७वाँ सूक्त ओषधिसूक्त कहलाता है। इस सूक्त के ऋषि आथर्वण भिषग् तथा देवता ओषधि हैं, छन्द अनुष्टुप् हैं और सूक्त की कुल ऋचाओं की संख्या २३ है। इस सूक्त के आरम्भ में ही ऋषि ने ओषधियों को देवरूप मानकर उनसे रोगनिवारण करके आरोग्य तथा दीर्घायुष्यप्राप्ति की प्रार्थना की है। इस… Read More
मन्युसूक्त March 21, 2025 | aspundir | Leave a comment मन्युसूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल में दो सूक्त (८३-८४वाँ) साथ-साथ पठित हैं, जो मन्युदेवता परक होने से मन्युसूक्त कहलाते हैं। इन दोनों सूक्तों के ऋषि मन्युस्तापस हैं। मन्युदेवता का अर्थ उत्साहशक्ति सम्पन्न देव किया गया है। इन सूक्तों में ऋषि ने जीव की उत्साहशक्ति को परमशक्ति से जोड़ा है और प्रार्थना की है कि हे… Read More