भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १४ से १६ December 23, 2018 | aspundir | Leave a comment ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय – १४ से १६ कुशकण्डिका-विधान तथा अग्नि-जिह्वाओं के नाम सूतजी कहते हैं — ब्राह्मणों ! अब मैं याग-विशेषों में स्वगृह्याग्नि-विधि कह रहा हूँ । अपनी वेदादि शाखा के अनुकूल ही गृह्माग्नि-विधि करनी चाहिये । दूसरे की शाखा के विधान से याग-विशेषों का अनुष्ठान करने पर… Read More
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १० से १३ December 23, 2018 | aspundir | Leave a comment भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १० से १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय – १० से १३ वास्तु-मंडल के निर्माण एवं वास्तु-पूजन की संक्षिप्त विधि सूतजी कहते हैं — ब्राह्मणों ! अब मैं वास्तु मण्डल का संक्षित वर्णन कर रहा हूँ । पहले भूमि… Read More
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ९ December 23, 2018 | aspundir | Leave a comment भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ९ गोत्र-प्रवर आदि के ज्ञान की आवश्यकता सूतजी कहते हैं — ब्राह्मणों ! गोत्र-प्रवर की परम्परा को जानना अत्यन्त आवश्यक होता है, इसलिये अपने-अपने गोत्र या प्रवर को पिता, आचार्य तथा शास्त्र द्वारा… Read More
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ७ से ८ December 23, 2018 | aspundir | Leave a comment भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ७ से ८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ७ से ८ काल-विभाग, तिथि-निर्णय एवं वर्षभर के विशेष पर्वो तथा तिथियों के पुण्यप्रद कृत्य सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! देव-कर्म या पैतृक-कर्म काल के आधार पर ही सम्पन्न होते हैं… Read More
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ६ December 23, 2018 | aspundir | Leave a comment भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ६ चतुर्विध मास-व्यवस्था एवं मलमास-वर्णन सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! अब मैं (विभिन्न प्रकार के) मासों का वर्णन करता हूँ । मास चार प्रकार के होते हैं – चान्द्र, सौर, सावन तथा नाक्षत्र… Read More
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ३ से ५ December 23, 2018 | aspundir | Leave a comment भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ३ से ५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय ३ से ५ यज्ञादि कर्म में दक्षिणाका माहात्म्य, विभिन्न कर्मों में पारिश्रमिक व्यवस्था और कलश-स्थापन का वर्णन सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! शास्त्रविहित यज्ञादि कार्य दक्षिणा-रहित एवं परिमाण-विहीन कभी नहीं करना… Read More
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १ से २ December 23, 2018 | aspundir | Leave a comment भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १ से २ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (मध्यमपर्व — द्वितीय भाग) अध्याय १ से २ यज्ञादि कर्मों के मण्डल-निर्माण का विधान तथा क्रौञ्चादि पक्षियों के दर्शन का फल सूतजी ने कहा — ब्राह्मणगण ! अब मैं आप लोगों से पुराणों में वर्णित मण्डल-निर्माण… Read More
रुद्रसूक्त ( नीलसूक्त) December 22, 2018 | aspundir | Leave a comment ॥ रुद्रसूक्त ( नीलसूक्त) ॥ भूतभावन भगवान् सदाशिव की प्रसन्नता के लिये रुद्रसूक्त पाठ का विशेष महत्त्व बताया गया है । पूजा में भगवान शंकर को सबसे प्रिय जलधारा है । इसलिये भगवान् शिव के पूजन में रुद्राभिषेक की परम्परा है और अभिषेक में इस ‘रुद्रसूक्त’ की ही प्रमुखता है । रुद्राभिषेक के अन्तर्गत रुद्राष्टाध्यायी… Read More
वैदिक गणेश-स्तवन December 22, 2018 | aspundir | Leave a comment ॥ वैदिक गणेश-स्तवन ॥ गणानां त्वा गणपतिᳬ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिᳬ हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ (शु०यजु० २३ । १९) हे परमदेव गणेशजी ! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों-प्राणियों के पालक और समस्त सुख-निधियों के निधिपति ! आपका हम आवाहन करते हैं । आप सृष्टि… Read More
ब्रह्मणस्पतिसूक्त December 22, 2018 | aspundir | Leave a comment ॥ ब्रह्मणस्पतिसूक्त ॥ वैदिक देवता विघ्नेश गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ‘ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मयके अधिष्ठाता हैं । आचार्य सायण से भी प्राचीन वेदभाष्यकार श्रीस्कन्दस्वामी (वि०सं० ६८७) अपने ऋग्वेदभाष्य के प्रारम्भ में लिखते हैं — “विघ्नेश विधिमार्तण्ड़चन्द्रेन्द्रोपेन्द्रवन्दित । नमो गणपते तुभ्यं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते ॥” अर्थात् ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र… Read More