श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय भवाटवी का स्पष्टीकरण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! देहाभिमानी जीवों के द्वारा सत्त्वादि गुणों के भेद से शुभ, अशुभ और मिश्र–तीन प्रकार के कर्म होते रहते हैं । उन कर्मों के द्वारा ही निर्मित नाना… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय भवाटवी का वर्णन और रहूगण का संशयनाश जडभरत ने कहा — राजन् ! यह जीवसमूह सुखरूप धन में आसक्त देश-देशान्तर में घूम-फिरकर व्यापार करनेवाले व्यापारियों के दल के समान हैं । इसे माया ने दुस्तर प्रवृत्तिमार्ग… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बारहवाँ अध्याय रहूगणका प्रश्न और भरतजीका समाधान राजा रहूगण ने कहा — भगवन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आपने जगत् का उद्धार करने के लिये ही यह देह धारण की है । योगेश्वर ! अपने परमानन्दमय… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ११ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ग्यारहवाँ अध्याय राजा रहूगण को भरतजी का उपदेश जड़भरत ने कहा — राजन् ! तुम अज्ञानी होने पर भी पण्डितों के समान ऊपर-ऊपर की तर्क-वितर्कयुक्त बात कह रहे हो । इसलिये श्रेष्ठ ज्ञानियों में तुम्हारी गणना नहीं हो… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दसवाँ अध्याय जड़भरत और राजा रहूगण की भेंट श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! एक बार सिन्धुसौवीर देश का स्वामी राजा रहूगण पालकी पर चढ़कर जा रहा था । जब वह इक्षुमती नदी के किनारे पहुँचा तब उसकी… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नवाँ अध्याय भरतजी का ब्राह्मणकुल में जन्म श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! आङ्गिरस गोत्र में शम, दम, तप, स्वाध्याय, वेदाध्ययन, त्याग (अतिथि आदि को अन्न देना), सन्तोष, तितिक्षा, विनय, विद्या (कर्मविद्या), अनसूया (दूसरों के गुणों में दोष… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आठवाँ अध्याय भरतजी को मृग के मोह में फँसकर मृग-योनि में जन्म लेना श्रीशुकदेवजी कहते हैं — एक बार भरतजी गण्डकी में स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्यों से निवृत्त हो प्रणव का जप करते हुए… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सातवाँ अध्याय भरत-चरित्र श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! महाराज भरत बड़े ही भगवद्भक्त थे । भगवान् ऋषभदेव ने अपने संकल्पमात्र से उन्हें पृथ्वी की रक्षा करने के लिये नियुक्त कर दिया । उन्होंने उनकी आशा में स्थित… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय छठा अध्याय ऋषभदेवजी का देहत्याग राजा परीक्षित् ने पूछा — भगवन् ! योगरूप वायु से प्रचलित हुई ज्ञानाग्नि से जिनके रागादि कर्मबीज दग्ध हो गये हैं उन आत्माराम मुनियों को दैववश यदि स्वयं ही अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त हो… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पाँचवाँ अध्याय ऋषभजीका अपने पुत्रों को उपदेश देना और स्वयं अवधूतवृत्ति ग्रहण करना श्रीऋषभदेवजी ने कहा — पुत्रो ! इस मर्त्यलोक में यह मनुष्य-शरीर दुःखमय विषयभोग प्राप्त करने के लिये ही नहीं हैं । ये भोग तो विष्ठाभोजी… Read More