स्वस्ति-वाचन सभी शुभ एवं मांगलिक धार्मिक कार्यों को प्रारम्भ करने से पूर्व वेद के कुछ मन्त्रों का पाठ होता है, जो स्वस्ति-पाठ या स्वस्ति-वाचन कहलाता है । इस स्वस्ति-पाठ में ‘स्वस्ति’ शब्द आता है, इसलिये इस सूक्त का पाठ कल्याण करनेवाला है । ऋग्वेद प्रथम मण्डल का यह ८९वाँ सूक्त शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयी-संहिता (२५/१४-२३), काण्व-संहिता, मैत्रायणी-संहिता… Read More


श्री त्रिपुर भैरवी कवचम् ।। श्रीपार्वत्युवाच ।। देव-देव महा-देव, सर्व-शास्त्र-विशारद ! कृपां कुरु जगन्नाथ ! धर्मज्ञोऽसि महा-मते ! । भैरवी या पुरा प्रोक्ता, विद्या त्रिपुर-पूर्विका । तस्यास्तु कवचं दिव्यं, मह्यं कफय तत्त्वतः । तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा, जगाद् जगदीश्वरः । अद्भुतं कवचं देव्या, भैरव्या दिव्य-रुपि वै । ।। ईश्वर उवाच ।।… Read More


त्रैलोक्यमंगल श्रीकृष्ण कवचम् कुञ्चिताधरपुटेन पूरयन् वंशिकाप्रचलदंगुलीततिः । मोहयन्सुरभिवामलोचनाः पातु कोऽपि नवनीरदच्छविः ॥ ॥ गणेशाय नमः ॥ ॥ नारद उवाच ॥ भगवन्सर्वधर्मज्ञ कवचं यत्प्रकाशितम् । त्रैलोक्यमंगलं नाम कृपया कथय प्रभो ॥ १ ॥ ॥ सनत्कुमार उवाच ॥… Read More


श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र ।। श्री मार्कण्डेय उवाच ।। भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम ! पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः ।। इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं । तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् ।। तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !।। ।। श्री नन्दिकेश्वर उवाच ।।… Read More


श्रीगणेशाय नमः श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीमद्-गोस्वामि-तुलसीदास-कृत हनुमान बाहुक :हिन्दी भावार्थ सहित छप्पय सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु । भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ।। गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव । जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।। कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट । गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ।।१।।… Read More


सु-प्रभात स्तोत्र ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च । गुरुश्च शुक्रः सह भानुजेन कुर्वन्तु सर्वे मम सु-प्रभातम् ।। भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च मनुः पुलस्त्यः पुलहः सगौतमः । रैभ्यो मरीचिश्च्यवनो ऋभुश्च कुर्वन्तु सर्वे मम सु-प्रभातम् ।।… Read More


व्यपोहन स्तव लिंगपुराण के ८२वें अध्याय में एक महत्त्वपूर्ण स्तव आया है, जिसका नाम है –“व्यपोहनस्तव” । व्यपोहन शब्द में ‘वि’ उपसर्ग है, जिसका अर्थ है ‘विशेषरुप से’ । ‘अपोहन’ का अर्थ है, ‘दूर हटाना या छिपाना’ । सूतजी ऋषियों से कहते हैं कि मैं अब आप लोगों को एक ऐसे स्तव (स्तोत्र, स्तुति) –… Read More


श्राद्ध सम्बन्धी ज्ञातव्य श्राद्ध के बारह भेदः- नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि (नान्दी), सपिंडन, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा एवं पुष्टिश्राद्ध – ये श्राद्ध के बारह भेद माने गये हैं । श्राद्ध में ब्राह्मण-संख्याः- श्राद्ध में अधिक ब्राह्मणों का निमंत्रण ठीक नहीं है । देवकार्य में दो तथा पितृकार्य में तीन ब्राह्मण पर्याप्त हैं, अथवा… Read More


श्राद्ध-कर्मःएक संक्षिप्त विधि श्राद्ध दिवस से पूर्व दिवस को बुद्धिमान् पुरुष श्रोत्रिय आदि से विहित ब्राह्मणों को ‘पितृ-श्राद्ध तथा ‘वैश्व-देव-श्राद्ध’ के लिए निमंत्रित करें। पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे। श्राद्ध-दिवस पर निम्न प्रक्रिया का… Read More


भगवती सीता की शक्ति तथा पराक्रम एक बार भगवान् श्रीराम जब सपरिकर सभा में विराज रहे थे, विभीषण बड़ी विकलतापूर्वक अपनी स्त्री तथा चार मन्त्रियों के साथ दौड़े आये और बार-बार उसाँस लेते हुए कहने लगे – ‘राजीवनयन राम ! मुझे बचाइये, बचाइये । कुम्भकर्ण के पुत्र मूलकासुर नामक राक्षस ने, जिसे मूल नक्षत्र में… Read More