श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दूसरा अध्याय आग्नीध्र-चरित्र श्रीशुकदेवजी कहते हैं — पिता प्रियव्रत के इस प्रकार तपस्या में संलग्न हो जाने पर राजा आग्नीध्र उनकी आज्ञा का अनुसरण करते हुए जम्बूद्वीप की प्रजा का धर्मानुसार पुत्रवत् पालन करने लगे ॥ १ ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पहला अध्याय प्रियव्रत-चरित्र राजा परीक्षित् ने पूछा — मुने ! महाराज प्रियव्रत तो बड़े भगवद्भक्त और आत्माराम थे । उनकी गुहस्थाश्रम में कैसे रुचि हुई, जिसमें फँसने के कारण मनुष्य को अपने स्वरूप की विस्मृति होती है और… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ३१ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इकतीसवाँ अध्याय प्रचेताओं को श्रीनारदजी का उपदेश और उनका परमपद-लाभ श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! दस लाख वर्ष बीत जाने पर जब प्रचेताओं को विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान् वाक्यों की याद आयी और वे अपनी भार्या… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ३० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तीसवाँ अध्याय प्रचेताओं को श्रीविष्णुभगवान् का वरदान विदुरजी ने पूछा — ब्रह्मन् ! आपने राजा प्राचीनबहिँ के जिन पुत्रों का वर्णन किया था, उन्होंने रुद्रगीत के द्वारा श्रीहरि की स्तुति करके क्या सिद्धि प्राप्त की ? ॥ १… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय उनतीसवाँ अध्याय पुरञ्जनोपाख्यान का तात्पर्य राजा प्राचीनबर्हि ने कहा — भगवन् ! मेरो समझ में आपके वचनों का अभिप्राय पूरा-पूरा नहीं आ रहा है । विवेकी पुरुष ही इनका तात्पर्य समझ सकते हैं, हम कर्ममोहित जीव नहीं ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अठ्ठाईसवाँ अध्याय पुरंजन को स्त्री योनि की प्राप्ति और अविज्ञात के उपदेश से उसका मुक्त होना श्रीनारदजी कहते हैं — राजन् ! फिर भय नामक यवनराज के आज्ञाकारी सैनिक प्रज्वार और कालकन्या के साथ इस पृथ्वीतल पर सर्वत्र… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सत्ताईसवाँ अध्याय पुरञ्जनपुरी पर चण्डवेग की चढ़ाई तथा कालकन्या का चरित्र श्रीनारदजी कहते हैं — महाराज ! इस प्रकार वह सुन्दरी अनेकों नखरों से पुरञ्जन को पूरी तरह अपने वश में कर उसे आनन्दित करती हुई विहार करने… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय छब्बीसवाँ अध्याय राजा पुरञ्जन का शिकार खेलने वन में जाना और रानी का कुपित होना श्रीनारदजी कहते हैं — राजन् ! एक दिन राजा पुरञ्जन अपना विशाल धनुष, सोने का कवच और अक्षय तरकस धारणकर अपने ग्यारहवें सेनापति… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पचीसवाँ अध्याय पुरञ्जनोपाख्यान का प्रारम्भ श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! इस प्रकार भगवान् शङ्कर ने प्रचेताओं को उपदेश दिया । फिर प्रचेताओं ने शङ्करजी की बड़े भक्तिभाव से पूजा की । इसके पश्चात् वे उन राजकुमारों के… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौबीसवाँ अध्याय पृथु की वंशपरम्परा और प्रचेताओं को भगवान् रुद्र का उपदेश श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुजी ! महाराज पृथु के बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजिताश्व राजा हुए । उनका अपने छोटे भाइयों पर बड़ा स्नेह था,… Read More