श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २२ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बाईसवाँ अध्याय भिन्न-भिन्न ग्रहों की स्थिति और गति का वर्णन राजा परीक्षित् ने पूछा — भगवन् ! आपने जो कहा कि यद्यपि भगवान् सूर्य राशियों की ओर जाते समय मेरु और ध्रुव को दायीं ओर रखकर चलते मालूम… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २१ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २१ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इक्कीसवाँ अध्याय सूर्य के रथ और उसकी गति का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! परिमाण और लक्षणों के सहित इस भूमण्डल का कुल इतना ही विस्तार है, सो हमने तुम्हें बता दिया ॥ १ ॥ इसी… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २० श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बीसवाँ अध्याय अन्य छः द्वीपों तथा लोकालोकपर्वत का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! अब परिमाण, लक्षण और स्थिति के अनुसार लक्षादि अन्य द्वीपों के वर्षविभाग का वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥ जिस प्रकार मेरु… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १९ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय उन्नीसवाँ अध्याय किम्पुरुष और भारतवर्ष का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! किम्पुरुषवर्ष में श्रीलक्ष्मणजी के बड़े भाई, आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परम भागवत श्रीहनुमान् जी अन्य किन्नरों के सहित अविचल… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १८ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अठारहवाँ अध्याय भिन्न-भिन्न वर्षों का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! भद्राश्ववर्ष में धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य-मुख्य सेवक भगवान् वासुदेव की हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्ति को अत्यन्त समाधिनिष्ठा के द्वारा हृदय में स्थापित कर इस मन्त्र… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १७ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सत्रहवाँ अध्याय गङ्गाजी का विवरण और भगवान् शङ्करकृत संकर्षणदेव की स्तुति श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! जब राजा बलि की यज्ञशाला में साक्षात् यज्ञमूर्ति भगवान् विष्णु ने त्रिलोकी को नापने के लिये अपना पैर फैलाया, तब उनके… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १६ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सोलहवाँ अध्याय भुवनकोश का वर्णन राजा परीक्षित् ने कहा — मुनिवर ! जहाँ तक सूर्य का प्रकाश है और जहाँ तक तारागण के सहित चन्द्रदेव दीख पड़ते हैं, वहाँ तक आपने भूमण्डल का विस्तार बतलाया है ॥ १… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १५ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय भरत के वंश का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! भरतजी का पुत्र सुमति था, यह पहले कहा जा चुका है । उसने ऋषभदेवजी के मार्ग का अनुसरण किया । इसीलिये कलियुग में बहुत-से पाखण्डी… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १४ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय भवाटवी का स्पष्टीकरण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! देहाभिमानी जीवों के द्वारा सत्त्वादि गुणों के भेद से शुभ, अशुभ और मिश्र–तीन प्रकार के कर्म होते रहते हैं । उन कर्मों के द्वारा ही निर्मित नाना… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १३ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय भवाटवी का वर्णन और रहूगण का संशयनाश जडभरत ने कहा — राजन् ! यह जीवसमूह सुखरूप धन में आसक्त देश-देशान्तर में घूम-फिरकर व्यापार करनेवाले व्यापारियों के दल के समान हैं । इसे माया ने दुस्तर प्रवृत्तिमार्ग… Read More