September 16, 2015 | aspundir | Leave a comment श्रीसूक्तः साधना के आयाम ‘श्री-सूक्त’ में 15 ऋचाएँ है । यह सूक्त ऋग्वेद संहिता के अष्टक 4, अध्याय 4, वर्ण के अन्तिम मण्डल 5 के अन्त में ‘परिशिष्ट’ के रुप में आया है । इसी को ‘खिल-सूक्त’ भी कहते हैं । निरुक्त एवं शौनक आदि ने भी इसका उल्लेख किया है । ‘खिल’ शब्द का अर्थ है – ‘अन्य शाखा में अपेक्षावश पढ़े जाने वाला पाठ’ । कहीं इस सूक्त को पदशिष्ट भी कहा गया है, जिसका तात्पर्य है – शौनक ने जिन मन्त्रों का पदपाठ नहीं किया है वह नीलकण्ठ ने अपनी व्याख्या में इस सूक्त के बारे में इसके वेद-मूलक होने का विचार किया है । सर्वानुक्रम और ऋक्संहिता – स्वाहाकार में इस सूक्त का ग्रहण नहीं हुआ है, किन्तु वैदिक कर्मकाण्ड में इसके विनियोगादि सर्वत्र मिलते हैं । वेद भाष्यकारों ने इस सूक्त के भाष्य किये हैं, अतः यह वैदिक है, यही सर्व-मान्य है। इस सूक्त पर श्रीविद्यारण्य, पृथ्वीधराचार्य, श्रीकण्ठ आदि के भाष्य हैं तथा शतानन्द वृत्ति, चिद्विलास वृत्ति, श्रीवैद्यनाथ दायगुण्डे आदि ने विधान सहित टीकाएँ लिखी है। इस सूक्त की सोलहवीं ऋचा फलश्रुति स्वरुप है । भाष्यकारों ने इसका भी भाष्यों में विवेचन किया है। इसके पश्चात् 17 से 25 वीं ऋचाएँ, जो फल-स्तुति रुप ही हैं, किन्तु उन्हें कुछ आचार्य ‘लक्ष्मी-सूक्त’ भी कहते हैं । सोलहवीं ऋचा के अनुसार श्रीसूक्त की प्रारम्भिक 15 ऋचाएँ कर्म-काण्ड-उपासना के लिए प्रयोज्य है । अतः इन 15 ऋचाओं के द्वारा ही लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के आगम-तन्त्रानुसार साधना में प्रयुक्त होती है। ‘सौभाग्य-तन्त्र‘ में / ‘लक्ष्मी-तन्त्र’ में इन्हीं सूक्त की 15 ऋचाओं के अलग-अलग मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र बतलाये हैं । यन्त्रों में एक-एक ऋचा को विभिन्न आकृतियों में लिखकर दिखाया है। अन्य आचार्यों ने समस्त श्रीसूक्त की 15 ऋचाओं को ही १५ यन्त्रों में लिखकर कतिपय बीज-मन्त्रों के साथ यन्त्र बनाने का निर्देश दिया है । श्री-सूक्त की प्रत्येक ऋचा को पाठात्मक, अभिषेकात्मक, जपात्मक और हवनात्मक प्रयोग भी आगमों में निर्दिष्ट है। – श्रीसूक्तानुष्ठान पद्धति अनेक आचार्यों ने श्रीसूक्त के नित्य 28,108 अथवा 1000 पाठ के विधान बतलाये हैं। एक दिन में एक हजार पाठ करने से संकल्प-सिद्धि होती है। प्रातः-काल स्नान सन्ध्या आदि करके पवित्रता पूर्वक महालक्ष्मी जी की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने पूर्व की ओर मुंह करके आचमन, प्राणायाम और संकल्प करे। फिर चित्र में विराजमान महालक्ष्मी का ध्यान करके षोडशोपचार पूजा करे। धूप-दीप करें, खोये की मिठाई का नैवेद्य लगाये। नमस्कार और प्रदक्षिणा समर्पण करे। यह नित्य-पूजा का क्रम है। इसमें आवाहन और विसर्जन की आवश्यकता नहीं है। नित्य पूजा में ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ इस मन्त्र से पूजा करें। तदनन्तर संकल्प से अनुसार श्रीसूक्त की आवृति करें। श्रीसूक्त वेदोक्त है। अतः इसे शुद्ध पाठ के रुप में सीख लेना चाहिए। पुरश्चरण विधानः- श्रीसूक्त के पाठ विधान में मुख्यतः एक-एक ऋचा का जप अथवा पूरे सूक्त के पाठों का जप होता है। किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए पहले मन्त्र का पुरश्चरण अवश्य करना चाहिए। श्रीसूक्त के बारह हजार पाठ का पुरश्चरण सर्वोत्तम माना गया है। ।।श्री सूक्त।। ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्। चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।। अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्। श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं। पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्। तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।। आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।। क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।। गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।। मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।। कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम। श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।। आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे। निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।। आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्। सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।। आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।। तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।। यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्। श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।। Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe