April 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-पंचम स्कन्धः-अध्याय-06 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पूर्वार्द्ध-पंचम स्कन्धः-षष्ठोऽध्यायः छठा अध्याय भगवान् विष्णु और शिव के साथ महिषासुर का भयानक युद्ध महिषासुरस्येन्द्रादिदेवैः सह युद्धवर्णनम् व्यासजी बोले — इस प्रकार दानव ताम्र के मूर्च्छित हो जाने पर महिषासुर कुपित हो गया और एक विशाल गदा लेकर देवताओं के समक्ष जा डटा ॥ १ ॥ हे देवताओ! तुम सब ठहरो; मैं अभी अपनी गदा से तुम सभी को मार डालूँगा । बलिभाग ( हविष्य) खाने वाले तुम सब तो सदा से बलहीन रहे हो — ऐसा कहकर अभिमान के मद में चूर वह महाबाहु महिषासुर हाथी पर बैठे हुए इन्द्र के पास पहुँचा और उसने उनके बाहुमूल पर अपनी गदा से तीव्र आघात किया ॥ २-३ ॥ इन्द्र ने अपने भयंकर वज्र से उस गदा को तुरंत काट दिया और वे महिषासुर को मारने की इच्छा से बड़ी शीघ्रतापूर्वक उसकी ओर बढ़े ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् वह महिषासुर भी कुपित होकर अपने हाथ में चमचमाती हुई तलवार लेकर महाबली तथा शत्रुविनाशक इन्द्र पर प्रहार करने के लिये उनके सामने पहुँच गया ॥ ५ ॥ तब उन दोनों में नानाविध आयुधों के द्वारा समस्त प्राणियों को भयभीत कर देने वाला तथा मुनिजनों को भी विस्मित कर देने वाला भीषण युद्ध छिड़ गया ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् दैत्य महिषासुर ने सम्पूर्ण जगत् को नष्ट कर देने वाली तथा मुनियों को भी मोहित कर देने वाली मोहकारिणी शाम्बरी माया का तत्काल प्रयोग किया ॥ ७ ॥ उस माया के प्रभाव से महिषासुर के ही रूपवाले तथा उसी के समान पराक्रमी करोड़ों महिषासुर अनेक प्रकार के आयुध लेकर देवसेना का संहार करते हुए दिखायी पड़े ॥ ८ ॥ तब दैत्य महिषासुर द्वारा उत्पन्न की गयी उस मोहकरी माया को देखकर इन्द्र विस्मय में पड़ गये तथा भय से बहुत व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥ वरुण, कुबेर, यम, अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा भी भयभीत हो गये और सभी के मन में त्रास छा गया। सभी देवगण माया-विमोहित होकर भाग खड़े हुए और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का स्मरण करने लगे ॥ १०-११ ॥ स्मरण करते ही उनकी रक्षा की कामना से श्रेष्ठ आयुध धारण करके सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु तथा महे अपने-अपने वाहन हंस, गरुड तथा वृषभ पर आरूढ होकर वहाँ आ गये ॥ १२ ॥ मोहकारिणी उस आसुरी माया को देखकर भगवान् विष्णु ने अपना तेजोमय सुदर्शन चक्र चला दिया, जिसके प्रचण्ड तेज से वह माया समाप्त हो गयी ॥ १३ ॥ तदनन्तर सृष्टि, पालन तथा संहार करने वाले उन देवताओं को देखकर उनसे युद्ध करने की इच्छा से वह महिषासुर परिघ लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १४ ॥ इसके बाद महावीर महिषासुर, सेनाध्यक्ष चिक्षुर, उग्रास्य, उग्रवीर्य, असिलोमा, त्रिनेत्र, बाष्कल तथा अन्धक — ये दानव एवं इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दानव युद्ध की अभिलाषा से निकल पड़े ॥ १५-१६ ॥ उन कवचधारी, धनुष धारण करने वाले, रथारूढ तथा मदोन्मत्त दानवों ने सभी देवताओं को उसी प्रकार घेर लिया, जिस प्रकार भेड़िये अत्यन्त कोमल बछड़ों को घेर लेते हैं ॥ १७ ॥ तदनन्तर एक- दूसरे को मार डालने की इच्छावाले वे मदोन्मत्त दानव तथा देवता बाण वृष्टि करने लगे ॥ १८ ॥ इसी बीच अन्धकासुर ने भगवान् विष्णु के समक्ष पहुँचकर सान पर चढ़ाये गये, विष में दग्ध किये गये तथा कान तक खींचे गये अत्यन्त शक्तिशाली पाँच बाण छोड़े ॥ १९ ॥ शत्रुदमन भगवान् विष्णु ने भी बड़ी तत्परता के साथ अपने तीव्रगामी बाणों से अन्धकासुर के उन बाणों को दूर से ही काट डाला और फिर उसके ऊपर पाँच बाण छोड़े ॥ २० ॥ इस प्रकार विष्णु तथा अन्धकासुर — उन दोनों में बाण, तलवार, चक्र, मूसल, गदा, बर्धी तथा फरसों से भीषण युद्ध होने लगा ॥ २१ ॥ इसी प्रकार महेश्वर तथा अन्धकासुर के बीच भीषण रोमांचकारी युद्ध निरन्तर पचास दिनों तक होता रहा ॥ २२ ॥ उसी तरह इन्द्र तथा बाष्कल, महिषासुर तथा भगवान् रुद्र, यमराज तथा त्रिनेत्र, महाहनु तथा कुबेर एवं असिलोमा तथा वरुण के बीच महाभीषण युद्ध हुआ । इसी बीच अन्धकासुर ने अपनी गदा से भगवान् विष्णु के वाहन गरुड पर प्रहार किया। गदा के प्रहार से घायल अंगोंवाले गरुड लम्बी साँस खींचते हुए स्थित हो गये। तत्पश्चात् देवाधिदेव विष्णु ने अपने दाहिने हाथ से सहलाकर महाबली गरुड को सान्त्वना प्रदान करते हुए उन्हें स्वस्थचित्त किया। तब भगवान् विष्णु ने अन्धक का संहार करने के विचार से अपना शार्ङ्गधनुष खींचकर उसके ऊपर बहुत से बाण छोड़े ॥ २३–२६१/२ ॥ दानव अन्धक ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उन बाणों को काट डाला और इसके बाद सानपर चढ़ाकर तेज बनाये गये पचास बाण भगवान् विष्णु के ऊपर कुपित होकर एक ही साथ छोड़े। भगवान् विष्णु ने भी उन उत्तम बाणों को तत्क्षण निष्फल करके अपना हजार अरोंवाला सुदर्शन चक्र अन्धकासुर के ऊपर वेगपूर्वक चलाया। तब अन्धकासुर ने भगवान् विष्णु द्वारा छोड़े गये सुदर्शन चक्र को अपने चक्र से काफी दूर से ही विफल कर दिया। हे महाराज [जनमेजय ] ! इसके बाद देवताओं को सम्मोहित करते हुए उसने भीषण गर्जना की ॥ २७-२९१/२ ॥ तत्पश्चात् शार्ङ्गधनुष धारण करने वाले भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र को विफल हुआ देखकर सभी देवता शोकाकुल हो उठे तथा दानवगण हर्षित हो गये। तब भगवान् विष्णु भी देवताओंको चिन्तामग्न देखकर अपनी कौमोदकी गदा लेकर दानव अन्धक पर झपट पड़े। श्रीहरि ने बड़े वेग से उस मायावी के मस्तक पर गदा से प्रहार किया। वह दैत्य गदा प्रहार से पूर्णरूप से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥ ३०–३२१/२ ॥ उसे इस प्रकार गिरा हुआ देखकर महिषासुर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और अपनी घोर गर्जना से भयभीत करता हुआ भगवान् विष्णु के सामने आ गया। भगवान् विष्णु ने भी उस महिषासुर को कुपित होकर अपने समक्ष आया देखकर देवताओं को आनन्दित करते हुए अपने धनुष की प्रत्यंचा से भयानक टंकार उत्पन्न की। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु महिषासुर के ऊपर शीघ्रतापूर्वक बाणों की बौछार करने लगे। उसने भी अपने बाणसमूहों से उन आते हुए बाणों को आकाश में ही काट डाला। हे राजन् ! इस प्रकार उन दोनों में परस्पर अति भीषण युद्ध हुआ ॥ ३३-३६ ॥ भगवान् विष्णु ने गदा से महिषासुर के मस्तक पर प्रहार किया। मस्तक पर उस गदा के आघात से मूर्च्छित होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। [ यह देखकर] उसकी सेना में अति भीषण हाहाकार मच गया। कुछ ही क्षणों में अपनी वेदना को भूलकर वह दैत्य फिर उठकर खड़ा हो गया। उसने तत्काल एक परिघ लेकर मधुसूदन श्रीविष्णु के सिर पर प्रहार किया। उस परिघ के प्रहार से आहत होकर भगवान् विष्णु मूर्च्छा को प्राप्त हो गये। तब गरुड मूर्च्छा को प्राप्त उन भगवान् विष्णु को युद्धस्थल से लेकर बाहर चले गये। इस प्रकार जगत्पति विष्णु के समरांगण से लौट जाने पर इन्द्र आदि प्रधान देवता भयभीत हो गये और दुःख से पीड़ित होकर युद्धभूमि में चीखने-चिल्लाने लगे ॥ ३७-४०१/२ ॥ तत्पश्चात् शूलधारी भगवान् शंकर ने देवताओं को इस प्रकार करुण क्रन्दन करते हुए देखकर अत्यन्त क्रोध के साथ महिषासुर के पास द्रुतगति से पहुँचकर उसपर भीषण प्रहार किया। उस महिषासुर ने भी भगवान् शंकर के वक्षःस्थल पर अपनी शक्ति (बछ) से तेज प्रहार किया और उनके त्रिशूलप्रहार को विफल करके उस दुष्टात्मा ने बड़ी तेज गर्जना की। वक्ष पर प्रहार होने पर भी भगवान् शंकर को कोई पीड़ा नहीं हुई और क्रोध से आँखें लाल करके उन्होंने उसपर अपने त्रिशूल से प्रहार किया ॥ ४१-४३१/२ ॥ इसी बीच दुष्टात्मा महिषासुर के साथ भगवान् शंकर को इस प्रकार युद्धरत देखकर प्रहारजनित मूर्च्छा का त्याग करके वहाँ भगवान् विष्णु आ गये। उस समय युद्ध के लिये उत्सुक महापराक्रमी विष्णु तथा शिव को श्रेष्ठ सुदर्शन चक्र तथा त्रिशूल धारण करके लड़ने के लिये अपने समक्ष उपस्थित देखकर वह महाबली महिषासुर अत्यन्त कुपित हो उठा। तत्पश्चात् वह विशालबाहु दैत्य उन दोनों देवताओं को अपने समीप आया हुआ देखकर महिष का रूप धारण करके पूँछ हिलाता हुआ युद्ध करने के लिये उनके समक्ष पहुँच गया। देवताओं को आतंकित करते हुए उस विशालकाय तथा भयावह महिषासुर ने अपनी सींगें फटकारते हुए मेघ की भाँति भीषण गर्जना की तथा वह अपनी सींगों से पर्वतों की बड़ी-बड़ी चट्टानें उखाड़ उखाड़कर फेंकने लगा ॥ ४४-४८१/२ ॥ उस दानव को देखकर महापराक्रमी देवश्रेष्ठ विष्णु तथा शंकर उसके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगे । भगवान् विष्णु तथा शिव को अपने ऊपर बाण – वृष्टि करते हुए देखकर महिषासुर ने अपनी पूँछ में एक भयानक पर्वतशिखर लपेटकर उनके ऊपर फेंका। उस पर्वत- शिखर को आते देखकर भगवान् विष्णु ने अपने बाणों से उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये और फिर सुदर्शन चक्र से उसके ऊपर शीघ्रता से प्रहार किया। भगवान् विष्णु के चक्र से आहत होकर वह दैत्यराज महिषासुर युद्ध में मूर्च्छित हो गया। किंतु थोड़ी ही देर में वह मनुष्य का शरीर धारण करके उठ खड़ा हुआ। पर्वत के समान शरीरवाला वह महाभयानक दैत्य हाथ में गदा धारणकर देवताओं को भयभीत करता हुआ मेघ के समान जोर-जोरसे गरजने लगा ॥ ४९-५३१/२ ॥ उस नाद को सुनकर भगवान् विष्णु ने तीव्रतर ध्वनि उत्पन्न करने के लिये बड़ी तेजी से अपना देदीप्यमान पांचजन्य नामक शंख बजाया। शंख की उस ध्वनि से समस्त दानव भयभीत हो गये और तपोधन ऋषिगण तथा देवता आनन्दमग्न हो गये ॥ ५४-५५ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत पंचम स्कन्ध का ‘महिषासुर का इन्द्रादिदेवों के साथ युद्धवर्णन’ नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ Content is available only for registered users. 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