श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-द्वादशः स्कन्धः-अध्याय-12
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-द्वादशः स्कन्धः-द्वादशोऽध्यायः
बारहवाँ अध्याय
भगवती जगदम्बा के मण्डप का वर्णन तथा मणिद्वीप की महिमा
मणिद्वीपवर्णनम्

व्यासजी बोले — त्रिकोण के मध्यभाग में भगवती जगदम्बा का वही चिन्तामणि नामक भवन विराजमान है। उसमें हजार स्तम्भों वाले चार मण्डप विद्यमान हैं ॥ १ ॥ उनमें पहला श्रृंगारमण्डप, दूसरा मुक्तिमण्डप, तीसरा ज्ञानमण्डप और चौथा एकान्तमण्डप कहा गया है ॥ १ ॥ अनेक प्रकार के वितानों से युक्त तथा नानाविध धूपों से सुवासित ये सुन्दर मण्डप कान्ति में करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान् रहते हैं ॥ ३१/२

हे राजन्! उन मण्डपों के चारों ओर केसर, मल्लिका और कुन्द की वाटिकाएँ बतायी गयी हैं, जिनमें मृगमदों से परिपूर्ण तथा मदस्रावी असंख्य गन्धमृग स्थित हैं । उसी प्रकार मण्डपों के चारों ओर रत्न से निर्मित सोपानों वाली महापद्माटवी है। वह अमृतरस से परिपूर्ण, गुंजार करते हुए मतवाले भौरों से युक्त, कारण्डवों तथा हंसों से सदा सुशोभित और चारों ओर से सुगन्ध से परिपूर्ण तट वाली है । इस प्रकार वह मणिद्वीप इन वाटिकाओं की सुगन्धों से सदा सुवासित रहता है ॥ ४-७ ॥ शृंगारमण्डप के मध्यभाग में विराजमान जगदम्बिका के चारों ओर सभासद् के रूप में श्रेष्ठ देवगण विद्यमान रहते हैं और वहाँ देवियाँ नानाविध स्वरों में सदा गाती रहती हैं । मुक्तिमण्डप के मध्य में विराजमान होकर कल्याणमयी भगवती जगदम्बा भक्तों को सदा मुक्ति प्रदान करती रहती हैं और हे राजन् ! तीसरे ज्ञानमण्डप में विराजमान होकर वे ज्ञान का उपदेश करती हैं। एकान्तमण्डप नामक चौथे मण्डप में अपनी मन्त्रिणियों के साथ भगवती जगत् की रक्षा के विषय में नित्य विचार-विमर्श किया करती हैं ॥ ८–१० ॥

हे राजन्! चिन्तामणिगृह में भगवती के शक्ति-तत्त्वरूपी दस श्रेष्ठ सोपानों से युक्त उनका मंच अत्यधिक सुशोभित होता है ॥ ११ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और सदाशिव ईश्वर – ये उस मंच के पाये कहे गये हैं । सदाशिव मंच के फलक हैं । उसके ऊपर भुवनेश्वर महादेव विराजमान हैं ॥ १२१/२

सृष्टि के आदि में अपनी लीला करने के लिये जो भगवती स्वयं दो रूपों में प्रकट हुई थीं, उन्हीं के अर्धांगस्वरूप ये भगवान् महेश्वर हैं ॥ १३१/२

वे कामदेव के अभिमान का नाश करने में परम कुशल, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर, पाँच मुख तथा तीन नेत्रों से युक्त और मणि के भूषणों से विभूषित हैं ॥ १४१/२

सदा सोलह वर्ष के प्रतीत होने वाले वे सर्वेश्वर महादेव अपनी भुजाओं में हरिण, अभयमुद्रा, परशु तथा वरमुद्रा धारण किये हुए हैं ॥ १५१/२

वे त्रिनेत्र महादेव करोड़ों सूर्य के समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल, शुद्ध स्फटिकमणि के समान आभा वाले तथा शीतल कान्ति वाले हैं ॥ १६१/२

इनके वाम अंक में देवी श्रीभुवनेश्वरी विराजमान हैं, वे नौ प्रकार के रत्नों से जटित सुवर्ण की करधनी से सुशोभित हैं और तप्त सुवर्ण तथा वैदूर्यमणि से निर्मित बाजूबन्द से भूषित हैं ॥ १७-१८ ॥ कमल के समान मुखवाली भगवती के कानों में श्रीचक्र की आकृति के समान सुवर्ण का कर्णफूल सुशोभित हो रहा है। उनके ललाट की कान्ति के वैभव ने अर्धचन्द्र के सौन्दर्य को जीत लिया है ॥ १९ ॥ वे बिम्बाफल की कान्ति को तिरस्कृत करने वाले होठों से सुशोभित हैं। कुमकुम – कस्तूरी के तिलक से अनुलिप्त उनका मुखमण्डल अति प्रकाशित है ॥ २० ॥ कान्तियुक्त चन्द्रमा तथा सूर्य के समान दिव्य तथा उज्ज्वल रत्नमय चूडामणि उनके मस्तक पर विराजमान है। उदयकालीन शुक्र नक्षत्र के सदृश स्वच्छ नासिका भूषण से वे सुशोभित हैं ॥ २१ ॥ चिन्ताक नामक कण्ठभूषण में लटकते हुए मोती के गुच्छ से वे सुशोभित हो रही हैं । चन्दन, कपूर और कुमकुम के अनुलेप से उनका वक्षःस्थल अलंकृत है ॥ २२ ॥ वे अनेक रूपों से सुसज्जित, शंख के समान ग्रीवावाली तथा अनार  के दानों के सदृश दन्तपंक्ति से सुशोभित हो रही हैं ॥ २३ ॥

वे अपने मस्तक पर बहुमूल्य रत्नों से निर्मित मुकुट धारण किये रहती हैं। उनके मुखकमल-पर मतवाले भ्रमरों की पंक्ति के सदृश अलकावली सुशोभित है ॥ २४ ॥ कलंक की कालिमा से रहित शारदीय चन्द्रमा के सदृश मुखमण्डल वाली हैं और गंगा के जलावर्त (भँवर)-तुल्य सुन्दर नाभि से विभूषित हैं ॥ २५ ॥ वे माणिक्य के दानों से जटित मुद्रिका से युक्त अँगुलियों से सुशोभित हैं और कमलदल की आकृति वाले तीन नेत्रों से वे अत्यन्त सौन्दर्यमयी प्रतीत होती हैं ॥ २६ ॥ वे शान पर चढ़ाकर अतीव स्वच्छ किये गये महाराग तथा पद्मरागमणि के सदृश उज्ज्वल कान्ति से सम्पन्न हैं और रत्नमय घुँघरू वाली करधनी तथा रत्ननिर्मित कंकण से सुशोभित हैं ॥ २७ ॥ उनके चरणकमल मणियों और मोतियों की मालाओं में विराजमान रहने वाली अपार शोभा से सम्पन्न हैं। वे रत्नों से युक्त अँगुलियों से फैलते हुए प्रभाजाल से सुशोभित हाथ वाली हैं ॥ २८ ॥ उनकी कंचुकी में गुथे हुए नानाविध रत्नों की पंक्तियों अनुपम प्रकाश निर्गत हो रहा है। मल्लिका की सुगन्धि से पूर्ण केश के जूड़े पर स्थित मल्लिका की माला पर मँडराने वाले भौंरों के समूह से देवी सुशोभित हो रही हैं ॥ २९ ॥ वृत्ताकार, सघन तथा उन्नत उरोजों के भार से कल्याणमयी भगवती अलसायी हुई प्रतीत होती हैं । उनकी चारों भुजाओं में वर, पाश, अंकुश तथा अभयमुद्रा सुशोभित हो रही है ॥ ३० ॥

वे भगवती समस्त शृंगारवेष से सम्पन्न, लता के समान अत्यन्त कोमल अंगों वाली, समस्त सौन्दर्यों की आधारस्वरूपा तथा निष्कपट करुणा से ओतप्रोत हैं ॥ ३१ ॥ वे अपनी वाणी की मधुरता से वीणा के स्वरों को भी तुच्छ कर देती हैं। वे परा भगवती करोड़ों-करोड़ों सूर्यों तथा चन्द्रमाओं की कान्ति धारण करती हैं ॥ ३२ ॥ वे बहुत-सी सखियों, दासियों, देवांगनाओं तथा समस्त देवताओं से चारों ओर से सदा घिरी रहती हैं ॥ ३३ ॥ वे इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति से सम्पन्न हैं । लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, कीर्ति, कान्ति, क्षमा, दया, बुद्धि, मेधा, स्मृति तथा लक्ष्मी — ये मूर्तिमती अंगनाएँ कही गयी हैं। जया, विजया, अजिता, अपराजिता, नित्या, विलासिनी, दोग्ध्री, अघोरा और मंगला — ये नौ पीठशक्तियाँ उन भगवती पराम्बा की निरन्तर सेवा करती रहती हैं ॥ ३४-३६ ॥ शंख तथा पद्म नामक वे दोनों निधियाँ उन भगवती के पार्श्वभाग में विराजमान रहती हैं। नवरत्नवहा (नौ प्रकार के रत्नों का वहन करने वाली), कांचनस्रवा (स्वर्ण का स्राव करने वाली) तथा सप्तधातुवहा (सातों धातुओंका वहन करने वाली) नामक नदियाँ उन्हीं दोनों निधियों से निकली हुई हैं और हे राजेन्द्र ! वे सभी नदियाँ अन्त में सुधा-सिन्धु में जाकर समाहित होती हैं ॥ ३७-३८ ॥

वे भगवती भुवनेश्वरी परमेश्वर के वाम अंक में विराजमान रहती हैं। उन्हीं भगवती के सांनिध्य से महेश्वर को सर्वेश्वरत्व प्राप्त है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३९ ॥ हे भूपाल ! अब आप इस चिन्तामणिगृह के परिमाण के विषय में सुनिये। यह विशाल भवन हजार योजन विस्तारवाला कहा जाता है ॥ ४० ॥ उसके उत्तर भाग में अनेक विशाल प्राकार हैं, जो परिमाण में पूर्व प्राकार से दुगुने कहे गये हैं। भगवती का यह मणिद्वीप बिना किसी आधार के अन्तरिक्ष में विराजमान है ॥ ४१ ॥ जैसे किसी कार्यवश पट का संकोच तथा विकास होता रहता है, वैसे ही प्रलयावस्था में इस मणिद्वीप का संकोच तथा सृष्टिकाल में विकास हो जाता है । इसका सृष्टि – विनाश नहीं होता ॥ ४२ ॥ सभी परकोटों की सम्पूर्ण कान्ति की परम सीमा को ही चिन्तामणिगृह कहा गया है, जहाँ तेजोमयी देवी विराजमान रहती हैं ॥ ४३ ॥ हे भूपाल ! प्रत्येक ब्रह्माण्ड में रहने वाले तथा देवलोक, नागलोक, मनुष्यलोक एवं अन्य लोकों में निवास करने वाले जो भी श्रीदेवी भुवनेश्वरी के उपासक हैं, वे सब इसी मणिद्वीप को प्राप्त होते हैं ॥ ४४१/२

जो लोग भगवतीकी आराधनामें संलग्न रहते हुए देवीक्षेत्र में प्राणोत्सर्ग करते हैं वे सब वहीं जाते हैं, जहाँ महानन्दस्वरूपिणी भगवती विराजमान रहती हैं ॥ ४५१/२

घृतकुल्या, दुग्धकुल्या, दधिकुल्या तथा मधुस्रवा नदियाँ वहाँ सदा प्रवाहित रहती हैं । उसी प्रकार अमृतवहा, द्राक्षारसवहा, जम्बूरसवहा, आम्ररसवाहिनी तथा इक्षुर-सवाहिनी हजारों अन्य नदियाँ भी वहाँ हैं ॥ ४६-४७१/२

वहाँ मनोरथरूपी फल वाले अनेक वृक्ष तथा वैसे बावलियाँ और कूप भी विद्यमान हैं, जो प्राणियों की इच्छा के अनुरूप उन्हें यथेष्ट फल तथा जल प्रदान करते हैं। वहाँ किसी प्रकार का अभाव नहीं है ॥ ४८१/२

उस मणिद्वीप में किसी को भी रोगों से जर्जरता, बुढ़ापा, चिन्ता, मात्सर्य, काम, क्रोध आदि कभी नहीं होते ॥ ४९१/२

वहाँ रहने वाले सभी लोग युवावस्था से सम्पन्न, स्त्रीयुक्त और हजारों सूर्यों के समान तेजस्वी रहते हैं और वे श्रीभुवनेश्वरीदेवी की निरन्तर उपासना करते हैं ॥ ५०१/२

उपासना-परायण लोगों में से कुछ लोग सालोक्य मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं, कुछ सामीप्य मुक्ति को प्राप्त हुए हैं, कुछ सारूप्य मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं तथा कुछ अन्य प्राणी साष्टि मुक्ति के अधिकारी हुए हैं ॥ ५११/२

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में रहने वाले जो-जो देवता हैं, उनके अनेक समूह वहाँ स्थित रहकर जगदीश्वरी की उपासना करते हैं । मूर्तिमान् होकर सात करोड़ महामन्त्र तथा समस्त महाविद्याएँ उन साम्यावस्था वाली, कारणब्रह्मस्वरूपिणी तथा मायाशबलविग्रह धारण करने वाली कल्याणमयी भगवती की उपासना में तत्पर रहते हैं ॥ ५२–५४ ॥

हे राजन् ! इस प्रकार मैंने अत्यन्त महान् मणिद्वीप का वर्णन कर दिया । करोड़ों सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् और अग्नि — वे सब इस मणिद्वीप की प्रभा के करोड़वें अंश के करोड़ों अंश के भी बराबर नहीं हैं । वहाँ कहीं पर मूँगे के समान प्रकाश फैल रहा है, कहीं मरकतमणि की छवि छिटक रही है, कहीं विद्युत् तथा भानुसदृश तेज विद्यमान है, कहीं मध्याह्नकालीन सूर्य के समान प्रचण्ड तेज फैला हुआ है और कहीं करोड़ों बिजलियों की महान् धाराओं की दिव्य कान्ति व्याप्त है । कहीं सिन्दूर, नीलेन्द्रमणि और माणिक्य के समान छवि विद्यमान है। कुछ दिशाओं का भाग  हीरा-मोती की रश्मियों से प्रकाशित हो रहा है, वह कान्ति में दावानल तथा तपाये हुए सुवर्ण के समान प्रतीत हो रहा है। कहीं-कहीं चन्द्रकान्तमणि और सूर्यकान्तमणि से बने स्थान हैं ॥ ५५-५९ ॥ इस मणिद्वीप का शिखर रत्नमय तथा इसके प्राकार और गोपुर भी रत्ननिर्मित हैं । यह रत्नमय पत्रों, फलों तथा वृक्षों से पूर्णतः मण्डित है ॥ ६० ॥ यह पुरी मयूर समूहों के नृत्यों, कबूतरों की बोलियों और कोयलों की काकली तथा शुकों की मधुर ध्वनियों से सुशोभित रहती है ॥ ६१ ॥

यह सुरम्य तथा रमणीय जलवाले लाखों सरोवरों से घिरा हुआ है । इस मणिद्वीप का मध्यभाग विकसित रत्नमय कमलों से सुशोभित है ॥ ६२ ॥ उसके चारों ओर सौ योजन तक का क्षेत्र उत्तम गन्धों से सर्वदा सुवासित रहता है । मन्द गति से प्रवाहित वायु के द्वारा हिलाये गये वृक्षों से यह व्याप्त रहता है ॥ ६३ ॥ चिन्तामणि के समूहों की ज्योति से वहाँ का विस्तृत आकाश सदा प्रकाशित रहता है और रत्नों की प्रभा से सभी दिशाएँ प्रज्वलित रहती हैं ॥ ६४ ॥ वृक्ष समूहों की मधुर सुगन्धों से सुपूरित वायु वहाँ सदा बहती रहती है । हे राजन् ! दस हजार योजन तक प्रकाशमान वह मणिद्वीप सदा सुगन्धित धूप से सुवासित रहता है ॥ ६५ ॥ किरणों की कान्ति तथा दर्पण से युक्त यह मणिद्वीप रत्नमयी जालियों के छिद्रों से निकलने वाली चपल दिशाभ्रम उत्पन्न कर देने वाला है ॥ ६६ ॥ हे राजन्! समग्र ऐश्वर्य, सम्पूर्ण श्रृंगार, समस्त सर्वज्ञता, समग्र तेज, अखिल पराक्रम, समस्त उत्तम गुण और समग्र दया की इस मणिद्वीप में अन्तिम सीमा है ॥ ६७-६८ ॥ एक राजा के आनन्द से लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त जो-जो आनन्द हो सकते हैं, वे सब इस मणिद्वीप के आनन्द में अन्तर्निहित हैं ॥ ६९ ॥

हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे अति महनीय मणिद्वीप का वर्णन कर दिया। महादेवी का यह परम धाम सम्पूर्ण उत्तम लोकों से भी उत्तम है ॥ ७० ॥ इस मणिद्वीप के स्मरणमात्र से सम्पूर्ण पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं और मृत्युकाल में इसका स्मरण हो जाने पर प्राणी उसी पुरी को प्राप्त हो जाता है ॥ ७१ ॥ इन पाँच अध्यायों का (अध्याय आठ से लेकर बारह तक) जो प्राणी सावधान होकर नित्य पाठ करता है; उसे भूत, प्रेत, पिशाच आदि बाधाएँ नहीं होतीं ॥ ७२ ॥ नये भवन के निर्माण तथा वास्तु यज्ञ के अवसर पर प्रयत्नपूर्वक इसका पाठ करना चाहिये; उससे कल्याण होता है ॥ ७३ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत बारहवें स्कन्ध का ‘मणिद्वीपवर्णन’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

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