श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-द्वादशः स्कन्धः-अध्याय-08
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-द्वादशः स्कन्धः-अष्टमोऽध्यायः
आठवाँ अध्याय
देवताओं का विजयगर्व तथा भगवती उमा द्वारा उसका भंजन, भगवती उमा का इन्द्र को दर्शन देकर ज्ञानोपदेश देना
पराशक्तेराविर्भाववर्णनम्

जनमेजय बोले — सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ तथा समस्त धर्मों को जानने वाले हे भगवन् ! सभी द्विजातियों के लिये शक्ति की उपासना नित्य होने के कारण तीनों सन्ध्या-कालों में तथा अन्य समय में भी करणीय है — ऐसा श्रुति का कथन है; तो फिर हे विभो! उन भगवती को छोड़कर द्विजगण अन्य देवताओं की उपासना क्यों करते हैं ? ॥ १-२ ॥ कुछ विष्णु उपासक, कुछ गणपति के उपासक, कुछ कापालिक, कुछ चीनमार्गी, कुछ वल्कलधारी, कुछ दिगम्बर, कुछ बौद्ध, कुछ चार्वाक आदि दिखायी पड़ते हैं । इसी प्रकार लोक में बहुत से ऐसे लोग भी दिखायी देते हैं, जो वेदों के प्रति श्रद्धा-भाव से रहित हैं । हे ब्रह्मन् ! इसमें क्या कारण है ? वह मुझे बताने की आप कृपा कीजिये ॥ ३-४१/२

कुछ बुद्धिमान् पण्डित और अनेक प्रकार के तर्क करने में दक्ष विद्वान् लोग भी हैं, जो वेदों के प्रति श्रद्धा से विहीन हैं। कोई भी व्यक्ति जान-बूझकर अपने कल्याण का परित्याग नहीं करना चाहता है, तो फिर वे ऐसा क्यों करते हैं ? हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! इसमें क्या कारण है; मुझे बतलाइये ॥ ५-६१/२

आपने पहले मणिद्वीप की महिमा का वर्णन किया था । भगवती का वह परम उत्तम स्थान कैसा है ? हे अनघ ! आप मुझ श्रद्धावान् भक्त को इसे भी बताइये; क्योंकि प्रसन्न गुरुजन गुप्त बात भी बता देते हैं ॥ ७-८१/२

सूतजी बोले — हे मुनीश्वरो ! महाराज जनमेजय की यह बात सुनकर भगवान् वेदव्यास ने उन्हें क्रम से वह सब कुछ बतला दिया, जिसे सुनकर द्विजातियों के मन में वेदों के प्रति श्रद्धा बढ़ जाती है ॥ ९-१० ॥

व्यासजी बोले — हे राजन् ! इस समय आपने जो पूछा है, वह अत्युत्तम तथा काल के अनुरूप ही है । आप बुद्धिमान् तथा वेदों में श्रद्धा रखने वाले प्रतीत होते हैं ॥ ११ ॥

हे महाराज! पूर्वकाल में मद से उन्मत्त दानवों ने देवताओं के साथ सौ वर्षों तक एक अत्यन्त विस्मयकारक युद्ध किया था ॥ १२ ॥ हे नृप ! अनेक प्रकार के शस्त्रों के प्रहार तथा अनेक प्रकार की मायाओं के प्रयोग से भरा उनका वह युद्ध जगत् के लिये अत्यन्त विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ १३ ॥ उस समय पराशक्ति भगवती की कृपा से देवताओं ने युद्ध में दैत्यों को जीत लिया और वे दैत्य भूलोक तथा स्वर्ग छोड़कर पाताललोक में चले गये ॥ १४ ॥ इस विजय से अत्यन्त हर्षित देवतागण मोह के कारण अभिमानयुक्त होकर चारों ओर परस्पर अपने पराक्रम की इस प्रकार चर्चा करने लगे हमारी विजय क्यों न हो? क्योंकि हमारी महिमा सर्वोत्तम है । कहाँ ये अधम और पराक्रमहीन दैत्य तथा कहाँ सृजन, पालन तथा संहार करने वाले हम यशस्वी देवता ! तो फिर हमारे सामने असहाय दैत्यों की बात ही क्या ॥ १५–१७ ॥

हे राजन् ! पराशक्ति के प्रभाव को न जानने के कारण ही वे देवता मोहित हो गये थे। तब उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिये दयामयी जगदम्बा एक यक्ष के रूप में प्रकट हुईं ॥ १८१/२

करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, करोड़ों चन्द्रमाओं के समान अत्यन्त शीतल, करोड़ों विद्युत् के समान आभा वाले और हाथ-पैर आदि अवयवों से रहित, पहले कभी न देखे गये उस परम सुन्दर तेज को देखकर देवता महान् विस्मय में पड़ गये और कहने लगे यह क्या है ! यह क्या है ! यह दैत्यों की चेष्टा है अथवा कोई बलवती माया है ? देवताओं को आश्चर्यचकित करने वाली यह माया किसके द्वारा रची गयी है ? तब उन सभी देवताओं ने एकत्र होकर उत्तम विचार किया कि यक्ष के समीप जाकर पूछना चाहिये कि ‘तुम कौन हो ?’ इस प्रकार उसके बलाबल की जानकारी कर लेने के पश्चात् ही कोई प्रतिक्रिया करनी चाहिये ॥ १९–२३ ॥

तत्पश्चात् देवराज इन्द्र ने अग्नि को बुलाकर उनसे कहा — ‘हे अग्निदेव ! आप जाइये । चूँकि आप ही हम लोगों के उत्तम मुख हैं, इसलिये वहाँ जाकर इसकी जानकारी कीजिये कि यह यक्ष कौन है ‘ ॥ २४३ ॥

हजार नेत्रों वाले इन्द्र के मुख से अपने प्रति पराक्रम से युक्त वचन सुनकर वे अग्निदेव अत्यन्त वेगपूर्वक निकल पड़े और शीघ्र ही यक्ष के पास जा पहुँचे ॥ २५१/२

तब यक्ष ने उन अग्नि से पूछा — ‘तुम कौन हो ? तुममें कौन-सा पराक्रम है ? जो हो वह सब मुझे बतलाओ’ ॥ २६१/२

इस पर उसने कहा — ‘मैं अग्नि हूँ; मैं जातवेदा हूँ। सम्पूर्ण विश्व को दग्ध कर डालने का सामर्थ्य मुझमें विद्यमान है ‘ ॥ २७१/२

तब परम तेजस्वी यक्ष ने अग्नि के समक्ष एक तृण रख दिया और कहा — ‘यदि विश्व को भस्म करने की शक्ति तुममें है, तो इसे जला दो’ ॥ २८१/२

तब अग्नि ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग करते हुए उस तृण को जलाने का प्रयास किया, किंतु वे उस तृण को भस्म करने में समर्थ नहीं हुए और लज्जित होकर देवताओं के पास लौट गये ॥ २९१/२

देवताओं के द्वारा वृत्तान्त पूछे जाने पर अग्निदेव ने सब कुछ बता दिया और कहा — हे देवताओ! सर्वेश आदि बनने में हम लोगों का अभिमान सर्वथा व्यर्थ है ॥ ३०१/२

तत्पश्चात् वृत्रासुर का संहार करने वाले इन्द्र ने वायु को बुलाकर यह कहा — सम्पूर्ण जगत् आपमें व्याप्त है और आपकी ही चेष्टाओं से यह क्रियाशील है। आप प्राणरूप होकर सभी प्राणियों में सम्पूर्ण शक्ति का संचार करते हैं। आप ही जाकर यह जानकारी प्राप्त कीजिये कि यह यक्ष कौन है ? क्योंकि अन्य कोई भी उस परम तेजस्वी यक्ष को जानने में समर्थ नहीं है ॥ ३१-३३ ॥

गुण और गौरव से समन्वित इन्द्र की बात सुनकर वे वायुदेव अभिमान से भर उठे और शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये, जहाँ यक्ष विराजमान था ॥ ३४ ॥

तब वायु को देखकर यक्ष ने मधुर वाणी में कहा — तुम कौन हो ? तुममें कौन-सी शक्ति है ? यह सब मेरे सामने बतलाओ ॥ ३५ ॥

यक्ष का वचन सुनकर वायु ने गर्वपूर्वक कहा — ‘मैं मातरिश्वा हूँ; मैं वायु हूँ। सबको संचालित करने तथा ग्रहण करने की शक्ति मुझमें विद्यमान है मेरी चेष्टा से ही सम्पूर्ण जगत् सब प्रकार के व्यवहार- वाला होता है ‘ ॥ ३६-३७ ॥

वायु की यह वाणी सुनकर परम तेजस्वी यक्ष ने कहा — तुम्हारे सामने यह जो तृण रखा हुआ है, उसे तुम अपनी इच्छा अनुसार गतिमान् कर दो; अन्यथा इस अभिमान का त्याग करके लज्जित हो इन्द्र के पास लौट जाओ ॥ ३८१/२

यक्ष का वचन सुनकर वायुदेव ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर उस तृण को उड़ाने का प्रयत्न किया, किंतु वह तृण अपने स्थान से हिला तक नहीं। तब वे पवनदेव लज्जित होकर अभिमान का त्याग करके इन्द्र के पास चले गये ॥ ३९-४० ॥

उन्होंने अभिमान को चूर करने वाला सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाते हुए कहा — ‘मिथ्या गर्व तथा अभिमान करने वाले हम लोग इस यक्ष को जानने में समर्थ नहीं हैं । परम प्रचण्ड तेज वाला यह यक्ष अलौकिक प्रतीत हो रहा है’ ॥ ४११/२

तत्पश्चात् सभी देवताओं ने सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र से कहा — ‘ आप देवताओं के स्वामी हैं, अतः अब आप ही यक्ष विषय में ठीक-ठीक जानने का प्रयत्न कीजिये’ ॥ ४२१/२

तब इन्द्र अत्यन्त अभिमानपूर्वक उस यक्ष के पास गये। उनके पहुँचते ही यक्षरूप परात्पर परम तेज शीघ्र ही अदृश्य हो गया। जब वह यक्ष इन्द्र के सामने से अन्तर्हित हो गया तब देवराज इन्द्र अत्यन्त लज्जित हो गये और यक्ष के उनसे बात तक न करने के कारण वे मन में अपने को छोटा समझने लगे। वे सोचने लगे कि अब मुझे देवताओं के समाज में नहीं जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ देवताओं के समक्ष अपनी इस हीनता के विषय में क्या बताऊँगा । अतः शरीर का त्याग कर देना ही मेरे लिये अच्छा होगा; क्योंकि मान ही महापुरुषों का धन होता है। मान के नष्ट हो जाने पर मनुष्य का जीवित रहना मृत्यु के समान है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३–४७ ॥

यह निश्चय करके देवराज इन्द्र अभिमान त्यागकर उन्हीं पराशक्ति की शरण में गये, जिनकी ऐसी अद्भुत लीला है ॥ ४८ ॥ उसी क्षण गगन-मण्डल में यह आकाशवाणी हुई ‘हे सहस्राक्ष ! तुम मायाबीज का जप करो और उससे सुखी हो जाओ’ ॥ ४९ ॥

तब इन्द्र ने नेत्र बन्द करके देवी का ध्यान करते हुए निराहार रहकर एक लाख वर्ष तक अतिश्रेष्ठ परम मायाबीज का जप किया ॥ ५० ॥ एक दिन चैत्रमास के शुक्ल पक्ष में नवमी तिथि को मध्याह्नकाल में उसी स्थल पर सहसा एक महान् तेज प्रकट हुआ ॥ ५१ ॥ इन्द्र ने उस तेजमण्डल के मध्य में नूतन यौवन से सम्पन्न, कुमारी अवस्था में विद्यमान, प्रभायुक्त जपाकुसुम की कान्ति से सम्पन्न, प्रातः कालीन करोड़ों सूर्य की प्रभा से सुशोभित, द्वितीया के चन्द्रमासदृश मुकुट धारण किये हुई, वस्त्र के अन्दरसे परिलक्षित होते हुए वक्ष:स्थल वाली, अपने चारों श्रेष्ठ हाथों में वर-पाश- अंकुश और अभयमुद्रा धारण करने वाली, अत्यन्त मनोहर अंगों से सम्पन्न, कोमल लता के समान अंगों वाली, कल्याणस्वरूपिणी, भक्तों के लिये कल्पवृक्षस्वरूपा, नानाविध आभूषणों से सुशोभित, तीन नेत्रों वाली, अपनी वेणी में चमेली की माला धारण की हुई, चारों दिशाओं में स्थित होकर मूर्तिमान् चारों वेदों द्वारा स्तुत होती हुई, अपने दाँतों की प्रभा से वहाँ की भूमि को पद्मरागमय बना देने वाली, प्रसन्नता तथा मुसकानयुक्त मुखमण्डल वाली, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर रक्तवर्ण के वस्त्र धारण की हुई, लालचन्दन से अनुलिप्त विग्रह वाली, समस्त कारणों की भी कारण तथा बिना किसी हेतु के साक्षात् करुणा की मूर्तिस्वरूपा उमा नाम से विख्यात जगदम्बा हैमवती भगवती शिवा को अपने समक्ष देखा। इससे इन्द्र का अन्तःकरण प्रेम से गद्गद हो उठा ॥ ५२-५८ ॥

प्रेमाश्रुओं से पूर्ण नयन वाले तथा रोमांचित शरीर वाले इन्द्र ने उन जगदीश्वरी के चरणों में दण्ड की भाँति गिरकर प्रणाम किया और अनेक प्रकार के स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की । भक्ति भाव से सम्पन्न हो सिर झुकाकर परम प्रसन्नतापूर्वक इन्द्र ने देवी से कहा हे सुशोभने ! यह यक्ष कौन था और किसलिये प्रकट हुआ था ? यह सब आप मुझे बतलाइये ॥ ५९-६०१/२

उनकी यह बात सुनकर करुणासागर भगवती ने कहा — यह मेरा ही रूप है; यही ब्रह्म है जो माया का अधिष्ठानस्वरूप, सबका साक्षी, निर्विकार और समस्त कारणों का भी कारण है ॥ ६१-६२ ॥ सभी वेद जिस पद का बार-बार प्रतिपादन करते हैं, समस्त तप भी तपश्चरण के द्वारा जिस पद की प्राप्ति को बताते हैं और साधकगण जिसकी प्राप्ति की अभिलाषा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उसी पद को मैं तुम्हें नामपूर्वक बतलाती हूँ ॥ ६३ ॥ उसी को ‘ॐ’ एक अक्षर वाला ब्रह्म कहते हैं और वही ‘ह्रीं’ रूप भी है । हे सुरश्रेष्ठ! ह्रीं और ॐ ये दो मेरे मुख्य बीजमन्त्र हैं। इन्हीं दो भागों से सम्पन्न होकर मैं सम्पूर्ण जगत् का सृजन करती हूँ। उनमें एक भाग सच्चिदानन्द नामवाला कहा गया है और दूसरा भाग मायाप्रकृति संज्ञा वाला कहा गया है। वह माया ही परा शक्ति है और सम्पूर्ण जगत् पर प्रभुत्व रखने वाली वह शक्तिशालिनी देवी मैं ही हूँ ॥ ६४-६६ ॥ यह माया चन्द्रमा की चाँदनी की भाँति अभिन्नरूप से सर्वदा मुझमें विराजमान रहती है । हे सुरोत्तम ! साम्यावस्थास्वरूपिणी मेरी यह माया सम्पूर्ण जगत् के प्रलय होते समय भी मुझसे भिन्न नहीं रहती है। प्राणियों के कर्मपरिपाकवश माया का वही अव्यक्तरूप पुनः व्यक्तरूप धारण कर लेता है ॥ ६७-६८१/२

जो अवस्था अन्तर्मुखी वह माया कही जाती है और जो बहिर्मुखी अवस्था वाली माया है, वह तम ( अविद्या) नाम से कही जाती है । तमोरूपिणी उस बहिर्मुखी माया से प्राणियों की उत्पत्ति होती है। हे सुरश्रेष्ठ! सृष्टि के आदि में यह माया रजोगुणरूप से विद्यमान रहती है ॥ ६९-७०१/२

ब्रह्मा, विष्णु और महेश — ये देवता त्रिगुणात्मक कहे गये हैं। ब्रह्मा में रजोगुण की अधिकता, विष्णु में सत्त्वगुण की अधिकता तथा सभी कारणों के स्वरूप वाले रुद्र में तमोगुण की अधिकता रहती है ॥ ७१-७२ ॥ ब्रह्मा स्थूलदेह वाले हैं। विष्णु लिंगदेह वाले तथा रुद्र कारणदेह वाले कहे गये हैं । जो सर्वान्तर्यामिस्वरूपिणी साम्यावस्था कही गयी है, वह तुरीयरूपा मैं ही हूँ और इसके भी ऊपर जो निराकार परब्रह्म है, वह भी मेरा ही रूप है ॥ ७३-७४ ॥ निर्गुण तथा सगुण – यह मेरा दो प्रकार का रूप कहा जाता है। माया से रहित रूप निर्गुण और मायायुक्त रूप सगुण है । वही मैं सम्पूर्ण जगत् की रचना करके उसके भीतर भलीभाँति प्रविष्ट होकर जीव को उसके कर्म तथा शास्त्र के अनुसार निरन्तर प्रेरित करती रहती हूँ ॥ ७५-७६ ॥ ब्रह्मा को सृष्टि करने, विष्णु को जगत् का पालन करने और कारणरूप रुद्र को संहार करने के लिये मैं, ही प्रेरणा प्रदान करती हूँ ॥ ७७ ॥ वायु मेरे भय से प्रवाहित होता है और सूर्य मेरा भय मानकर निरन्तर गति करता रहता है। उन्हीं की भाँति इन्द्र, अग्नि और यम भी मेरे भय से अपने-अपने कार्य सम्पन्न करते हैं । इसीलिये मैं सर्वश्रेष्ठ कही गयी हूँ ॥ ७८ ॥

आप सभी देवताओं ने मेरी ही कृपा से सब प्रकार की विजय प्राप्त की है। मैं आप लोगों को कठपुतली के समान नचाती रहती हूँ ॥ ७९ ॥ मैं कभी देवताओं की विजय कराती हूँ और कभी दैत्यों की। मैं स्वतन्त्र होकर अपनी इच्छा से सभी के कर्म विपाक के अनुसार सब कुछ सम्पादित करती हूँ ॥ ८० ॥ अहंकार से आवृत बुद्धि वाले तुम लोग अपने गर्व से वैसी प्रभाव वाली मुझ सर्वात्मिका भगवती को भूलकर दुःखदायी मोह को प्राप्त हो गये थे । इसलिये तुम लोगों पर अनुग्रह करने के लिये तुम लोगों के शरीर से मेरा दिव्य तेज निकलकर यक्ष के रूप में प्रकट हो गया था ॥ ८१-८२ ॥ अब तुम लोग अपने देह से उत्पन्न गर्व का सब प्रकार से त्याग करके मुझ सच्चिदानन्दस्वरूपिणी भगवती की ही शरण में आ जाओ ॥ ८३ ॥

व्यासजी बोले — [ हे जनमेजय !] ऐसा कहकर मूलप्रकृतिरूपा सर्वेश्वरी महादेवी देवताओं के द्वारा भक्ति-पूर्वक सुपूजित होकर तत्काल अन्तर्धान हो गयीं ॥ ८४ ॥ तत्पश्चात् सभी देवता अपने अभिमान का त्याग करके भगवती के परात्पर चरणकमल की विधिवत् आराधना करने लगे । वे सब तीनों सन्ध्याओं में सदा गायत्री-जप में संलग्न रहते थे और यज्ञ-भाग आदि के द्वारा नित्य भगवती की उपासना करते थे ॥ ८५-८६ ॥ इस प्रकार सत्ययुग में सभी लोग गायत्री-जप में तत्पर थे और वे प्रणव तथा हल्लेखा के जप में भी दत्तचित्त रहते थे ॥ ८७ ॥

वेद के द्वारा कहीं भी विष्णु की उपासना तथा विष्णु-दीक्षा नित्य नहीं कही गयी है; उसी प्रकार शिव की भी उपासना तथा दीक्षा नित्य नहीं कही गयी है, किंतु गायत्री की उपासना सभी वेदों के द्वारा नित्य कही गयी है, जिसके बिना ब्राह्मण का सब प्रकार अध: पतन हो जाता है । द्विज केवल उतने से ही कृतकृत्य हो जाता है, उसे किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रहती। केवल गायत्री-उपासना में ही तत्पर रहकर द्विज मोक्ष प्राप्त कर लेता है, चाहे वह अन्य कार्य करे अथवा न करे ऐसा मनु ने स्वयं कहा है। उन गायत्री बिना विष्णु तथा शिव की उपासना में संलग्न रहने वाला विप्र सब प्रकार से नरकगामी होता है। इसीलिये हे राजन् ! सत्ययुग में सभी उत्तम द्विजगण गायत्रीजप तथा भगवती के चरणकमल की उपासना में निरन्तर संलग्न रहते थे ॥ ८८-९२ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत बारहवें स्कन्ध का ‘पराशक्ति के आविर्भाव का वर्णन’ नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

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