June 1, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-द्वादशः स्कन्धः-अध्याय-06 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-द्वादशः स्कन्धः-षष्ठोऽध्यायः छठा अध्याय गायत्रीसहस्त्रनाम स्तोत्र तथा उसके पाठ का फल गायत्रीसहस्रनामस्तोत्रवर्णनम् नारदजी बोले — सभी धर्मों को जानने वाले तथा सभी शास्त्रों में निष्णात हे भगवन्! मैंने आपके मुख से श्रुतियों, स्मृतियों तथा पुराणों से सम्बद्ध सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाला वह रहस्य सुन लिया, जिससे विद्या की प्राप्ति होती है । हे देव ! किसके द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है और मोक्ष का साधन क्या है ? हे कमलनयन ! किस साधन से ब्राह्मणों को उत्तम गति मिलती है, किससे मृत्यु का नाश होता है ? और किसके आश्रय से मनुष्य को इहलोक तथा परलोक में उत्तम फल प्राप्त होता है ? इस सम्बन्ध में प्रारम्भ से लेकर सम्पूर्ण बातें विस्तारपूर्वक बताने की कृपा कीजिये ॥ १–३१/२ ॥ श्रीनारायण बोले — हे महाप्राज्ञ ! हे अनघ ! आपको साधुवाद है, जो आपने इतनी उत्तम बात पूछी है । सुनिये, मैं प्रयत्नपूर्वक गायत्री के दिव्य तथा मंगलकारी एक हजार आठ नामों वाले सर्वपापहारीस्तोत्र का वर्णन करता हूँ ॥ ४-५ ॥ पूर्वकाल में सृष्टि के आदि में भगवान् ने जिसे कहा था, वही मैं आपको बता रहा हूँ। इस एक हजार आठ नाम वाले स्तोत्र के ऋषि ब्रह्माजी कहे गये हैं । अनुष्टुप् इसका छन्द है तथा भगवती गायत्री इसकी देवता कही गयी हैं । हल् (व्यंजन) वर्ण इसके बीज और स्वर इसकी शक्तियाँ कही गयी हैं । मातृकामन्त्र के छः अक्षर ही इसके छ: अंगन्यास और करन्यास कहे जाते हैं ॥ ६-७१/२ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register अब साधकों के कल्याण के लिये देवी का ध्यान बताता हूँ। रक्तश्वेतहिरण्यनीलधवलैर्युक्तां त्रिनेत्रोज्ज्वलां रक्तां रक्तनवस्रजं मणिगणैर्युक्तां कुमारीमिमाम् । गायत्रीं कमलासनां करतलव्यानद्धकुण्डाम्बुजां पद्माक्षीं च वरस्रजं च दधतीं हंसाधिरूढां भजे ॥ ९ ॥ रक्त-श्वेत-पीत-नील एवं धवलवर्ण ( – वाले मुखों) – से सम्पन्न, तीन नेत्रों से देदीप्यमान विग्रह वाली, रक्तवर्ण वाली, नवीन रक्तपुष्पों की माला धारण करने वाली, अनेक मणिसमूहों से युक्त, कमल के आसन पर विराजमान, अपने दो हाथों में कमल और कुण्डिका एवं अन्य दो हाथों में वर तथा अक्षमाला धारण करने वाली, कमल के समान नेत्रों वाली, हंस पर विराजमान रहने वाली तथा कुमारी अवस्था से सम्पन्न भगवती गायत्री की मैं उपासना करता हूँ ॥ ८-९ ॥ [देवी के सहस्रनाम इस प्रकार हैं — ] १. अचिन्त्यलक्षणा (बुद्धि की पहुँच से परे लक्षणों वाली) २. अव्यक्ता, ३. अर्थमातृमहेश्वरी (अर्थ आदि पार्थिव पदार्थों के परिच्छेदक ब्रह्मा आदि देवताओं पर नियन्त्रण करने वाली) ४. अमृता (अमृतस्वरूपिणी), ५. अर्णवमध्यस्था (समुद्र के भीतर विराजमान रहने वाली), ६. अजिता, ७. अपराजिता ८. अणिमादिगुणा- धारा (अणिमा आदि सिद्धियों की आश्रयभूता), ९. अर्कमण्डलसंस्थिता ( सूर्यमण्डल में विराजमान), १०. अजरा (सदा तरुण अवस्था में रहने वाली), ११. अजा (जन्मरहित), १२. अपरा (जिनसे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है), १३. अधर्मा ( जात्यादिनिमित्तक लोकधर्मों से रहित), १४. अक्षसूत्रधरा ( अक्षसूत्र धारण करने वाली), १५. अधरा ( अपने ही आधार पर स्थित) ॥ १०-११ ॥ १६. अकारादिक्षकारान्ता (जिनके आदि में अकार तथा अन्त में क्षकार है, वे वर्णमातृकास्वरूपिणी देवी), १७. अरिषड्वर्गभेदिनी (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य — इन छः प्रकार के शत्रुओं का भेदन करने वाली), १८. अञ्जनाद्रिप्रतीकाशा (अंजनगिरि के समान कृष्णवर्ण की प्रभा से सुशोभित ), १९. अञ्जनाद्रिनिवासिनी (अंजनगिरि पर निवास करने वाली) ॥ १२ ॥ २०. अदितिः (देवताओं की माता), २१. अजपा (अजपाजपरूपिणी), २२. अविद्या (माया), २३. अरविन्दनिभेक्षणा ( कमलसदृश नेत्रों वाली), २४. अन्तर्बहिः स्थिता (सभी के भीतर तथा बाहर स्थित रहने वाली), २५. अविद्याध्वंसिनी ( अविद्या का नाश करने वाली), २६. अन्तरात्मिका (सभी के अन्तःकरण में विराजमान रहने वाली ) ॥ १३ ॥ २७. अजा (जन्म से रहित प्रकृति-स्वरूपिणी), २८. अजमुखावासा ( ब्रह्मा के मुख में निवास करने वाली), २९. अरविन्दनिभानना ( कमल के समान प्रफुल्लित मुखवाली), ३०. अर्धमात्रा ( प्रणवांगभूत अर्धमात्रास्वरूपा), ३१. अर्थदानज्ञा ( धर्म आदि चारों पुरुषार्थों का दान करने में कुशल), ३२. अरिमण्डलमर्दिनी (शत्रु- समूहों का मर्दन करने वाली ) ॥ १४ ॥ ३३. असुरघ्नी (राक्षसों का संहार करने वाली), ३४. अमावास्या (अमावस्यातिथिरूपा), ३५. अलक्ष्मी- घ्न्यन्त्यजार्चिता (अलक्ष्मी का संहार करने वाली अन्त्यजा—मातंगीदेवी से अर्चित होने वाली), ३६. आदि- लक्ष्मी:, ३७. आदिशक्ति: ( महामाया), ३८. आकृति: (आकारस्वरूपिणी), ३९. आयतानना (विशाल मुखवाली) ॥ १५ ॥ ४०. आदित्यपदवीचारा (आदित्य मार्ग पर चलने वाली सूर्यगतिरूपा ), ४१. आदित्यपरिसेविता (सूर्य आदि देवताओं से सुसेवित), ४२. आचार्या (सदाचार की व्याख्या करने वाली), ४३. आवर्तना ( भ्रमणशील जगत् की रचना करने वाली), ४४. आचारा (आचारस्वरूपिणी), ४५. आदिमूर्तिनिवासिनी (आदिमूर्ति अर्थात् ब्रह्म में निवास करने वाली ) ॥ १६ ॥ ४६. आग्नेयी (अग्नि की अधिष्ठात्री), ४७. आमरी (देवताओं की पुरी जिनका रूप माना जाता है), ४८. आद्या (आदिस्वरूपिणी), ४९. आराध्या (सभी द्वारा आराधित), ५०. आसनस्थिता (दिव्य आसन पर विराजमान रहने वाली), ५१. आधारनिलया ( मूलाधार में निवास करने वाली कुण्डलिनीस्वरूपिणी), ५२. आधारा ( जगत् को धारण करने वाली), ५३. आकाशान्त- निवासिनी (आकाशतत्त्व के अन्तरूप अहंकार में निवास करने वाली) ॥ १७ ॥ ५४. आद्याक्षरसमायुक्ता (आदि अक्षर अर्थात् अकार से युक्त), ५५. आन्तराकाशरूपिणी (दहराकाश- रूपिणी), ५६. आदित्यमण्डलगता (सूर्यमण्डल में विद्यमान), ५७. आन्तरध्वान्तनाशिनी ( अज्ञानरूप आन्तरिक अन्धकार का नाश करनेवाली ) ॥ १८ ॥ ५८. इन्दिरा (लक्ष्मी), ५९. इष्टदा ( मनोरथ पूर्ण करनेवाली), ६०. इष्टा ( साधकों की अभीष्ट देवतारूपिणी), ६१. इन्दीवरनिभेक्षणा (सुन्दर नीलकमल के समान नेत्रों वाली), ६२. इरावती ( इरा अर्थात् पृथ्वी से युक्त), ६३. इन्द्रपदा ( अपनी कृपा से इन्द्र को पद दिलाने वाली), ६४. इन्द्राणी ( शचीरूप से विराजमान ), ६५. इन्दुरूपिणी ( चन्द्रमा के समान सुन्दर रूपवाली ) ॥ १९ ॥ ६६. इक्षुकोदण्डसंयुक्ता (हाथ में इक्षु का धनुष धारण करने वाली), ६७. इषुसन्धानकारिणी (बाणों का संधान करने में दक्ष), ६८. इन्द्रनीलसमाकारा (इन्द्रनील-मणि के समान प्रभा वाली), ६९. इडापिङ्गलरूपिणी ( इडा और पिंगला आदि नाड़ीरूपिणी ) ॥ २० ॥ ७०. इन्द्राक्षी (शताक्षी नाम वाली देवी), ७१. ईश्वरी देवी (अखिल ऐश्वर्यों से युक्त भगवती), ७२. ईहात्रयविवर्जिता ( तीन प्रकार की ईहा अर्थात् लोकैषणा, वित्तैषणा और पुत्रैषणा से रहित), ७३. उमा, ७४. उषा, ७५. उडुनिभा (नक्षत्र के सदृश प्रभा वाली), ७६. उर्वारुकफलानना (ककड़ी के फल के समान सदा प्रफुल्लित मुखवाली ) ॥ २१ ॥ ७७. उडुप्रभा (जल के समान वर्ण वाली), ७८. उडुमती (रात्रिरूपिणी), ७९. उडुपा (चन्द्रमा अथवा नौकारूपिणी), ८०. उडुमध्यगा (नक्षत्रमण्डल के मध्य विराजमान), ८१. ऊर्ध्वम् (ऊर्ध्वदेशरूपिणी), ८२. ऊर्ध्वकेशी (ऊपर की ओर उठे हुए केशों वाली), ८३. ऊर्ध्वाधोगतिभेदिनी (ऊर्ध्वगति अर्थात् स्वर्ग और अधोगति अर्थात् नरक दोनों का भेदन करने वाली ) ॥ २२ ॥ ८४. ऊर्ध्वबाहुप्रिया ( भुजाओं को ऊपर उठाकर आराधना करने वाले भक्तों से प्रेम करने वाली), ८५. ऊर्मिमालावाग्ग्रन्थदायिनी (तरंगमालाओं के समान श्रेष्ठ वाणी से सम्पन्न ग्रन्थ-रचना का सामर्थ्य प्रदान करने वाली), ८६. ऋतम् (सूनृत -स्वरूपिणी), ८७. ऋषिः (वेदरूपा), ८८. ऋतुमती, ८९. ऋषिदेव-नमस्कृता (ऋषियों तथा देवताओं से नमस्कृत होनेवाली) ॥ २३ ॥ ९०. ऋग्वेदा (ऋग्वेदरूपा), ९१. ऋणहर्त्री (देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का नाश करने वाली ), ९२. ऋषिमण्डलचारिणी (ऋषियों की मण्डली में विचरण करने वाली), ९३. ऋद्धिदा (समृद्धि दान करने वाली), ९४. ऋजुमार्गस्था ( सदाचार के मार्ग पर चलने वाली), ९५. ऋजुधर्मा (सहज धर्म वाली), ९६. ऋतुप्रदा (अपनी कृपा से विभिन्न ऋतुएँ प्रदान करनेवाली) ॥ २४ ॥ ९७. ऋग्वेदनिलया (ऋग्वेद में निवास करने वाली), ९८. ऋज्वी (सरल स्वभाव वाली), ९९. लुप्तधर्म-प्रवर्तिनी (लुप्त धर्मों का पुनः प्रवर्तन करने वाली), १००. लूतारिवरसम्भूता ( लूता नामक रोग विशेष के महान् शत्रुरूपी मन्त्रों को उत्पन्न करने वाली), १०१. लूतादिविषहारिणी ( मकड़ी आदि के विष का हरण करने वाली) ॥ २५ ॥ १०२. एकाक्षरा (एक अक्षर से युक्त), १०३. एकमात्रा (एक मात्रा में विराजने वाली), १०४. एका ( अद्वितीय), १०५. एकनिष्ठा ( सर्वदा एकनिष्ठ भाव में रहने वाली), १०६. ऐन्द्री (इन्द्र की शक्तिस्वरूपा), १०७. ऐरावतारूढा (ऐरावत पर आरूढ़ रहने वाली), १०८. ऐहिकामुष्मिकप्रदा ( इहलोक तथा परलोक का फल प्रदान करने वाली ) ॥ २६ ॥ १०९. ओङ्कारा (प्रणवस्वरूपिणी), ११०. ओषधी (सांसारिक रोगों से ग्रस्त प्राणियों के लिये ओषधिरूपा), १११. ओता (मणि में सूत्र की भाँति सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तःकरण में विराजमान), ११२. ओतप्रोत-निवासिनी (ब्रह्म से व्याप्त ब्रह्माण्ड में निवास करने वाली), ११३. और्वा ( वाडवाग्निस्वरूपिणी), ११४. औषधसम्पन्ना (भवरोग के शमन हेतु औषधियों से सम्पन्न), ११५. औपासनफलप्रदा (उपासना करने वालों को श्रेष्ठ फल प्रदान करने वाली ) ॥ २७ ॥ ११६. अण्डमध्यस्थिता देवी ( ब्रह्माण्ड के भीतर विराजमान देवी), ११७. अ: कारमनुरूपिणी (अ:कार अर्थात् विसर्गरूप मन्त्रमय विग्रह वाली), ११८. कात्यायनी (कात्यायनऋषि द्वारा उपासित), ११९. कालरात्रि (दानवों के संहार के लिये कालरात्रि के रूप में प्रकट करने वाली), १२०. कामाक्षी ( काम को नेत्रों में धारण करने वाली), १२१. कामसुन्दरी ( यथेच्छ सुन्दर स्वरूप धारण करने वाली ) ॥ २८ ॥ १२२. कमला, १२३. कामिनी, १२४. कान्ता, १२५. कामदा, १२६. कालकण्ठिनी (काल को अपने कण्ठ में समाहित कर लेने वाली), १२७. करिकुम्भस्तनभरा (हाथी के कुम्भसदृश पयोधरों वाली), १२८. करवीरसुवासिनी (करवीर अर्थात् महालक्ष्मीक्षेत्र में निवास करने वाली) ॥ २९ ॥ १२९. कल्याणी, १३०. कुण्डलवती, १३१. कुरुक्षेत्रनिवासिनी, १३२. कुरुविन्ददलाकारा (कुरुविन्द दल के समान आकार वाली), १३३. कुण्डली, १३४. कुमुदालया, १३५. कालजिह्वा (राक्षसों के संहार के लिये कालरूपिणी जिह्वा से सम्पन्न), १३६. करालास्या (शत्रुओं के समक्ष विकराल मुखाकृति वाली), १३७. कालिका, १३८. कालरूपिणी, १३९. कमनीयगुणा (सुन्दर गुणों से सम्पन्न), १४०. कान्तिः, १४१. कलाधारा (समस्त चौंसठ कलाओं को धारण करने वाली), १४२. कुमुद्वती ॥ ३०-३१ ॥ १४३. कौशिकी, १४४. कमलाकारा (कमल के समान सुन्दर आकार धारण करने वाली), १४५. कामचारप्रभञ्जिनी ( स्वेच्छाचार का ध्वंस करने वाली), १४६. कौमारी, १४७. करुणापाङ्गी (करुणामय कटाक्ष से भक्तों पर कृपा करने वाली), १४८. ककुबन्ता (दिशाओं की अवसानरूपा), १४९. करिप्रिया (जिन्हें हाथी प्रिय है) ॥ ३२ ॥ १५०. केसरी, १५१. केशवनुता ( भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा प्रणम्य), १५२. कदम्बकुसुमप्रिया (कदम्ब के पुष्प से प्रेम करने वाली), १५३. कालिन्दी, १५४. कालिका, १५५. काञ्ची, १५६. कलशोद्भवसंस्तुता ( अगस्त्यमुनि से स्तुत होने वाली), १५७. काममाता, १५८. क्रतुमती ( यज्ञमय विग्रह धारण करने वाली), १५९. कामरूपा, १६०. कृपावती, १६१. कुमारी, १६२. कुण्डनिलया (हवन- कुण्ड में विराजने वाली), १६३. किराती (भक्तों का कार्यसाधन करने के लिये किरात-वेष धारण करने वाली), १६४. कीरवाहना (तोतापक्षी को वाहन रूप में रखने वाली) ॥ ३३-३४ ॥ १६५. कैकेयी, १६६. कोकिलालापा, १६७. केतकी, १६८. कुसुमप्रिया, १६९. कमण्डलुधरा (ब्रह्मचारिणी के रूप में कमण्डलु धारण करने वाली), १७०. काली, १७१. कर्मनिर्मूलकारिणी ( आराधित होने पर कर्मों को निर्मूल कर देने वाली) ॥ ३५ ॥ १७२. कलहंसगतिः, १७३. कक्षा, १७४. कृतकौतुकमङ्गला (सर्वदा मंगलमय वैवाहिक वेष धारण करने वाली), १७५. कस्तूरीतिलका, १७६. कम्रा (चंचला), १७७. करीन्द्रगमना (ऐरावत पर आरूढ होने वाली), १७८. कुहूः ( अमावस्या नाम से प्रसिद्ध) ॥ ३६ ॥ १७९. कर्पूरलेपना, १८०. कृष्णा, १८१. कपिला, १८२. कुहराश्रया (बुद्धिरूपी गुहा में स्थित रहने वाली), १८३. कूटस्था ( पर्वतशिखर पर निवास करने वाली), १८४. कुधरा ( पृथ्वी को धारण करने वाली), १८५. कम्रा ( अत्यन्त सुन्दरी), १८६. कुक्षिस्थाखिलविष्टपा (अपनी कुक्षि में स्थित अखिल जगत् की रक्षा करने वाली ) ॥ ३७ ॥ १८७. खड्गखेटकरा ( दानवों को मारने के लिये हाथ में ढाल-तलवार धारण करने वाली), १८८. खर्वा (अभिमानिनी), १८९. खेचरी, १९०. खगवाहना, १९९. खट्वाङ्गधारिणी, १९२. ख्याता, १९३. खगराजोपरिस्थिता (गरुड के ऊपर विराजमान रहने वाली) ॥ ३८ ॥ १९४. खलघ्नी, १९५. खण्डितजरा ( बुढ़ापे से रहित विग्रह वाली), १९६. खण्डाख्यानप्रदायिनी (मधुर कथाओं को प्रदान करने वाली), १९७. खण्डेन्दुतिलका (ललाट पर खण्डित चन्द्रमा अर्थात् द्वितीया चन्द्रमा को तिलक रूप में धारण करने वाली), १९८. गङ्गा, १९९. गणेशगुहपूजिता ( गणेश तथा कार्तिकेय से पूजित ) ॥ ३९ ॥ २००. गायत्री (अपना गुणगान करने वालों की संरक्षिका), २०१. गोमती, २०२. गीता, २०३. गान्धारी, २०४. गानलोलुपा, २०५. गौतमी, २०६. गामिनी, २०७. गाधा (पृथ्वी को आश्रय देने वाली), २०८. गन्धर्वाप्सरसेविता ( गन्धर्व तथा अप्सराओं से सेवित) ॥ ४० ॥ २०९. गोविन्दचरणाक्रान्ता (श्रीविष्णु के चरणों से आक्रान्त अर्थात् पृथ्वीस्वरूपिणी), २१०. गुणत्रयविभाविता ( तीन गुणों के साथ आविर्भूत होने वाली), २११. गन्धर्वी, २१२. गह्वरी ( दुरूह महिमा वाली), २१३. गोत्रा ( पृथ्वीरूपा), २१४. गिरीशा (पर्वत की अधिष्ठात्री), २१५. गहना (गूढ़ स्वभाव वाली), २१६. गमी ( गमनशीला ) ॥ ४१ ॥ २१७. गुहावासा, २१८. गुणवती, २१९. गुरुपापप्रणाशिनी (महान् पापों का नाश करने वाली), २२०. गुर्वी, २२१. गुणवती, २२२. गुह्या, २२३. गोप्तव्या (हृदय में छिपाये रखने योग्य), २२४. गुणदायिनी ॥ ४२ ॥ २२५. गिरिजा, २२६. गुह्यमातङ्गी (ब्रह्म- विद्यास्वरूपिणी), २२७. गरुडध्वजवल्लभा (विष्णु की परम प्रिया), २२८. गर्वापहारिणी ( अभिमान का नाश करनेवाली), २२९. गोदा (गौ अथवा पृथ्वी का दान करने वाली), २३०. गोकुलस्था, २३१. गदाधरा ॥ ४३ ॥ २३२. गोकर्णनिलयासक्ता (गोकर्ण नामक तीर्थस्थान में निवास हेतु तत्पर रहने वाली), २३३. गुह्यमण्डलवर्तिनी ( अत्यन्त गोपनीय मण्डल में विद्यमान रहने वाली), २३४. घर्मदा (ऊष्मा प्रदान करने वाली), २३५. घनदा ( मेघ उत्पन्न करने वाली), २३६. घण्टा, २३७. घोरदानवमर्दिनी ॥ ४४ ॥ २३८. घृणिमन्त्रमयी (सूर्य को प्रसन्न करने वाले मन्त्र रूप से विराजमान), २३९. घोषा (युद्ध में भयावह नाद करने वाली), २४०. घनसम्पातदायिनी (मेघों को जलवृष्टि की आज्ञा देनेवाली), २४१. घण्टारवप्रिया (घण्टा-ध्वनि से प्रसन्न होने वाली), २४२. घ्राणा (घ्राणेन्द्रिय की अधिष्ठात्री देवी), २४३. घृणिसन्तुष्ट-कारिणी (सूर्य को सन्तुष्ट करने वाली ) ॥ ४५ ॥ २४४. घनारिमण्डला ( अनेकानेक शत्रुओं से परिवृता), २४५. घूर्णा ( सर्वत्र भ्रमणशीला), २४६. घृताची (सरस्वतीरूपा अथवा रात्रि की अधिष्ठात्री देवी), २४७. घनवेगिनी ( प्रचण्ड वेगशाली), २४८. ज्ञानधातुमयी (चिन्मय धातुओं से बनी हुई), २४९. चर्चा, २५०. चर्चिता ( चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुपूजित), २५१. चारुहासिनी ॥ ४६ ॥ २५२. चटुला, २५३. चण्डिका, २५४. चित्रा, २५५. चित्रमाल्यविभूषिता ( अनेक प्रकार के रंगों की मालाओं से सुशोभित), २५६. चतुर्भुजा, २५७. चारुदन्ता, २५८. चातुरी, २५९. चरितप्रदा (सदाचार की शिक्षा प्रदान करनेवाली ) ॥ ४७ ॥ २६०. चूलिका (देवी-देवताओं में शीर्ष स्थान वाली), २६१. चित्रवस्त्रान्ता, २६२. चन्द्रमः कर्ण- कुण्डला (कानों में चन्द्राकार कुण्डल धारण करने वाली), २६३. चन्द्रहासा, २६४. चारुदात्री, २६५. चकोरी, २६६. चन्द्रहासिनी (चन्द्रमा को अपने मुखसौन्दर्य से आह्लादित करने वाली) ॥ ४८ ॥ २६७. चन्द्रिका, २६८. चन्द्रधात्री, २६९. चौरी ( अपनी शक्ति को गुप्त रखने वाली), २७०. चौरा (भक्तों का पाप हरण करने वाली), २७१. चण्डिका, २७२. चञ्चद्वाग्वादिनी ( चंचलतापूर्वक सम्भाषण करने वाली), २७३. चन्द्रचूडा, २७४. चोरविनाशिनी (चौरवृत्ति में लिप्त लोगों का विनाश करने वाली ) ॥ ४९ ॥ २७५. चारुचन्दनलिप्ताङ्गी (सुन्दर चन्दन से अनुलिप्त अंगों वाली), २७६. चञ्चच्चामरवीजिता (निरन्तर डुलाये जाते हुए चँवरों से सुसेवित), २७७. चारुमध्या (सुन्दर कटिप्रदेश वाली), २७८. चारुगतिः (मनमोहक गति वाली), २७९. चन्दिला, २८०. चन्द्ररूपिणी ॥ ५० ॥ २८१. चारुहोमप्रिया ( श्रेष्ठ हवन से प्रसन्न होने-वाली), २८२. चार्वाचरिता (उत्तम आचरण से सम्पन्न), २८३. चक्रबाहुका, २८४. चन्द्रमण्डलमध्यस्था, २८५. चन्द्रमण्डलदर्पणा ( चन्द्रमण्डलरूपी दर्पण को धारण करने वाली) ॥ ५१ ॥ २८६. चक्रवाकस्तनी (चक्रवाक के समान स्तनों वाली), २८७. चेष्टा, २८८. चित्रा, २८९. चारुविलासिनी, २९०. चित्स्वरूपा (चिन्मय स्वरूप वाली), २९९. चन्द्रवती, २९२. चन्द्रमा, २९३. चन्दनप्रिया ॥ ५२ ॥ २९४. चोदयित्री ( भक्तों को प्रेरणा प्रदान करने वाली), २९५. चिरप्रज्ञा (सनातन विद्या-स्वरूपिणी), २९६. चातका (चातक के समान दृढ संकल्पवाली), २९७. चारुहेतुकी, २९८. छत्रयाता (छत्रयुक्त होकर गमन करने वाली), २९९. छत्रधरा, ३००. छाया, ३०१. छन्दःपरिच्छदा (वेदों से ज्ञात होने वाली ) ॥ ५३ ॥ ३०२. छायादेवी, ३०३. छिद्रनखा, ३०४. छन्नेन्द्रियविसर्पिणी (जितेन्द्रिय योगियों के पास पधारने वाली), ३०५. छन्दोऽनुष्टुप्प्रतिष्ठान्ता (अनुष्टुप् छन्द में प्रतिष्ठित रहने वाली), ३०६. छिद्रोपद्रवभेदिनी (कपटरूप उपद्रव को शान्त करने वाली ) ॥ ५४ ॥ ३०७. छेदा (पापोंका उच्छेदन करने वाली), ३०८. छत्रेश्वरी, ३०९. छिन्ना, ३१०. छुरिका, ३११. छेदनप्रिया, ३१२. जननी, ३१३. जन्मरहिता, ३१४. जातवेदा ( अग्निस्वरूपिणी), ३१५. जगन्मयी ॥ ५५ ॥ ३१६. जाह्नवी, ३१७. जटिला, ३१८. जेत्री, ३१९. जरामरणवर्जिता, ३२०. जम्बूद्वीपवती, ३२१. ज्वाला, ३२२. जयन्ती, ३२३. जलशालिनी, ३२४. जितेन्द्रिया, ३२५. जितक्रोधा, ३२६. जितामित्रा, ३२७. जगत्प्रिया, ३२८. जातरूपमयी (परम सुन्दर रूप वाली), ३२९. जिह्वा, ३३०. जानकी, ३३१. जगती, ३३२. जरा (सन्ध्याकाल में वृद्धरूप धारण करने वाली ) ॥ ५६-५७ ॥ ३३३. जनित्री, ३३४. जह्नुतनया, ३३५. जगत्त्रयहितैषिणी (तीनों लोकों का हित चाहने वाली), ३३६. ज्वालामुखी, ३३७. जपवती (सदा ब्रह्म के जप में तत्पर रहने वाली), ३३८. ज्वरघ्नी, ३३९. जितविष्टपा (सम्पूर्ण जगत्पर विजय प्राप्त करनेवाली) ॥ ५८ ॥ ३४०. जिताक्रान्तमयी ( सबको आक्रान्त करने के लिये विजयशालिनी देवी), ३४१. ज्वाला, ३४२. जाग्रती, ३४३. ज्वरदेवता, ३४४. ज्वलन्ती, ३४५. जलदा, ३४६. ज्येष्ठा, ३४७. ज्याघोषास्फोटदिङ्मुखी (दिशाओं- विदिशाओं को अपने धनुष की स्पष्ट तथा भीषण टंकार से व्याप्त कर देने वाली ) ॥ ५९ ॥ ३४८. जम्भिनी (अपने दाँतों से दानवों को पीस डालने वाली), ३४९. जृम्भणा, ३५०. जृम्भा, ३५१. ज्वलन्माणिक्यकुण्डला ( प्रभायुक्त मणियों के कुण्डलों से सुशोभित), ३५२. झिंझिका ( झींगुर-सदृश तुच्छ प्राणी को भी अपने अंश से उत्पन्न करने वाली), ३५३. झणनिर्घोषा (कंकण की झंकार ध्वनि से सर्वदा मुखरित), ३५४. झंझामारुतवेगिनी ( झंझावात के सदृश भयावह वेगशाली ) ॥ ६० ॥ ३५५. झल्लरीवाद्यकुशला (झाँझ नामक वाद्य बजाने में अत्यन्त निपुण), ३५६. ञरूपा ( बलीवर्द के समान रूपवाली), ३५७. ञभुजा ( बलीवर्द के समान पराक्रमी भुजाओं वाली), ३५८. टङ्कबाणसमायुक्ता, ३५९. टङ्किनी, ३६०. टङ्कभेदिनी ॥ ६१ ॥ ३६१. टङ्कीगणकृताघोषा ( रुद्रगण के समान गम्भीर ध्वनि करनेवाली ), ३६२. टङ्कनीयमहोरसा (वर्णनीय महान् वक्ष:स्थल वाली), ३६३. टङ्कार-कारिणीदेवी, ३६४. ठठशब्दनिनादिनी ( ठ ठ शब्द के घोर निनाद से शत्रुओं को भयाक्रान्त करने वाली ) ॥ ६२ ॥ ३६५. डामरी, ३६६. डाकिनी, ३६७. डिम्भा, ३६८. डुण्डुमारैकनिर्जिता ( डुण्डुमार नामक राक्षस को परास्त करनेवाली), ३६९. डामरीतन्त्रमार्गस्था ( डामर-तन्त्र के मार्ग पर स्थित), ३७०. डमड्डमरुनादिनी (डमरु से डमड्-डमड् ध्वनि उत्पन्न करनेवाली ) ॥ ६३ ॥ ३७१. डिण्डीरवसहा ( डिण्डी नामक वाद्य की ध्वनि को सहन करने वाली), ३७२. डिम्भलसत्क्रीडा-परायणा (छोटे बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक क्रीडा करने में संलग्न), ३७३. दुण्ढिविघ्नेशजननी, ३७४. ढक्काहस्ता, ३७५. ढिलिव्रजा (ढिलि नामक गणसमूहों से समन्वित) ॥ ६४ ॥ ३७६. नित्यज्ञाना, ३७७. निरुपमा, ३७८. निर्गुणा, ३७९. नर्मदा, ३८०. नदी, ३८१. त्रिगुणा, ३८२. त्रिपदा, ३८३. तन्त्री, ३८४. तुलसीतरुणातरुः (वृक्षों में तरुणी तुलसीरूप से विराजमान ) ॥ ६५ ॥ ३८५. त्रिविक्रमपदाक्रान्ता ( भगवान् वामन के तीन डगों से आक्रान्त पृथ्वीरूपा), ३८६. तुरीयपदगामिनी (चतुर्थ पाद में गमन करने वाली), ३८७. तरुणादित्य- सङ्काशा (प्रचण्ड सूर्य के समान तेज वाली), ३८८. तामसी, ३८९. तुहिना (चन्द्रमासदृश शीतल किरणों वाली), ३९०. तुरा ( शीघ्र गमन करने वाली) ॥ ६६ ॥ ३९१. त्रिकालज्ञानसम्पन्ना, ३९२. त्रिवेणी (गंगा-यमुना-सरस्वतीरूपा), ३९३. त्रिलोचना, ३९४. त्रिशक्तिः (इच्छाशक्ति क्रियाशक्ति – ज्ञानशक्तिरूपा), ३९५. त्रिपुरा, ३९६. तुङ्गा, ३९७. तुरङ्गवदना ॥ ६७ ॥ ३९८. तिमिङ्गिलगिला (मत्स्यभोजी तिमिंगिल को भी खा जानेवाली), ३९९. तीव्रा, ४००. त्रिस्रोता, ४०१. तामसादिनी ( अज्ञानरूपी अन्धकार का भक्षण करने वाली), ४०२. तन्त्रमन्त्रविशेषज्ञा, ४०३. तनुमध्या, ४०४. त्रिविष्टपा ॥ ६८ ॥ ४०५. त्रिसन्ध्या, ४०६. त्रिस्तनी ( राजा मलय-ध्वज के यहाँ कन्या के रूप में विराजमान), ४०७. तोषा-संस्था (सदा सन्तुष्ट भाव में स्थित ), ४०८. तालप्रतापिनी ( ताली बजाकर शत्रुओं को आतंकित करने वाली), ४०९. ताटङ्किनी, ४१०. तुषाराभा (बर्फ के समान धवल कान्तिवाली), ४११. तुहिनाचलवासिनी (हिमालय में निवास करने वाली ) ॥ ६९ ॥ ४१२. तन्तुजालसमायुक्ता, ४१३. तारहारा- वलिप्रिया (चमकीले तारों से युक्त हार-पंक्तियों से प्रेम करने वाली), ४१४. तिलहोमप्रिया, ४१५. तीर्था, ४१६. तमालकुसुमाकृतिः ( तमालपुष्प के समान श्याम आकृतिवाली ) ॥ ७० ॥ ४१७. तारका (भक्तों को तारनेवाली), ४१८. त्रियुता, ४१९. तन्वी, ४२०. त्रिशङ्कुपरिवारिता (राजा त्रिशंकु के द्वारा उपास्यरूप में वरण की हुई), ४२१. तलोदरी (पृथ्वी को उदर के रूप में धारण करने वाली), ४२२. तिलाभूषा (तिल के पुष्प के सदृश नीलकान्ति वाली), ४२३. ताटङ्कप्रियवाहिनी (कानों में सुन्दर कर्णफूल धारण करने वाली ) ॥ ७१ ॥ ४२४. त्रिजटा, ४२५. तित्तिरी, ४२६. तृष्णा, ४२७. त्रिविधा, ४२८. तरुणाकृतिः, ४२९. तप्त-काञ्चनसङ्काशा (तप्त सोने के सदृश प्रभा वाली), ४३०. तप्तकाञ्चनभूषणा (तप्त सोने के सदृश दीप्तिवाले आभूषणों से अलंकृत) ॥ ७२ ॥ ४३१. त्रैयम्बका, ४३२. त्रिवर्गा, ४३३. त्रिकाल-ज्ञानदायिनी, ४३४. तर्पणा, ४३५. तृप्तिदा, ४३६. तृप्ता, ४३७. तामसी, ४३८. तुम्बुरुस्तुता, ४३९. तार्क्ष्यस्था (गरुड पर विराजमान रहने वाली), ४४०. त्रिगुणाकारा, ४४१. त्रिभङ्गी, ४४२. तनुवल्लरिः (कोमल लता की भाँति कमनीय अंगों वाली), ४४३. थात्कारी (युद्धभूमि में ‘थात् ‘ शब्द का उच्चारण करने वाली), ४४४. थारवा ( भय से मुक्त करने वाले शब्द का उच्चारण करने वाली), ४४५. थान्ता ( मंगलमयी देवी), ४४६. दोहिनी ( यथेच्छ दोहन करने योग्य कामधेनुस्वरूपिणी), ४४७. दीनवत्सला ॥ ७३-७४ ॥ ४४८. दानवान्तकरी, ४४९. दुर्गा, ४५०. दुर्गासुरनिबर्हिणी ( दुर्ग नामक राक्षस का वध करने वाली), ४५१. देवरीतिः (दिव्य मार्ग से सम्पन्न), ४५२. दिवारात्रि:, ४५३. द्रौपदी, ४५४. दुन्दुभिस्वना (दुन्दुभि के समान तीव्र ध्वनि करने वाली ) ॥ ७५ ॥ ४५५. देवयानी, ४५६. दुरावासा, ४५७. दारिद्र्योद्भेदिनी ( दरिद्रता दूर करने वाली), ४५८. दिवा, ४५९. दामोदरप्रिया, ४६० दीप्ता, ४६१. दिग्वासा (दिशारूपी वस्त्र वाली), ४६२. दिग्विमोहिनी ( समस्त दिशाओं को मोहित करने वाली ) ॥ ७६ ॥ ४६३. दण्डकारण्यनिलया, ४६४. दण्डिनी, ४६५. देवपूजिता, ४६६. देववन्द्या, ४६७. दिविषदा (सदा स्वर्ग में विराजमान रहने वाली), ४६८. द्वेषिणी (राक्षसों से द्वेष करने वाली), ४६९. दानवाकृतिः ( समयानुसार दानवसदृश आकृति धारण करने वाली ) ॥ ७७ ॥ ४७०. दीनानाथस्तुता, ४७१. दीक्षा, ४७२. दैवतादिस्वरूपिणी, ४७३. धात्री, ४७४. धनुर्धरा, ४७५. धेनुः, ४७६. धारिणी, ४७७. धर्मचारिणी, ४७८. धरंधरा, ४७९. धराधारा, ४८०. धनदा, ४८१. धान्यदोहिनी, ४८२. धर्मशीला, ४८३. धनाध्यक्षा, ४८४. धनुर्वेदविशारदा ॥ ७८-७९ ॥ ४८८. धर्मराजप्रिया, ४८९. ध्रुवा, ४९० धूमावती, ४८५. धृतिः, ४८६. धन्या ४८७ धृतपदा, ४९१. धूमकेशी ४९२. धर्मशास्त्रप्रकाशिनी, ४९३. नन्दा, ४९४. नन्दप्रिया, ४९५. निद्रा, ४९६. नृनुता ( मनुष्यों-द्वारा नमस्कृत), ४९७. नन्दनात्मिका, ४९८. नर्मदा, ४९९. नलिनी, ५००. नीला, ५०१. नीलकण्ठसमाश्रया (नीलकण्ठ महादेव की आश्रयरूपा ) ॥ ८०-८१ ॥ ५०२. नारायणप्रिया, ५०३. नित्या, ५०४. निर्मला, ५०५. निर्गुणा, ५०६. निधि:, ५०७. निराधारा, ५०८. निरुपमा, ५०९. नित्यशुद्धा, ५१०. निरञ्जना ( माया से रहित), ५११. नादबिन्दुकलातीता (नाद-बिन्दु-कला से परे), ५१२. नादबिन्दुकलात्मिका ( नादबिन्दुकला-रूपिणी), ५१३. नृसिंहरूपा, ५१४. नगधरा, ५१५. नृपनागविभूषिता (नागराज से विभूषित) ॥ ८२-८३ ॥ ५१६. नरकक्लेशशमनी, ५१७. नारायणपदोद्भवा (भगवान् विष्णु के चरण से प्रकट गंगास्वरूपिणी), ५१८. निरवद्या ( दोषरहित), ५१९ निराकारा, ५२०. नारदप्रियकारिणी, ५२१. नानाज्योतिः-समाख्याता (अनेकविध ज्योतिरूप से विख्यात), ५२२. निधिदा, ५२३. निर्मलात्मिका (विशुद्धस्वरूपा), ५२४. नवसूत्रधरा (नवीन सूत्र धारण करने वाली), ५२५. नीतिः, ५२६. निरुपद्रवकारिणी ( समस्त उपद्रवों को समाप्त कर देने वाली ) ॥ ८४-८५ ॥ ५२७. नन्दजा (नन्द की पुत्री), ५२८. नवरत्नाढ्या (नौ प्रकार के रत्नों से विभूषित), ५२९. नैमिषारण्यवासिनी (नैमिषारण्य में लिंगधारिणी ललितादेवी के रूप में विराजमान), ५३०. नवनीतप्रिया, ५३१. नारी, ५३२. नीलजीमूतनिः स्वना (नीले मेघ समान गर्जन करनेवाली), ५३३. निमेषिणी (निमेषरूपा), ५३४. नदीरूपा, ५३५. नीलग्रीवा, ५३६. निशीश्वरी (रात्रि कीअधिष्ठात्री देवी), ५३७. नामावलिः ( नानाविध नामों वाली), ५३८. निशुम्भघ्नी (निशुम्भ दैत्य का संहार करने वाली), ५३९. नागलोकनिवासिनी ॥ ८६-८७ ॥ ५४०. नवजाम्बूनदप्रख्या (नवीन सुवर्णसदृश कान्ति से सम्पन्न), ५४१. नागलोकाधिदेवता ( पाताल-लोक की अधिष्ठात्री देवी), ५४२. नूपुराक्रान्तचरणा ( नूपुरों की झंकार से समन्वित चरणों वाली), ५४३. नरचित्तप्रमोदिनी, ५४४. निमग्नारक्तनयना ( धँसी हुई लाल आँखों वाली), ५४५. निर्घातसमनिःस्वना (वज्रपात के समान भीषण शब्द करने वाली), ५४६. नन्दनोद्याननिलया (नन्दनवन में विहार करने वाली), ५४७. निर्व्यूहोपरिचारिणी (बिना व्यूहरचना के आकाश में स्वच्छन्द विचरण करने वाली ) ॥ ८८-८९ ॥ ५४८. पार्वती, ५४९. परमोदारा, ५५०. पर-ब्रह्मात्मिका, ५५१. परा, ५५२. पञ्चकोशविनिर्मुक्ता (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय — इन पाँच कोशों से रहित विग्रह वाली), ५५३. पञ्चपातकनाशिनी (पाँच प्रकार महापातकों का नाश करने वाली), ५५४. परचित्त-विधानज्ञा ( दूसरों के मनोभावों को समझने वाली), ५५५. पञ्चिका (पंचिकादेवी के नाम से प्रसिद्ध), ५५६. पञ्चरूपिणी, ५५७. पूर्णिमा, ५५८. परमा, ५५९. प्रीतिः, ५६०. परतेजः (परम तेजस्विनी), ५६१. प्रकाशिनी ॥ ९०-९१ ॥ ५६२. पुराणी, ५६३. पौरुषी, ५६४. पुण्या, ५६५. पुण्डरीकनिभेक्षणा (विकसित कमल के सदृश नेत्रों वाली), ५६६. पातालतलनिर्मग्ना (पाताल के तल तक प्रविष्ट होने की सामर्थ्य से सम्पन्न), ५६७. प्रीता, ५६८. प्रीतिविवर्धनी, ५६९. पावनी, ५७०. पादसहिता ( तीन पदों से शोभा पाने वाली), ५७१. पेशला (परम सुन्दर विग्रह वाली), ५७२. पवनाशिनी (वायु का भक्षण करने वाली), ५७३. प्रजापतिः, ५७४. परिश्रान्ता ( प्रयत्नशीला), ५७५. पर्वतस्तन-मण्डला (विशाल स्तनों से सुशोभित) ॥ ९२-९३ ॥ ५७६. पद्मप्रिया (कमलपुष्प अर्पित करने से प्रसन्न होने वाली), ५७७. पद्मसंस्था (कमल के आसन पर स्थित रहने वाली), ५७८. पद्माक्षी, ५७९. पद्मसम्भवा, ५८०. पद्मपत्रा (कमलपत्र की भाँति जगत् से निर्लिप्त रहनेवाली), ५८१. पद्मपदा ( कमल के समान कोमल चरणों वाली), ५८२. पद्मिनी (हाथ में कमल धारण करने वाली), ५८३. प्रियभाषिणी ॥ ९४ ॥ ५८४. पशुपाशविनिर्मुक्ता (पाशविक बन्धनों से मुक्त), ५८५. पुरन्ध्री (गृहस्थी के कार्य में संलग्न स्त्री के रूप में विराजमान), ५८६. पुरवासिनी, ५८७. पुरुषा ( पुरुषार्थमयी), ५८८. पुष्कला, ५८९. पर्वा (पर्वस्वरूपा), ५९०. पारिजातसुमप्रिया (पारिजात पुष्प से अत्यधिक प्रेम रखने वाली), ५९१. पतिव्रता, ५९२. पवित्राङ्गी, ५९३. पुष्पहासपरायणा (खिले हुए पुष्प के समान हँसने वाली), ५९४. प्रज्ञावतीसुता, ५९५. पौत्री, ५९६. पुत्रपूज्या, ५९७. पयस्विनी (प्राणियों के संवर्धन हेतु अमृततुल्य दुग्ध प्रदान करनेवाली) ॥ ९५-९६ ॥ ५९८. पट्टिपाशधरा, ५९९. पंक्तिः, ६००. पितृलोकप्रदायिनी, ६०१. पुराणी, ६०२. पुण्यशीला, ६०३. प्रणतार्तिविनाशिनी ( शरणागतजनों का क्लेश दूर करने वाली), ६०४. प्रद्युम्नजननी, ६०५. पुष्टा (पुष्टिरूपा), ६०६. पितामहपरिग्रहा (आदिशक्ति द्वारा पितामह ब्रह्मा के लिये अर्पित की गयी देवी), ६०७. पुण्डरीकपुरावासा (पुण्डरीकपुर अर्थात् चिदम्बरक्षेत्र में निवास करने वाली), ६०८. पुण्डरीकसमानना (कमल-सदृश सुन्दर मुख वाली) ॥ ९७-९८ ॥ ६०९. पृथुजङ्घा (विशाल जाँघों वाली), ६१०. पृथुभुजा (दीर्घ भुजाओं वाली), ६११. पृथुपादा (बृहत् चरणोंवाली), ६१२. पृथूदरी (विशाल उदरवाली), ६१३. प्रवालशोभा (मूँगे के समान कान्ति से सम्पन्न), ६१४. पिङ्गाक्षी, ६१५. पीतवासाः, ६१६. प्रचापला (अत्यन्त चंचल स्वभाव वाली), ६१७. प्रसवा (सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाली), ६१८. पुष्टिदा, ६१९. पुण्या, ६२०. प्रतिष्ठा, ६२१. प्रणवागतिः (ओंकार की मूलरूपा), ६२२. पञ्चवर्णा, ६२३. पञ्चवाणी, ६२४. पञ्चिका, ६२५. पञ्जरस्थिता (प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाली ) ॥ ९९-१०० ॥ ६२६. परमाया (परम मायारूपा), ६२७. परज्योतिः, ६२८. परप्रीतिः, ६२९. परागतिः, ६३०. पराकाष्ठा (ब्रह्माण्ड की अन्तिम सीमा), ६३१. परेशानी (परमेश्वरी), ६३२. पावनी, ६३३. पावकद्युतिः, ६३४. पुण्यभद्रा (पवित्र करने में अतीव दक्ष), ६३५. परिच्छेद्या (सबसे विलक्षण स्वभाव वाली), ६३६. पुष्पहासा, ६३७. पृथूदरी, ६३८. पीताङ्गी, ६३९. पीतवसना, ६४०. पीतशय्या (पीले रंग की शय्या पर शयन करने वाली), ६४१. पिशाचिनी (पिशाचों के गण साथ में रखनेवाली ) ॥ १०१-१०२ ॥ ६४२. पीतक्रिया (मधुपानक्रियारूपा), ६४३. पिशाचघ्नी, ६४४. पाटलाक्षी ( विकसित गुलाब- पुष्पसदृश नयनों वाली), ६४५. पटुक्रिया (चतुरता के साथ कार्य सम्पन्न करने वाली), ६४६. पञ्चभक्ष- प्रियाचारा ( भोज्य – चर्व्य – चोष्य – लेह्य और पेय – इन पाँचों प्रकार के पदार्थों का प्रेमपूर्वक आहार करने वाली), ६४७. पूतनाप्राणघातिनी ( पूतना के प्राणों का नाश करने वाली), ६४८. पुन्नागवनमध्यस्था (जायफल के वन के मध्य भाग में विराजमान रहने वाली), ६४९. पुण्यतीर्थनिषेविता ( पुण्यमय तीर्थों में निवास करने वाली), ६५०. पञ्चाङ्गी, ६५१. पराशक्तिः, ६५२. परमाह्लादकारिणी ( परम आनन्द प्रदान करने वाली) ॥ १०३-१०४ ॥ ६५३. पुष्पकाण्डस्थिता (फूलों के डंठलों पर स्थित रहने वाली), ६५४. पूषा, ६५५. पोषिताखिलविष्टपा (सम्पूर्ण संसार का भरण-पोषण करने वाली), ६५६. पानप्रिया, ६५७. पञ्चशिखा, ६५८. पन्नगोपरिशायनी ( सर्पों पर शयन करने वाली), ६५९. पञ्चमात्रात्मिका, ६६०. पृथ्वी, ६६१. पथिका, ६६२. पृथुदोहिनी (पर्याप्त दोहन करने वाली), ६६३. पुराणन्यायमीमांसा (पुराण, न्याय तथा मीमांसास्वरूपिणी), ६६४. पाटली, ६६५. पुष्पगन्धिनी, ६६६. पुण्यप्रजा, ६६७. पारदात्री, ६६८. परमार्गैकगोचरा ( एकमात्र श्रेष्ठ मार्ग द्वारा अनुभवगम्य), ६६९. प्रवालशोभा ( मूँगे से सुशोभित विग्रह वाली), ६७०. पूर्णाशा, ६७१. प्रणवा (ॐकारस्वरूपिणी), ६७२. पल्लवोदरी (नवीन पल्लव के समान सुकोमल उदरवाली) ॥ १०५ – १०७ ॥ ६७३. फलिनी (फलरूपिणी), ६७४. फलदा, ६७५. फल्गुः (फल्गु नामक नदी के रूप में विद्यमान), ६७६. फूत्कारी (क्रोधावस्था में फूत्कार करने वाली), ६७७. फलकाकृतिः (बाण के अग्रभाग के समान आकार वाली), ६७८. फणीन्द्रभोगशयना (नागराज शेषनाग के फन पर शयन करने वाली), ६७९. फणि- मण्डलमण्डिता (नागमण्डलों से सुशोभित ) ॥ १०८ ॥ ६८०. बालबाला (बालिकाओं में बालारूपिणी), ६८१. बहुमता, ६८२. बालातपनिभांशुका (उदयकाल के सूर्य की भाँति अरुण वस्त्र धारण करने वाली), ६८३. बलभद्रप्रिया, ६८४. वन्द्या, ६८५. वडवा, ६८६. बुद्धिसंस्तुता, ६८७. बन्दीदेवी, ६८८. बिलवती (गुहा में रहने वाली), ६८९. बडिशघ्नी ( कपट का विनाश करने वाली), ६९०. बलिप्रिया, ६९१. बान्धवी, ६९२. बोधिता, ६९३. बुद्धिः, ६९४. बन्धूककुसुमप्रिया ( बन्धूकपुष्प से प्रसन्न होने वाली ) ॥ १०९-११० ॥ ६९५. बालभानुप्रभाकारा (प्रात:कालीन सूर्य की प्रभा से युक्त विग्रह वाली), ६९६. ब्राह्मी, ६९७. ब्राह्मणदेवता, ६९८. बृहस्पतिस्तुता, ६९९. वृन्दा, ७००. वृन्दावनविहारिणी, ७०१. बालाकिनी ( बगुलों की पंक्तिसदृश रूप वाली), ७०२. बिलाहारा (कर्मों के दोष का निवारण करने वाली), ७०३. बिलवासा (बिलरूपिणी गुहा में निवास करने वाली), ७०४. बहूदका, ७०५. बहुनेत्रा ७०६. बहुपदा, ७०७. बहुकर्णावतंसिका (अनेक प्रकार के कर्णभूषणों से अलंकृत) ॥ १११-११२ ॥ ७०८. बहुबाहुयुता, ७०९. बीजरूपिणी, ७१०. बहुरूपिणी, ७११. बिन्दुनादकलातीता ( बिन्दु, नाद और कला से सर्वथा परे), ७१२. बिन्दुनादस्वरूपिणी ( बिन्दु और नाद स्वरूप वाली), ७१३. बद्धगोधा- ङ्गुलित्राणा (गोधा के चर्म का अंगुलित्राण धारण करने वाली), ७१४. बदर्याश्रमवासिनी (बदरिकाश्रम में निवास करने वाली), ७१५. बृन्दारका, ७१६. बृहत्स्कन्धा (विशाल कन्धों वाली), ७१७. बृहती, ७१८. बाणपातिनी (बाणों की वर्षा करने वाली) ॥ ११३-११४ ॥ ७१९. वृन्दाध्यक्षा (वृन्दा आदि कृष्णसखियों में प्रमुखतम), ७२०. बहुनुता (सभी के द्वारा नमस्कृत), ७२१. वनिता, ७२२. बहुविक्रमा, ७२३. बद्धपद्मा- सनासीना, ७२४. बिल्वपत्रतलस्थिता, ७२५. बोधिद्रुम- निजावासा (पीपल वृक्ष के नीचे अपना निवासस्थान बनाने वाली), ७२६. बडिस्था, ७२७. बिन्दुदर्पणा (अव्यक्त माया रूप दर्पण वाली), ७२८. बाला, ७२९. बाणासनवती (हाथ में धनुष धारण करने वाली), ७३०. वडवानलवेगिनी (वडवाग्नि के समान वेग धारण करने वाली ) ॥ ११५-११६ ॥ ७३१. ब्रह्माण्डबहिरन्तः स्था ( ब्रह्माण्ड के भीतर तथा बाहर दोनों स्थानों में रहने वाली), ७३२. ब्रह्मकङ्कण- सूत्रिणी (ब्रह्मा की कंकणसूत्रस्वरूपिणी), ७३३. भवानी, ७३४. भीषणवती ( दानवों के वध के लिये भयावह रूप धारण करने वाली), ७३५. भाविनी (जगत् की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाली), ७३६. भयहारिणी, ७३७. भद्रकाली, ७३८. भुजङ्गाक्षी, ७३९. भारती, ७४०. भारताशया (अपने ध्यान में रत पुरुषों के अन्तःकरण में विराजमान रहने वाली), ७४१. भैरवी, ७४२. भीषणाकारा, ७४३. भूतिदा ( ऐश्वर्य प्रदान करने वाली), ७४४. भूतिमालिनी ( विपुल ऐश्वर्य से सम्पन्न) ॥ ११७-११८ ॥ ७४५. भामिनी, ७४६. भोगनिरता, ७४७. भद्रदा, ७४८. भूरिविक्रमा ( अत्यधिक पराक्रम से सम्पन्न), ७४९. भूतवासा (सभी प्राणियों में विद्यमान रहनेवाली), ७५०. भृगुलता, ७५१. भार्गवी (भृगु- मुनि की शक्ति के रूप में विराजमान), ७५२. भूसुरार्चिता (ब्राह्मणों के द्वारा अर्चित), ७५३. भागीरथी, ७५४. भोगवती, ७५५. भवनस्था, ७५६. भिषग्वरा ( भवरोग दूर करने के लिये श्रेष्ठ वैद्यरूपा), ७५७. भामिनी, ७५८. भोगिनी, ७५९. भाषा, ७६०. भवानी, ७६१. भूरिदक्षिणा ॥ ११९-१२० ॥ ७६२. भर्गात्मिका (परम तेज से सम्पन्न), ७६३. भीमवती, ७६४. भवबन्धविमोचिनी, ७६५. भजनीया, ७६६. भूतधात्रीरञ्जिता ( प्राणियों का पालन तथा अनुरंजन करने वाली), ७६७. भुवनेश्वरी, ७६८. भुजङ्गवलया (साँपों को वलयाकृति के रूप में हाथों में धारण करने वाली), ७६९. भीमा, ७७०. भेरुण्डा (भेरुण्डा नाम से प्रसिद्ध देवी), ७७१. भागधेयिनी (परम सौभाग्यवती), ७७२. माता, ७७३. माया, ७७४. मधुमती (मधुपान करने वाली), ७७५. मधुजिह्वा, ७७६. मधुप्रिया (मधु से अतिशय प्रीति रखने वाली ) ॥ १२१-१२२ ॥ ७७७. महादेवी, ७७८. महाभागा, ७७९. मालिनी, ७८०. मीनलोचना (मछली के समान नेत्रों वाली), ७८१. मायातीता, ७८२. मधुमती, ७८३. मधुमांसा, ७८४. मधुद्रवा (मधु का अर्पण करने से भक्तों पर द्रवित होने वाली), ७८५. मानवी (मानवरूप धारण करने वाली), ७८६. मधुसम्भूता ( चैत्रमास में प्रकट होने वाली), ७८७. मिथिलापुरवासिनी (मिथिलापुरी में निवास करने वाली सीतास्वरूपिणी), ७८८. मधुकैटभ- संहर्त्री (मधु तथा कैटभ दानवों का संहार करने वाली), ७८९. मेदिनी (पृथ्वीस्वरूपिणी), ७९०. मेघमालिनी (मेघमालाओं से घिरी हुई) ॥ १२३-१२४ ॥ ७९१. मन्दोदरी, ७९२. महामाया, ७९३. मैथिली, ७९४. मसृणप्रिया (मधुर पदार्थों से प्रेम करने वाली), ७९५. महालक्ष्मी:, ७९६. महाकाली, ७९७. महाकन्या, ७९८. महेश्वरी, ७९९. माहेन्द्री (शची के रूप में विराजमान), ८००. मेरुतनया, ८०१. मन्दारकुसुमार्चिता ( मन्दार पुष्प से पूजित होने वाली), ८०२. मञ्जुमञ्जीरचरणा (चरणों में सुन्दर पायल धारण करने वाली), ८०३. मोक्षदा, ८०४. मञ्जुभाषिणी ॥ १२५-१२६ ॥ ८०५. मधुरद्राविणी (भक्ति से द्रवित होकर मधुर वचन बोलने वाली), ८०६. मुद्रा, ८०७. मलया (मलयाचल पर निवास करने वाली), ८०८. मलयान्विता ( मलयगिरि चन्दन से युक्त), ८०९. मेधा, ८१०. मरकतश्यामा (मरकतमणि के सदृश श्याम वर्ण वाली), ८११. मागधी, ८१२. मेनकात्मजा, ८१३. महामारी, ८१४. महावीरा, ८१५. महाश्यामा, ८१६. मनुस्तुता (मनु के द्वारा स्तुत), ८१७. मातृका, ८१८. मिहिराभासा ( सूर्य के समान प्रभा वाली), ८१९. मुकुन्दपदविक्रमा ( भगवान् विष्णु के पद का अनुसरण करने वाली ) ॥ १२७-१२८ ॥ ८२०. मूलाधारस्थिता (मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी के रूप में स्थित रहने वाली), ८२१. मुग्धा (सर्वदा प्रसन्नचित्त रहने वाली), ८२२. मणिपूरकवासिनी (मणिपूर नामक चक्र में निवास करने वाली), ८२३. मृगाक्षी (मृग के समान नेत्रों वाली), ८२४. महिषारूढा (महिष पर आरूढ़ होने वाली), ८२५. महिषासुरमर्दिनी (महिष नामक दानव का वध करने वाली ) ॥ १२९ ॥ ८२६. योगासना, ८२७. योगगम्या, ८२८. योगा, ८२९. यौवनकाश्रया (सदा यौवनावस्था में विराजमान), ८३०. यौवनी, ८३१. युद्धमध्यस्था, ८३२. यमुना, ८३३. युगधारिणी, ८३४. यक्षिणी, ८३५. योगयुक्ता, ८३६. यक्षराजप्रसूतिनी ( यक्षराज को उत्पन्न करने वाली), ८३७. यात्रा, ८३८. यानविधानज्ञा (विमानों की व्यवस्था का विशेष ज्ञान रखने वाली), ८३९. यदुवंश-समुद्भवा (यदुवंश में प्रादुर्भूत देवी ) ॥ १३०-१३१ ॥ ८४०. यकारादिहकारान्ता ( यकार से लेकर हकार तक सभी वर्णों के रूप वाली), ८४१. याजुषी (यजुर्वेदस्वरूपिणी), ८४२. यज्ञरूपिणी, ८४३. यामिनी, ८४४. योगनिरता, ८४५. यातुधानभयङ्करी (राक्षसों को भय उत्पन्न करने वाली ) ॥ १३२ ॥ ८४६. रुक्मिणी, ८४७. रमणी, ८४८. रामा, ८४९. रेवती, ८५०. रेणुका, ८५१. रतिः, ८५२. रौद्री, ८५३. रौद्रप्रियाकारा ( रौद्र आकृति से प्रीति करने वाली), ८५४. राममाता (कौसल्या रूप में विराजमान), ८५५. रतिप्रिया, ८५६. रोहिणी, ८५७. राज्यदा, ८५८. रेवा ( नर्मदासंज्ञक नदी), ८५९. रमा, ८६०. राजीवलोचना, ८६१. राकेशी, ८६२. रूपसम्पन्ना, ८६३. रत्नसिंहासनस्थिता ( रत्न से निर्मित सिंहासन पर विराजमान रहने वाली ) ॥ १३३-१३४ ॥ ८६४. रक्तमाल्याम्बरधरा, ८६५. रक्तगन्धानुलेपना, ८६६. राजहंससमारूढा, ८६७. रम्भा, ८६८. रक्तबलि- प्रिया, ८६९. रमणीययुगाधारा ( रमणीय युग की आश्रय-स्वरूपिणी), ८७०. राजिताखिलभूतला (सम्पूर्ण पृथ्वी-तल को सुशोभित करने वाली), ८७१. रुरुचर्मपरीधाना (मृगचर्म को वस्त्र के रूप में धारण करने वाली), ८७२. रथिनी, ८७३. रत्नमालिका ॥ १३५-१३६ ॥ ८७४. रोगेशी (रोगों पर शासन करने वाली), ८७५. रोगशमनी, ८७६. राविणी ( भयावह गर्जन करने वाली), ८७७. रोमहर्षिणी, ८७८. रामचन्द्रपदाक्रान्ता, ८७९. रावणच्छेदकारिणी (रावण का संहार करने वाली), ८८०. रत्नवस्त्रपरिच्छन्ना ( रत्न तथा वस्त्रों से सम्यक् आच्छादित), ८८९. रथस्था, ८८२. रुक्मभूषणा (स्वर्णमय आभूषणों से सुशोभित), ८८३. लज्जाधिदेवता, ८८४. लोला (अत्यन्त चंचल स्वभाव वाली), ८८५. ललिता, ८८६. लिङ्गधारिणी ॥ १३७-१३८ ॥ ८८७. लक्ष्मीः, ८८८. लोला, ८८९. लुप्तविषा (विष से निष्प्रभावित रहने वाली), ८९०. लोकिनी, ८९१. लोकविश्रुता, ८९२. लज्जा, ८९३. लम्बोदरीदेवी, ८९४. ललना (स्त्रीस्वरूपा), ८९५. लोकधारिणी ॥ १३९ ॥ ८९६. वरदा, ८९७. वन्दिता, ८९८. विद्या, ८९९. वैष्णवी, ९००. विमलाकृतिः, ९०१. वाराही (वराहरूप धारण करनेवाली), ९०२. विरजा, ९०३. वर्षा (वृष्टिरूपा), ९०४. वरलक्ष्मीः, ९०५. विलासिनी, ९०६. विनता, ९०७. व्योममध्यस्था, ९०८. वारि-जासनसंस्थिता (कमल के आसन पर विराजमान रहने वाली), ९०९. वारुणी ( वरुण की शक्तिस्वरूपिणी), ९१०. वेणुसम्भूता (बाँस से प्रकट होनेवाली), ९११. वीतिहोत्रा (अग्निस्वरूपिणी), ९१२. विरूपिणी (विशिष्टरूप से सम्पन्न) ॥ १४०-१४१ ॥ ९१३. वायुमण्डलमध्यस्था, ९१४. विष्णुरूपा, ९१५. विधिप्रिया, ९१६. विष्णुपत्नी ९१७. विष्णुमती, ९१८. विशालाक्षी (विशाल नेत्रों वाली), ९१९. वसुन्धरा, ९२०. वामदेवप्रिया ( रुद्राणी रूप से विद्यमान), ९२१. वेला (समय की अधिष्ठात्री देवी), ९२२. वज्रिणी, ९२३. वसुदोहिनी (सम्पदा का दोहन करने वाली), ९२४. वेदाक्षरपरीताङ्गी (वेदाक्षरों से युक्त अंगों वाली), ९२५. वाजपेयफलप्रदा (वाजपेय यज्ञ का फल प्रदान करने वाली), ९२६. वासवी, ९२७. वामजननी ( वामदेव की जननी), ९२८. वैकुण्ठनिलया, ९२९. वरा, ९३०. व्यासप्रिया, ९३१. वर्मधरा (कवच धारण करने वाली), ९३२. वाल्मीकिपरिसेविता (वाल्मीकि के द्वारा भलीभाँति सेवित) ॥ १४२-१४४ ॥ ९३३. शाकम्भरी (शाकम्भरी देवी नाम से प्रसिद्ध), ९३४. शिवा, ९३५. शान्ता, ९३६. शारदा, ९३७. शरणागतिः, ९३८. शातोदरी (तेज से युक्त उदरवाली), ९३९. शुभाचारा (पवित्र आचरण वाली), ९४०. शुम्भा-सुरविमर्दिनी (शुम्भ नामक दानव का वध करने वाली), ९४१. शोभावती, ९४२. शिवाकारा (कल्याणमयी आकृति धारण करने वाली), ९४३. शङ्करार्धशरीरिणी (शिव की अर्धांगिनी), ९४४. शोणा (रक्त वर्णवाली), ९४५. शुभाशया (मंगलकारी अभिप्राय से युक्त), ९४६. शुभ्रा, ९४७. शिरः सन्धानकारिणी (दैत्यों के मस्तक पर संधान करने वाली ) ॥ १४५-१४६ ॥ ९४८. शरावती (बाणों से रक्षा करनेवाली), ९४९. शरानन्दा (आनन्दपूर्वक बाण का संचालन करने वाली), ९५०. शरज्ज्योत्स्ना ( शरत्कालीन चन्द्रमा के समान धवल किरणों वाली), ९५१. शुभानना, १५२. शरभा (हरिणी -स्वरूपा ), ९५३. शूलिनी, ९५४. शुद्धा, ९५५. शबरी, ९५६. शुकवाहना ( शुक पर सवार होने वाली), ९५७. श्रीमती, ९५८. श्रीधरानन्दा ( विष्णु को आनन्द प्रदान करनेवाली), ९५९. श्रवणानन्ददायिनी (देवी-चरित्र सुनने से भक्तों को आनन्द प्रदान करने वाली), ९६०. शर्वाणी (शंकर की शक्तिरूपा भगवती पार्वती), ९६१. शर्वरीवन्द्या (रात्रि में पूजित होने वाली), ९६२. षड्भाषा ( छ: भाषाओं के रूप वाली), ९६३. षड्ॠतुप्रिया (सभी छ: ऋतुओं से प्रीति रखने वाली) ॥ १४७-१४८ ॥ ९६४. षडाधारस्थितादेवी (छ: प्रकार के आधारों में विराजमान होने वाली भगवती ), ९६५. षण्मुख-प्रियकारिणी (कार्तिकेय का प्रिय करने वाली), ९६६. षडङ्गरूपसुमतिसुरासुरनमस्कृता (षडंग रूप वाले सुमति नामक देवताओं तथा असुरों द्वारा नमस्कृत), ९६७. सरस्वती, ९६८. सदाधारा ( सत्य पर प्रतिष्ठित रहने वाली), ९६९. सर्वमङ्गलकारिणी ( सबका कल्याण करने वाली), ९७०. सामगानप्रिया, ९७१. सूक्ष्मा, ९७२. सावित्री, ९७३. सामसम्भवा ( सामवेद से प्रादुर्भूत होने वाली) ॥ १४९-१५० ॥ ९७४. सर्वावासा (सबमें व्याप्त रहने वाली), ९७५. सदानन्दा, ९७६. सुस्तनी, ९७७. सागराम्बरा (वस्त्र के रूप में सागर को धारण करने वाली), ९७८. सर्वैश्वर्यप्रिया (समस्त ऐश्वर्यों से प्रेम करने वाली), ९७९. सिद्धिः, ९८०. साधुबन्धुपराक्रमा ( सज्जनों तथा प्रिय भक्तजनों के लिये पराक्रम प्रदर्शित करने वाली), ९८१. सप्तर्षिमण्डलगता, ९८२. सोममण्डलवासिनी (चन्द्रमण्डल में विराजमान रहने वाली), ९८३. सर्वज्ञा, ९८४. सान्द्रकरुणा ( अतीव करुणामयी), ९८५. समानाधिकवर्जिता (सदा एक समान रहनेवाली ) ॥ १५१-१५२ ॥ ९८६. सर्वोत्तुङ्गा (सर्वोच्च स्थान रखने वाली), ९८७. सङ्गहीना (आसक्ति भावना से रहित), ९८८. सद्गुणा, ९८९. सकलेष्टदा (सभी अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली), ९९०. सरघा ( मधुमक्षिका-स्वरूपिणी), ९९१. सूर्यतनया ( सूर्यपुत्री), ९९२. सुकेशी (सुन्दर केशों से सम्पन्न ), ९९३. सोमसंहतिः ( अनेक चन्द्रमाओं की शोभा से सम्पन्न ) ॥ १५३॥ ९९४. हिरण्यवर्णा (स्वर्ण के समान वर्ण वाली), ९९५. हरिणी, ९९६. ह्रींकारी ( ह्रीं – बीजस्वरूपिणी), ९९७. हंसवाहिनी ( हंस पर सवार होने वाली), ९९८. क्षौमवस्त्रपरीताङ्गी (रेशमी वस्त्रों से ढँके हुए अंगों वाली), ९९९. क्षीराब्धितनया ( क्षीरसागर की पुत्रीस्वरूपा), १००० क्षमा, १००१. गायत्री, १००२. सावित्री, १००३. पार्वती, १००४. सरस्वती, १००५. वेदगर्भा, १००६. वरारोहा, १००७. श्रीगायत्री, १००८. पराम्बिका ॥ १५४-१५५ ॥ हे नारद! भगवती गायत्री का यह सहस्रनाम है। यह अत्यन्त पुण्यदायक, सभी पापों का नाश करने वाला तथा विपुल सम्पदाओं को प्रदान करनेवाला है ॥ १५६ ॥ इस प्रकार कहे गये ये नाम गायत्री को सन्तुष्टि प्रदान करने वाले हैं । ब्राह्मणों के साथ विशेष करके अष्टमी तिथि को इस सहस्रनाम का पाठ करना चाहिये । भलीभाँति जप, होम, पूजा और ध्यान करके इसका पाठ करना चाहिये। जिस किसी को भी इस गायत्रीसहस्रनाम का उपदेश नहीं करना चाहिये; अपितु योग्य भक्त, उत्तम शिष्य तथा ब्राह्मण को ही इसे बताना चाहिये । पथभ्रष्ट साधकों अथवा ऐसे अपने बन्धुओं के भी समक्ष इसे प्रदर्शित नहीं करना चाहिये ॥ १५७–१५९ ॥ जिस व्यक्ति के घर में यह गायत्री सम्बन्धी शास्त्र लिखा होता है, उसे किसी का भी भय नहीं रहता और अत्यन्त चपल लक्ष्मी भी उस घर में स्थिर होकर विराजमान रहती हैं ॥ १६० ॥ यह परम रहस्य गुह्य से भी अत्यन्त गुह्य है। यह मनुष्यों को पुण्य प्रदान कराने वाला, दरिद्रों को सम्पत्ति सुलभ कराने वाला, मोक्ष की अभिलाषा रखने वालों को मोक्ष प्राप्ति कराने वाला तथा सकाम पुरुषों को समस्त अभीष्ट फल प्रदान करने वाला है । इस सहस्रनाम के प्रभाव से रोगी रोगमुक्त हो जाता है तथा बन्धन में पड़ा हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है । ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी तथा गुरुपत्नीगमन सदृश महान् पाप करने वाले भी इसके एक बार के पाठ से पापमुक्त हो जाते हैं ॥ १६१-१६३ ॥ इसका पाठ करने से मनुष्य निन्दनीय दान लेने, अभक्ष्यभक्षण करने, पाखण्डपूर्ण व्यवहार करने और मिथ्याभाषण करने आदि प्रमुख पापों से मुक्त हो जाता है । हे ब्रह्मापुत्र नारद! मेरे द्वारा कहा गया यह परम पवित्र रहस्य मनुष्यों को ब्रह्म सायुज्य प्रदान करने वाला है। यह बात सत्य है, सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६४-१६५ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत बारहवें स्कन्ध का ‘गायत्रीसहस्त्रनामस्तोत्रवर्णन’ नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ Content is available only for registered users. 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