श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-द्वादशः स्कन्धः-अध्याय-01
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-द्वादशः स्कन्धः-प्रथमोऽध्यायः
पहला अध्याय
गायत्री जप का माहात्म्य तथा गायत्री के चौबीस वर्णों के ऋषि, छन्द आदि का वर्णन
गायत्रीविचारः

नारदजी बोले हे देव ! हे प्रभो ! आपने सदाचार- विधि का वर्णन कर दिया; उस विधि का माहात्म्य अत्यन्त अतुलनीय तथा सभी पापों का नाश करने वाला है ॥ १ ॥ आपके मुखकमल से निःसृत देवी के कथारूप अमृत का श्रवण तो कर लिया; किंतु आपने जिन चान्द्रायण आदि मुख्य व्रतों का वर्णन किया है, कर्तृसाध्य उन व्रतों को मैं अत्यन्त कष्टसाध्य समझता हूँ। इसलिये अब आप ऐसा उपाय बताइये, जो मनुष्यों के लिये सुखसाध्य हो । हे स्वामिन्! हे सुरेश्वर ! आप मुझे कृपापूर्वक उस कर्मानुष्ठान के विषय में बताइये; जो मंगलकारी, सिद्धि देने वाला तथा भगवती की प्रसन्नता की प्राप्ति करानेवाला हो ॥ २-४ ॥ सदाचार-विधान के अन्तर्गत आपने जिस गायत्री- विधि का वर्णन किया है, उसमें मुख्यतम वस्तु क्या है और क्या करने से अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है ? ॥ ५ ॥ आपने गायत्री के जिन चौबीस अक्षरों को बताया है, उन अक्ष रोंके कौन-कौन ऋषि, कौन-कौन छन्द तथा कौन-कौन देवता कहे गये हैं ? हे प्रभो ! यह सब मुझे बताइये; क्योंकि इस सम्बन्ध में मेरे मन में महान् कौतूहल उत्पन्न हो रहा है ॥ ६-७ ॥


श्रीनारायण बोले द्विज कोई दूसरा अनुष्ठान आदि कर्म करे अथवा न करे, किंतु एकनिष्ठ होकर केवल गायत्री का अनुष्ठान कर ले तो वह कृतकृत्य हो जाता है ॥ ८ ॥ मुने! तीनों संध्याओं में भगवान् सूर्य को अर्ध्य प्रदान करने वाला तथा तीन हजार गायत्री जप करने वाला पुरुष देवताओं का पूज्य हो जाता है ॥ ९ ॥ न्यास करे अथवा न करे, किंतु निष्कपट भाव से सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी भगवती का ध्यान करके गायत्री जप अवश्य करना चाहिये ॥ १० ॥ उसके एक अक्षर की भी सिद्धि हो जाने पर ब्राह्मणश्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, चन्द्र और अग्नि के साथ स्पर्धा करने योग्य हो जाता है ॥ ११ ॥ हे ब्रह्मन्! अब आप गायत्री के वर्ण, ऋषि, छन्द, देवता तथा तत्त्व आदि के विषय में क्रम से सुनिये ॥ १२ ॥

वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, शुक्र, कण्व, पराशर, महातेजस्वी विश्वामित्र, कपिल, महान् शौनक, याज्ञवल्क्य, भरद्वाज, तपोनिधि जमदग्नि, गौतम, मुद्गल, वेदव्यास, लोमश, अगस्त्य, कौशिक, वत्स, पुलस्त्य, माण्डुक, तपस्वियोंमें श्रेष्ठ दुर्वासा, नारद और कश्यप हे मुने! ये चौबीस ऋषि क्रम से गायत्री-मन्त्र के वर्णों के ‘ऋषि’ कहे गये हैं। गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, धृति, अतिधृति, विराट्, प्रस्तारपंक्ति, कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अक्षरपंक्ति, भूः भुवः स्वः तथा ज्योतिष्मतीहे महामुने! ये गायत्रीमन्त्र के वर्णों के क्रमशः छन्द  कहे गये हैं ॥ १३–१९ ॥

हे प्राज्ञ ! अब क्रमशः उन वर्णों के देवताओं के नाम सुनिये। पहले वर्ण के देवता अग्नि, दूसरे के प्रजापति, तीसरे के चन्द्रमा, चौथे के ईशान, पाँचवें के सविता, छठे के आदित्य, सातवें के बृहस्पति, आठवें के मित्रावरुण, नौवें के भग, दसवें के ईश्वर, ग्यारहवें के गणेश, बारहवें के त्वष्टा, तेरहवें के पूषा,, चौदहवें के इन्द्राग्नि, पन्द्रहवें के वायु, सोलहवें के वामदेव, सत्रहवें के मित्रावरुण, अठारहवें के विश्वेदेव, उन्नीसवें के मातृक, बीसवें के विष्णु, इक्कीसवें के वसु, बाईसवें के रुद्र, तेईसवें के कुबेर और चौबीसवें वर्ण के देवता अश्विनीकुमार कहे गये हैं । हे मुने! इस प्रकार मैंने गायत्री के चौबीस वर्णों के देवताओं का वर्णन कर दिया। यह नाम-संग्रह परम श्रेष्ठ और महान् पापों का विनाश करने वाला है, जिसके श्रवणमात्र से सांगोपांग गायत्रीजप का फल प्राप्त हो जाता है ॥ २०–२७ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत बारहवें स्कन्ध का ‘गायत्रीविचार’ नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

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