May 30, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-एकादशः स्कन्धः-अध्याय-17 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-एकादशः स्कन्धः-सप्तदशोऽध्यायः सत्रहवाँ अध्याय गायत्री-महिमा सन्ध्यादिकृत्यवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे नारद! भिन्न पादवाली गायत्री ब्रह्महत्या का शमन करने वाली है तथा अभिन्न पादवाली गायत्री के जप से ब्रह्महत्या का पाप लगता है । जो द्विज अभिन्न पादवाली गायत्री का जप करते हैं, वे कई सौ करोड़ कल्पों तक नीचे मुख करके लटके हुए रहते हैं ॥ १-२ ॥ हे सुव्रत ! धर्मशास्त्रों, पुराणों और इतिहासों में गायत्री विविध प्रकार की मानी गयी है; यथा — प्रणव से सम्पुटित तथा छः ॐकार से संयुक्त । पाँच प्रणव वाली गायत्री का जप करना चाहिये, ऐसा भी शास्त्रों का आदेश है । जितनी जप संख्या करना अभीष्ट हो, उसके आठवें-आठवें भाग के अन्त में गायत्री के चौथे पद का जप करना चाहिये । इस तरह से जप करने वाले उस द्विज को परम ज्ञानी समझना चाहिये; वह द्विज परम सायुज्य प्राप्त कर लेता है । जो इसके विपरीत गायत्री का जप करता है, वह जप व्यर्थ हो जाता है ॥ ३–५ ॥ एक सम्पुटवाली तथा छः ॐकार वाली जो गायत्री है, वह केवल एकनिष्ठ ब्रह्मचारियों के लिये है। गृहस्थ, ब्रह्मचारी अथवा मोक्ष की कामना करने वाले को तुरीया गायत्री का जप करना चाहिये । गायत्री का तुरीय पाद ‘परोरजसे सावदोम्’ यही है । हे नारद! अब मैं इसके ध्यान के विषय में बता रहा हूँ, जो जप के हृदयदेश में सूर्य-चन्द्र तथा अग्निमण्डल से युक्त, सांगोपांग फल को देने वाला है ॥ ६-७ ॥ हृदि विकसितपद्मं सार्कसोमाग्निबिम्बं प्रणवमयमचिन्त्यं यस्य पीतं प्रकल्प्यम् । अचलपरमसूक्ष्मं ज्योतिराकाशसारं भवतु मम मुदेऽसौ सच्चिदानन्दरूपः ॥ ८ ॥ प्रणवमय तथा अचिन्त्य विकसित कमल ही जिनका आसन है — वे ब्रह्म अचल, परम सूक्ष्म, ज्योतिस्वरूप तथा आकाश के साररूप हैं । वे सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर मेरी प्रसन्नता के हेतु बनें ॥ ८ ॥ त्रिशूल, योनि, सुरभि, अक्षमाला, लिंग, अम्बुज तथा महामुद्रा — ये सात मुद्राएँ गायत्री को प्रदर्शित करनी चाहिये ॥ ९ ॥ जो सन्ध्या हैं, वे ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी गायत्री हैं। ब्राह्मण को उन गायत्री का नित्य पूजन तथा नमन करना चाहिये ॥ १० ॥ ध्यान किये गये देवता की पाँच उपचारों से [मानसिक] पूजा करनी चाहिये । ‘लं’ पृथ्वीस्वरूपिणी देवी को गन्ध अर्पित करता हूँ, उन्हें बार- बार नमस्कार है। ‘हं’ आकाशस्वरूपिणी देवीको पुष्प अर्पित करता हूँ, उन्हें बार-बार नमस्कार है । तत्पश्चात् ‘यं’ वायुस्वरूपिणी देवी को धूप अर्पित करता हूँ — ऐसा कहना चाहिये । तदनन्तर ‘रं’ अग्निस्वरूपिणी देवी को दीपक अर्पित करता हूँ – ऐसा बोलना चाहिये । पुनः ‘वं’ अमृतस्वरूपिणी देवी को नैवेद्य भी ( उसी प्रकार ) अर्पित करना चाहिये ॥ ११–१३ ॥ अन्त में यं, रं, लं, वं, हं- ऐसा उच्चारण करके पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिये । इस प्रकार मानसिक पूजन करने के उपरान्त मुद्राएँ दिखानी चाहिये ॥ १४ ॥ मन से देवी का ध्यान करना चाहिये और मन्त्र का उच्चारण धीरे-धीरे करना चाहिये । इस समय सिर तथा गर्दन नहीं हिलाना चाहिये और दाँत नहीं दिखाने चाहिये ॥ १५ ॥ एक सौ आठ बार या अट्ठाईस बार अथवा अशक्त होने की स्थिति में दस बार ही विधिपूर्वक गायत्री का जप करना चाहिये, किंतु इससे कम जप इसके बाद ‘उत्तम०’ इत्यादि अनुवाक् मन्त्र कभी नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥ उच्चारण करके देवी का विसर्जन करना चाहिये । विद्वान् व्यक्ति को चाहिये कि जल में स्थित रहकर गायत्री मन्त्र का जप कभी भी न करे; क्योंकि वे अग्निमुखी कही गयी हैं — ऐसा कुछ महर्षियों ने कहा है । जप के अनन्तर सुरभि, ज्ञान, शूर्प, कूर्म, योनि, पंकज, लिंग और निर्वाण — ये आठ मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये । इसके बाद इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे — यदक्षरपदभ्रष्टं स्वरव्यञ्जनवर्जितम् ॥ १९ ॥ तत्सर्वं क्षम्यतां देवि कश्यपप्रियवादिनि । कश्यप के प्रति प्रिय सम्भाषण करने वाली हे देवि ! मेरे उच्चारण में अक्षरों तथा पदों का जो विचलन हुआ हो और स्वर तथा व्यंजनसम्बन्धी जो दोष रहा हो; उन सबको आप क्षमा कीजिये। हे महामुने ! इसके बाद गायत्री-तर्पण करना चाहिये ॥ १७–२० ॥ ‘गायत्री’ इसका छन्द कहा गया है, ‘विश्वामित्र’ ऋषि कहे गये हैं और ‘सविता’ इसके देवता कहे गये हैं । तर्पणक्रिया में इसका विनियोग किया जाता है । ‘भू: ‘ ऐसा बोलकर ऋग्वेद-पुरुष का तर्पण करता हूँ और ‘भुवः’ ऐसा उच्चारण करके यजुर्वेद का तर्पण करता हूँ — ऐसा कहे । ‘स्वः ‘ व्याहृति का उच्चारण करके सामवेद का तर्पण करता हूँ — ऐसा कहे और ‘महः ‘ ऐसा बोलकर अथर्ववेदका तर्पण करे । पुनः ‘जन: ‘ पद के साथ इतिहास – पुराण का तर्पण करता हूँ – ऐसा कहे । ‘तपः’ से सम्पूर्ण आगमस्वरूप पुरुष का और ‘सत्यं’ से सत्यलोकाख्य पुरुष का तर्पण करता हूँ — ऐसा बोलना चाहिये । तदनन्तर ‘ॐ भूः ‘ से भूर्लोकपुरुषका तर्पण करता हूँ, ‘भुवः’ से भुवर्लोकपुरुष का तर्पण करता हूँ तथा ‘स्व:’ से स्वर्गलोकपुरुष का तर्पण करता हूँ — ऐसा कहना चाहिये । इसके बाद ‘ॐ भूः’ से एकपदा नामवाली गायत्री का तर्पण कर रहा हूँ और ‘भुवः’ से द्विपदा गायत्री का तर्पण कर रहा हूँ – ऐसा बोलना चाहिये । ‘स्वः’ से त्रिपदा गायत्री का तर्पण कर रहा हूँ और ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ से चतुष्पदा गायत्री का तर्पण कर रहा हूँ — इस प्रकार बोलना चाहिये ॥ २१ – २८ ॥ तदनन्तर उषसी, गायत्री, सावित्री, सरस्वती, वेदमाता, पृथ्वी, अजा, कौशिकी, सांकृति और सार्वजिति — इन नामों को उच्चारित करके गायत्रीदेवी का तर्पण करना चाहिये । तर्पण के अन्त में शान्ति के लिये ‘जातवेदसम्०’ – इस ऋचा का पाठ करना चाहिये । इसी प्रकार विद्वान् पुरुष को चाहिये कि शान्ति के लिये ‘मानस्तोके ०’ – – इस मन्त्र का भी पाठ करे । तत्पश्चात् शान्तिके लिये त्र्यम्बकम्’ – इस मन्त्र का भी पाठ करना बताया गया है । शान्ति हेतु ‘तच्छंयो० ‘ इस मन्त्र का भी जप करना चाहिये। इसके बाद ‘देवा गातु०’ इस मन्त्र के द्वारा अपने दोनों हाथों से सम्पूर्ण अंगों का स्पर्श करना चाहिये और ‘स्योना पृथिवी० ‘ मन्त्र के द्वारा पृथ्वी को प्रणाम करना चाहिये । प्रणाम करते समय द्विजश्रेष्ठ को विधि के अनुसार अपने गोत्र आदि का उच्चारण कर लेना चाहिये । प्रातः कालीन सन्ध्या-सम्बन्धी इस प्रकार का विधान कहा गया है। सन्ध्याकर्म समाप्त करने के उपरान्त स्वयं अग्निहोत्र भी करना चाहिये ॥ २९–३४ ॥ तत्पश्चात् एकाग्रचित्त हो पंचायतनपूजा करनी चाहिये; इसमें शिवा, शिव, गणेश, सूर्य तथा विष्णु की अर्चना करनी चाहिये । पुरुषसूक्त, व्याहृति, मूल मन्त्र अथवा ‘ ह्रीश्च ते० ‘ इस मन्त्र से समाहितचित्त होकर पूजन करना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥ देवीकी पंचायतन पूजा में मण्डल के मध्य में भवानी का पूजन करना चाहिये । मण्डल के ईशानकोण में माधव, अग्निकोण में पार्वतीपति शंकर, नैर्ऋत्य कोण में गणेश और वायव्यकोण में सूर्य का अर्चन करना चाहिये । देवी-पंचायतन में देवताओं की स्थापना का यही क्रम है । मनुष्य सोलह ऋचाओं का पाठ करके सोलह प्रकार के पूजनोपचार अर्पित करे ॥ ३७-३८ ॥ सर्वप्रथम देवी की पूजा करके ही क्रमशः अन्य देवताओं की पूजा करनी चाहिये। देवी के पूजन से बढ़कर अधिक पुण्यप्रद कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता ॥ ३९ ॥ इसीलिये सन्ध्याकालों में सन्ध्या (गायत्री ) – की उपासना श्रुतियों में कही गयी है। अक्षत से भगवान् विष्णु की, तुलसी से गणेश की, दुर्वा से दुर्गा की तथा केतकी-पुष्प से शंकर की पूजा नहीं करनी चाहिये । मल्लिका, जातिपुष्प, कुटज, पनस, किंशुक, बकुल, कुन्द, लोध्र, करवीर, शिंशपा, अपराजिता, बन्धूक, अगस्त्य, मदंत, सिन्दुवार, पलाश – पुष्प, दूर्वांकुर, बिल्वदल, कुश – मंजरी, शल्लकी, माधवी, अर्क, मन्दार, केतकी, कर्णिकार, कदम्ब, नागकेसर, चम्पा, जूही और तगर आदि — ये पुष्प देवी को प्रसन्नता प्रदान करने वाले हैं ॥ ४०–४५ ॥ भवानी के लिये गुग्गुल का धूप तथा तिल के तेल का दीपक अर्पित करना चाहिये । इस प्रकार देवताओं का पूजन करके मूल मन्त्र का जप करना चाहिये। इस रीति से पूजा समाप्त करने के अनन्तर ही विद्वान् व्यक्ति को वेदाभ्यास में प्रवृत्त होना चाहिये । इसके बाद बुद्धिमान् पुरुष को दिन के तीसरे भाग में नियमपूर्वक अपनी वृत्ति के अनुसार अपने आश्रितवर्ग भरण-पोषणहेतु प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत ग्यारहवें स्कन्ध का ‘सन्ध्यादिकृत्यवर्णन’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥ Content is available only for registered users. 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