May 29, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-एकादशः स्कन्धः-अध्याय-05 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-एकादशः स्कन्धः-पञ्चमोऽध्यायः पाँचवाँ अध्याय जपमाला का स्वरूप तथा रुद्राक्ष धारण का विधान रुद्राक्षजपमालाविधानवर्णनम् ईश्वर बोले — हे षडानन ! अब मैं जपमाला का लक्षण बताऊँगा, उसे सुनो। रुद्राक्ष के मुख को ब्रह्मा तथा बिन्दु (ऊपरी भाग ) – को रुद्र कहा गया है । रुद्राक्ष का पुच्छ (नीचे का भाग) विष्णुरूप है, यह भोग तथा मोक्ष का फल प्रदान करता है ॥ ११/२ ॥ श्वेतवर्ण या रक्तवर्ण या मिश्रित वर्णवाले, छिद्रयुक्त, अखण्डित तथा काँटेदार पाँच मुख वाले पचीस रुद्राक्षों से गाय की पूँछ के आकार की एक अक्षमाला बनानी चाहिये ॥ २-३ ॥ [माला बनाने के लिये] एक दाने का मुख दूसरे दाने के मुख से संयोजित करते हुए एक दाने का पुच्छ (नुकीला भाग) दूसरे दाने के पुच्छ से जोड़ते जाना चाहिये। सुमेरु का मुख ऊपर की तरफ और नागपाश उसके ऊपर करना चाहिये ॥ ४ ॥ इस प्रकार गूँथी गयी मन्त्र-सिद्धिप्रदायिनी माला को पहले गन्धोदक और बाद में पंचगव्य से विधिवत् प्रक्षालित करके तथा पुनः शिवाभिषिक्त जल से स्नान कराने के पश्चात् इसमें मन्त्रों का न्यास करना चाहिये। शिवास्त्र-मन्त्र से स्पर्श करके कवच-मन्त्र (हुम्) -से अवगुंठन करना चाहिये ॥ ५-६ ॥ इसके बाद मूलमन्त्र से पूर्ववत् न्यास करे तथा गुरु आदि से न्यास कराये । पुनः सद्योजात आदि मन्त्रों से एक सौ आठ बार उस पर जल से प्रोक्षण करने के पश्चात् मूलमन्त्र का उच्चारण करके उसे शुद्ध भूमि पर रखकर उसके ऊपर जगत् के परम कारण साम्बसदाशिव का न्यास करना चाहिये ॥ ७-८ ॥ इस प्रकार प्रतिष्ठित की गयी माला समस्त कामनाओं का फल प्रदान करने वाली होती है। जिस देवता का जो मन्त्र सिद्ध करना हो, उसी मन्त्र से उस माला का पूजन करना चाहिये ॥ ९ ॥ जपमाला को मस्तक पर, गले में अथवा कान पर धारण करना चाहिये और संयतचित्त होकर रुद्राक्ष माला से ही जप करना चाहिये। परम श्रद्धा से युक्त होकर रुद्राक्ष की माला कण्ठ में, मस्तक पर, हृदय पर, पार्श्वभाग में, कान में तथा दोनों भुजाओं पर नित्य धारण करनी चाहिये ॥ १०-११ ॥ रुद्राक्ष के सम्बन्ध में अधिक कहने तथा बार-बार वर्णन करने से क्या लाभ ? अतः नित्य रुद्राक्ष धारण करना श्रेयस्कर है। विशेष करके स्नान, दान, जप, होम, बलिवैश्वदेव, देवपूजन, प्रायश्चित्त कर्म, श्राद्ध तथा दीक्षा के समय इसे अवश्य धारण करना चाहिये ॥ १२-१३ ॥ रुद्राक्ष धारण न करके मोहपूर्वक कुछ भी वैदिक कृत्य सम्पन्न करने वाला ब्राह्मण निश्चितरूप से नरक में पड़ता है ॥ १४ ॥ सुवर्ण अथवा मणि से जटित रुद्राक्ष मस्तक, कण्ठ, यज्ञोपवीत अथवा हाथ में धारण करना चाहिये । अन्य व्यक्ति के द्वारा धारण किया हुआ रुद्राक्ष अपने लिये शुद्ध तथा कल्याणकारी नहीं होता है ॥ १५ ॥ अपवित्र अवस्था में रुद्राक्ष नहीं धारण करना चाहिये; सर्वदा पवित्र अवस्था में ही इसे भक्तिपूर्वक धारण करना चाहिये। रुद्राक्ष के वृक्ष से चली हुई वायु के सम्पर्क में आकर उगे हुए तृण भी पुण्यलोक में जाते हैं और वहाँ से पुनः वे इस लोक में नहीं आते ॥ १६१/२ ॥ रुद्राक्ष धारण करने वाला मनुष्य पाप करके भी सभी पापों से मुक्त हो जाता है — ऐसा जाबालोपनिषद् में कहा गया है। रुद्राक्षधारण से पशु भी रुद्रत्व को प्राप्त हो जाते हैं; फिर मनुष्य होकर जो लोग रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं, उनकी बात ही क्या ! शिवभक्तों को एक रुद्राक्ष सिर पर सर्वदा अवश्य धारण करना चाहिये, इससे उनके सभी दुःखों का नाश हो जाता है तथा सभी पापों की समाप्ति हो जाती है । जो लोग परमात्मा शिव के नामों का उच्चारण करते हैं तथा जो रुद्राक्ष से अलंकृत रहते हैं, वे ही भगवान् के श्रेष्ठ भक्त होते हैं। अपने समस्त कल्याण की कामना करने वाले मनुष्य को कर्णपाश में, शिखा में, कण्ठ में, हाथ में तथा उदर पर रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १७–२११/२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, उनकी विभूतियाँ तथा सभी देवता भक्तिपूर्वक अवश्य ही रुद्राक्ष धारण करते हैं । गोत्रप्रवर्तक ऋषिगण, सभी के कूटस्थ मूल पुरुष, उनके वंशज तथा शुद्ध आत्मा वाले श्रौतधर्मावलम्बी लोग भी रुद्राक्ष अवश्य धारण करते हैं ॥ २२–२४ ॥ यदि आरम्भ में साक्षात् वेद- प्रतिपादित तथा मुक्तिदायक रुद्राक्ष को धारण करने में श्रद्धा न उत्पन्न हो, तो भी अनेक जन्मों के बाद भगवान् शिव के अनुग्रह से रुद्राक्ष धारण करने के प्रति स्वाभाविक रूप से इच्छा उत्पन्न हो जाती है । जाबालशाखा के सभी मुनि लोग अत्यन्त आदरपूर्वक रुद्राक्ष के माहात्म्य का पाठ करते हैं और मैंने भी रुद्राक्ष-माहात्म्य के विषय में पढ़ा है। हे पुत्र! रुद्राक्ष-धारण का फल तीनों लोकों में विख्यात है ॥ २५–२७ ॥ रुद्राक्ष-फल के दर्शन से महान् पुण्य मिलता है, इसके स्पर्श से करोड़ गुना अधिक पुण्य होता है तथा इसे धारण कर लेने पर मनुष्य सौ करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है । रुद्राक्ष माला से नित्य जप करने से वह सैकड़ों लाख करोड़ गुना तथा हजारों लाख करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥ जो अपने हाथ में, वक्ष:स्थल पर, कण्ठ में, दोनों कानों में तथा मस्तक पर रुद्राक्ष धारण करता है, वह साक्षात् रुद्र है; इसमें सन्देह नहीं है। वह सभी प्राणियों से अवध्य रहते हुए इस पृथ्वी पर रुद्र की भाँति निर्भय होकर विचरण करता है और शिवजी की तरह समस्त देवता तथा दानवों के लिये वन्दनीय हो जाता है ॥ ३०-३१ ॥ सभी मनुष्य भी रुद्राक्ष धारण करने वाले की निरन्तर वन्दना करते हैं । उच्छिष्ट की भाँति त्याज्य, निषिद्ध कर्मों में रत तथा सभी प्रकार के पापों से युक्त मनुष्य भी रुद्राक्ष धारण करने पर सभी पापों से मुक्त हो जाता है। गले में रुद्राक्ष बँधा हुआ कुत्ता भी यदि मर जाय तो वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है, फिर मनुष्य की बात ही क्या ? ॥ ३२-३३१/२ ॥ जप तथा ध्यान से विहीन रहता हुआ भी यदि कोई मनुष्य रुद्राक्ष धारण कर ले तो वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। यदि कोई एक भी रुद्राक्ष प्रयत्नपूर्वक धारण करता है तो वह अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके अन्त में रुद्रलोक में प्रतिष्ठित होता है। इसके बाद अब मैं रुद्राक्ष की और भी विधि का वर्णन करूँगा ॥ ३४–३६ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत ग्यारहवें स्कन्ध का ‘रुद्राक्षजपमालाविधानवर्णन’ नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥ Content is available only for registered users. 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