May 28, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-दशम स्कन्धः-अध्याय-13 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-दशम स्कन्धः-त्रयोदशोऽध्यायः तेरहवाँ अध्याय मनुपुत्रों की तपस्या, भगवती का उन्हें मन्वन्तराधिपति होने का वरदान देना, दैत्यराज अरुण की तपस्या और ब्रह्माजी का वरदान, देवताओं द्वारा भगवती की स्तुति और भगवती का भ्रामरी के रूप में अवतार लेकर अरुण का वध करना भ्रामरीचरित्रवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] इसके बाद अब आप शेष मनुओं की अद्भुत उत्पत्ति के विषय में सुनिये, जिसके स्मरणमात्र से देवीभक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥ १ ॥ वैवस्वत मनु के करूष, पृषध्र, नाभाग, दिष्ट, शर्याति तथा त्रिशंकु नामक उज्ज्वल यशवाले छः पुत्र थे। वे सब महान् पराक्रमी थे ॥ २-३ ॥ वे छहों पुत्र यमुना के पावन तट पर जाकर निराहार रहते हुए अपने श्वास पर नियन्त्रण रखकर वहीं स्थित होकर भगवती की उपासना करने लगे । भगवती की अलग-अलग पार्थिव मूर्ति बनाकर वे भाँति-भाँति के उपचारों से आदरपूर्वक उनकी पूजा करते थे। इसके बाद उन सभी महाबली तथा महातपस्वी मनुपुत्रों ने क्रमशः सूखे पत्तों, वायु, जल, धूम्र तथा सूर्य की किरणों के आहार पर जीवन धारण करते हुए घोर तपस्या की ॥ ३-६ ॥ तत्पश्चात् आदरपूर्वक देवी की अनवरत आराधना कर रहे उन पुत्रों के मन में समस्त मोहों को नष्ट कर देने वाली निर्मल बुद्धि जाग्रत् हुई ॥ ७ ॥ वे मनुपुत्र एकमात्र भगवती के चरणों में ही मन लगाये हुए थे। विशुद्ध बुद्धि के प्रभाव से उन्हें शीघ्र अपने ही भीतर सम्पूर्ण जगत् दिखायी पड़ने लगा । वह अद्भुत स्थिति थी । इस प्रकार बारह वर्षों के पश्चात् उनके तप से हजारों सूर्यों के समान कान्ति वाली जगत् की स्वामिनी देवेश्वरी प्रकट हुईं ॥ ८-१३ ॥ तब विमल आत्मा वाले वे छहों राजकुमार देवी को देखते ही विनम्र तथा भाव-विह्वल होकर भक्तिपूर्ण अन्तःकरण से उनकी स्तुति करने लगे ॥ १०१/२ ॥ राजकुमार बोले — हे महेश्वरि ! हे ईशानि! हे परमे ! हे करुणालये! हे वाग्भव बीजमन्त्र की आराधना से प्रसन्न होने वाली ! हे वाग्भव मन्त्र से प्रतिपादित होने वाली ! हे क्लींकाररूपी विग्रह वाली ! हे ‘क्लीं’ बीजमन्त्र से उपासित होने पर प्रीति प्रदान करने वाली! हे कामेश्वर के मन को प्रसन्नता प्रदान करने वाली ! हे परमेश्वर को सन्तुष्ट करने- वाली ! हे महामाये! हे मोदपरे ! हे महान् साम्राज्य देने वाली ! हे विष्णु, सूर्य, महेश, इन्द्र आदि के स्वरूप वाली ! हे भोग की वृद्धि करने वाली ! आपकी जय हो ॥ ११–१३१/२ ॥ इस प्रकार उन महात्मा राजपुत्रों के स्तुति करने पर प्रसन्नता से सुन्दर मुखवाली भगवती उनसे कल्याणमय वचन कहने लगीं ॥ १४१/२ ॥ देवी बोलीं — हे महात्मा राजपुत्रो ! तपस्या से युक्त आप लोग मेरी उपासना से निष्कल्मष तथा विमल बुद्धि वाले हो गये हैं। अब आप लोग अपना मनोवांछित वर शीघ्र ही माँग लीजिये। मैं अतीव प्रसन्न हूँ, इस समय आप लोगों के मन में जो भी होगा, वह सब मैं अवश्य दूँगी ॥ १५-१६१/२ ॥ राजपुत्र बोले — हे भगवति ! निष्कंटक राज्य, दीर्घजीवी सन्तान, अखण्डित भोग, यथेच्छ यश, तेज,बुद्धि तथा सभी से अपराजेयता हमें प्राप्त हो जाय, यही हमारे लिये हितकर वर है ॥ १७-१८ ॥ देवी बोलीं — ऐसा ही हो, आप सभी की जो मनोगत कामनाएँ हैं, वे पूर्ण होंगी। अब आप लोग मेरी एक और बात सावधान होकर सुन लीजिये ॥ १९ ॥ हे राजपुत्रो! मेरी कृपा से आप सभी लोग क्रम से मन्वन्तराधिपति बनेंगे, दीर्घजीवी सन्तानें तथा अनेक प्रकार के भोग आपको प्राप्त होंगे। अखण्डित बल, ऐश्वर्य, यश, तेज तथा विभूतियाँ — ये सब आपको प्राप्त होंगे ॥ २०-२१ ॥ श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] इस प्रकार उन राजकुमारों के भक्तिपूर्वक स्तुति करने पर साध्वी भ्रामरी जगदम्बिका उन्हें वर प्रदानकर तत्काल अन्तर्धान हो गयीं ॥ २२ ॥ उन महान् तेजस्वी सभी राजपुत्रों ने उस जन्म में महान् राज्य तथा समस्त सांसारिक सुखों का भोग किया ॥ २३ ॥ सावर्णि पद नामवाले वे सभी राजपुत्र अखण्डित सन्तानें उत्पन्न करके भूलोक में अपनी-अपनी वंश-परम्परा स्थापित कर दूसरे जन्म में क्रम से मन्वन्तरों के अधिपति हुए ॥ २४१/२ ॥ दक्षसावर्णि नामक पहले राजपुत्र नौवें मनु कहलाये । भगवती की कृपा से वे अव्याहत बल वाले तथा परम ऐश्वर्यशाली हुए ॥ २५१/२ ॥ मेरु सावर्णि नामक दूसरे राजपुत्र दसवें मनु हुए। महादेवी की कृपा से वे मन्वन्तरपति के रूप में प्रतिष्ठित हुए ॥ २६१/२ ॥ सूर्यसावर्णि नामक तीसरे राजपुत्र ग्यारहवें मनु के रूप में प्रसिद्ध हुए। अपनी तपस्या से भावित ये मनु परम उत्साह से सम्पन्न थे ॥ २७१/२ ॥ चन्द्रसावर्णि नामक चौथे राजपुत्र परम ऐश्वर्यशाली बारहवें मनु के रूप में अधिष्ठित हुए, जो देवी की उपासना के प्रभाव से मन्वन्तर के अधिपति हो गये ॥ २८१/२ ॥ रुद्रसावर्णि नाम वाले पाँचवें राजपुत्र तेरहवें मनु कहे गये हैं । महान् बल तथा महान् पराक्रम से सम्पन्न वे मनु पृथ्वी के स्वामी हुए ॥ २९१/२ ॥ विष्णुसावर्णि नामक छठे राजपुत्र चौदहवें मनु कहे गये हैं । भगवती के वरदान से वे लोकों में विख्यात राजा के रूप में प्रतिष्ठित हुए ॥ ३०१/२ ॥ ये सभी चौदहों मनु भगवती भ्रामरी की आराधना तथा उनके प्रसाद से महान् तेज तथा बल से सम्पन्न, लोकों में नित्य पूजनीय, वन्दनीय और महाप्रतापी हो गये थे ॥ ३१-३२ ॥ नारदजी बोले — ये भ्रामरी देवी कौन हैं, वे कैसे प्रकट हुईं तथा किस स्वरूपवाली हैं ? हे प्राज्ञ ! आप शोक का नाश करने वाले उस अद्भुत आख्यान का वर्णन कीजिये ॥ ३३ ॥ मैं भगवती के कथारूपी अमृत का पान करके भी तृप्त नहीं हो रहा हूँ। अमृत पीने वाले की मृत्यु तो सम्भव है, किंतु इस कथा का श्रवण करने वाले की मृत्यु सम्भव नहीं है ॥ ३४ ॥ श्रीनारायण बोले — हे नारद! अब मैं अचिन्त्य तथा अव्यक्तस्वरूपिणी जगज्जननी की मोक्षदायिनी अद्भुत लीला का वर्णन करूँगा; आप सुनिये ॥ ३५ ॥ भगवती श्रीदेवीके जो-जो चरित्र हैं, वे सब अहैतुकी दया से लोकहित में उसी प्रकार सम्पादित किये जाते हैं; जैसे माता के कार्य पुत्र के हितार्थ हुआ करते हैं ॥ ३६ ॥ पूर्वकाल में अरुण नामक एक महान् बलशाली दैत्य था । देवताओं से द्वेष रखने वाला वह घोर नीच दानव दैत्यों के निवासस्थान पाताल में रहता था ॥ ३७ ॥ देवताओं को जीतने की इच्छा वाला वह दैत्य हिमालय पर पहुँचकर उसके समीप अत्यन्त शीतल गंगाजल पद्मयोनि ब्रह्मा को प्रसन्न करने के उद्देश्य से यह सोचकर कठोर तप करने लगा कि एकमात्र वे ही हमारे रक्षक हो सकते हैं। सूखे पत्तों के आहार पर रहते हुए वह अपना श्वास रोककर तमोगुण से युक्त हो सकामभाव से योगपरायण होते हुए गायत्रीमन्त्र के जप में लीन हो गया । इसके बाद दस हजार वर्षों तक जलकण पीकर, पुनः दस हजार वर्षों तक वायु के आहारपर और पुनः दस हजार वर्षों तक वह पूर्णरूप से निराहार रहा ॥ ३८–४१ ॥ इस प्रकार तप करते हुए उस दैत्य के शरीर से अग्नि उठी, जो सम्पूर्ण जगत् को जलाने लगी; वह एक अद्भुत घटना थी ॥ ४२ ॥ यह क्या, यह क्या? ऐसा कहते हुए सभी देवता काँपने लगे तथा सभी प्राणी भयभीत हो गये । वे ब्रह्माजी की शरण में गये । वहाँ सभी श्रेष्ठ देवताओं ने वह बात बतायी। उसे सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माजी गायत्रीसहित हंस पर सवार होकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये ॥ ४३-४४ ॥ उस समय उस दैत्य के सैकड़ों नाड़ियों से युक्त शरीर में प्राणमात्र अवशिष्ट था, उसका उदर सूख गया था, शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था, आँखें मूँदकर वह ध्यान में अवस्थित था तथा अपने तेज से दूसरे अग्नि की भाँति प्रतीत हो रहा था — ऐसे उस दैत्य को ब्रह्माजी ने देखा और तब श्रवणमात्र से ही सन्तुष्टि प्रदान करने वाला यह वाक्य उससे कहा — हे वत्स ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे मन में जो भी हो, वह माँग लो ॥ ४५-४६१/२ ॥ ब्रह्माजी के मुख से अमृत की धारा के सदृश वाणी सुनकर अरुण ने जब आँखें खोलीं, तब उसने गायत्री को साथ लिये हुए, चारों वेदों को धारण किये हुए, हाथों में अक्षमाला तथा कुण्डिका ग्रहण किये हुए तथा शाश्वत ब्रह्म का जप करते हुए पद्मयोनि ब्रह्माजी को सामने देखा ॥ ४७-४८१/२ ॥ उसने ब्रह्माजी को देखते ही उठकर प्रणाम किया तथा अनेकविध स्तोत्रों से उनकी स्तुति करके अपनी बुद्धि में स्थित वर की याचना की कि मेरी मृत्यु कभी न हो ॥ ४९१/२ ॥ अरुण का यह वचन सुनकर ब्रह्माजी ने उसे आदरपूर्वक समझाया — हे दानवश्रेष्ठ ! जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि भी मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं तो फिर मृत्यु सम्बन्ध में अन्य लोगों की बात ही क्या ? अतएव तुम दूसरा उचित वर माँगो, जिसे मैं तुम्हें दे सकूँ, बुद्धिमान् लोग इस विषय में कभी भी आग्रह नहीं करते ॥ ५०-५२ ॥ ब्रह्माजी का यह वचन सुनकर उसने पुनः आदरपूर्वक कहा — हे प्रभो! हे देव! तो फिर मुझे यह वर दीजिये कि मेरी मृत्यु न युद्ध में हो, न अस्त्र- शस्त्र से हो, न पुरुष से हो, न स्त्री से हो, न दो पैर वाले, न चार पैरों वाले प्राणियों से और न तो उभय आकारवाले प्राणी से ही हो, इसके साथ-साथ मुझे अत्यधिक बल भी दीजिये, जिससे देवताओं पर मेरी विजय स्थापित हो जाय ॥ ५३-५४१/२ ॥ अरुण की यह बात सुनकर ब्रह्माजी ने तथास्तु — ऐसा वचन कह दिया और इस प्रकार उसे वर प्रदान करके वे तत्काल अपने लोक चले गये ॥ ५५१/२ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्माजी से वरदान पाकर अभिमान में चूर उस अरुण नामक दैत्य ने अपने आश्रित रहने वाले पातालवासी दैत्यों को बुला लिया ॥ ५६१/२ ॥ पाताल से आकर उन सभी दैत्यों ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया और देवताओं से युद्ध करने के अभिप्राय से देवपुरी के लिये एक दूत भेजा ॥ ५७१/२ ॥ दूत की बात सुनकर देवराज इन्द्र भय से काँपने लगे और शीघ्र ही देवताओं के साथ ब्रह्मलोक के लिये चल पड़े ॥ ५८१/२ ॥ वहाँ से पुनः ब्रह्मा तथा विष्णु को आगे करके वे देवता शिवलोक पहुँचे और वहाँ देवशत्रु राक्षसों के वध के लिये विचार-विमर्श करने लगे ॥ ५९१/२ ॥ उसी समय वह अरुण नामक दैत्यराज दैत्यसेना को साथ में लेकर स्वर्ग पहुँच गया । हे मुने! अपनी तपस्या से अनेक रूप धारण करने वाले उस दैत्य ने सूर्य, चन्द्रमा, यम तथा अग्नि के समस्त अधिकारों को पृथक्-पृथक् अपने अधीन कर लिया ॥ ६०-६११/२ ॥ तदनन्तर अपने-अपने स्थान से च्युत हुए सभी देवता कैलासपर्वत पर गये और एक-एक करके शंकरजी को अपनी दुःखगाथा सुनाने लगे ॥ ६२१/२ ॥ उस समय शंकरजी भी महान् सोच में पड़ गये कि अब ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिये ? क्योंकि ब्रह्माजी इसे वरदान दे चुके हैं, अतः इसकी मृत्यु न युद्ध में, न शस्त्रास्त्रों से, न पुरुष से, न स्त्री से, न दो पैर वाले प्राणियों से, न चार पैर वाले प्राणियों से और न तो उभय आकारवालों से ही सम्भव है । वे सभी इसी चिन्ता में व्याकुल थे; किंतु कुछ भी कर पाने में समर्थ नहीं हुए ॥ ६३–६५ ॥ इसी बीच वहाँ उच्च स्वर में सन्तोषदायिनी आकाशवाणी हुई — [ हे देवताओ ! ] तुम लोग भगवती भुवनेश्वरी की आराधना करो। वे ही तुम लोगों का कार्य सिद्ध करेंगी। गायत्रीजप में संलग्न दैत्यराज अरुण यदि गायत्री-उपासना का त्याग कर दे तो उसकी मृत्यु हो सकती है ॥ ६६-६७ ॥ इस दिव्य वाणी को सुनकर आदरणीय देवताओं ने परस्पर मन्त्रणा की । तदुपरान्त देवराज इन्द्र ने बृहस्पति को बुलाकर उनसे यह वचन कहा — हे गुरो ! आप देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये दैत्य अरुण के पास जाइये और जिस किसी भी तरह से उसके द्वारा गायत्री-जप का त्याग हो सके, वैसा प्रयत्न कीजिये । इधर, हम लोग भी ध्यानयोग में अवस्थित होकर परमेश्वरी की उपासना कर रहे हैं । वे प्रसन्न होकर आपकी सहायता अवश्य करेंगी ॥ ६८-७० ॥ गुरु बृहस्पति से इस प्रकार कहकर वे सभी देवता भगवती जम्बूनदेश्वरी के पास गये कि वे कल्याणी उस दैत्य के भय से त्रस्त हम देवताओं की रक्षा अवश्य करेंगी ॥ ७१ ॥ वहाँ पहुँचकर देवीयज्ञ परायण वे सभी देवता अत्यन्त निष्ठापूर्वक मायाबीज के जप में लीन होकर घोर तपश्चर्या करने लगे ॥ ७२ ॥ इधर, बृहस्पति शीघ्र ही दानव अरुण के पास पहुँच गये। तब आये हुए उन मुनिवर बृहस्पति से उस दैत्यराज ने पूछा — हे मुने! आप यहाँ कहाँ आ गये ? इस समय कहाँ से तथा किस उद्देश्य से यहाँ आपका आगमन हुआ है ? यह मुझे बताइये। मैं आपका पक्षधर तो हूँ नहीं, अपितु सदा से शत्रु ही हूँ ॥ ७३-७४ ॥ उसकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ बृहस्पति ने कहा — जो देवी हम लोगों की आराध्या हैं, उन्हीं की उपासना तुम भी अनवरत कर रहे हो, तो फिर यह बताओ कि क्या तुम हमारे पक्षधर नहीं हुए ? ॥ ७५१/२ ॥ हे सत्तम (नारद!) उन बृहस्पति की यह बात सुनकर देवमाया से मोहित हुए उस दैत्य ने अभिमानपूर्वक परम गायत्री-मन्त्र के जप का त्याग कर दिया। तब गायत्री-जप से विरत होते ही वह तेजशून्य हो गया ॥ ७६-७७ ॥ इसके बाद गुरु बृहस्पति अपना कार्य सिद्ध करके उस स्थान से चल दिये और वापस आकर उन्होंने इन्द्र से सम्पूर्ण वृत्तान्त बताया। इससे सभी देवता सन्तुष्ट हो गये और वे देवी परमेश्वरी की आराधना करने लगे ॥ ७८१/२ ॥ हे मुने! इस प्रकार बहुत समय बीत जाने के बाद किसी समय जगत् का कल्याण करने वाली जगज्जननी प्रकट हुईं। वे देवी करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाली थीं, करोड़ों कामदेव के सदृश सुन्दर, अंगों में अद्भुत अनुलेपन से युक्त, दो सुन्दर वस्त्रों से सुशोभित तथा विचित्र माला तथा आभूषणों से मण्डित थीं । वे अपनी मुट्ठी में अद्भुत प्रकार के भ्रमर लिये हुए थीं, वे भगवती अपने हाथों में वर तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थीं, शान्त तथा करुणामृत के सागर के सदृश अनेकविध भ्रमरों से युक्त पुष्पों की माला से वे शोभायमान थीं, वे अद्भुत प्रकार की असंख्य भ्रामरियों से घिरी हुई थीं और वे अम्बिका ‘ह्रींकार’ मन्त्र का गान कर रहे करोड़ों- करोड़ों भ्रमरों से सभी ओर से परिवृत थीं । वे सभी प्रकार के शृंगारों तथा वेषों से अलंकृत थीं तथा सभी वेदों द्वारा स्तुत हो रही थीं। वे सबकी आत्मारूपा, सर्वमयी, सर्वमंगलरूपिणी, सर्वज्ञ, सर्वजननी, सर्वरूपिणी, सर्वेश्वरी तथा कल्याणमयी हैं ॥ ७९-८५ ॥ उन्हें देखकर ब्रह्माजी को आगे करके दीन देवगण प्रसन्नचित्त होकर वेदों में प्रतिपादित देवी की स्तुति करने लगे ॥ ८६ ॥ ॥ देवा ऊचुः ॥ नमो देवि महाविद्ये सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि । नमः कमलपत्राक्षि सर्वाधारे नमोऽस्तु ते ॥ ८७ ॥ सविश्वतैजसप्राज्ञविराट्सूत्रात्मिके नमः । नमो व्याकृतरूपायै कूटस्थायै नमो नमः ॥ ८८ ॥ दुर्गे सर्गादिरहिते दुष्टसंरोधनार्गले । निरर्गलप्रेमगम्ये भर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ८९ ॥ नमः श्रीकालिके मातर्नमो नीलसरस्वति । उग्रतारे महोग्रे ते नित्यमेव नमो नमः ॥ ९० ॥ नमः पीताम्बरे देवि नमस्त्रिपुरसुन्दरि । नमो भैरवि मातङ्गि धूमावति नमो नमः ॥ ९१ ॥ छिन्नमस्ते नमस्तेऽस्तु क्षीरसागरकन्यके । नमः शाकम्भरि शिवे नमस्ते रक्तदन्तिके ॥ ९२ ॥ निशुम्भशुम्भदलनि रक्तबीजविनाशिनि । धूम्रलोचननिर्णाशे वृत्रासुरनिबर्हिणि ॥ ९३ ॥ चण्डमुण्डप्रमथिनि दानवान्तकरे शिवे । नमस्ते विजये गङ्गे शारदे विकचानने ॥ ९४ ॥ पृथ्वीरूपे दयारूपे तेजोरूपे नमो नमः । प्राणरूपे महारूपे भूतरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ९५ ॥ विश्वमूर्ते दयामूर्ते धर्ममूर्ते नमो नमः । देवमूर्ते ज्योतिमूर्ते ज्ञानमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥ ९६ ॥ गायत्रि वरदे देवि सावित्रि च सरस्वति । नमः स्वाहे स्वधे मातर्दक्षिणे ते नमो नमः ॥ ९७ ॥ नेति नेतीति वाक्यैर्या बोध्यते सकलागमैः । सर्वप्रत्यक्स्वरूपां तां भजामः परदेवताम् ॥ ९८ ॥ भ्रमरैर्वेष्टिता यस्माद् भ्रामरी या ततः स्मृता । तस्यै देव्यै नमो नित्यं नित्यमेव नमो नमः ॥ ९९ ॥ नमस्ते पार्श्वयोः पृष्ठे नमस्ते पुरतोऽम्बिके । नम ऊर्ध्वं नमश्चाधः सर्वत्रैव नमो नमः ॥ १०० ॥ कृपां कुरु महादेवि मणिद्वीपाधिवासिनि । अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिके जगदम्बिके ॥ १०१ ॥ जय देवि जगन्मातर्जय देवि परात्परे । जय श्रीभुवनेशानि जय सर्वोत्तमोत्तमे ॥ १०२ ॥ कल्याणगुणरत्नानामाकरे भुवनेश्वरि । प्रसीद परमेशानि प्रसीद जगतोरणे ॥ १०३ ॥ देवता बोले — सृष्टि, पालन तथा संहार करने वाली हे देवि ! हे महाविद्ये ! आपको नमस्कार है । हे कमल – पत्र के समान नेत्रों वाली ! आपको नमस्कार है । हे समस्त जगत् को धारण करने वाली ! आपको नमस्कार है ॥ ८७ ॥ हे विश्व, तैजस, प्राज्ञ तथा विराट्रूपके साथ सूक्ष्मरूप धारण करने वाली ! आपको नमस्कार है । व्याकृत तथा कूटस्थरूप वाली आप भगवती को बार- बार नमस्कार है ॥ ८८ ॥ हे दुर्गे ! हे उत्पत्ति आदि से रहित देवि ! हे दुष्टों के अवरोधार्थ अर्गलास्वरूपिणि! हे अटूट प्रेम से प्राप्त की जाने वाली ! हे तेजोमयी देवि ! आपको नमस्कार है ॥ ८९ ॥ हे श्रीकालिके ! आपको नमस्कार है । हे मातः ! आपको नमस्कार है । हे नीलसरस्वति ! हे उग्रतारे ! हे महोग्रे ! आपको नित्य बार-बार नमस्कार है ॥ ९० ॥ हे पीताम्बरे ! आपको नमस्कार है । हे देवि ! हे त्रिपुरसुन्दरि ! आपको नमस्कार है । हे भैरवि ! आपको नमस्कार है। हे मातंगि! हे धूमावति ! आपको बार- बार नमस्कार है ॥ ९१ ॥ हे छिन्नमस्ते ! आपको नमस्कार है । हे क्षीरसागरकन्यके ! आपको नमस्कार है । हे शाकम्भरि ! हे शिवे ! हे रक्तदन्तिके ! आपको नमस्कार है ॥ ९२ ॥ हे शुम्भ तथा निशुम्भ का संहार करने वाली ! हे रक्तबीज का विनाश करने वाली ! हे धूम्रलोचन का वध करने वाली! हे वृत्रासुर का ध्वंस करने वाली ! हे चण्ड तथा मुण्ड का दलन करने वाली ! हे दानवों का अन्त करने वाली ! हे शिवे ! हे विजये ! हे गंगे! हे शारदे! हे प्रसन्नमुखि ! आपको नमस्कार है ॥ ९३-९४ ॥ हे पृथ्वीरूपे ! हे दयारूपे ! हे तेजोरूपे ! आपको बार-बार नमस्कार है । हे प्राणरूपे ! हे महारूपे ! हे भूतरूपे ! आपको नमस्कार है ॥ ९५ ॥ हे विश्वमूर्ते! हे दयामूर्ते! हे धर्ममूर्ते ! आपको बार-बार नमस्कार है । हे देवमूर्ते ! हे ज्योतिमूर्ते ! हे ज्ञानमूर्ते ! आपको नमस्कार है ॥ ९६ ॥ हे गायत्रि ! हे वरदे! हे देवि ! हे सावित्रि ! हे सरस्वति! आपको नमस्कार है । हे स्वाहे ! हे स्वधे ! हे मातः ! हे दक्षिणे ! आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ९७ ॥ समस्त शास्त्र ‘नेति नेति’ वचनों से जिनका बोध करते हैं, उन प्रत्यक्स्वरूपा परादेवता भगवती की हम सभी देवगण उपासना करते हैं ॥ ९८ ॥ सदा भ्रमरों से घिरी रहने के कारण जो ‘भ्रामरी ‘ कही जाती हैं, उन भगवती को नित्य – नित्य अनेकशः प्रणाम है ॥ ९९ ॥ हे अम्बिके! आपके पार्श्व तथा पृष्ठ भाग में हमारा नमस्कार है। आपके आगे नमस्कार है, ऊपर नमस्कार है, नीचे नमस्कार है तथा सभी ओर नमस्कार है ॥ १०० ॥ हे मणिद्वीप में निवास करने वाली! हे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों की अधीश्वरि ! हे महादेवि ! हे जगदम्बिके ! हम सब पर कृपा कीजिये ॥ १०१ ॥ जगज्जननि ! हे देवि ! आपकी जय हो ! हे देवि ! हे परात्परे ! आपकी जय हो ! हे श्रीभुवनेश्वरि ! आपकी जय हो ! हे सर्वोत्तमोत्तमे ! आपकी जय हो ॥ १०२ ॥ हे कल्याण तथा गुणरत्नों की निधिस्वरूपे ! हे भुवनेश्वरि ! प्रसन्न हो जाइये। हे परमेश्वरि ! प्रसन्न हो जाइये । हे संसार की तोरणस्वरूपे ! प्रसन्न हो जाइये ॥ १०३ ॥ श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] देवताओं की यह प्रगल्भ तथा मधुर वाणी सुनकर मत्त कोयल के समान बोलने वाली वे जगदम्बा कहने लगीं ॥ १०४ ॥ देवी बोलीं — हे देवताओ ! वर प्रदान करने वालों में श्रेष्ठ मैं (आपसे) सदा प्रसन्न हूँ । आप लोगों के मन में जो अभिलाषा हो, उसे बतायें ॥ १०५ ॥ देवी का यह वचन सुनकर देवताओं ने अपने दुःख का कारण बतलाया। उन्होंने दुष्ट दैत्य के द्वारा जगत् में किये जाने वाले महान् पीडाकारक कृत्यों; सर्वत्र देवताओं, ब्राह्मणों और वेदों की अवहेलना तथा विनाश और अपने-अपने स्थान से देवताओं के च्युत कर दिये जाने का वर्णन बड़े विनयपूर्वक कर दिया। साथ ही ब्रह्माजी द्वारा उस दैत्य को दिये गये वरदान के विषय में भी देवताओं ने देवी से यथावत् कह दिया ॥ १०६-१०७१/२ ॥ तब देवताओं के मुख से यह वाणी सुनकर महाभगवती भ्रामरी ने अपने हस्तस्थित, पार्श्व- प्रान्तस्थित तथा अग्रभागस्थित अनेकरूपधारी भ्रमरों को प्रेरित किया; इसके साथ ही बहुत-से भ्रमरों को उत्पन्न भी किया, जिनसे तीनों भुवन व्याप्त हो गये ॥ १०८-१०९१/२ ॥ उस समय उन भ्रमरों के झुण्ड टिड्डियों के दल के समान निकलने लगे। उन भ्रमरों से सम्पूर्ण अन्तरिक्ष आच्छादित हो गया और पृथ्वी पर अन्धकार छा गया। आकाश में, पर्वतों के शिखरों पर, वृक्षों पर तथा वनों में सर्वत्र भ्रमर-ही-भ्रमर हो गये । वह दृश्य अत्यन्त आश्चर्यजनक था ॥ ११०-११११/२ ॥ वे सभी भ्रमर निकल-निकलकर दैत्यों के वक्ष:स्थल को उसी प्रकार छेदने लगे, जैसे क्रोध में भरी मधुमक्खियाँ मधु का दोहन करने वाले व्यक्ति को काटती हैं ॥ ११२१/२ ॥ उस समय अस्त्रों तथा शस्त्रों से किसी प्रकार भी सुरक्षा का उपाय सम्भव नहीं हो सका । दैत्य न युद्ध कर सके और न कोई सम्भाषण ही । उन्हें केवल अपनी मृत्यु दिखायी दे रही थी ॥ ११३१/२ ॥ जिस-जिस स्थान पर जो-जो दैत्य जिस- जिस स्थिति में विद्यमान थे, वे सब उसी रूप में उसी स्थान पर अट्टहास करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए ॥ ११४ ॥ उन दैत्यों में से किसी की भी एक-दूसरे से कोई बातचीत भी नहीं हो सकी और वे सभी दैत्यश्रेष्ठ क्षणभर में विनष्ट हो गये ॥ ११५१/२ ॥ इस प्रकार यह कार्य करके वे भ्रमर पुनः देवी के पास आ गये। यह तो आश्चर्य हो गया — ऐसा सभी लोग कहने लगे। जिन जगदम्बा की इस प्रकार की यह माया है, उनके लिये कौन – सा कार्य आश्चर्यजनक है ॥ ११६-११७ ॥ तदनन्तर हर्षरूपी समुद्र में डूबे हुए सभी देवगणों ने ब्रह्मा, विष्णु आदि को अग्रसर करके अनेक प्रकार के उपचारों से देवी की पूजा की, अपने हाथों से उन्हें नानाविध उपहार प्रदान किये और जय-जयकार करते हुए उन पर पुष्पों की वर्षा की ॥ ११८-११९ ॥ आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं, अप्सराएँ नृत्य करने लगीं, गन्धर्व आदि गाने लगे तथा श्रेष्ठ मुनिगण वेदपाठ करने लगे। मृदंग, ढोल, वीणा, ढाक, डमरू, घण्टा और शंख आदि की ध्वनियों से तीनों लोक व्याप्त हो गये ॥ १२०-१२१ ॥ उस समय अनेकविध स्तोत्रों से देवी का स्तवन करके अपनी अंजलियाँ मस्तक पर रखकर सभी देवता कहने लगे — हे मातः ! आपकी जय हो । हे ईशानि! आपकी जय हो ॥ १२२ ॥ उनके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना करने पर उनपर परम प्रसन्न भगवती महादेवी ने उन देवताओं को पृथक्-पृथक् वर प्रदान करके उन्हें अपनी विपुल भक्ति प्रदान की । इसके बाद देवताओं के देखते-देखते वे अन्तर्धान हो गयीं ॥ १२३१/२ ॥ [हे नारद!] इस प्रकार मैंने आपसे भगवती भ्रामरी के सम्पूर्ण महिमाशाली चरित्र का वर्णन कर दिया, जिसके पढ़ने तथा सुनने वालों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सुनने में आश्चर्यजनक यह [देवीचरित्र] संसाररूपी सागर से पार कर देने वाला है ॥ १२४-१२५ ॥ इसी प्रकार अन्य सभी मनुओं का चरित्र भी पाप को नष्ट करने वाला, देवी के माहात्म्य से परिपूर्ण तथा पढ़ने-सुननेवाले के लिये कल्याणप्रद है ॥ १२६ ॥ जो मनुष्य इस चरित्रको नित्य पढ़ता है तथा निरन्तर सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर देवी-सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ १२७ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत दसवें स्कन्ध का ‘भ्रामरीचरित्रवर्णन’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥ ॥ दशम स्कन्ध समाप्त ॥ Content is available only for registered users. 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