May 28, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-दशम स्कन्धः-अध्याय-11 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-दशम स्कन्धः-एकादशोऽध्यायः ग्यारहवाँ अध्याय सावर्णि मनु के पूर्वजन्म की कथा के प्रसंग में मधु-कैटभ की उत्पत्ति और भगवान् विष्णु द्वारा उनके वध का वर्णन देवीमाहात्म्ये मधुकैटभवधवर्णनम् राजा बोले — कालज्ञान रखने वालों में श्रेष्ठ ! आपने जिन देवी का वर्णन किया है, वे कौन हैं, वे प्राणियों को क्यों मोहित करती हैं और हे द्विज ! इसमें क्या कारण है ? वे देवी किसलिये आविर्भूत होती हैं, उनका स्वरूप क्या है तथा उनका स्वभाव कैसा है ? हे भूदेव ! इन सभी बातों को कृपा करके सम्यक् प्रकार से मुझे बताइये ॥ १-२ ॥ मुनि बोले — हे राजन् ! वे जगन्मयी भगवती जिस प्रकार उत्पन्न हुईं, जिनसे उत्पन्न हुईं तथा उन देवी का जैसा स्वरूप है — इन सबका मैं आपसे वर्णन कर रहा हूँ; ध्यान से सुनिये ॥ ३ ॥ [कल्प के अन्त में] जब योगराट् भगवान् नारायण विश्व का संहार करके समुद्र के भीतर शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में सोये हुए थे। तब उन देवदेव भगवान् जनार्दन के निद्रा के वशीभूत हो जाने पर उनके कानों के मैल से मधु तथा कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हुए। भयंकर आकृति वाले वे दोनों दानव ब्रह्माजी को मारने को उद्यत हो गये ॥ ४-५१/२ ॥ तब पद्मयोनि ब्रह्मदेव उन मधु-कैटभ दानवों को तथा देवदेव नारायण को निद्रित देखकर घोर चिन्ता में पड़ गये ॥ ६१/२ ॥ भगवान् विष्णु तो निद्रा की अवस्था में हैं और ये दोनों दानव दुर्जेय हैं। ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ तथा किस प्रकार शान्ति प्राप्त करूँ ? हे तात ! इस प्रकार चिन्तन कर रहे कमलयोनि महात्मा ब्रह्मा के मन में कार्य सिद्ध करने वाली यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि निद्रित अवस्था वाले ये भगवान् विष्णुदेव इस समय जिनकी अधीनता को प्राप्त हैं, सबको उत्पन्न करने वाली उन्हीं निद्रा देवी की शरण में मैं भी चला जाऊँ ॥ ७–९१/२ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ देवि देवि जगद्धात्रि भक्ताभीष्टफलप्रदे ॥ १० ॥ जगन्माये महामाये समुद्रशयने शिवे । त्वदाज्ञावशगाः सर्वे स्वस्वकार्यविधायिनः ॥ ११ ॥ कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिर्मदोत्कटा । व्यापिनी वशगा मान्या महानन्दैकशेवधिः ॥ १२ ॥ महनीया महाराध्या माया मधुमती मही । परापराणां सर्वेषां परमा त्वं प्रकीर्तिता ॥ १३ ॥ लज्जा पुष्टिः क्षमा कीर्तिः कान्तिः कारुण्यविग्रहा । कमनीया जगद्वन्द्या जाग्रदादिस्वरूपिणी ॥ १४ ॥ परमा परमेशानी परानन्दपरायणा । एकाप्येकस्वरूपा च सद्वितीया द्वयात्मिका ॥ १५ ॥ त्रयी त्रिवर्गनिलया तुर्या तुर्यपदात्मिका । पञ्चमी पञ्चभूतेशी षष्ठी षष्ठेश्वरीति च ॥ १६ ॥ सप्तमी सप्तवारेशी सप्तसप्तवरप्रदा । अष्टमी वसुनाथा च नवग्रहमयीश्वरी ॥ १७ ॥ नवरागकला रम्या नवसंख्या नवेश्वरी । दशमी दशदिक्पूज्या दशाशाव्यापिनी रमा ॥ १८ ॥ एकादशात्मिका चैकादशरुद्रनिषेविता । एकादशीतिथिप्रीता एकादशगणाधिपा ॥ १९ ॥ द्वादशी द्वादशभुजा द्वादशादित्यजन्मभूः । त्रयोदशात्मिका देवी त्रयोदशगणप्रिया ॥ २० ॥ त्रयोदशाभिधा भिन्ना विश्वेदेवाधिदेवता । चतुर्दशेन्द्रवरदा चतुर्दशमनुप्रसूः ॥ २१ ॥ पञ्चाधिकदशी वेद्या पञ्चाधिकदशी तिथिः । षोडशी षोडशभुजा षोडशेन्दुकलामयी ॥ २२ ॥ षोडशात्मकचन्द्रांशुव्याप्तदिव्यकलेवरा । एवंरूपासि देवेशि निर्गुणे तामसोदये ॥ २३ ॥ त्वया गृहीतो भगवान्देवदेवो रमापतिः । एतौ दुरासदौ दैत्यौ विक्रान्तौ मधुकैटभौ ॥ २४ ॥ एतयोश्च वधार्थाय देवेशं प्रतिबोधय । ब्रह्माजी बोले — हे देवि ! हे जगत् का पालन करने वाली देवि ! हे भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाली ! हे जगन्माये ! हे महामाये ! हे समुद्र में शयन करने वाली ! हे शिवे ! आपकी आज्ञा के अधीन होकर ही सभी अपना-अपना कार्य सम्पादित करते आप ही कालरात्रि हैं, आप ही महारात्रि हैं तथा आप ही भयंकर मोहरात्रि हैं । आप सर्वव्यापिनी, हैं ॥ १०-११ ॥ भक्तों के वशीभूत, सम्माननीया तथा महान् आनन्द की एकमात्र सीमा हैं । आप ही महनीया, महाराध्या, माया, मधुमती, मही तथा पर- अपर सभी में श्रेष्ठतम कही गयी हैं ॥ १२-१३ ॥ आप लज्जा, पुष्टि, क्षमा, कीर्ति, कान्ति, करुणा की प्रतिमूर्ति, कमनीया, विश्ववन्द्या तथा जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति के स्वरूप वाली हैं ॥ १४ ॥ आप ही परमा, परमेशानी तथा परमानन्दपरायणा हैं। आप ही एका (अद्वितीया) हैं, अतएव आप प्रथमा हैं । आप ही सद्वितीया ( मायासहित) होने के कारण द्वितीया भी हैं । आप ही धर्म-अर्थ-काम — इन तीनों का धाम होने से त्रयी अर्थात् तृतीया हैं । आप तुर्या अर्थात् सबसे परे होने के कारण चतुर्थी भी हैं । आप पंचमहाभूतों (पृथ्वी, तेज, जल, वायु, आकाश ) — की ईश्वरी होने के कारण पंचमी और काम-क्रोध-लोभ- मोह-मद-मत्सर — इन छः की अधिष्ठात्री होने के कारण षष्ठी हैं ॥ १५-१६ ॥ आप रवि आदि सातों वारों की ईश्वरी होने के कारण तथा सात-सात वर प्रदान करने के कारण सप्तमी हैं तथा आठ वसुओं की स्वामिनी होने के कारण अष्टमी हैं। आप ही नवग्रहमयी ईश्वरी, रम्य नौ रागों की कला तथा नवेश्वरी होने के कारण नवमी हैं। आप दसों दिशाओं में व्याप्त रमारूपिणी हैं तथा दसों दिशाओं में पूजित होती हैं, अतएव दशमी कही जाती हैं ॥ १७-१८ ॥ आप एकादश रुद्र द्वारा आराधित हैं, एकादशी तिथि के प्रति आपकी प्रीति है तथा आप ग्यारह गणों की अधीश्वरी हैं; अतः आप एकादशी हैं ॥ १९ ॥ आप बारह भुजाओं वाली हैं तथा बारह आदित्यों को जन्म देने वाली हैं, अतः द्वादशी हैं । आप मलमास – सहित तेरह मासस्वरूपा हैं, तेरह गणों की प्रिया हैं। और विश्वेदेवों की अधिष्ठात्री देवी हैं, अतः आप त्रयोदशी नाम से प्रसिद्ध हैं । आप चौदह इन्द्रों को वर प्रदान करने वाली तथा चौदह मनुओं को उत्पन्न करने वाली हैं, अतएव चतुर्दशी हैं ॥ २०-२१ ॥ आप पंचदशी अर्थात् कामराज – विद्यारूपा त्रिपुर- सुन्दरीरूप से जानी जाती हैं तथा आप पंचदशी तिथि- रूपिणी हैं। सोलह भुजाओं वाली, चन्द्रमा की सोलहवीं कला से विभूषित तथा चन्द्रमा की षोडश कलारूपी किरणों से व्याप्त दिव्य विग्रह वाली होने के कारण आप षोडशी हैं । हे तमोगुण से युक्त होकर प्रकट होनेवाली ! हे निर्गुणे! हे देवेशि ! आप इस प्रकार के विविध रूपवाली हैं ॥ २२-२३ ॥ देवाधिदेव लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णु को आपने निद्रा के वशवर्ती कर रखा है और ये दोनों मधु-कैटभ दानव अत्यन्त पराक्रमी तथा दुर्जेय हैं; अतएव आप इन दोनों का संहार करने के लिये देवेश्वर विष्णु को जगाइये ॥ २४१/२ ॥ मुनि बोले — [ ब्रह्माजी ] इस प्रकार स्तुति करने पर भगवान् को प्रिय तमोगुणमयी भगवती ने देवदेव विष्णु शरीर को छोड़कर उन दोनों दानवों को मोहित कर दिया ॥ २५१/२ ॥ उसी समय जगन्नाथ, परमात्मा, परमेश्वर भगवान् विष्णु जग गये और उन्होंने दानवों में श्रेष्ठ उन दोनों मधु-कैटभ को देखा ॥ २६१/२ ॥ तभी उन दोनों भयंकर दानवों ने मधुसूदन विष्णु को देखकर युद्ध करने का निश्चय किया और वे भगवान् के पास पहुँच गये ॥ २७१/२ ॥ तब सर्वव्यापी भगवान् मधुसूदन उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक बाहुयुद्ध करते रहे ॥ २८१/२ ॥ तत्पश्चात् जगन्माया के द्वारा विमोहित किये गये वे दोनों अत्यधिक बल से उन्मत्त दानव परमेश्वर विष्णु से कहने लगे — आप [ हम दोनों से ] वरदान माँग लीजिये ॥ २९१/२ ॥ उन दोनों की यह बात सुनकर आदिपुरुष भगवान् विष्णु ने यह वर माँगा — तुम दोनों मेरे द्वारा आज ही मार दिये जाओ ॥ ३०१/२ ॥ इसके बाद अत्यन्त बलशाली उन दोनों दानवों ने भगवान् श्रीहरि से पुनः कहा — जिस स्थान पर पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, वहीं पर आप हमारा वध कीजिये ॥ ३११/२ ॥ हे राजन्! ‘वैसा ही होगा’ – यह कहकर गदा तथा शंख धारण करने वाले भगवान् विष्णु ने उनके मस्तकों को अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट दिया ॥ ३२१/२ ॥ हे नृप ! हे महाराज ! इस प्रकार ब्रह्माजी के स्तवन करने पर सभी योगेश्वरों की ईश्वरी महाकाली भगवती प्रकट हुई थीं । हे महीपते ! अब आप महालक्ष्मी की उत्पत्ति के विषय में सुनिये ॥ ३३-३४ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत दसवें स्कन्ध का ‘देवीमाहात्म्य में मधु-कैटभवधवर्णन’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe