श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-दशम स्कन्धः-अध्याय-04
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-दशम स्कन्धः-चतुर्थोऽध्यायः
चौथ अध्याय
देवताओं का भगवान् शंकर से विन्ध्यपर्वत की वृद्धि रोकने की प्रार्थना करना और शिवजी का उन्हें भगवान् विष्णु के पास भेजना
रुद्रप्रार्थनम्

सूतजी बोले — [ हे मुनियो!] तत्पश्चात् इन्द्र आदि सभी प्रधान देवगण ब्रह्माजी को आगे करके भगवान् शिवकी शरण में गये ॥ १ ॥ गिरि पर शयन करने वाले तथा चन्द्रमा से सुशोभित मस्तक वाले देवदेव शिव को प्रणाम करके वे देवता उनके सम्मुख खड़े हो गये और सुन्दर महिमा से युक्त स्तोत्रों से उनका स्तवन करने लगे ॥ २ ॥

देवता बोले — हे देव ! हे गणाध्यक्ष ! हे पार्वती द्वारा पूजित चरणकमल वाले ! हे भक्तजन को आठों सिद्धियों की विभूतियाँ प्रदान करने वाले आपकी जय हो ॥ ३ ॥ महामायारूपी स्थली में विलास करने वाले, परमात्मा, वृषांक, अमरेश, कैलासवासी, अहिर्बुध्न्य, मान्य, मनु, मान प्रदान करने वाले, अज, अनेक रूपों वाले, अपनी आत्मा में रमण करने वाले, शम्भु, गणों के नाथ, गिरि पर शयन करने वाले, महान् ऐश्वर्य प्रदान करने वाले तथा महाविष्णु के द्वारा स्तुत किये जाने वाले आप महादेव को नमस्कार है ॥ ४-६ ॥ विष्णु के हृदयकमल में निवास करने वाले, महायोग में रत रहने वाले, योग से प्राप्त होने वाले, योगस्वरूप तथा योगियों के अधीश्वर को नमस्कार है ॥ ७ ॥ योगीश, योगों के फलदाता, दीनों को दान देने में तत्पर तथा दयासागर की साक्षात् मूर्ति आपको नमस्कार है ॥ ८ ॥ आर्त प्राणियों का कष्ट निवारण करने वाले, उग्र पराक्रम वाले, गुणमूर्ति, वृषध्वज, कालस्वरूप तथा कालों के भी काल आपको नमस्कार है ॥ ९ ॥

सूतजी बोले — यज्ञभोक्ता देवताओं के द्वारा इस प्रकार स्तुत किये गये वृषध्वज देवेश शिव उन श्रेष्ठ देवताओं से हँसते हुए गम्भीर वाणी में कहने लगे — ॥ १० ॥

श्रीभगवान् बोले — हे स्वर्ग में निवास करने वाले ! हे उत्तम पुरुषो ! मैं [आप लोगों की ] स्तुति से प्रसन्न हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ ! मैं आप सभी का मनोरथ पूर्ण करूँगा ॥ ११ ॥

देवता बोले — हे सर्वदेवेश ! हे गिरिश ! हे शशिशेखर ! हे महाबल ! आप दुःखी प्राणियों का कल्याण करने वाले हैं, अतएव हमारा भी कल्याण कीजिये ॥ १२ ॥ हे पुण्यात्मन् ! विन्ध्य नामक एक पर्वत है, जिसने सुमेरुगिरि से द्वेष करके आकाश में अत्यधिक ऊपर उठकर सूर्य का मार्ग रोक दिया है और वह सबके लिये दुःखदायी बन गया है ॥ १३ ॥ हे ईशान ! उसकी वृद्धि को रोक दीजिये और सबके लिये कल्याणकारी बन जाइये । सूर्य की गति अवरुद्ध हो जाने पर लोगों को कालज्ञान कैसे होगा ? लोक में स्वाहा तथा स्वधाकार के विलुप्त हो जाने पर हमें कौन शरण देगा ? भय से पीड़ित हम देवताओं के लिये एकमात्र शरणदाता तो केवल आप ही परिलक्षित हो रहे हैं । हे पार्वतीपते! हे देव ! आप हम पर प्रसन्न होइये और हमारे कष्ट का निवारण कीजिये ॥ १४-१५१/२

श्रीशिव बोले — हे देवताओ ! उस विन्ध्यगिरि की वृद्धि को रोकने की शक्ति इस समय मुझमें नहीं है । अब हम लोग भगवान् लक्ष्मीकान्त से यह समाचार कहेंगे ॥ १६१/२

वे कारणरूपधारी, समस्त कारणों के कारण, आत्मारूप, गोविन्द भगवान् श्रीविष्णु हम लोगों के पूज्य स्वामी हैं । अतएव उन्हीं के पास जाकर हम कहेंगे और वे हमारा दुःख दूर करने वाले होंगे ॥ १७-१८ ॥

इस प्रकार भगवान् शिव का कथन सुनकर इन्द्र तथा ब्रह्मासहित समस्त देवता शंकरजी को आगे करके थर-थर काँपते हुए शीघ्रतापूर्वक वैकुण्ठलोक के लिये प्रस्थित हुए ॥ १९ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत दसवें स्कन्ध का ‘रुद्रप्रार्थना’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

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